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  • अध्याय - 49 राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत

     19.05.2020
    अध्याय - 49 राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत

    अध्याय - 49

    राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत

    राजकीय संग्रहालय आबू पर्वत, आबू पर्वत पर बने राजभवन परिसर के मुख्य मार्ग पर स्थित है। इसकी नींव 18 अक्टूबर 1962 को रखी गई। इसका उद्घाटन राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. सम्पूर्णानन्द ने किया था। इस संग्रहालय में सिरोही जिले से प्राप्त प्रस्तर एवं धातु प्रतिमाओं, ताम्रपत्रों तथा शिलालेखों के साथ-साथ जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर और बून्दी से प्राप्त चित्र, पीतल की कलात्मक सामग्री, चीनी टाइल्स, धातु प्रतिमाएँ तथा हाथी दांत की कलाकृतियाँ संगृहीत की गई हैं। जयपुर के कारीगरों द्वारा निर्मित पीतल की कलात्मक ढालें, फूल-पत्तियां युक्त पैनल, महीन कला युक्त काष्ठ फलक, रंगीन फूल-पत्तियों से युक्त टाइल्स आदि प्रदर्शित की गई हैं।

    संग्रहालय की प्रथम दीर्घा में आदिवासी जनजीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है। यहाँ एक आदिवासी झौंपड़ी बनाई गई है जिसमें आदिवासी महिला के साथ घरेलू सामान, आटा चक्की, गेहूं इकट्ठा करने की कोठी, आंगन साफ करने का सूप आदि आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किए गए हैं। इसके सामने आदिवासियों के आराध्य मामाजी के घोड़े रखे गए हैं। इस दीर्घा में आदिवासियों के अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, तलवार-फरसा आदि प्रदर्शित हैं। आदिवासियों के वाद्ययंत्र, नगारा, बांसुरी, पुंगी तथा आदिवासी स्त्रियों के आभूषण भी प्रदर्शित हैं। आदिवासी स्त्री-पुरुषों की वेषभूषा को दर्शाने वाले मानव-मॉडल भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    द्वितीय दीर्घा में मध्यकालीन राजपूत शैली के विभिन्न चित्र प्रदर्शित हैं जिनमें कृष्णलीला के दृश्य, राग-रागिनी के चित्र, होली के दृश्य, शिव-पार्वती, बादशाह आलमगीर, अश्वारूढ़ महाराजा छत्रसिंह, अंगड़ाई लेते हुए नायिका, पूजन करने जाती हुई स्त्रियां, शिकार करते हुए राजा आदि के चित्र सम्मिलित हैं। गोपियों के साथ नृत्यमुद्रा में राधा-कृष्ण का जयपुर शैली का 18वीं शताब्दी का चित्र जयपुर शैली के चरवा चित्र तथा बसोली शैली का आलमगीर का चित्र यहाँ संगृहीत चित्रों में प्रमुख हैं। इस दीर्घा में जयपुर एवं बीकानेर शैली के पीतल के बर्तन, पौधे, लकड़ी पर खुदाई एवं कुराई का काम, ढाल, थाल तथा जैन धर्म की धातु प्रतिमाएँ रखी हुई हैं। वि.सं.1016 के दो ऐतिहासिक ताम्रपत्र और चार महत्वपूर्ण जैन प्रतिमाएँ रखी गई हैं। इनमें वि.सं. 1516 की द्विबाहु ध्यानस्थ जैन प्रतिमा, वि.सं. 1432 की लेखयुक्त पंच परमेश्वरीय जैन प्रतिमा, वि.सं. 1305 की लेख युक्त पार्श्वनाथ प्रतिमा तथा वि.सं. 1400 की चन्द्रमुखी प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय हैं।

    तृतीय दीर्घा में सिरोही जिले के चंद्रावती, वरमाण, देलवाड़ा तथा अचलगढ़ से प्राप्त प्राचीन पाषाण प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। चंद्रावती से प्राप्त परमार कालीन प्रतिमाओं में गणेश, चंवरधारिणी, अग्नि, भैरव, पार्वती, लक्ष्मी, सूर्य आदि की प्रतिमाएँ उल्लेखनीय हैं। ये प्रतिमाएँ ईसा की 12वीं शताब्दी के आस-पास की हैं तथा इनकी संख्या 402 है। इन प्रस्तर प्रतिमाओं के साथ-साथ कलात्मक प्रस्तर भी प्रदर्शित किये गए हैं जिनमें उस काल की धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ मनोविनोद, प्रणय, मिथुन और स्नेहाकर्षण के दृश्य अंकित हैं। शिव-पार्वती की आलिंगन मुद्रा की चतुर्बाहु मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है। देवी पार्वती के हाथ में गोल दर्पण है जिसमें वह अपना रूप निहार रही हैं। शिव का वाहन नन्दी तथा दोनों ओर नृत्यलीन परिचारिकायें भी उत्कीर्ण हैं। एक नारी प्रतिमा सौम्य भाव से युक्त है। उसके कानों के वर्तुलाकार कुण्डल तथा तीखी नासिका सुन्दरता से अंकित किये गए हैं। उमा-महेश्वर, सूर्य, शिव, ब्रह्मा, नृसिंह, लक्ष्मीनारायण और किन्नर आदि की प्रतिमाएँ भग्न अवस्था में हैं जो मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा बेरहमी से तोड़ी गई हैं।

    चन्द्रावती से प्राप्त प्रतिमाओं में मिथुन, आलिंगन एवं प्रणय मूर्तियां बड़ी संख्या में हैं। अलस भाव से अंगड़ाई लेती हुई तथा उन्मुक्त भाव से विविध संचारी भावों का प्रदर्शन करती हुई नायिकाओं का अंकन बड़ी खूबसूरती से किया गया है।

    बारहवीं शताब्दी की कामिनी प्रतिमा में नायिका अंगड़ाई लेते हुए स्तन का स्पर्श कर रही है। इसके प्रत्येक अंग में उन्मुक्तता का भाव स्पष्ट दिखाई देता है। एक अन्य प्रतिमा में सोमपात्र लिए हुए नायिका उत्कीर्ण की गई है जिसके उन्नत उरोज, मद युक्त दृष्टिविलास, मनमोहक केश-विन्यास, कर्णवलय, तथा अंग-प्रत्यंग में सौन्दर्य का सागर लहरें मार रहा है। अंगड़ाई मुद्रा में स्थानक कामिनी अपने एक पैर में गेंद जैसी वस्तु को दबाये हुए है तथा दूसरे पैर को पहले पैर के घुटने पर रखे हुए है।

    देलवाड़ा से प्राप्त गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु, शेषशायी विष्णु, वाराही देवी तथा संतों की प्रतिमाएँ सम्मिलित हैं। अचलगढ़ से प्राप्त चामुण्डा, सूर्य तथा नगरनायिका आदि की 8वीं से 14वीं शताब्दी तक की प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। ये प्रतिमाएँ राजस्थान में मूर्तिकला के उत्तरोत्तर विकास को दर्शाती हैं। स्मृति स्तंभ के एक खण्ड में मिथुन आकृति तथा द्वितीय खण्ड में परमार राजा धारावर्ष का वि.सं. 1232 का 14 पंक्तियों का लेख उत्कीर्ण है।

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