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  • अध्याय - 45 मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय जोधपुर

     02.06.2020
     अध्याय - 45 मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय जोधपुर

    अध्याय - 45

    मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय, जोधपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जोधपुर स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग के भीतर अनेक महल हैं जिनमें से कुछ महलों में संग्रहालय स्थापित किया गया है। ई.1922 में स्थापित इस संग्रहालय में जोधपुर राज परिवार की पीढ़ियों से संचित विविध कलाकृतियां एवं ऐतिहासिक वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। इस संग्रहालय में जोधपुर नरेशों का सिंहासन, विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, शाही-पोशाकें, झूले, हाथियों के हौदे, पालकियां, मारवाड़ शैली के चित्र, लोकवाद्य, पाग-पगड़ियां, साफे, पालने, तम्बू, माही मरातिब, हाथीदांत की कलाकृतियां आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    अस्त्र-शस्त्र खण्ड

    मेहरानगढ़ संग्रहालय के अस्त्र-शस्त्र खण्ड में जोधपुर राजवंश के शासकों द्वारा प्रयुक्त किए गए विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए हैं। इनमें कुछ ऐसी बन्दूकें हैं जिन्हें दो-दो, चार-चार व्यक्ति एक साथ उठाकर रखते थे तथा एक अन्य व्यक्ति उसे दागता था। संग्रहालय में तेज धार वाली चमचमाती हुई कटारें भी प्रदर्शित की गई हैं। इनमें से कुछ बंदूकें और कटारें मारवाड़ के शासकों को मुगल शासकों से उपहार स्वरूप अथवा सम्मान स्वरूप प्राप्त हुई थीं। इनमें शहंशाह अकबर द्वारा मारवाड़ के शासक को भेंट की गई एक कलात्मक मुगल तलवार विशेष महत्व की है। माना जाता है कि यह तलवार तैमूर लंग की थी। इस तलवार पर अरबी लिपि के सुन्दर अक्षरों में कुरान की आयतें उकेरी हुई हैं। इस संग्रह की एक कटार पर रामराव अंकित है। राव रणमल की तलवार का भार तीन किलो आठ सौ ग्राम है। इस तलवार का निर्माण काल ई.1428 से 1438 के मध्य का माना जाता है।

    लाल डेरा

    दौलतखाना में महाराजा अभयसिंह (ई.1724-49) द्वारा प्रयुक्त 'लाल डेरा' नामक विशाल तम्बू है जो 
    स्वर्णिम पीले वस्त्र पुष्पों की श्रेष्ठ कसीदाकारी से युक्त लाल मखमल से निर्मित है। इसे मुगल शैली का कपड़े का बना चलता-फिरता भव्य महल कहा जा सकता है। इस प्रकार के तम्बू मुगल शासक दिल्ली से बाहर प्रवास के दौरान प्रयुक्त करते थे। वे वर्ष के कई महीने ऐसे ही हवादार वस्त्र-महलों में रहकर समय बिताते थे। फराशखाना में ऐसे वस्त्र-महल डिजायन करके तैयार किए जाते थे। मौजूदा तम्बू दीवान-ए-हॉल के रूप में प्रयुक्त होता था। बादशाह खूबसूरत चांदनी से ढकी जाजम पर गद्दी लगाकर बैठता था और अपना दरबार लगाता था। उस काल में केवल मुगल शहजादों को लाल तम्बुओं की सुविधा प्राप्त थी। हिन्दू राजाओं को सफेद तम्बू प्रयोग करने की अनुमति थी। 18वीं शताब्दी में महाराजा अभयसिंह ने लाल रंग का तम्बू बनवाया। जब ई.1734 में राजपूत राजाओं के हुरड़ा सम्मेलन में महाराजा ने इस तम्बू का उपयोग किया तो उसकी शिकायत मुगल बादशाह से की गई। इस पर महाराजा ने सफाई भिजवाई कि चूंकि उस सम्मेलन में मैं आपके प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित था, इसलिए मैंने लाल रंग के डेरे का उपयोग किया।

    लाल डेरा लगभग तीन मीटर ऊंचा, सात मीटर चौड़ा और सात मीटर लम्बा है। भीतर तीन मीटर वर्ग के नाप का सिंहासन कक्ष है। सामने की कनात खाली और पीछे से बंद रहती है। डेरे का भीतरी भाग सुनहरी पीले फूलों से अलंकृत है जिस पर पीले रेशम पर सुनहरी कसीदाकारी है। फूल पत्तियों की डिजायन अत्यंत कलात्मक है और हल्के आसमानी रेशम की संकीर्ण धारियों पर वैसी ही फूल-पत्तियों की कसीदाकारी है। दीवारों से मिलने वाली भीतरी छत के निचले कोने में सुनहरी धागों की सजावट है। सैंकड़ों वर्ष पुराना लालडेरा अपने मौलिक स्वरूप में है। जोधपुर राजवंश के वर्तमान उत्तराधिकारी गजसिंह के सुझाव पर तम्बू में रेशमी धागे से लिपटे बांस से बने खिड़की-दरवाजों की चिकें लगाई गई हैं। ईस्वी 1985 में न्यूयार्क में आयोजित भारत महोत्सव में इस तम्बू प्रदर्शित किया गया था।

    हाथियों का हौदा कक्ष

    मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय में हाथियों का हौदा नामक एक कक्ष है। इसमें हाथी पर सवारी करने के हौदे रखे गए हैं जिनमें सोने-चांदी का उपयोग हुआ है। चांदी से निर्मित एक बहुत बड़ा हौदा मुगल शासक शाहजहाँ ने महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) को 18 दिसम्बर 1657 को उनके सम्मान में भेंट किया था। इस कक्ष में हाथी को नियंत्रण में रखे जाने वाले व्रम और भाले भी प्रदर्शित किए गए हैं। हाथी के पीठ पर रखे जाने वाले झूले, उनको बांधने के काम आने वाली लोहे की जंजीरें, राठौड़ों की नौ रियासतों के रंग बिरंगे झण्डे और रियासतों के नामपट्ट भी देखे जा सकते हैं।

    पालकी कक्ष

    संग्रहालय के पालकी कक्ष में विभिन्न प्रकार की पालकियाँ रखी गई हैं। इनमें 'महाडोल' नामक वह ऐतिहासिक पालकी भी है जिसे महाराजा अभयसिंह ई.1730 में गुजरात के शासक सरबुलंद खाँ को युद्ध में पराजित कर वहाँ से लाया था।

    वस्त्र कक्ष

    जानकी महल दर्शकों को राजा-रानियों के युग में ले जाता है। यहाँ दर्शक विभिन्न राजाओं, महाराजाओं, रानियों और महारानियों द्वारा पहने जाने वाले वस्त्रों से साक्षात्कार करता है। इस कक्ष में होली, दीपावली, गणगौर, राज्याभिषेक और अन्य विशेष अवसरों पर प्रयुक्त होने वाले सोने-चांदी की जरी से सुसज्जित वस्त्र रखे हैं।

    पाग-पगड़ियां

    मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग अवसरों पर धारण की जाने वाली पाग-पगड़ियां प्रदर्शित की गई हैं। मारवाड़ में निवास करने वाले विभिन्न समुदायों द्वारा उपयोग में ली जाने वाली पाग-पागड़ियों के साथ-साथ मेवाड़, मेवात, ढूंढार, हाड़ौती, वागड़, शेखावटी आदि क्षेत्रों में विभिन्न समुदायों द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली पाग-पागड़ियों और सिंधी तथा विश्नोई समुदाय द्वारा पहनी जाने वाली टोपियों को भी यहाँ देखा जा सकता है।

    ताले

    मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय में, प्राचीनकाल में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न प्रकार के ताले प्रदर्शित किए गए हैं। ऐसे ताले भी प्रदर्शित किए गए हैं जिनकी कई-कई चाबियाँ हैं। आकार और वजन की दृष्टि से विभिन्न प्रकार के एवं देखने में विचित्र आकृति वाले मजबूत और ठोस ताले संगृहीत एवं प्रदर्शित किए गए हैं।

    जोधपुर के राजाओं का सिंहासन

    मेहरानगढ़ संग्रहालय में जोधपुर नरेशों का तीन शताब्दियों पुराना सोने का सिंहासन प्रदर्शित किया गया है।

    माही मरातिब

    दुर्ग में रखा माही मरातिब दर्शनीय वस्तुओं में से हैं। मगरमच्छ के मुंह, मछली की आकृति और चंद्रमा की कलंगी से युक्त यह मरातिब ई.1628 में शाहजहाँ ने जोधपुर नरेश गजसिंह को दिया था जो पांच हजारी मनसबदारों को दिया जाता था।

    मेहरानगढ़ संग्रहालय के भित्ति चित्र

    मारवाड़ चित्रशैली एवं भित्तिचित्रों की दृष्टि से मेहरानगढ़ दुर्ग संग्रहालय अत्यंत समृद्ध है। फूल महल, चोकेलाव तथा तखतनिवास के भित्तिचित्र प्रमुख हैं। इन चित्रों में पौराणिक एवं धार्मिक कथा प्रसंग, लोककथाओं, राजदरबार, शिकार, संगीत, बारहमासा, शृंगार, शिकार, होली, विवाह तथा राज्याभिषेक आदि प्रसंगों के चित्र प्रमुख रूप से दर्शाए गए हैं। 18वीं शताब्दी में महाराजा अभयसिंह (ई.1724-49) द्वारा निर्मित फूल महल अथवा दीवान-ए-खास की छत पर नक्काशी का बेहतरीन काम किया गया है।

    यहाँ विभिन्न राग-रागिनियों और देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। महल के खम्भों पर अंकित स्त्री-पुरुष के युग्म-चित्र वर्षों बाद भी अपने रंग-विधान और कलाकारों के श्रम को प्रदर्शित करते हैं। तखत विलास महल महाराजा तखतसिंह (ई.1843-73) के शयनागर के रूप में प्रयुक्त होता था। इस महल में लकड़ी का एक आकर्षक झूला रखा है। इस कक्ष की दीवारें महाराजा तखतसिंह की रुचि के अनुसार सजाई गई हैं तथा चित्रमय हैं। इसकी लकड़ी की छत पर विभिन्न मुद्राओं में स्त्री-पुरुषों के चित्र अंकित हैं। सैंकड़ों कलात्मक चित्रों से सुसज्जित इस कक्ष में कहीं बारात का चित्र है तो कहीं लोकवाद्यों का वादन करते हुए कलाकार हैं। इस कक्ष में प्रवेश करने वाले दर्शक मोहक चित्रकारी देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

    खबका महल (ख्वाब का महल) में मारवाड़ के इतिहास को संजोए हुए एक बहुमूल्य तैलचित्र उपलब्ध है। यह चित्र भारत में जन्मे तथा पाश्चात्य संस्कारों में पले-बढ़े चित्रकार आर्किबाल्ड हैरमैन लैन मूलर (ए. एच. मूलर) ने बनाया था। यह चित्र वीर दुर्गादास राठौड़ द्वारा मुगलों से बचाए गए मारवाड़ के भावी शासक बालक अजीतसिंह का है। यह कलाकृति मूलर ने जोधपुर में रहकर तैयार की थी। भावपूर्ण आलेखन यथार्थ अंकन और आकर्षक रंग संयोजन के कारण मूलर की यह कलाकृति चित्रकला की अमूल्य थाती बन पड़ी है। उम्मेद विलास में मारवाड़ शैली के साथ-साथ बीकानेर, जैसलमेर, बूंदी, मेवाड़ और मुगल शैली के चित्र बने हुए हैं।

    दुर्लभ तोपों का संग्रह

    मेहरनागढ़ दुर्ग में अनेक ऐतिहासिक तोपें रखी हैं जिनमें किलकिला, शम्भुबाण, जमजमा, कड़क-बीजली, बगस-वाहन, बिच्छू-बाण, गजनीखाँ, नुसरत, गुब्बार, धूड़धाणी नामक तोपें प्रसिद्ध हैं। जोधपुर नरेश गजसिंह (ई.1619-38) ने एक बार जालोर पर चढ़ाई की। उसे जालोर के किले से गजनी खाँ नामक तोप प्राप्त हुई जिसे वह जोधपुर ले आया। कड़क-बीजली नामक तोप राजा अजीतसिंह (ई.1708-24) के समय घाणेराव से मंगवाई गई थी। इस तोप का भार 14 मन अर्थात् 560 किलो है। किलकिला तोप राजा अजीतसिंह ने बनवाई थी जब वह अहमदाबाद का सूबेदार था। यह भी कहा जाता है कि यह तोप अजीतसिंह ने ई.1715 में विजयराज भण्डारी के माध्यम से अहमदाबाद से 1400 रुपये में क्रय की थी। कहा जाता है कि किलकिला तथा जमजमा तोपों का धमाका सुनकर गर्भवती महिलाओं के गर्भ गिर जाते थे।

    'शंभू बाण' तोप राजा अभयसिंह (ई.1724-49) ने अहमदाबाद के सूबेदार सरबुलन्द खाँ को ई.1730 में परास्त कर प्राप्त की थी। यह भी कहा जाता है कि यह तोप अभयसिंह ने सूरत से खरीद कर जोधपुर मंगवाई। नुसरत तोप भी राजा अभयसिंह ने ई.1730 में अहमदाबाद के गवर्नर सर बुलन्द खाँ, सरकार खाँ तथा गजनी खाँ को परास्त कर बहुत से घोड़ों, पालकियों और तोपों के साथ छीनी थी। महाराजा भीमसिंह (ई.1793-1803) के समय दुर्ग में नागपली, मागवा, व्याधी, मीरक चंग, मीर बख्श, रहस्य कला तथा गजक नामक प्रमुख तोपें मौजूद थीं।

    ई.1901 में राजा सरदारसिंह (ई.1859-1911) के समय जोधपुर का प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह चीन गया। वापसी में वह एक तोप खरीद कर लाया और किलेदार मानसिंह पंवार को किले में रखने के लिए दी। आज भी यह तोप जोधपुर दुर्ग में सुरक्षित है। दुर्ग की प्राचीर पर ब्रिटिश काल की तोपों का संग्रह किया गया है। एक तोप पर ब्रिटिश ताज बना हुआ है। यह कई नालों वाली मशीनगन जैसी तोप है जिसकी प्रत्येक नाली पर 
    तोपों के समान छिद्र हैं जिनके द्वारा बारूद में आग लगाई जाती थी। पंचधातु की एक तोप का मुंह मछली जैसा, पूंछ मगरमच्छ जैसी, पांव शेर के पंजों जैसे तथा गर्दन सिंह का आकार लिए हुए हैं। यह तोप दौलतखाना में रखी हुई है। यह तोप अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भेजी जाती है। गुब्बार तोप भी दौलत खाने में रखी हुई है। अधिकतर तोपें ट्राली अथवा पहियों पर रखी हुई हैं। ये तोपें चल तोपें कहलाती हैं। बिना पहियों वाली तोपें दुर्ग की प्राचीर आदि पर लगा दी जाती थीं और अचल तोपें कहलाती थीं।

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