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  • अध्याय - 43 सरदार राजकीय संग्रहालय जोधपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 43 सरदार राजकीय संग्रहालय जोधपुर

    अध्याय - 43

    सरदार राजकीय संग्रहालय जोधपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1909 में लॉर्ड किचनर जोधपुर आया। उसे मारवाड़ में जंगी लाट कहा जाता है। किचनर को दिखाने के लिए मारवाड़ रियासत की विभिन्न प्रकार की हस्तकला वस्तुएं एकत्र की गईं तथा उन्हें एक स्थान पर प्रदर्शित करने के लिए इण्डस्ट्रीयल म्यूजियम की स्थापना की गई। उस समय जोधपुर रियासत पर महाराजा सरदारसिंह (ई.1895-1911) का शासन था। इसलिए यह सरदार संग्रहालय कहलाने लगा।

    सर्वप्रथम यह संग्रहालय सोजती गेट के बाहर एक भवन में खोला गया था। वहाँ से इस संग्रहालय को राईकाबाग के बाहर एक भवन में स्थानान्तरित किया गया तथा बाद में सूरसागर ले जाया गया। ई.1916 में भारत सरकार ने सरदार संग्रहालय को मान्यता प्रदान की। ई.1921 में सरदार संग्राहलय को दरबार स्कूल भवन में स्थानांतरित किया गया। ई.1935 में डीडवाना के सेठ मंगनीराम बांगड़ ने इस संग्रहालय और सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी के लिए जोधपुर स्थित सार्वजनिक उद्यान (पब्लिक पार्क) में एक नवीन भवन बनवाया। 17 मार्च 1936 को वायसराय विलिंगडन ने नवीन संग्रहालय भवन और सुमेर पब्लिक लाइब्रेरी का उद्घाटन किया।

    यह संग्रहालय अब सरदार राजकीय संग्रहालय कहलाता है तथा आज भी उसी सार्वजनिक उद्यान में स्थित है जो अब उम्मेद उद्यान के नाम से जाना जाता है। इस संग्रहालय में आठ मुख्य दीर्घाएं हैं जिनमें मारवाड़ रियासत के विभिन्न नगरों एवं गांवों तथा रियासत के बाहर से लाई गई ऐतिहासिक एवं कलात्मक सामग्री संगृहीत है।

    प्रस्तावना कक्ष

    प्रस्तावना कक्ष में संग्रहालय के विभिन्न कक्षों में प्रदर्शित सामग्री को प्रस्तावना के रूप में स्थान दिया गया है। इस कक्ष में पाषाण प्रतिमा, चित्र, लकड़ी, हाथीदांत, पीतल, चीड़, खस तथा मिट्टी से निर्मित कलात्मक वस्तुओं एवं जनजीवन की झांकियों को प्रदर्शित किया गया है।

    प्राणी कक्ष

    इस कक्ष में दुर्लभ प्राणियों के शरीरों अथवा उनके सिर को स्टफ करके प्रदर्शित किया गया है। इनमें शेर, मगरमच्छ, घड़ियाल, भेड़िया एवं सूअर आदि के सिर मुख्य हैं। प्राणी कक्ष में विभिन्न प्रकार के शंख, मछलियां, बिच्छू, कछुए, चिड़िया, अजगर आदि के स्टफ भी रखे गए हैं। इसी कक्ष में कायलाना झील तथा रेगिस्तान का सुंदर मनोरम दृश्य मॉडल्स के माध्यम से प्रदर्शित किए गए हैं।

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष

    इस कक्ष में प्राचीन खंजर, भाले, तलवारें, ढालें, कुल्हाड़ियां, बंदूकें, पिस्तौलें, गुप्तियां, बंदूकों के बेनट, तोप के गोले, शिरस्त्राण, हाथियों के अंकुश आदि प्रदर्शित हैं। बख्तरबंद, हवाई जहाज एवं भारवाहक पानी के जहाजों के मॉडल भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    प्रतिमा कक्ष

    इस कक्ष में प्रदर्शित मण्डोर दुर्ग से प्राप्त 4-5वीं शताब्दी के तोरण स्तम्भ उल्लेखनीय हैं जिन पर कृष्ण लीलाओं का अंकन है। इन लीलाओं में श्रीकृष्ण द्वारा अंगुली पर गोवर्धन धारण, दधिमंथन, शकटभंग, धेनुकासुर वध, कालियदमन, सुदामा के साथ क्रीड़ा, अरिष्ठासुर से युद्ध तथा केशीवध के दृश्य शामिल हैं। आगोलाई से प्राप्त शेषशायी विष्णु की भीमकाय प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है जिसमें विष्णु शेषशैय्या पर शयन कर रहे हैं। उनके पैरों के पास लक्ष्मी विराजमान हैं तथा सिराहने गदा रखी है। किराडू से प्राप्त 12वीं शताब्दी ईस्वी की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें पंखों का भी अंकन किया गया है। डीडवाना से प्राप्त काले पत्थर की योगनारायण प्रतिमा 12-13वीं सदी की है। योगनारायण कमलपुष्प पर आसीन हैं। प्रतिमा चतुर्भुजी है। भगवान ने वैजन्तीमाला धारण कर रखी है। यह प्रतिमा विदेशों में भी प्रदर्शन के लिए भेजी जाती रही है। ओसियां, बाप, देवांगना, चंद्रावती तथा निमाज से प्राप्त प्रतिमाएँ रखी गई हैं।

    महावीर कक्ष

    महावीर कक्ष में खींवसर से प्राप्त जीवन्त स्वामी की मनुष्याकार प्रतिमा प्रदर्शित है जो 10वीं शताब्दी ईस्वी की है। यह विभिन्न अलंकरणों से सुसज्जित है। इसके सिर के ऊपर छत्र है जिसके दोनों तरफ हाथी बने हुए हैं। इसी कक्ष में ओसियां से प्राप्त जीवन्त स्वामी एवं प्रार्श्वनाथ की बड़ी प्रतिमाएँ, सांचोर से प्राप्त जैन तीर्थंकरों की धातु प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित हैं। इस कक्ष में श्रीमद्भगवतगीता के कुछ चित्र, बारहमासा, राग-रागिनियों के चित्र, जम्बूद्वीप का मानचित्र एवं प्राचीन शिलालेखों के ठप्पे भी प्रदर्शित हैं।

    ऐतिहासिक कक्ष

    इस कक्ष में मारवाड़ रियासत के शासकों के मानवाकार चित्र, लघुचित्र, हाथीदांत पर बनाए गए चित्र एवं ढोला-मरवण का चित्र सम्मिलित हैं।

    मुद्रा संग्रह

    सरदार संग्रहालय में मुद्राओं (सिक्कों) का भण्डार विशेष निधि के रूप में सुरक्षित है। इन सिक्कों में मारवाड़ रियासत में विभिन्न कालखण्डों में प्रचलित मुद्राओं के साथ-साथ देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर प्रचलित मुद्राएं, राजपूताना की देशी रियासतों की मुद्राएं, मुस्लिम आक्रांताओं की मुद्राएं तथा ऑस्ट्रिया, फ्रांस, बगदाद, बुखारा एवं बेल्जियम आदि देशों की मुद्राएं भी शामिल हैं।

    सरदार संग्रहालय में मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मण्डोर में स्थित मण्डोर उद्यान की खुदाई के समय भूगर्भ से मिली 7वीं एवं 8वीं शताब्दी की चांदी की 30 गोलाकार छोटी-छोटी मुद्राएं सुरक्षित रखी गई हैं। इन मुद्राओं ने पश्चिमी भारत के प्राचीन इतिहास की कड़ियों को खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन मुद्राओं का तौल 7 से 9 ग्रेन के मध्य और परिधि 4 इंच है। इन सिक्कों के एक ओर अरबी में कलमा तथा दूसरी तरफ अरब गवर्नरों के नाम अंकित हैं।

    इन मुद्राओं पर अमीर अब्दुल्ला, वाली अब्दुल्ला, मुहम्मद बनु अमराविया, बनु अलविया, बनु अब्दुर्ररहमान, मुहम्मद आदि सिंध के रेगिस्तानी मार्ग से भारत आए अरब आक्रमणकारियों-के नाम अंकित हैं। गुजरात और राजस्थान में प्रचलित ई.650 से 1100 के सिक्के देसूरी, नागौर, सांभर, जालोर, चौहटन और सरदार शहर से प्राप्त हुए हैं जो सरदार संग्रहालय में सुरक्षित हैं। इसी प्रकार नागभट्ट के शासनकाल (ई.840-890) की 62 रजत मुद्राएं भी संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

    15वीं शताब्दी ईस्वी में गुजरात के मुस्लिम शासकों इब्राहिम शाह, मोहम्मद शाह, हुसैन शाह तथा हुसैन गौरी, एवं उसी काल में मालवा के मुस्लिम शासकों ग्यासशाह खिलजी, नासिरशाह खिलजी और मोहम्मद खिलजी (द्वितीय) के सांभर से प्राप्त सिक्के भी इस संग्रहालय में रखे गए हैं। इन सिक्कों से ज्ञात होता है कि 15वीं शताब्दी में दिल्ली, गुजरात एवं मालवा के मुस्लिम शासकों की गतिविधियां राजस्थान में अपने चरम पर थीं। 

    संग्रहालय में विविध प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं भी उपलब्ध हैं जिन पर दिल्ली के शासक जलालुद्दीन फिरोज (द्वितीय), अल्लाउद्दीन मोहम्मद शाह (द्वितीय) आदि के नाम अंकित हैं। ये सिक्के राजकीय कोषालय जोधपुर से प्राप्त हुए थे। जयपुर संग्रहालय द्वारा प्रदत्त गयासुद्दीन तुगलक (प्रथम), फिरोज शाह तुगलक (तृतीय), तैमूरशाह, अकबर, शाहजहाँ, शाहआलम (द्वितीय), फर्रूखसियर, मोहम्मदशाह, शाहआलम (द्वितीय), नादिरशाह, अबुल अब्बास एवं अहमद बगदाद (बसरा) के समय के सिक्कों के अलावा बुखारा, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया आदि देशों के सोने के सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    जोधपुर कोषालय से फ्रांस के सम्राट नैपोलियन बोनापार्ट, ऑस्ट्रिया, ईस्ट इण्डिया कंपनी, महारानी विक्टोरिया, बड़ौदा, उदयपुर, जयपुर आदि देशी रियासतों के सिक्के भी प्राप्त हुए थे जो इस संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त (द्वितीय), काश्मीर नरेश प्रतापादित्य (द्वितीय, ई.500), कन्नौज नरेश गोविन्द चन्द्र (ई.1112-60), मुगल बादशाह अकबर, जहांगीर एवं उसकी बेगम नूरजहाँ तथा शाहजहाँ के समय के सिक्के भी उपलब्ध हैं। आंध्र प्रदेश के वर्तमान नेलोर जिले की पुरानी रियासत के 13वीं सदी के सिक्के भी हैं जिन पर भुजवीर और मदन के नाम अंकित हैं।

    महेन्द्र वर्मा (प्रथम), जगदेव (प्रथम), जगदेव (द्वितीय), कृष्णराय (मैसूर) और वासुदेव के सोने के सिक्के भी संगृहीत है। लखनऊ संग्रहालय से प्राप्त थानेश्वर के शासक शिलादित्य, लखनऊ के शासक नसरूद्दीन मोहम्मद (प्रथम), अल्लाउद्दीन मोहम्मदशाह (द्वितीय), मुगल शासक जहांगीर, औरंगजेब, मोहम्मदशाह, शाहआलम (द्वितीय) आदि के चांदी के सिक्के जोधपुर संग्रहालय की विशेष निधि हैं। चांदी के सिक्कों में विलियम चतुर्थ, ईस्ट इंडिया कम्पनी, जोधपुर नरेश विजयसिंह (ई.1752-93) के विजयशाही सिक्के, महाराजा तख्तसिंह (ई.1843-73) के समय के सिक्के, कुमार गुप्त, सोमदेव आदि के सिक्कों का खजाना भी जोधपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।

    लखनऊ से इस संग्रहालय को जौनपुर के शासक हुसैनशाह, मोहम्मद बिन कासिम, शम्मुद्दीन और अल्लाउद्दीन मसूद के ताम्बे के सिक्के प्राप्त हुए हैं। ताम्बे के सिक्कों में नागौर एवं मेड़ता के सिक्के, इतबुद्दीन, मुबारकशाह (प्रथम), गयासुद्दीन तुगलक, जलालुद्दीन तुगलक, महमूद बिन कासिम (प्रथम), जलालुद्दीन, रजिया, शमसुद्दीन, नसरूद्दीन, सिकन्दरशाह लोदी और स्कन्दशाह लोदी के सिक्के भी संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

    संग्रहालय में सिक्कों को वर्गीकृत करके पृथक-पृथक केबिनेट में रखा गया है। वर्गीकृत सिक्कों में 160 सोने के, 820 चांदी के, 329 तांबे के, 2 शीशे के, 132 विलीयोन के, 10 निकल के और 4 इलक्ट्रोन के सिक्के हैं जिनका कुल योग 1465 है। ये सिक्के तीन कैबिनेटों मे रखे गए हैं। प्रथम कैबिनेट में वे सिक्के है जो प्राचीन युगीन इण्डोग्रीक, बैक्टीरियन, इण्डोपर्शियन कुषाण, प्राचीन दक्षिण एवं उत्तर साम्राज्य के शासकों के सिक्के हैं जो 400 ई.पू. से प्रारम्भिक मुगल युग के हैं। इनमें सबसे प्राचीन ई.पू. 400 की पंचमार्क मुद्राएं हैं।

    दूसरे केबिनेट में ई.1193 से 1858 तक के मुगलिया, तैमूर, बुखारी, सफवी, पर्शिया, बगदाद, तुर्की आदि के सिक्के हैं। इन सिक्कों में विभिन्न प्रकार के लेख और चिन्ह अंकित हैं। तीसरे कैबिनेट में बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, फ्रांस, इंग्लैण्ड, अफ्रीका, चीन, अमरीका, ईस्ट इंण्डिया कंपनी, ईरानी, डच इंडिया कंपनी और फ्रैंच ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ साथ बड़ौदा, उदयपुर, जयपुर, जामनगर, बीकानेर, बूंदी, हैदराबाद, जोधपुर, इंदौर, मालवा, जौनपुर, चंदेरी, सिरोही, आदि भारतीय रियासतों के सिक्के रखे हुए हैं।

    मारवाड़ में कुछ समय के लिए कन्नौज राज्य के सिक्के भी प्रचलित हुए, जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण सिक्के जोधपुर संग्रहालय में है। जोधपुर रियासत की जोधपुर, नागौर, पाली, सोजत एवं कुचामन आदि टकसालों में बने सिक्के भी सुरक्षित हैं। जोधपुर रियासत के सिक्कों का स्वतंत्र स्वरूप मुगल सल्तनत के पराभव काल में आरंभ हुआ जब महाराजा विजयसिंह ने अपने सिक्के चलाए। ये सिक्के विजयशाही के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाराजा विजयसिंह ने ई.1761 में राज्य की अलग टकसाल स्थापित की। उसने सर्वप्रथम मुगल बादशाह शाहआलम के समय (ई.1759-86) उसी के नाम के सिक्के ढाले। विजयशाही सिक्कों के पूर्व मारवाड़ में दिल्ली के बादशाहों के सिक्के प्रचलित थे।

    सरदार संग्रहालय जोधपुर में जहांगीर द्वारा जारी राशि बोधक सिक्कों में से मेष और कर्क राशि बोधक दो चांदी के रुपए भी संगृहीत है। ऐसा एक सिक्का जयपुर के केन्द्रीय संग्रहालय में एवं एक रुपया बीकानेर के राजकीय संग्रहालय में देखा जा सकता है।

    हस्तशिल्प सामग्री

    इस संग्रहालय के औद्योगिक कक्ष प्रथम एवं द्वितीय में मारवाड़ के कलाकारों द्वारा निर्मित हस्तशिल्प सामग्री का प्रदर्शन किया गया है। मकराना से प्राप्त संगमरमर की कलात्मक वस्तुओं पर सुनहरी काम किया गया है। जैसलमेर के पीले पत्थर एवं सांभर से प्राप्त नमक के क्रिस्टलों से बनी कलात्मक वस्तुएं, मेड़ता से प्राप्त हाथीदांत की वस्तुएं जिनमें रेलवे स्टेशन, चौपड़ एवं शतरंज की गोटियां, सोजत एवं रायपुर से प्राप्त लकड़ी की वस्तुएं जिनमें चारपाई के पाए, तश्तरियां और विभिन्न प्रकार के खिलौने सम्मिलित हैं। सीप से निर्मित कुछ सामग्री भी उल्लेखनीय है जिसमें इत्रदानियां एवं फोटो एलबम प्रमुख हैं।

    पीतल से निर्मित कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं जिनमें तश्तरियों पर मीनाकारी का काम, विभिन्न प्रकार के ताले एवं दीपक, लकड़ी पर चित्रकारी (कावड़) चमड़े पर कशीदाकारी, कांच पर सुनहरी काम की कलाकृतियां, सलमा सितारे का काम, बंधेज की साड़ियां, लहरिया, सुई का काम एवं एम्ब्रॉयडरी को प्रदर्शित किया गया है। इसी कक्ष में चमड़े से निर्मित कुप्पे, ईसर गणगोर की झांकी एवं काष्ठ निर्मित सुनहरी झूला प्रदर्शित किया गया है।

    सरदार संग्रहालय में जोधपुर और मेड़ता के कुशल कारीगरों द्वारा निर्मित कलाकृतियां संग्रहित की गई हैं। इनमें चारपाई के कलात्मक पाये सम्मिलित हैं जिनमें कारीगर ने वाद्य यंत्रों को धारण करती हुई भावमयी मनमोहक नारी प्रतिमाओं को उत्कीर्ण किया है। इन्हें बागरी काम के नाम से भी जाना जाता है। मेड़ता के कारीगरों द्वारा निर्मित तम्बाकू रखने का गोलाकृति का एक बक्सा है जिसमें कलात्मक ढंग से हाथीदांत की जड़ाई की गई है। खिलौनों की आकृति के चौपड़ के पासे जिन्हें लाख चढ़ा कर आकर्षक बनाया गया है, शतरंज की कलात्मक 32 गोटी, लाख चढ़ा हुआ लकड़ी का तीन दराज वाला बक्सा, गुलाबदानी, चकलौटा, तश्तरी, कलमदान, लोटा, गिलास, तम्बाकू रखने का बक्सा, बोतल, चिलम, खिलौने, गेंद, छड़ी, टेबिल लैम्प, कलश, बेलन, कटोरदान, गड़वा-चकरी, सीताफल, खरबूजा, बैंगन, केरी तुर्रा-स्टैण्ड, कप, तश्तरी, फलाकृति वाला बक्सा, हुक्का, इत्रदानी, ऊँट की नकेल, जैन साधुओं का पटरा और साधुओं का तूम्बा आदि विशेष स्थान रखते हैं।

    इन हस्तकलाकृतियों को बनाने के लिए कलाकारों ने रोहिड़ा, सागवान और शीशम की लकड़ी का प्रयोग किया है। इन कलाकृतियों पर लकड़ी की प्रकृति के अनुसार रंगों का चयन किया गया है। साथ ही कलाकृतियों को आकर्षक बनाने के लिए पच्चीकारी और खुदाई का कार्य किया गया है एवं उन पर हाथी दांत, सीप, धातु या अन्य काष्ठ का उसी के बराबर टुकड़ा काटकर लाख या अन्य मसाले से रिक्त स्थान पर चिपका दिया गया है। ऊपर लगी हुई लाख को चाकू से साफ करके चमक के लिए पॉलिश की गई है। कलाकृतियों पर लाख का लेप करके विविध प्रकार की चित्रकारी की गई है।

    लकड़ी की वस्तु पर लाख की विविध रंगों की तहें चढ़ाकर उनको रुखाई से तराशा गया है जिससे रंग उभर कर दृष्टिगत होते हैं। इस कार्य को 'लुक' कहा जाता है। 19वीं शताब्दी में जोधपुर 'लुक कला' का प्रमुख केन्द्र था।

    संग्रहालय में प्रदर्शित खिलौनों में अधिकांश लक्ष्मण कुम्हार द्वारा निर्मित हैं। इनकी कीमत 2 पैसे से 12 पैसे तक थी। कुछ खिलौने ऐसे भी हैं जिनकी कीमती रुपयों में आंकी गई थी। लकड़ी एंव मिट्टी के खिलौनों में विविध प्रान्तों एवं देशों मे रहने वाले व्यक्तियों के मॉडल भी प्रदर्शित हैं, जैसे जाट, श्रीमाली ब्राह्मण, राजपूत, बंगाली, फारसी, अफगानी और गुजराती आदि। उनके रहन-सहन और वेशभूषा, स्थल की संस्कृति का परिचय देते हैं।

    कुछ खिलौनों में विभिन्न व्यक्तियों को कार्यरत स्थिति में दर्शाया गया है, जैसे खेत जोतते हुए किसान, पानी का छिड़काव करते हुए भिश्ती, हजामत बनाते हुए नाई, धार धरते हुए सिकलीगर, गहने गढ़ते हुए सुनार, लकड़ी काटते हुए लकड़हारा, दर्जी, गन्धी, मोची, माली, रंगरेज, पोस्टमेन, कालबेलिया, सपेरा, सिपाही, कावड़िया, पत्थर का कार्य करते हुए सिलावट, बर्तन बनाते हुए ठठेरा, फल बेचते हुए फल विक्रेता, सफाई करते हुए सफाईकर्मी, मशालची, धोबी, भड़भूजा, लुहार, हमाल, तेली, हलवाई, खोमचेवाला, मशकिया, डॉक्टर, हाकिम, महाजन, दूधवाला, शिकारी आदि।

    खिलौनों में देवी-देवताओं को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। कुछ खिलौने ऐसे हैं जिन्हें देखकर बच्चा हंसते-हंसते-लोट-पोट हो जाता है, जैसे शराबी, जोकर, भंगेड़ी, चिलमची, अफीमची, भोजन भट्ट पाण्डे, होली का स्वांग, मोटे पेट वाला व्यक्ति आदि। कुछ 
    खिलौनों  में समूचा दृश्य ही मिट्टी में ढाल दिया गया है जैसे विवाह के दृश्य में वर-वधू तथा पण्डित, वेदी और सखियाँ आदि, शराबियों की महफिल, भगवान भजन में रत साधु-दल, नृत्य समूह, ऑपरेशन का दृश्य, ग्राम के घर, चटशाला का दृश्य आदि। इन खिलौनों में केश, नेत्र, मांसपेशियाँ आदि को विविध रंगों से सजाया गया है।

    लखनऊ से प्राप्त मिट्टी के फल एवं सब्जी, आम, केला, सिंगाड़ा, ककड़ी मक्का, काचरी, करेला, बैंगन, तोरू, आलू, काजू, बादाम, किशमिश अखरोट आदि इतने सच्चे प्रतीत होते हैं कि नेत्र धोखा खा जाते हैं। संग्रहालय में नमक के क्रिस्टलों से बने 100 वर्ष पुराने सुराही, कप, प्लेट, कटोरे, जाम, गिलास आदि भी दर्शनीय हैं। सांभर के नमक से बने इन बर्तनों की कुल संख्या 19 है। बर्तनों के साथ नमक से बने फूलदान, हाथी, घोड़ा भी दर्शनीय हैं।

    सोजत, बगड़ी, रायपुर, मकराना, मेड़ता आदि क्षेत्रों में निर्मित सुंदर कलाकृतियों को भी संजोया गया है। संगमरमर, चन्दन की लकड़ी, पीतल, ऊँट के चमड़े एवं जैसलमेर के पीले पत्थर से निर्मित कलात्मक सामग्री भी संगृहीत की गई है।

    कुल मिलाकर इस संग्रह में 397 पत्थर की मूर्तियां, 10 शिलालेख, 1,951 लघुचित्र, 12 मृदभाण्ड, 32 धातु निर्मित सामग्री, 178 शस्त्र, 1,11,703 सिक्के, 4,107 विविध प्रकार की सामग्री प्रदर्शित की गई है।

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