Blogs Home / Blogs / राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय / अध्याय - 27 राजकीय संग्रहालय हवामहल : जयपुर
  • अध्याय - 27 राजकीय संग्रहालय हवामहल : जयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 27 राजकीय संग्रहालय हवामहल : जयपुर

    अध्याय - 27


    राजकीय संग्रहालय हवामहल : जयपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजस्थान के कुछ राजकीय संग्रहालय महत्वपूर्ण स्मारकों के अन्दर सज्जित किए गए हैं। राजकीय संग्रहालय, हवामहल एक महत्वपूर्ण स्मारक के अन्दर स्थित प्राचीन ढूंढाड़ प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संग्रहालय है। जयपुर का हवामहल राजस्थान के प्रतीक रूप में सुविख्यात है। जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह द्वारा हवामहल का निर्माण ई.1799 में उस्ता लालचन्द की देखरेख में करवाया गया। हवामहल का पिछला भाग, जो सिहडयोढ़ी बाजार तथा माणक चौक अथवा बड़ी चौपड़ की ओर मुख्यमार्ग पर पूर्वाभिमुख एवं बहुसंख्य कलात्मक गवाक्षों से अलंकृत एवं सुशोभित है, भारतीय-फारसी सम्मिश्रित शैली में निर्मित है।

    हवामहल का मुख्य प्रवेश द्वार माणकचौक अथवा बड़ी चौपड़ से त्रिपोलिया द्वार की ओर चलने पर आता है। दाहिने हाथ पर हवामहल के समकालीन निर्मित और कभी हवामहल के मुख्य भाग में जुड़े रहे महल भाग में राज्य आयुर्वेद विभाग के उपनिदेशक का कार्यालय है।

    हवामहल के पश्चिमाभिमुख मुख्य द्वार को आनन्द पोल तथा दूसरे चौक के द्वारपाल युक्त द्वार को गणेशपोल कहा जाता है। मुख्य द्वार आनन्द पोल में प्रवेश करते ही बाएं हाथ पर हवामहल के प्रवेश तथा कैमरा प्राप्ति कक्ष स्थित हैं। प्रथम चौक को पार कर गणेशपोल से प्रवेश करते हुए दूसरे मुख्य एवं बड़े चौक के मध्य में फव्वारों से युक्त संगमरमर का एक बड़ा हौज है। इसी चौक के दक्षिण में महाराजा सवाई प्रताप सिंह (ई.1778-1803) के निजी उपयोग में रहा प्रतापमंदिर कक्ष है, जिसमें वर्तमान में ढूंढाड़ प्रदेश की शिल्प तथा तक्षण कला की अप्रतिम उदाहरण पाषाण प्रतिमाएं तथा अन्य पुरातत्व सामग्री प्रदर्शित है।

    चौक के उत्तर दिशा में मूलतः रसोड़ा (भोजनशाला) रहे भाग में ढूंढाड़ क्षेत्र की प्रतिनिधि चित्रकला एवं हस्तशिल्प का प्रदर्शन है। पूर्वाभिमुख पांच-मंजिला मुख्य भवन के भू-तल पर स्थित 'शरदमंदिर' कक्ष में पूर्व जयपुर राज्य के प्रमुख महाराजाओं और प्रतिष्ठित नागरिकों के चित्र प्रदर्शन किए गए हैं। ऊपर की मंजिलें क्रमशः रत्न मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर, हवामंदिर तथा उत्तर पूर्व कोने पर बनी खुली छतरी, जो पुरानी शिकार ओढी थी, स्मारक के रूप में दर्शनीय हैं।

    हवामहल संग्रहालय का लोकार्पण 23 दिसम्बर 1983 को हुआ। इसमें ढूंढाड़ क्षेत्र की पुरा एवं कला सम्पदा संजाई गई है। प्रतापमंदिर के बाह्यभाग में स्थित मूर्तिकक्ष में 8-9वीं शती की प्रतिहार कालीन प्रतिमा, आबानेरी से प्राप्त स्कन्द कार्तिकेय, महिषासुर मर्दिनी तथा दशानन रावण द्वारा कैलाश पर्वत धारण प्रतिमा, नरहड़ से प्राप्त जैन तीर्थंकर सुमतिनाथ, सांभर से प्राप्त वामन अवतार आदि पाषाण प्रतिमाएं ढूंढाड़ क्षेत्र के शिल्प और तक्षण कौशल की अप्रतिम उदाहरण हैं। आमेर-जयपुर के कछवाहा शासकों के काल की शिल्प एवं तक्षण कला का प्रतिनिधित्व मकराना के श्वेत संगमरमर से निर्मित सुर-सुन्दरी प्रतिमाएं कर रही हैं। 11-12वीं शती में चौहानों के शासनकाल में सांभर-चाकसू क्षेत्र में निर्मित वामन अवतार तथा विष्णु के विभिन्न अवतारों की मूर्तियां मूर्ति-शिल्प के इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 18वीं शती में सफेद मकराना संगमरमर से निर्मित वेणुधारी कृष्ण की भव्य प्रतिमा देखते ही बनती है।

    प्रताप मंदिर के आंतरिक मुख्य कक्ष में गणेश्वर, जोधपुर, बैराठ, रैढ़, सांभर और नगर आदि प्राचीन पुरातात्विक स्थलों के सर्वेक्षण और उत्खनन से प्राप्त विभिन्न पाषाण, ताम्र एवं लौह उपकरण, मृद्पात्र तथा मृण्मूर्तियां प्रदर्शित हैं। इनके माध्यम से ढूंढाड़ क्षेत्र में मानवीय सभ्यता के उषाकाल की सांस्कृतिक विरासत की झांकी प्रस्तुत की गई है।

    प्रताप मंदिर के भीतर दक्षिण-पूर्वी कोने में स्थित एक छोटे कक्ष में ढूंढाड़ क्षेत्र के शिलालेखों, ताम्रपत्रों और सिक्कों का प्रदर्शन किया गया है। बैराठ से प्राप्त तीसरी शती पूर्व के अशोक के शिलालेख, विक्रम संवत् 284 और 335 का बरनाला यूप स्तम्भ (लालसोट के निकट बरनाला गांव से प्राप्त), 10वीं शती का चाकसू अभिलेख, ई.1363 का फारसी और देवनागरी लिपि में द्विभाषीय शिलालेख, आमेर नरेश मानसिंह का जमवारामगढ़ से प्राप्त वि.सं. 1669 का शिलालेख तथा प्रतिहार कालीन बधाल ताम्रपत्र लिपि, भाषा एवं इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि मानसिंह के पिता का नाम भगवंतदास और पितामह का नाम भारमल था।

    इसी कक्ष में छठी शती पूर्व से दूसरी शती पूर्व के मध्य प्रचलित रहे आहत सिक्कों (पंचमार्क), विराटनगर से प्राप्त यूनानी सिक्कों, स्थानीय मालव एवं यौधेय गणराज्यों के सिक्कों, खेतड़ी एवं जमवारामगढ़ से प्राप्त कुषाणकालीन सिक्कों, टोंक जिले से प्राप्त गुप्तकालीन सिक्कों, सेसैनियन वंश के 'द्रम्भ' सिक्कों, अजमेर एवं सांभर के चौहान शासकों तथा जयपुर के कछवाहा शासकों द्वारा प्रचलित सिक्कों के माध्यम से इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का परिचय मिलता है। सुखपुरा (जिला टोंक) से प्राप्त मुद्राओं में समुद्रगुप्त, काचगुप्त तथा चन्द्रगुप्त (द्वितीय) की मुद्राएं सम्मिलित हैं। ग्राम गांवली से पृथ्वीराज चौहान के सिक्के प्राप्त हुए हैं। आमेर, फागी, दयारामपुरा, बैराठ, बगरू, जयपुर, हर्ष तथा सीकर से अरबी-फारसी भाषा के मुगलिया सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं। सवाई जयसिंह ने ई.1727 में जयपुर में टकसाल की स्थापना की। इस टकसाल में झाड़शाही सिक्के ढाले गए। जयपुर रियासत के झाड़शाही सिक्कों पर छः शाखाओं वाला झाड़ अंकित है।

    उत्तर दिशा में स्थित रसोड़ा (भोजनशाला) में चित्रकला एवं हस्तशिल्प दीर्घा में जयपुर शैली के लघुचित्रों, जयपुर की प्रसिद्ध नीलवर्ण मृदपात्र कला (ब्ल्यू पॉटरी), काष्ठ-तक्षण कला, पीतल एवं धातु से निर्मित अलंकृत बड़े आकार की सजावटी ढालें, पारम्परिक आभूषण तथा अस्त्र-शस्त्र आदि के माध्यम से ढूंढाड़ क्षेत्र के हस्तशिल्प का प्रदर्शन किया गया है। खगोल यंत्र का मॉडल, कशीदाकारी, मीनाकारी युक्त थाल का भी प्रदर्शन किया गया है। एक विशाल थाल पर रामायण के दृश्य अंकित हैं। जयपुर शैली के चित्रों में राजसी वैभव, दरबार, शिकार के दृश्य, होली, गणगौर, तीज आदि त्यौहार, बारहमासा एवं विभिन्न राग-रागिनियों का चित्रण किया गया है।

    शरद मंदिर एवं रतन मंदिर में जयपुर नगर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह (ई.1699-1743) तथा कच्छवाहा वंश के अन्य राजाओं एवं जयपुर राज्य के प्रसिद्धि व्यक्तियों के छायाचित्र प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें विद्याधर चक्रवर्ती, रत्नाकर पौण्डरीक, कवि पद्माकर, पंडित टोडरमल, विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा, स्वामी लक्ष्मीराम, उस्ताद बहराम खाँ डागर, मिर्जा इस्माइल, सेठ जमनालाल बजाज और अर्जुनलाल सेठी आदि के चित्र सम्मिलित हैं।

    संग्रहालय के भण्डारों में भी महत्वपूर्ण सामग्री संगृहीत है। इसमें राजस्थान से हड़प्पाकालीन सभ्यता के प्रमुख केन्द्र कालीबंगा से प्राप्त सुप्रसिद्ध ताम्रवृषभ के लगभग समकालीन योग मुद्रा में नग्न पुरुष की प्रतिमा प्रमुख है। जयपुर के प्रसिद्ध तीर्थ गलता के जल-कुण्ड की सफाई से प्राप्त पाषाण एवं धातु की अनेक प्रतिमाएं तथा ज्योतिष यंत्र भी संगृहित हैं।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

  • अध्याय - 27

    <"/> अध्याय - 27

    <"> अध्याय - 27

    <">
    Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×