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  • अध्याय - 63 राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

     21.12.2018
    अध्याय - 63 राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    अध्याय - 63


    राजकीय संग्रहालय, भरतपुर

    भरतपुर राजकीय संग्रहालय, भरतपुर के लोहागढ़ दुर्ग परिसर के भीतर स्थित है। इस संग्रहालय में अद्वितीय और पुरातन कलाकृतियाँ तथा दुर्लभ पुरातात्विक सामग्री प्रदर्शित की गई है। ई.1939 में भरतपुर नरेश सवाई कर्नल बृजेन्द्रसिंह द्वारा भरतपुर राज्य में अनेक स्थानों पर असुरक्षित अवस्था में बिखरी पड़ी पत्थर की प्रतिमाओं और कलापूर्ण वास्तुखंडों को संगृहीत करवाकर स्थानीय सार्वजनिक पुस्तकालय के एक कक्ष में प्रदर्शित करवाया गया। ई.1944 में इसे नये भवन में स्थानांतरित किया गया और इसे स्वतंत्र संग्रहालय में बदल दिया गया।

    वर्तमान संग्रहालय भवन, रियासती काल में भरतपुर रियासत का प्रशासनिक कार्यालय था और इसे 'कचहरी कलां' (दरबार हॉल) के नाम से जाना जाता था। इस तीन मंजिला भवन का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह (ई.1825-53) ने करवाया था। इसकी प्रथम मंजिल पर स्थित कमरा खास और सिलहखाना को भी संग्रहालय में सम्मिलित कर लिया गया। इस संग्रहालय को चार प्रमुख खण्डों में बाँटा गया है- पुरातत्व खण्ड, बच्चों की गैलरी, शस्त्रागार, कला खण्ड और शिल्प एवं उद्योग।

    इस संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियों, चित्रों, सिक्कों, शिलालेखों, प्राणी नमूनों का अच्छा संग्रह किया गया है। वर्तमान में भरतपुर संग्रहालय में 581 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 10 शिलालेख, 120 टैराकोटा सामग्री, 13 धातु सामग्री, 670 सिक्के, 1966 अस्त्र-शस्त्र, 196 लघुचित्र एवं 861 स्थानीय हस्तकला एवं उद्योग के नमूने संगृहीत हैं।

    पुरातत्व खण्ड

    संग्रहालय का पुरातत्व खण्ड सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसमें द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर, शुंग काल, कुषाण काल, गुप्त काल, मध्यकाल एवं 19वीं शताब्दी ईस्वी तक की विभिन्न प्रस्तर प्रतिमाएँ एवं कलापूर्ण वास्तुखंड प्रदर्शित किए गए हैं। पहली शताब्दी की मूर्तियाँ इस संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण हैं। इस संग्रहालय में नोह, अघापुर, गांवड़ी, वीरावई, नौगया खेड़ा, मैलाह, जाघिना, एकता, तुइया सोगर एवं सोगारा आदि गांवों एवं बयाना, कामां, कुम्हेर, वैर, भुसावर, रूपाबास आदि कस्बों से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री प्रदर्शित की गई हैं। इनमें एकमुखी शिवलिंग, बोधिसत्व फलक, बुद्ध का शीश, महिषासुर मर्दिनी, कार्तिकेय की कुषाण कालीन मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं। भरतपुर संग्रहालय में यक्ष एवं यक्षी प्रतिमाओं का अच्छा संग्रह है। यही मूर्तियां आगे चलकर गुप्तकाल में विष्णु एवं विष्णु अवतारों की तथा उसके बाद के काल में जैन एवं बौद्ध प्रतिमाओं का आदर्श बनीं।

    वीरावई तथा नोह आदि स्थलों से प्राप्त प्रथम शताब्दी ई.पू. की यक्ष प्रतिमाएँ, नागराज (कुषाण काल) प्रतिमा, सप्तमातृका, दिक्पाल आदि की प्रतिमाएँ विशेष उल्लेखनीय हैं।

    इस संग्रहालय में रखी मृण्मूर्तियां (टैराकॉटा) इस क्षेत्र की लोकसंस्कृति का परिचय देती हैं। विभिन्न पुरातत्व स्थलों से प्राप्त बैल, कुत्ता, हाथी आदि पशुओं एवं स्त्री-पुरुषों की मृण्मूर्तियां आकार में छोटी हैं जबकि संग्रहालय में प्रदर्शित पत्थर की मूर्तियां आकार में पर्याप्त बड़ी हैं। टैराकौटा (मृणमूर्तियां) की बनी प्रतिमाएँ सामान्यतः लाल एवं सलेटी रंग की हैं किंतु कुछ प्रतिमाओं पर काली पॉलिश की गई है। प्रतिमाओं के धड़ प्रायः नग्न हैं किंतु उन पर मिट्टी के मणियों से मालाएं आदि बना दी गई हैं। कानों में बड़े कुण्डल हैं तथा गले में बड़े मणियों की मालाएं बनाई गई हैं। ये प्रतिमाएँ या तो पूजा के काम आती रही होंगी अथवा 
    इन्हें बालकों के लिए खिलौनों के रूप में बनाया गया होगा। शुंग काल की प्रतिमाओं में देवी का एक धड़ तथा गणेश प्रतिमा के अवेशष भी प्राप्त हुए हैं। कुषाण काल की बहुत से पशुओं की मृण्मूर्तियां मिली हैं। इनमें 12 इंच गुणा 3 इंच का एक हाथी भी है जिसकी पीठ पर सवार सहित हौदा बना हुआ है।

    जैन प्रतिमा दीर्घा में भरतपुर क्षेत्र के विभिन्न स्थलों से प्राप्त 8वीं शती ईस्वी से 18वीं शताब्दी ईस्वी तक की जैन प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं, जो इस क्षेत्र में प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक जैन धर्म के प्रसार की परिचायक हैं। इस दीर्घा में प्रदर्शित शासनदेव की स्वतंत्र आकर्षक प्रतिमा अतुलनीय है। नेमिनाथ, शांतिनाथ तथा चतुर्मुखी आदिनाथ आदि तीर्थकर प्रतिमाएँ भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

    नोह से प्राप्त मूर्तियां

    नोह से प्राप्त सामग्री गंगा घाटी की प्राचीनतम सभ्यताओं- हस्तिनापुर एवं वैशाली आदि की समकालीन है। नोह एक समृद्ध नगर था जो तीसरी शताब्दी ईस्वी में नष्ट हो गया। नोह से पांच सभ्यताओं के अवशेष स्तर मिले हैं। सबसे नीचे की सभ्यता ईसा से 1100 वर्ष पहले अस्तित्व में थी। इस स्तर से प्राप्त चित्रित सलेटी रंग के पक्षी की मृण्मूर्ति पुरातत्व जगत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मृण्मूर्ति लगभग ई.पू.1100 की मानी जाती है। इसी स्तर से लाल मृद्भाण्ड तथा सरल प्रकार के लाल-काले मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं। इन बर्तनों की बनावट आहार सभ्यता से भिन्न प्रकार की है। नोह से ग्रेवेयर (धूसर मृद्भाण्ड) वाली सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। उसके ऊपर के स्तर में पेंटेड ग्रेवेयर एवं पॉलिशयुक्त काले क्लेवेयर प्राप्त हुए हैं। ऐसे ही बर्तन हस्तिनापुर से भी प्राप्त किए गए थे। पॉलिशयुक्त एवं चित्रित मृद्भाण्ड समृद्ध लोगों द्वारा प्रयुक्त होते थे। कुछ मृद्भाण्डों पर पक्षियों की आकृतियां बनी हुई हैं। ऐसे बर्तन हस्तिनापुर एवं वैशाली से भी मिले हैं।

    नोह से मिली सभ्यता के ऊपरी स्तर से तीरों की नोक, भवनों के अवशेष मिले हैं जबकि सबसे ऊपर के स्तर से पक्की ईंटों से घिरे हुए एक नगर के अवशेष मिले हैं जिसमें पक्के घर बने हुए थे। यह नगर प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व में अस्तित्व में आया तथा तीसरी शताब्दी ईस्वी में नष्ट हो गया। यहाँ से धातु गलाने की भट्टियां, बड़ी मात्रा में धातु अपशिष्ट (मैटल वेस्ट) भी प्राप्त हुआ है। आठ पैरों एवं चार भुजाओं वाली एक भट्टी एवं पकी हुई ईंटें भी प्राप्त हुई हैं। यह सामग्री एक समृद्ध सभ्यता की ओर संकेत करती है जो ईसा से 1200 वर्ष पहले विकसित हुई थी। यहाँ से ढक्कनदार बर्तन भी मिले हैं। इनके ढक्कनों पर स्वास्तिक एवं त्रिरत्न के चिह्न बने हुए हैं। स्त्री-पुरुष मृण्प्रतिमाओं में आभूषणों की भरमार है।

    पशु आकृतियों वाले खिलौने कई प्रकार के हैं जिनमें हाथी, घोड़े, गाड़ियां आदि हैं। मथुरा के शासकों के ताम्बे के सिक्के, कांच एवं मिट्टी की चूड़ियों के टुकड़े, मौर्य काल की मिट्टी की मुहरें भी मिली हैं। शुंग काल का एक मिट्टी का कुत्ता आग में पकाकर मजूबत बनाया गया है। कुषाण काल की पॉटरी पर ब्राह्मी लिपि जैसी लिखावट मिली है। नोह से कम से कम 14 मूर्तियां मिली हैं जो भिन्न काल के सभ्यताओं से सम्बद्ध हैं। नोह से प्राप्त शुंग काल की एक विशाल यक्ष प्रतिमा की आज भी पूजा की जाती है। इसे जाख बाबा कहते हैं। इसका पेट घड़े के आकार वाला है, शरीर पर भारी आभूषण हैं तथा मुंह पर घनी मूंछें हैं। यह आठ फुट आठ इंच ऊंची प्रतिमा है।

    नोह से ही उत्तर मौर्य काल की लाल पत्थर की यक्षिणी प्रतिमा मिली है। बोधिसत्वों की चार मूर्तियां आरम्भिक शुंग काल की हैं। चारों बोधिसत्व एक पंक्ति में खड़े हैं तथा उन्होंने बाएं हाथ में जल-पात्र धारण कर रखा है और दाहिना हाथ अभयमुद्रा में उठा रखा है। इनके माथे पर एक जैसी पगड़ी तथा आभूषण हैं तथा गले में अंग्रेजी अक्षर 'वी' की आकृति वाली माला है। यह प्रतिमा सफेद धब्बों वाले लाल सैण्डस्टोन पत्थर से बनी हुई है जो कि रूपाबास में मिलता है। गुप्त काल की एक ग्रे सैण्डस्टोन की महिला की आवक्ष मूर्ति मिली है। स्तनों के बड़े आकार के कारण इसे पूर्ववर्ती प्रतिमाओं से सहज ही अलग पहचाना जा सकता है। इसी काल का एक पुरुष धड़ भी मिला है। देवी लक्ष्मी की प्रतिमा, विष्णु की मस्तक रहित प्रतिमा, भगवान शिव का आवक्ष विग्रह जिसे सिर के जटाजूट एवं माथे की तीसरी आंख से पहचाना जा सकता है, भी प्राप्त हुई हैं। इन्हें आभूषणों एवं पगड़ियों के आधार पर पीछे के युगों से सहज ही अलग किया जा सकता है। नोह से एक मुखी शिवलिंग से लेकर चारमुखी शिवलिंग प्राप्त हुए हैं। शिव के ये चार मुख ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य एवं शक्ति के प्रतीक हैं।

    अघापुर से प्राप्त मूर्तियां

    अघापुर से बड़ी संख्या में परिष्कृत मूर्तियां मिली हैं। यहाँ से प्राप्त कूण्डिका यक्ष भी घड़े के पेट वाला है। इसने अपने सिर पर एक कूण्डी धर रखी है। इसने चूड़ियां पहन रखी हैं तथा कानों में कुण्डल हैं। यहाँ से पत्थरों पर बनी हुई पशु-मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। दो शेरों के जुड़े हुए मुंह वाली आवक्ष प्रतिमा प्राप्त हुई है। इसमें शेर का मुंह खुला हुआ है, उसकी गर्दन पर भारी बाल हैं। शेर की आंखें, नाक कान, होठ, दांत, गाल, सीना आदि काफी पुष्ट बनाए गए हैं। भरतपुर तहसील के वीरवाई गांव से यक्ष की उसी काल की एक और प्रतिमा मिली है। यक्ष को उस काल में 'वीर' कहा जाता था। अतः अनुमान किया जा सकता है कि गांव का नाम वीरवाई इसी यक्ष मूर्ति के कारण पड़ा होगा। इसके गले में भी नोह से प्राप्त यक्ष प्रतिमा जैसा 'वी' आकृति का हार है। सोगारा गांव से भी यक्ष कीऐसी ही प्रतिमा मिली है जो कि शुंग काल की है। इस मूर्ति के सिर पर पगड़ी है तथा यक्ष को भारवाहक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

    शुंग काल की ये मूर्तियां, भरतपुर-मथुरा-नोह क्षेत्र में उस काल की धार्मिक मान्यताओं पर प्रकाश डालती हैं जिसके अनुसार गांव-गांव में यक्ष की पूजा होती थी। वस्तुतः इस काल तक गुप्त काल भविष्य के गर्भ में था अतः माना जाना चाहिए कि गुप्त काल की मूर्ति कला शुंग काल की मूर्ति कला का ही गौरवमयी विकास था। गुप्त काल में यक्ष का स्थान भगवान विष्णु तथा उनके अवतारों ने ले लिया।

    मैलाह से प्राप्त मूर्तियां

    मैलाह से प्राप्त प्रतिमाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि गुप्तकाल एवं मध्यपूर्व काल में यह स्थल शैव एवं वैष्णव सम्प्रदायों के प्रमुख केन्द्रों में से था। यहाँ इस काल में शिव एवं विष्णु के कम से कम तीन मंदिर स्थित थे। यहाँ से प्राप्त अवशेषों में आठवीं एवं दसवीं शताब्दी की प्रतिमाएँ मिली हैं। विष्णु के अवतारों में राम, नृसिंह तथा वाराह और दिक्पालों में अग्नि तथा वरुण की मूर्तियां मिली हैं। अन्य प्रतिमाओं में रेवान्ता, मातृका ऐन्द्री, परिचारिकाएं, चंवरधारिणी, द्वारपाल, शिव-मस्तक, नंदी नृत्यलीन शिव, मंदिरों की शिखर रचनाओं के अंश, देवी यमुना एवं देवी गंगा की मूर्तियां एवं अंकन मिले हैं। ब्रह्मा, ब्रह्माणी, कुबेर, स्त्री द्वारपाल एवं नृत्यरत पुरुष प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

    जघीना से प्राप्त मूर्तियां

    भरतपुर तहसील का गांव जघीना गुप्तोत्तर काल में जैन धर्म की श्वेताम्बर शाखा का केन्द्र था। यहाँ भगवान पार्श्वनाथ का श्वेताम्बर शाखा का जैन मंदिर था। संभवतः इसी मंदिर की विशाल पार्श्वनाथ प्रतिमा भग्नावस्था में मिली है। इस प्रतिमा के पीछे सर्प छाया करता हुआ दिखाया गया था। यहाँ से अन्य जैन प्रतिमाएँ भी मिली हैं। कायोत्सर्ग भाव में खड़ी सर्वतोभद्र की एक प्रतिमा तथा आदिनाथ की प्रतिमाएँ भी मिली हैं। आदिनाथ की प्रतिमा पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी की है। इससे स्पष्ट है कि गुप्तकाल में भरतपुर के आसपास जैनों की बड़ी बस्ती थी।

    एकता से प्राप्त प्रतिमाएँ

    भरतपुर जिले में स्थित एकता गांव वैष्णव धर्म का छोटा केन्द्र था। भरतपुर संग्रहालय में एकता से प्राप्त प्रतिमाएँ रखी हैं। इनमें से विष्णु की एक प्रतिमा 3 फुट 2 इंच की है तथा दसवीं शताब्दी ईस्वी की है। विष्णु के आयुधपुरुष स्वरूप की एक प्रतिमा की पीठिका (पैडस्टल) मिली है।

    भरतपुर नगर से प्राप्त प्रतिमाएँ

    भरतपुर नगर से गुप्तकाल एवं उसके बाद के समय की प्रतिमाएँ प्राप्त की गई हैं। इनमें एकमुखी शिवलिंग तथा लाल पत्थर की कीचक रचना गुप्तकाल के हैं। स्थानक मुद्रा में भगवान सूर्यदेव की प्रतिमा भी महत्वपूर्ण है। सूर्यदेव के दोनों हाथों में पूर्ण खिला हुआ कमल है। यह लाल सैण्डस्टोन से निर्मित पौने तीन फुट ऊंची प्रतिमा है। इसी युग की भैरव प्रतिमा एवं नाग दम्पत्ति की युगल प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। यह समस्त सामग्री गुप्त काल में निर्मित किसी एक मंदिर में प्रयुक्त हुई होगी। भरतपुर नगर से सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी की अनेक प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें सबसे पुरानी प्रतिमा एक जैन तीर्थंकर की है। इसकी पीठिका पर ई.1584 का एक लेख उत्कीर्ण है, प्रतिमा खण्डित अवस्था में है। 16वीं शताब्दी में भरतपुर क्षेत्र में पौराणिक धर्म की उपस्थिति को दर्शाने वाली सूर्य एवं विष्णु की विशाल प्रतिमाएँ भी भरतपुर नगर से प्राप्त की गई हैं।

    कामां से प्राप्त प्रतिमाएँ

    भरतपुर जिले का कामां नामक प्राचीन नगर महाभारत के काल से भी पहले अस्तित्व में था। तब इसे कदम्बवन, काम्यकवन और कामवन कहा जाता था। उस काल में इसका धार्मिक महत्व वृंदावन तथा महावन के समकक्ष था। गुप्तकाल में कामां में भगवान शिव का विशाल मंदिर स्थित था। इसके भग्नावशेषों को अब चौरासी खंभा मंदिर कहते हैं। इस मंदिर की मूर्तियां अजमेर एवं मथुरा सहित भारत के कई संग्रहालयों में ले जाई गई हैं। इस मंदिर से प्राप्त शिलालेखों में गुर्जर-प्रतिहार शासकों की वंशावली उत्कीर्ण है। मंदिर की बनावट, प्रतिमाओं की बनावट तथा शिलोखों के अक्षरों की बनावट से इस मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी ईस्वी में होना प्रतीत होता है। मंदिर का शिल्प बहुत समृद्ध है। घटपल्लवों की ऐसी सजावट अन्य मंदिरों में दुर्लभ है। मंदिर के एक शिलालेख के अनुसार यह मंदिर सूरसेन वंश के राजा दुर्गगान की रानी वच्छालिका द्वारा भगवान विष्णु को समर्पित किया गया था। इस मंदिर से दो शिवलिंग मिले थे जो अब अजमेर संग्रहालय में हैं।

    लघु चित्र खंड

    संग्रहालय भवन की प्रथम मंजिल पर स्थित लघुचित्र खण्ड में मुगल शैली के 17वीं शताब्दी के चित्र एवं राजस्थान की जयपुर, जोधपुर, कोटा, किशनगढ़, नाथद्वारा, बूँदी और भरतपुर शैलियों के चित्र प्रदर्शित हैं। अभ्रक की पत्तियों, पीपल के पत्तों तथा पुराने लिथो पेपर की पट्टियों पर बने चित्र, इस संग्रहालय की अनूठी कलाकृतियां हैं। ई.1610 ई. में लिखित 'सहज सनेही', महाराजा बलवन्तसिंह के समय में ई.1851 में लिखित 'पुत्रोत्सव' आदि हस्तलिखित ग्रन्थ और मुद्रित सूक्ष्माक्षरी कुरान भी दर्शनीय है। इस गैलरी में भरतपुर नरेशों के अनेक चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

    विविध खंड

    देशी-विदेशी एवं स्थानीय हस्तकला की वस्तुएं तथा विभिन्न प्रकार की बहुमूल्य कलाकृतियाँ, विविध खण्ड में देखी जा सकती हैं। यहाँ रियासतकालीन 500 से अधिक कलाकृतियां हैं। इनमें मिट्टी, चीनी तथा काँच से निर्मित विभिन्न बर्तन, फूलदान, हाथीदाँत और चन्दन की लकड़ी से बने इत्रदान, शृंगारदान पीतल के कलापूर्ण कलश, थाल, पशु-पक्षियों के नमूने आदि प्रदर्शित हैं। विभिन्न प्रकार की घड़ियां तथा राजाओं द्वारा प्रयुक्त कटलरी का विशाल संग्रह भी रखा गया है। संग्रहालय के द्वार के पास एक विशाल कड़ाही रखी गई है जिसमें एक साथ कई हजार लोगों के लिए भोजन तैयार किया जा सकता था। एक विशाल चंवर भी देखा जा सकता है। इसी दीर्घा में वनमानुष, मगरमच्छ, शेर का बच्चा तथा भालू आदि वन्यपशुओं को केमिकल ट्रीटमेंट करके तथा उन्हें स्टफ करके शोकेसों में रखा गया है जो कि बच्चों को आकर्षित करते हैं।

    अस्त्र-शस्त्र खंड

    संग्रहालय की पहली मंजिल पर बने अस्त्र-शस्त्र खण्ड में भरतपुर राज्य के शासकों एवं सैनिकों द्वारा विभिन्न युद्धों में प्रयुक्त कई प्रकार के हथियार प्रदर्शित किए गए हैं। यहाँ छोटे आकार की पिस्तौल से लेकर तोप जैसे बड़े हथियार भी प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कई प्रकार की तलवारें, ढालें, छुरे, बन्दूकें, रिवॉल्वर, भाले, तोप आदि सम्मिलित हैं। कुछ तलवारों की मूठ पर सोना एवं चांदी का कलात्मक कार्य किया गया है। इस कला को कोफ्तकारी, निशान, तहनिशान आदि कहा जाता था। रामचंगी बंदूकें तथा विभिन्न प्रकार की ढालें भी विशेष आकर्षण का विषय हैं। अठारहवीं शताब्दी की बंदूकें एवं तोपें भी दर्शक को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

    अन्य

    संग्रहालय परिसर में भूतल पर स्थित 'हमाम' इस परिसर का बहुत बड़ा आकर्षण है। यह महाराजा जवाहरसिंह (ई.1763-68) द्वारा बनवाया गया था। मुगल शैली के इस स्नानगृह में कई कक्ष बने हुए हैं। इसकी दीवारों के आरायश प्लास्टर पर फ्रेस्कोेे पद्धति से बने भित्तिचित्र आज भी चित्ताकर्षक हैं। स्नानघर में प्रकाश तथा वायु के आगमन के लिए वातायानों की व्यवस्था की गई है। स्नानघर में ठंडे और गर्म पानी का प्रबंध किया गया था। ठण्डे पानी के लिए भूमिगत पाइप बनाए गए थे और गर्म पानी के लिए हौद के नीचे भट्टियां लगाई गई थीं। राजा और रानियों के कपड़े बदलने के लिए अलग-अलग कक्ष बनाए गए हैं। संग्रहालय की छत पर छप्पन खम्भों की बारादरी बनी हुई है। प्रत्येक शुक्रवार को संग्रहालय का साप्ताहिक अवकाश रहता है।

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