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  • अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर

    अध्याय - 7 राजकीय संग्रहालय, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    महाराणा शम्भुसिंह (ई.1861-74) के शासन काल में कर्नल हैचिन्सन की सलाह पर उदयपुर रियासत में तवारीख महकमा (इतिहास विभाग) स्थापित किया गया। इसी दौरान ई.1873 में उदयपुर संग्रहालय की स्थापना का काम आरम्भ हुआ। महाराणा सज्जनसिंह (ई.1874-84) के शासनकाल में इतिहास विभाग की अच्छी प्रगति हुई। उनके शासन काल में ही राज्य में ई.1879 में कविराजा श्यामलदास की अध्यक्षता में ऐतिहासिक और पुरा सामग्री का अनुसंधान कार्य प्ररम्भ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासविद् गोविन्द गंगाधर देशपाण्डे ने एक वर्ष तक उदयपुर में रहकर प्राचीन शिलालेखों का अध्ययन किया।


    ई.1887 में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) ने महारानी विक्टोरिया (ई.1837-1901) के शासन की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उदयपुर के सज्जन निवास बाग में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया। इस भवन का निर्माण इण्डो-ब्रिटिश स्थापत्य शैली में किया गया था। इस उद्यान को अब गुलाब बाग कहते हैं। 1 नवम्बर 1890 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड लेन्सडाउन ने इस भवन में विक्टोरिया हॉल म्यूजियम और पुस्तकालय का उद्घाटन किया। उसी दिन से यह जनसाधारण के लिए खोल दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर ओझा को क्यूरेटर के पद पर नियुक्त किया गया। वे ई.1908 तक इस पद पर तक कार्यरत रहे। उनके पश्चात् पण्डित अक्षय कीर्ति व्यास और रत्नचन्द्र अग्रवाल भी इस संग्रहालय एवं पुस्तकालय के अध्यक्ष रहे। उन्होंने पूरे राज्य से शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएँ, कलात्मक सामग्री एवं वस्त्रों के नमूने प्राप्त करके इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए। आगे चलकर पं. अक्षय कीर्ति व्यास ने मेवाड़ क्षेत्र के शिलालेखों एवं रतनचन्द्र अग्रवाल ने मेवाड़ क्षेत्र की प्राचीन प्रतिमाओं को प्रकाशित करने पर विशेष ध्यान दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरस्वती भण्डार से बहुत बड़ी संख्या में चित्रित पाण्डुलिपियों का अधिग्रहण किया गया।

    महारानी विक्टोरिया की ऐतिहासिक प्रतिमा

    इस संग्रहालय के लिए लंदन से महारानी विक्टोरिया की एक विशाल मूर्ति मंगवाई गई जिसका समस्त व्यय महाराणा द्वारा वहन किया गया। इस प्रतिमा को संग्रहालय भवन के समक्ष स्थापित किया गया जहाँ यह वर्षों तक खड़ी रही। ई.1948 में उदयपुर के स्वतंत्रता सेनानी तथा भारत की संविधान सभा के सदस्य वीरभद्र जोशी तथा मास्टर बलवंत सिंह मेहता इस प्रतिमा पर चढ़ गए और इसके मुंह पर काला रंग पोत दिया। इसके बाद इस प्रतिमा को उठाकर संग्रहालय के भवन में रख दिया गया और विक्टोरिया की प्रतिमा के स्थान पर गांधीजी की प्रतिमा स्थापित की गई। स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा इसे राष्ट्रवाद की विजय बताया गया। ई.1968 में यह संग्रहालय सज्जन निवास बाग से सिटी पैलेस के कर्ण विलास या हिसाब दफ्तर महल में स्थानान्तरित किया गया और इसका नाम प्रताप संग्रहालय रखा गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद यह राजकीय संग्रहालय उदयपुर के नाम से जाना जाता है। विक्टोरिया हॉल अब गवर्नमेंट सरस्वती पुस्तकालय कहलाने लगा किंतु विक्टोरिया की वह प्रतिमा आज भी इस भवन की एक गैलेरी के कोने में उपेक्षित अवस्था में रखी हुई है।

    क्षेत्रीय संग्रहालय

    वर्तमान में राजकीय संग्रहालय उदयपुर एक क्षेत्रीय संग्रहालय है। इसमें मेवाड़ क्षेत्र के प्राचीन शिलालेख, प्रतिमाएं, लघु चित्र, प्राचीन सिक्के, एवं अस्त्र-शस्त्र संगृहीत हैं। संग्रहालय की पुरा सामग्री एवं कला सामग्री को पांच दीर्घाओं में रखा गया है।

    बाल दीर्घा

    प्रथम दीर्घा को बाल दीर्घा का रूप दिया गया है। इसमें बालकों की रुचि की सामग्री प्रदर्शित है जिसमें स्टफ किया गया कंगारू, बन्दर, सफेद सांभर, कस्तूरी हिरन और घड़ियाल प्रमुख हैं।

    सांस्कृतिक दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ की छपाई के वó, हाथी दाँत के कलात्मक नमूने, मेवाड़ी पगड़ियाँ, साफे, चोगा, भीलों के आभूषण, महाराणाओं के पोट्रेट्स, भीलों के जीवन पर आधारित आधुनिक चित्र, और अó-शó प्रमुख हैं। सांस्कृतिक दीर्घा की सबसे मूल्यवान निधि शहजादा खुर्रम की पगड़ी है। ई.1622 में शहजादा खुर्रम अपने पिता जहांगीर से बगावत करके दक्षिण की ओर जाते हुए कुछ दिनों के लिए उदयपुर ठहरा था। वह मेवाड़ के राणा 
    कर्णसिंह का पगड़ी बदल भाई बना था। वही यादगार पगड़ी राजकीय संग्रहालय उदयपुर में प्रदर्शित है। हाथी दांत से निर्मित बहुत सी कलाकृतियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। इनमें हाथीदांत से बने मुग्दर, खड़ाऊं, पालकी ले जाते कहार, पानी का जहाज, चंदन से बनी खड़ाऊं, भेड़ पर आक्रमण करता शेर, कुत्तों को घुमाने ले जाता आदमी, हाथीदांत की कार बहुत ही परिश्रम से बनाई गई प्रतीत होती हैं। धातुओं से बनी बहुत सी मूर्तियां भी महत्वपूर्ण हैं। पीतल से बनी भील ज्वैलरी भी दर्शनीय है। पीतल से बनी 13वीं सदी की महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा इतिहास की दृष्टि से बहुमूल्य है। इस प्रतिमा में देवी के चार हाथ दर्शाए गए हैं। पीतल से बनी जैन तीर्थंकरों की भी कई प्रतिमाएँ हैं। संग्रहालय में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का लकड़ी का मॉडल भी प्रदर्शित किया गया है जिसकी कला देखते ही बनती है।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय में मध्यकालीन एवं रियासती इतिहास को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण अस्त्र-शस्त्रों को बड़ी संख्या में प्रदर्शित किया गया है। हथियार बनाने वालों ने कुछ हथियारों पर उनसे सम्बन्धित सूचनाएं भी अंकित की हैं। कुछ तलवारों की मूठ सोने से बनी हुई हैं तथा कुछ तलवारों की म्यान पर सोने का काम किया गया है। संग्रहालय में कलाई पर पहनने वाला पहुंचा, बरछी, पेशकब्ज, छुरी तथा नारजा भी प्रदर्शित किए गए हैं। एक तलवार पर बांसवाड़ा के महारावल पृथ्वीसिंह का नाम अंकित है। स्टील से बने धनुष एवं बाण, बांस से बने बाण, 17वीं शताब्दी में जैसलमेर में बनी मैचलॉक बंदूक जिस पर सोने की कोफ्तकारी का काम है, अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में निर्मित हाथी का अंकुश, 18वीं शताब्दी का भीलों के काम आने वाला चमड़े का तरकश, दो सौ साला पुरानी लोहे की गुप्ती, थ्री नॉट थ्री राइफल, तुर्किश तोप, विभन्न रियासतों के चांदी के सिक्के, बीकानेर में बनी 18वीं सदी की लोहे की ढाल जिस पर चंद्रस का काम हुआ है तथा ताम्बे के फूलों से सजी हुई है, विभिन्न प्रकार की पेशकब्ज, खुखरी, कैंची कटार, टाइगर कटार, 17वीं शताब्दी में बूंदी में निर्मित लोहे की दस्तेद्रस (दाओ) संग्रहालय में प्रदर्शित की गई हैं।

    संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की तलवारें रखी गई हैं जो 17वीं से 19 शताब्दी तक भारत में प्रयुक्त होती थीं। इनमें तोते की आकृति वाली मूठ युक्त तलवार, ई.1850 के आसपास बनी लहरिया तलवार जिसकी मूठ पर सोने की कोफ्ताकारी है, घोड़े की मुखाकृति की मूठ वाली कुलाबा (पतली तलवार), पक्षी की चोंच के समान चिरे हुए मुंह वाली जुल्फिकार तलवार, स्टील की गुर्ज, लोहे की ढालें जिन पर चांदी का काम किया हुआ है, चांदी की कोफ्तकारी से युक्त नागिन के समान लहराती हुई आकृति में बनी तलवार, लोहे की तेगा तलवार, कोरबंदी कोफ्तकारी से युक्त लहरिया पैटर्न की लोहे की तलवार, सोने के काम वाली मूठ की पट्टा तलवार जो 17वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में दक्षिण भारत में बनी थी, सम्मिलित हैं।

    शिलालेख दीर्घा

    इस संग्रहालय के प्रथम क्यूरेटर गौरीशंकर ओझा ने रियासत के विभिन्न भागों से इतिहास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी शिलालेख एकत्रित किए थे जिनमें से बहुत से शिलालेख अब भी इस संग्रहालय में हैं, कुछ शिलालेख अन्य संग्रहालयों को भेज दिए गए हैं। इस संग्रहालय के क्यूरेटर रत्नचंद्र अग्रवाल भी बहुत से शिलालेखों को प्रकाश में लाए।

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त द्वितीय शताब्दी ई.पू. से 19वीं शताब्दी ईस्वी तक के शिलालेख संगृहीत हैं जो मेवाड़ क्षेत्र के इतिहास को जानने का प्रमुख साधन हैं। इन शिलालेखों में सबसे प्राचीन घोसुण्डी शिलालेख है जो द्वितीय शताब्दी ई. पू. का है। यह चित्तौड़ से सात मील दूर नगरी के निकट घोसुण्डी से प्राप्त हुआ। यह लेख कई खण्डों में टूटा हुआ है। इनमें से एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है। इस शिलालेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजा गृह नारायण वाटिका के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के पराशरी के पुत्र सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का उल्लेख है। जोगेन्द्रनाथ घोष के विचार से इस लेख में वर्णित राजा कण्ववंशीय ब्राह्मण होना चाहिए। जॉनसन के विचार से यह लेख किसी ग्रीक, शुंग या आन्ध्रवंशीय शासक का होना चाहिये। आन्ध्रों में ‘गाजायन’ नामक गोत्र तथा ‘सर्वतात्’ आदि नाम पाए जाते थे। इसके अतिरिक्त भीलवाड़ा जिले का वि.सं. 282 का नान्दसा यूप शिलालेख, छोटी सादड़ी का वि.सं. 547 का भामरमाता शिलालेख, कल्याणपुर शिलालेख एवं कुम्भलगढ़ से प्राप्त कुम्भा कालीन चार विशाल शिलालेख उल्लेखनीय हैं।

    चित्तौड़ से छः मील दूर स्थित नगरी (प्राचीन नाम माध्यमिका) से प्राप्त एक शिलालेख प्रदर्शित किया गया है। कुंद शिलालेख वि.सं. 718 का है जो सूर्यवंशी राजा अपराजित से सम्बन्धित है। राजा धवलप्पदेव का धौद शिलालेख, परमार वंश का डबोक शिलालेख, तेजसिंह का घाघसा बावड़ी का शिलालेख, चौहान वंश का अलावदा और लोहारी सती लेख, सूचिवर्मन एवं शक्तिकुमार का आहार शिलालेख भी इस संग्रहालय के प्रमुख आकर्षण हैं। संग्रहालय में एक फारसी शिलालेख भी उल्लेखनीय है जो गयासुद्दीन तुगलक के शासन के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करता है। इसी दीर्घा में कुम्भलगढ़ से प्राप्त 16 लेखयुक्त प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं जिनमें ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, दामोदर, वासुदेव, केशव, माधव, मधूसूदन एवं पुरुषोत्तम प्रमुख हैं।

    कुछ प्राचीन ताम्रपत्र भी इस संग्रहालय में प्रदर्शित किए गए हैं जिन पर धार्मिक प्रयोजन हेतु ब्राह्मणों को भूमिदान दिए जाने का उल्लेख है।

    प्रतिमा दीर्घा

    इस दीर्घा में मेवाड़ क्षेत्र से प्राप्त छठी शताब्दी से 18वीं शताब्दी ईस्वी की प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। इन प्रतिमाओं को शैव सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, जैन सम्प्रदाय तथा अन्य विषयों से सम्बन्धित प्रतिमाओं से विभक्त किया जा सकता है। इनमें जगत से प्राप्त इन्द्राणी की प्रतिमा तथा तनेसर से प्राप्त शिशु क्रीड़ा, छठी शताब्दी ईस्वी की मूर्ति कला का प्रतिनिधित्व करती हैं। बान्सी क्षेत्र के रानीमल्या का जैन कुबेर और कल्याणपुर से प्राप्त घुंघराले बालों से युक्त शिवमस्तक आठवीं शताब्दी ईस्वी की प्रमुख प्रतिमाएं हैं। कल्याणपुर से प्राप्त एक पुरुष प्रतिमा का भारी मस्तक भी इस संग्रहालय में रखा गया है। कल्याणपुर से ही त्रिनेश शिव प्रतिमा का एक मस्तक भी प्राप्त किया गया है। इसमें परमात्मा के चेहरे पर बहुत ही शांत भाव हैं। मस्तक पर बहुविध अलंकरण किया गया है।

    केजड़ा से प्राप्त नृत्यलीन वाराही तथा नागदा से प्राप्त शेषशायी विष्णु, आहार से प्राप्त भगवान विष्णु के मत्स्यावतार एवं कच्छप अवतार प्रतिमाएँ भी संग्रहालय का विशिष्ट आकर्षण हैं। कमल पुष्प पर आसीन देवी लक्ष्मी की एक प्रतिमा विभिन्न प्रकार के आभूषणों से अलंकृत है। इसमें देवी की देहयष्टि अत्यंत पुष्ट दिखाई दिखाई गई है। आहार से प्राप्त एक भारी कांस्य प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई है। गुप्तोत्तर काल में दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हरे-नीले पत्थर (परेवा पत्थर) पर बहुत बड़ी संख्या में प्रतिमाओं का निर्माण किया गया। इस संग्रहालय में इस पत्थर की बहुत सी प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। भगवान शिव की परेवा पत्थर की 8वीं शताब्दी की एक प्रतिमा में भगवान किंचित बांकपन लेकर खड़े हैं। चार हाथों की इस प्रतिमा के तीन हाथ ही दिखाई देते हैं। एक हाथ में भगवान ने त्रिशूल पकड़ रखा है। एक हाथ में पुष्प है। भगवान के चरणों के पास नंदी खड़ा है।

    परेवा पत्थर पर ही चामुण्डा की एक प्रतिमा आठवीं शताब्दी की है। इसमें देवी के चार हाथ हैं, माथे पर सुंदर केश-सज्जा एवं मुकुट दिखाई दे रहे हैं। आठवीं शताब्दी की परेवा पत्थर की एक शिव प्रतिमा में भगवान शिव के मुखमण्डल पर प्रसन्नता विराज रही है। उन्होंने भीलों की तरह छोटा सा बाघम्बर बांध रखा है। सिर पर केशों की भारी सजावट की गई है। भगवान, नंदी का सहारा लेकर खड़े हैं। इस प्रतिमा की चार भुजाएं थीं किंतु अब केवल एक ही रह गई है।

    परेवा पत्थर से बनी नागिनी की एक प्रतिमा 9वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी भगवान के वराह अवतार की एक दुर्लभ प्रतिमा दर्शनीय है। इसी प्रकार की एक वराह प्रतिमा जो कम से कम एक हजार वर्ष पुरानी रही होगी, लेखक ने बारां जिले में परवन नदी के किनारे काकूनी के भग्नावशेषों में पड़ी देखी थी जिसे एक मंदिर के परिसर में रखा गया था। सिंहवाहिनी क्षेमंकरी माता की प्रतिमा सौम्य भाव की है, यह 10वीं-11वीं शताब्दी की है। देवी के चरणों के पास सिंह का अंकन किया गया है। देवी के माथे पर जूड़ा एवं मुकुट है तथा मस्तक के पीछे प्रभामण्डल बनाया गया है। इसी काल का लाल पत्थर का एक कुबेर देखते ही बनता है, वह एक छोटे हाथी पर पालथी लगाकर बैठा है तथा उसके भारी शरीर के कारण हाथी दबा हुआ प्रतीत होता है। परेवा पत्थर पर बनी भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा एवं शेषशायी प्रतिमा भी देखते ही बनती हैं। शेषशायी प्रतिमा में देवी लक्ष्मी भगवान के चरण चाप रही हैं। शिव-पार्वती की एक युगल प्रतिमा 10वीं-12 शताब्दी की है। यह भी परेवा पत्थर पर बनी है तथा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है।

    पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ राज्य के शिल्पिी सूत्रधार मण्डन ने इस क्षेत्र की मूर्ति कला को प्रभावित किया। उसके प्रभाव से युक्त मूर्तिकला की कई मूर्तियां इस संग्रहालय में देखी जा सकती हैं। साधारण लाल पत्थर से 15वीं शताब्दी में बनी कई प्रतिमाएँ इस संग्रहालय में हैं जिनमें ब्रह्माणी माता का एक पैनल, भगवान विष्णु का खड़ा विग्रह, दामोदर स्वरूप का विग्रह, वासुदेव स्वरूप का विग्रह, अनिरुद्ध स्वरूप का विग्रह, केशव स्वरूप, प्रद्युम्न स्वरूप तथा भगवान के पुरुषोत्तम स्वरूप के विग्रह प्रदर्शित किए गए हैं। पंद्रहवीं शताब्दी का अधोक्षजा स्वरूप का विग्रह भी दर्शनीय है। इस प्रतिमा के दोनों हाथ तथा वैजयंती माला का काफी भाग खण्डित हैं। कुंभलगढ़ से प्राप्त वैष्णवी की एक प्रतिमा पर ई.1458 का शिलालेख अंकित है। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी की भगवान संकषर्ण की प्रतिमा अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है। यह लाल पत्थर से निर्मित है। परेवा पत्थर पर बनी एक चतुर्भुजी ब्रह्मा की प्रतिमा के चारों ओर अलंकृत परिकर बनाया गया है। यह 17वीं शताब्दी की प्रतिमा है तथा परेवा पत्थर से निर्मित है।

    परेवा पत्थर पर निर्मित भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी की रागात्मक भाव की एक सौम्य प्रतिमा 16वीं शताब्दी ईस्वी की है। परेवा पत्थर से बनी इंद्राणी की एक प्रतिमा मध्यकाल की है। इसमें इन्द्र की पत्नी कमल असन पर विराजमान है। उसकी सवारी ऐरावत भी कमल के नीचे अंकित है। इन्द्राणी के चार हाथ हैं, मस्तक एवं गले में बहुत सुंदर आभूषण एवं अलंकरण हैं। यह छठी शताब्दी ईस्वी की प्रतिमा है जो जगत से प्राप्त हुई थी। इन्द्राणी ने अपना बायां पैर मोड़कर अपनी दायीं जंघा के पास रखा हुआ है तथा दायां पैर आसन से नीचे लटक रहा है। देवी के चेहरे पर आत्म गौरव एवं आत्मविश्वास के भाव हैं। परेवा पत्थर पर बनी द्वारपाल की एक प्रतिमा 16वीं शताब्दी की है।

    वाराही की एक मनुष्याकार प्रतिमा 15वीं शती की है तथा लाल पत्थर पर निर्मित है। यह भी मातृका का ही अंकन है। इस पर उसी काल का एक लेख अंकित है जिसके अनुसार महाराणा कुंभा (ई.1433-68) ने इस प्रतिमा को लगवाया। यह प्रतिमा कुंभलगढ़ से लाई गई प्रतीत होती है। सोलहवीं शती की लाल पत्थर की गणेश प्रतिमा का शिल्प देखते ही बनता है। भगवान की दोनों जंघाओं पर रिद्धि एवं सिद्धि विराजमान हैं। मध्यकाल के एक अत्यंत सुंदर पैनल में अष्ट भुजाओं वाले शिव का अंकन किया गया है किंतु इस प्रतिमा का सिर उपलब्ध नहीं है। भगवान ने अपने हाथों में कमल, त्रिशूल, खट्वांग, सर्प तथा कपाल धारण कर रखे हैं। भगवान ने अपने दो हाथ अपनी गोद में रख रखे हैं। भगवान के दोनों तरफ चंवरधारिणियों का अंकन किया गया है। सूर्य एवं सुरसुन्दरी आदि प्रतिमाएँ दर्शकों को पंद्रहवी शती के कालखण्ड का अनुभव करावाने में सक्षम हैं।

    जैन प्रतिमाओं में 7वीं-8वीं शती की जैन कुबेर की भारी शरीर सौष्ठव वाली प्रतिमा अपेक्षाकृत बहुत अच्छी अवस्था में है। पंद्रहवीं-सोलहवीं शती की आदिनाथ की प्रतिमा तथा तीर्थंकर की एक मस्तक विहीन प्रतिमा प्रमुख हैं। जैन तीर्थंकर का एक घुंघराले बालों के अंकन वाला मस्तक अलग से प्रदर्शित किया गया है। संभवतः यह मस्तक संग्रहालय की ही मस्तक विहीन प्रतिमा का हो। क्षीण कटि एवं स्थूल पीन पयोधरों से युक्त एक मनोहारी जैन देवी की प्रतिमा इस क्षेत्र में पाए जाने वाले साधारण लाल पत्थर से बनी हुई है। संग्रहालय में मध्यकालीन शिल्पकला का एक अनुपम नमूना तोरण के एक खण्ड के रूप में उपलब्ध है। इसमें गुलाब की पत्तियों एवं ज्यामितीय आकृतियों का अद्भुत अंकन किया गया है।

    चित्रकला दीर्घा

    राजीय संग्रहालय उदयपुर की चित्रकला दीर्घा में लगभग आठ हजार लघु चित्र प्रदर्शित किए गए हैं जो संसार में मेवाड़ शैली का सबसे विशाल संग्रह है। इस संग्रह का अध्ययन करने के लिए देश-विदेश के शोधकर्ता उदयपुर संग्रहालय आते हैं। ई.1979 में बनेड़ा निवासी अक्षय देराश्री ने 143 लघुचित्र उदयपुर संग्रहालय को भेंट किए जिनमें जयपुर और मालपुरा शैली के चित्र भी प्रमुख हैं। इन लघु चित्रों का काल ई.1630 से ई.1900 तक विस्तृत है। संग्रहालय में सबसे प्राचीन लघुचित्र रसिकप्रिया पर आधारित हैं। इन लघुचित्रों का चित्रकार साहबदीन था जिसकी शैली इतनी स्वभाविक एवं समृद्ध थी कि उस परम्परा का प्रभाव मेवाड़ की कला पर आज भी देखा जा सकता है। महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) (ई.1698-1710) के काल के रसिकप्रिया के 47 चित्र संग्रहालय की अमूल्य निधि हैं। कुछ चित्र एकलिंग महात्म्य से सम्बन्धित हैं। कृष्ण द्वैपायन द्वारा लिखित हरिवंश के श्लोकों में आए प्रसंगों को आधार बनाकर, मध्यकाल में चित्र बनाने की परम्परा रही है। इस परम्परा के कुछ चित्र इस संग्रहालय में रखे हैं।

    महाभारत, कृष्णावतार चरित (भागवत), कादम्बरी, रघुवंश, रसिकप्रिया, वेलि कृष्ण रुक्मणि, मालती माधव, गीत गोविन्द, पृथ्वीराज रासो, सूरसागर, बिहारी सतसई एवं पंच-तंत्र पर आधारित लघुचित्र भी उल्लेखनीय हैं। फारसी एवं अरबी ग्रन्थों पर आधारित ‘कलीला-दमना’ और ‘मुल्ला दो प्याजा’ के लतीफों पर आधारित लघुचित्र भी संग्रहालय में संगृहीत हैं। एक चित्रित एलबम ‘दर्शनों की किताब’ के नाम से उपलब्ध है। एक एलबम में मेवाड़ के राणा उदयसिंह से महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) तक के चित्र हैं। इस एलबम में मीराबाई का चित्र भी महत्वपूर्ण है। प्रति वर्ष लगभग दस हजार देशी एवं डेढ़ हजार विदेशी दर्शक संग्रहालय को देखने आते हैं।

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