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  • अध्याय - 44 राजकीय संग्रहालय मण्डोर

     02.06.2020
     अध्याय - 44 राजकीय संग्रहालय मण्डोर

     अध्याय - 44

    राजकीय संग्रहालय मण्डोर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    मण्डोर संग्रहालय की स्थापना ई.1968 में जनाना बाग के प्राचीन महलों में की गई। इस संग्रहालय में वास्तुकला, प्रस्तर कला और मूर्तिकला के अवशेष, शिलालेख, चित्र, खुदाई से प्राप्त सभ्यताओं के अवशेष, हस्तकला, शरीर और प्रकृति विज्ञान की सामग्री आदि का संग्रह है। इस समस्त पुरा सामग्री एवं कला सामग्री को अलग-अलग कक्षों में प्रदर्शित किया गया है।


    मूर्तिकक्ष में मण्डोर, ओसियां, किराड़ू, घटियाला, जूना, सलावास आदि से प्राप्त मूर्तियां एवं उनके खण्ड प्रदर्शित किए गए हैं। मण्डोर से प्राप्त पुरा सामग्री के लिए पृथक् से एक कक्ष बनाया गया है जिसमें 9-10वीं शताब्दी की सूर्य, त्रिविक्रम, सुर सुन्दरी, नट, यक्ष, दुर्गा, शिव, कीचक, नवग्रह आदि प्रतिमाओं के साथ अलंकृत वास्तुकला के महत्वपूर्ण खण्ड सजाए गए हैं। इस काल में मण्डोर क्षेत्र कला के प्रमुख केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित था।

    मण्डोर संग्रहालय में प्रदर्शित अरहट के नाम से सम्बोधित दो फलक मूर्तिकला, सांस्कृतिक विकास, धर्म एवं इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। प्रथम खण्ड में वीर योद्धा अपने शस्त्रों से सुसज्जित होकर जा रहे हैं और एक अश्वारोही तथा कुछ व्यक्ति ऊँटगाड़ी में सवार हैं। इसी खण्ड में अरहट का अंकन किया गया है। पास ही पानी पीते हुए ऊँट का अंकन है। यह दृश्य मारवाड़ की वास्तविक झांकी प्रस्तुत करने के साथ ही प्राचीन समय में कुएं से पानी निकालने की पद्धति का परिचायक है।

    द्वितीय फलक पर युद्ध करते हुए सैनिक और अश्वचालित रथ में बैठे सैनिकों का अंकन है। मण्डोर से ही प्राप्त एक पाषाण स्तम्भ पर स्त्री-पुरुष के परस्पर स्नेहाकर्षण युक्त दृश्य का अंकन है। इस फलक में कीर्तिमुख गोल घेरे में एक प्रेमालाप सूचक दृश्य अंकित है। इसी स्तम्भ में गवाक्ष, फूल-पत्तियां एवं अन्य मनमोहक आकृतियों का भी अंकन है।

    द्वितीय स्तम्भ में प्रेमालाप सूचक दृश्य के साथ-साथ नृत्य-गायन-वादन मुद्रा में पुरुषाकृतियां, घट, कीर्तिमुख तथा फूल-पत्तियों का सजीव अंकन है। सातवीं से तेराहवीं शताब्दी के बीच निर्मित हिन्दू मंदिरों में प्रणयभाव से ओत-प्रोत आकृतियों का अंकन किया जाता था। उसी परम्परा का निर्वाह यहाँ भी हुआ है। प्रतिमाओं पर केश विन्यास एवं आभूषणों का अंकन अत्यंत आकर्षक है।

    घटियाला से प्राप्त सर्वतोभद्र गणेश की प्रतिमा भी प्रदर्शित है।यह प्रतिमा स्तम्भ पर चारों दिशाओं की तरफ मुख किए हुए स्थापित की गई थी किंतु वर्तमान में इस प्रतिमा के दो मुख ही शेष हैं।

    द्वितीय कक्ष में विविध स्थलों से प्राप्त प्रतिमाओं, शिला-खण्डों एवं शिलालेखों का प्रदर्शन किया गया है। ओसियां से प्राप्त शिवलिंग, शिखर का अग्रभाग जिसके मध्य में शेषशायी विष्णु, सालावास (जोधुपर) से प्राप्त लक्ष्मीनारायण, किराड़ू से प्राप्त ब्रह्मा, कुबेर, युद्धरत
    स्त्री एवं विभिन्न नृत्य मुद्रा में स्त्रियों के साथ-साथ जोधपुर, सिरोही, नागौर एवं मण्डोर से प्राप्त शिलालेखों को प्रदर्शित किया गया है।

    चित्रकक्ष में प्रदर्शित मण्डोर के शासक राव चूण्डा, जोधपुर के शासक मालदेव, उदयसिंह, सूरसिंह, गजसिंह, जसवन्तसिंह, अजीतसिंह, अभयसिंह, विजयसिंह, मानसिंह एवं तख्तसिंह के मानवाकार चित्र इस संग्रहालय की अमूल्य निधि हैं।

    इसी कक्ष में मारवाड़ के राजाओं की वंशावली, महाराजा गजसिंह (ई.1619-38) द्वारा अहमद नगर के युद्ध का ऐतिहासिक दृश्य, अप्पाजी सिंधिया की खुखरी द्वारा हत्या, महाराजा जसवन्त सिंह (ई.1638-78) की विधवा रानियों का अटक नदी पार करना और मुगल सेना द्वारा घेराव करना, श्रीनाथजी का पटचित्र एवं श्रीकृष्णलीला के दृश्यों के साथ-साथ जोधपुर शैली में निर्मित राग-रागिनियों के चित्र विशेष रूप से प्रदर्शित हैं।

    इसी कक्ष में मृत मगरमच्छ एवं जंगली भैंसे में मसाला भरकर प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय के विविध कक्ष में क्ले से निर्मित मानव शरीर संरचना के मॉडल, सामाजिक जनजीवन को प्रदर्शित करने वाले मिट्टी के बर्तन एवं मिट्टी से निर्मित कलाकृतियां, ऊँट के चमड़े से निर्मित तेल रखने का विशाल पात्र, संगमरमर, लाल प्रस्तर, लकड़ी, सीप आदि से निर्मित कला सामग्री भी प्रदर्शित है।

    इस संग्रहालय में कालीबंगा, रंग-महल और भीनमाल की खुदाई में उपलब्ध कुछ सामग्री भी संगृहीत है। मंडोर उद्यान परिसर में स्थित देवताओं की साल का निर्माण राजा अजीतसिंह और उसके पुत्र अभययसिंह के काल में करवाया गया था। बड़ी-बड़ी देव प्रतिमाओं को चट्टान पर उत्कीर्ण करने से पूर्व छोटे-छोटे प्रस्तर खंडों पर इनके नमूने बनाए गए थे। ये नमूने मंडोर के राजकीय संग्रहालय में रखे हैं।

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