Blogs Home / Blogs / राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय / अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास
  • अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास

     02.06.2020
    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की  स्थापना का इतिहास

    अध्याय - 4 राजस्थान में संग्रहालयों की स्थापना का इतिहास


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान में पुराप्रस्तर युगों से लेकर आधुनिक काल तक विकसित मानव सभ्यताओं की गाथा नदी घाटियों, पर्वतीय उपत्यकाओं एवं रेतीले धोरों में दबी हुई है। इसे पहचानना, खोजना, उसकी कालावधि का निर्धारिण करना, संग्रहण करना तथा दर्शकों तक उसकी पहुंच बनाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। यह समस्त सामग्री राजस्थान में मनुष्य के उद्भव से लेकर सभ्य बनने तक का इतिहास कहती है जो उस काल में लिखित रूप में नहीं मिलता है। उस इतिहास के साक्ष्य उस काल के खेतों, कुओं, चूल्हों, घरों के अवशेषों एवं शवाधानों के साथ-साथ बर्तनों, आभूषणों, मणकों, मूर्तियों, कंकालों आदि के रूप में मिलते हैं। मानव सभ्यताओं की इससे आगे की गाथा शिलालेखों, सिक्कों, मुद्राओं, वस्त्रों, कीर्ति-स्तम्भों, दुर्गों, महलों, हवेलियों, मंदिरों, मूर्तियों, जलाशयों, कलात्मक कुओं, बावड़ियों, ताल-तलैयों, सर-सरोवरों, समाधियों, छतरियों, अभिलेखों, आदि के रूप में मिलती है। यह सब सामग्री हमारी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। इस विरासत में बहुत सी ऐसी है जिसे संग्रहालयों तक नहीं लाया जा सकता है किंतु बहुत सी सामग्री ऐसी भी है जिसे संग्रहालयों तक लाया जा सकता है और किसी विशिष्ट क्रम एवं विधि में प्रदर्शित कर मानव इतिहास को उसकी निरंतरता के साथ देखा, समझा एवं परखा जा सकता है।


    राजपूताना की देशी रियासातें में अपने राजवंश एवं राज्य की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण एवं प्रदर्शन का विचार उन्नीसवीं सदी में विकसित होने लगा था। यही कारण है कि राजस्थान निर्माण के पूर्व ही राजपूताना की विभिन्न रियासतों में दस संग्रहालय स्थापित हो गए थे। संग्रहालयों की स्थापना के क्रम में सर्वप्रथम ई.1870 के आसपास उदयपुर में संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ किंतु राजपूताना में प्रथम संग्रहालय की विधिवत् स्थाना का श्रेय जयपुर को जाता है। जयपुर में प्रथम संग्रहालय की नींव का पत्थर महाराजा सवाई रामसिंह (द्वितीय) (ई.1835-80) के शासनकाल में ई.1876 में प्रिंस एलबर्ट ने रखा और उसी के नाम पर इस संग्रहालय का नाम एलबर्ट म्यूजियम रखा गया। ई.1881 में जयपुर संग्रहालय का संग्रह अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित स्कूल आफ आर्ट में लाया गया और महाराजा माधोसिंह (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में इसे वर्तमान संग्रहालय में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड बेडफोर्ड ने इसका उद्घाटन कर विधिवत् रूप से इसे जनता के लिए खोल दिया। प्रदेश स्तर के इस संग्रहालय मे राजस्थान के जन-जीवन और शिल्प कौशल की जानकारी मिलती है।

    मेवाड़ में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) के शासनकाल में संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए गुलाब बाग (उदयपुर) में एक भव्य भवन का निर्माण किया गया। इस भवन निर्माण का निर्णय महारानी विक्टोरिया सिल्वर जुबली समारोह के दौरान लिया गया था। भवन निर्माण का कार्य पूर्ण हो जाने पर इसका नाम विक्टोरिया हॉल म्यूजियम रखा गया और ई.1890 में तत्कालीन वायसराय लार्ड लेंसडाउन द्वारा इसका उद्घाटन किया गया।

    लार्ड कर्जन के समय संग्रहालयों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए। संग्रहालयों को समुचित एवं व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने के लिए ई.1902 में सर जॉन मार्शल को आर्कियोलॉजीकल सर्वे आफ इण्डिया का डायरेक्टर जनरल नियुक्त किया गया। संग्रहालयों की परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए पहली बार भारतीय विद्वानों की सेवाएं ली गईं और भारतीय संस्कृति एवं पुरासम्पदा की खोज कर उनके संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया गया। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि विद्वानों के सक्रिय सहयोग एवं उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण से एकत्र पुरासम्पदा के फलस्वरूप अजमेर के ऐतिहासिक दुर्ग अकबर का किला में राजपूताना म्यूजियम की स्थापना की गई। ई.1908 में राजपूताना के गर्वनर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन द्वारा इसका विधिवत् रूप से उद्घाटन किया गया। ओझाजी को राजपूताना म्यूजियम का प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। ओझा अैर उसके सुयोग्य उत्तराधिकारी यू. सी. आाचार्य द्वारा विभिन्न स्थानों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। पुरासामग्री का संकलन किया गया। आर. भण्डारकर द्वारा किए गए उत्खनन कार्य से नगरी (चित्तौड़गढ़) से शुंग और कुषाणकालीन टेराकोटाज, सरवानिया (बांसवाड़ा) से क्षत्रप सिक्कों का भण्डार तथा अढाई दिन के झौंपड़े से उत्कीर्ण पाषाण खण्ड प्राप्त किए गए और आगे भी संग्रहालय को समृद्ध करने के प्रयत्न जारी रहे।

    जोधपुर में ई.1909 में संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1914 में पंडित विश्वेश्वर नाथ रेऊ संग्रहालय के सहायक अधीक्षक बने और उनके निर्देशन एवं सहयोग से संग्रहालय को नया स्वरूप प्रदान किया गया। ई.1916 में संग्रहालय को भारत सरकार की मान्यता मिली और आगे चलकर इसका नाम जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह (ई.1895-1911) की स्मृति में सरदार म्यूजियम रख दिया गया। रेऊजी की रुचि और रचनात्मक दृष्टिकोण से संग्रहालय में ओसियां, किराड़ू, मण्डोर, डीडवाना, सांभर, नागौर आदि स्थानों से सांस्कृतिक विरासत को एकत्रकर इस संग्रहालय को समृद्ध किया गया।

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ में क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा भवानीसिंह (ई.1874-1929) की गहन रुचि एवं उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई। ई.1929 में उम्मेद भवन पैलेस संग्रहालय की स्थापना की गई।

    संग्रहालय स्थापना की दौड़ में बीकानेर भी पीछे नहीं रहा। रियासत ने इटली के विद्वान डॉ. एल. पी. टेस्सीटोरी को आमंत्रित कर एक विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उन्होंने गंगानगर-बीकानेर क्षेत्र से महत्वपूर्ण पुरासामग्री का संकलन किया। डॉ. टेस्सीटोरी के संग्रह का उपयोग करते हुए ई.1937 में गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम की स्थापना की गई। महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने चित्तौड़गढ़ संग्रहालय का निर्माण करवाया।

    संग्रहालय स्थापना की शृंखला में ई.1940 में अलवर और ई.1944 में भरतपुर रियासतों में संग्रहालय स्थापित किए गए। भरतपुर रियासत में महाराजा ब्रजेन्द्र सवाई वीरेन्द्र सिंह बहादुर जंग (ई.1929-47) की प्रेरणा से मूर्तिशिल्प, स्थापत्य, शिलालेख एवं अन्य पुरा सामग्री का संकलन कर इसे स्थानीय पुस्तकालय परिसर में प्रदर्शित किया गया। संग्रहालय के संस्थापक क्यूरेटर रावत चतुर्भुजदास चतुर्वेदी के अथक प्रयासों से इस संग्रहालय में पुरासम्पदा की अभिवृद्धि की गई। आगे चलकर इसे दुर्ग में स्थित वर्तमान भवन में स्थानान्तरित किया गया तथा ई.1944 में जनता के लिए खोला गया। ई.1951 में इसमें सिलहखाना और कमराखास भी जोड़ दिया गया। संग्रहालय को समृद्ध करने में भरतपुर के तत्कालीन शासकों तथा मेजर हार्वे का उल्लेेखनीय योगदान रहा।

    ई.1944 में कोटा और ई.1949 में आमेर संग्रहालय की स्थापना के साथ संग्रहालयों की संख्या बढ़ कर दस हो गई। राजस्थान निर्माण के बाद ई.1950 में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना हुई और विभाग ने संग्रहालयों के विस्तार की दिशा में उल्लेेखनीय कदम उठाए। इसके परिणाम स्वरूप ई.1957 में श्री बांगड़ राजकीय संग्रहालय पाली, ई.1959 में डूंगरपुर और ई.1961 में आहाड़ संग्रहालयों की स्थापना संभव हो सकी। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रही और ई.1965 में माउण्ट आबू संग्रहालय तथा ई.1968 में मण्डोर संग्रहालय स्थापित किए गए।

    ई.1954 में बिड़ला तकनीकी म्यूजियम की, ई.1959 में जयपुर में सिटी पैलस संग्रहालय की तथा ई.1960 में श्रीरामचरण प्राच्य विद्यापीठ एवं संग्रहालय जयपुर की स्थापना हुई। ई.1964 में लोक संस्कृति शोध संस्थान नगरश्री, चूरू की स्थापना हुई।

    चित्तौड़गढ़ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पुरासामग्री के प्रदर्शन के लिए ई.1969 में चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1977 में आधुनिक कला प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करने वाली राज्य की पहली कला दीर्घा स्थापित हुई जिसे आगे चलकर राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंप दिया गया। विभाग द्वारा पुरान्वेषण, पुरा सामग्री के संकलन-संग्रहण एवं संरक्षण का कार्य निरन्तर जारी रहा और ई.1983 में हवामहल संग्रहालय तथा ई.1984 में जैसलमेर संग्रहालय की स्थापना की गई। ई.1985-86 में गंगानगर जिले में कालीबंगा के उत्खनन से प्राप्त सामग्री के लिए सभ्यता स्थल पर ही संग्रहालय का निर्माण किया गया। अब यह हनुमानगढ़ जिले में स्थित है।

    30 दिसम्बर 1983 को माणिक्यलाल वर्मा जनजाति शोध संस्थान द्वारा उदयपुर में जनजाति संग्रहालय का निर्माण किया गया। इसका उद्देश्य जनजातियों की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था को प्रदर्शित करना था।

    संग्रहालयों के विस्तार की
    शृंखला में ई.1987 में विराट नगर संग्रहालय तथा ई.1991 में पाली संग्रहालय की स्थापना हुई। आमेर की सांस्कृतिक धरोहर के वैभव को प्रदर्शित करने के लिए ई.1992 में आमेर में कला दीर्घा स्थापित की गई। संग्रहालयों के विस्तार की यह धारा आज भी सतत रूप से प्रवाहमान है। राजस्थान के आधुनिक संग्रहालयों की यात्रा में सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर, आहड़ संग्रहालय उदयपुर, राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा, लोक कला संग्रहालय उदयपुर, मीरा संग्रहालय मेड़ता, हल्दीघाटी संग्रहालय राजसमंद आदि सम्मिलित हैं।


    राजस्थान में संग्रहालयों की समस्या

    राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका 61.11 प्रतिशत भाग मरुस्थल है। इतने बड़े प्रदेश में पुरातात्विक सामग्री, प्राचीन भवन, दुर्ग, महल, देवालय, स्मारक, सरोवर, बावड़ियां, मूर्तियां, शिलालेख, प्राचीन ग्रंथ, शासकीय अभिलेख, सिक्के, ताड़पत्र, ताम्रपत्र आदि का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। संग्रहालयोपयोगी सम्पूर्ण सामग्री को राज्य के विभिन्न संग्रहालयों में संजोने के लिए आवश्यक निपुण व्यक्तियों, धन, सुविधाओं तथा भवनों का अभाव है। इस कारण राजस्थान में प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रख पाना बहुत बड़ी समस्या है। राजस्थान सरकार ने राज्य में 18 राजकीय संग्रहालयों की स्थापना की है। इन संग्रहालयों में कर्मचारियों का अभाव है। राज्य में झालावाड़ राजकीय संग्रहालय जैसे कई संग्रहालय हैं जो केवल चपरासियों और लिपिकों के भरोसे छोड़ दिए गए हैं।

    बहुत से संग्रहालयों को भारत सरकार से सामग्री प्राप्त होती है किंतु वह स्थान, साधन एवं दृष्टि के अभाव में संग्रहालयों के अंधेरे बंद कमरों में पड़ी हुई है, दर्शक वहाँ तक चाह कर भी नहीं पहुंच सकते।

    वसुंधरा राजे सरकार (ई.2013-18) द्वारा राज्य के संग्रहालयों की बुरी तरह से उपेक्षा किए जाने से यह समस्या और भी गंभीर हो गई है।

    राज्य सरकार द्वारा बीकानेर में राजस्थान राज्य अभिलेखागार तथा जोधपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की स्थापना की गयी है। जयपुर, बीकानेर, चित्तौड़, जयपुर, अलवर, कोटा तथा उदयपुर में प्राच्य विद्या संस्थान की शाखाएं स्थापित की गयी हैं। राजस्थान में मौजूद पुराने दुर्गों एवं ऐतिहासिक भवनों का संरक्षण करने के लिए भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिसके कारण कई दुर्ग, हवेलियाँ, मंदिर एवं महल उपेक्षित पड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व शेखावाटी की कलात्मक हवेलियों में भित्ति चित्रों की दुर्दशा देखकर एक विदेशी महिला नदीन ला प्रैन्स ने एक हवेली खरीदकर उसका पुनरुद्धार करवाया और वहाँ एक सांस्कृतिक केन्द्र बनाया। इसमें भारत और फ्रान्स के चित्रकारों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। इससे शेखावाटी क्षेत्र की कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। संस्कृृति प्रेमियों, पर्यटन संस्थाओं तथा स्वयं सेवी संगठनों को इस दिशा में और भी प्रयास करने होंगे।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×