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  • अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

     02.06.2020
    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर

    अध्याय - 6 राजकीय संग्रहालय, अजमेर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    राजकीय संग्रहालय अजमेर की स्थापना 
    राजपूताना म्यूजियम के नाम से 19 अक्टूबर 1908 को अजमेर नगर के मध्य ‘मैगजीन’ के नाम से विख्यात प्राचीन दुर्ग में की गई जिसे मुगल काल में अकबर का किला कहा जाता था। यह एक प्राचीन दुर्ग था जिसका अकबर के काल में जीर्णोद्धार एवं विस्तार किया गया। इसी दुर्ग में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स (प्रथम) का राजदूत ‘सर टामस रो’ जहांगीर के समक्ष उपस्थित हुआ था तथा उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की थी। ब्रिटिश काल में इस दुर्ग में अंग्रेजों का शस्त्रागार स्थापित किया गया था, इसलिए इसे मैगजीन कहा जाने लगा। ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय अंग्रेज अधिकारियों एवं उनके परिवारों को इसी दुर्ग में शरण दी गई थी।

    ई.1902 में भारत का वायसराय एवं गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन अजमेर आया। उसने राजपूताना की विभिन्न रियासतों में प्राचीन स्मारकों तथा विभिन्न स्थलों पर बिखरी हुई कलात्मक पुरावस्तुओं को देखा। कर्जन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक सर जॉन मार्शल को निर्देश दिए कि वे इस प्रभूत सामग्री को संरक्षित करने के लिए एक संग्रहालय की स्थापना करें। ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलैक्जेण्डर कनिंघम, आर्चिबाल्ड कार्लेयल, डी. आर. भण्डारकर, आर. डी. बनर्जी, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, यू. सी. भट्टाचार्य आदि पुरातत्वविदों एवं इतिहासविदों ने इस संग्रहालय के लिए पुरातत्व सामग्री, प्राचीन प्रतिमाओं, शिलालेखों, सिक्कों, ताम्रपत्रों, पुस्तकों, चित्रों आदि को एकत्रित करने में विशिष्ट योगदान दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे इस कार्य में सहयोग देने के लिए देशी रियासतों के अनेक राजा भी आगे आए। फलस्वरूप अजमेर संग्रहालय प्राचीन इतिहास, कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण संग्रहालय बन गया। ई.1908 में गवर्नर जनरल के एजेन्ट सर इलियट ग्राहम कोल्विन ने संग्रहालय का उद्घाटन किया। इसे अजमेर संग्रहालय एवं राजपूताना संग्रहालय कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसे राजकीय संग्रहालय कहा जाने लगा।

    इस संग्रहालय में प्राचीन प्रतिमाएं, मृण्मय प्रतिमाएं (टेराकोटा), शिलालेख, सिक्के, ताम्रपत्र, लघुरंग चित्र, उत्खनन से प्राप्त सामग्री राजपूत कालीन वेश-भूषाएं, धातु प्रतिमाएं तथा विभिन्न कलाओं से सम्बन्धित सामग्री संगृहीत की गई। इन पुरावस्तुओं एवं कला सामग्री को विभिन्न दीर्घाओं में बनी पीठिकाओं तथा शो-केस में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में इस संग्रहालय में 652 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 84 शिलालेख, 3,986 सिक्के, 18 धातु सामग्री, 149 लघुचित्र, 75 अस्त्र-शस्त्र, 363 टैराकोटा सामग्री, 128 स्थानीय हस्तकला सामग्री एवं पूर्वैतिहासिक काल की सामग्री संगृहीत है।

    उत्खनन से प्राप्त सामग्री

    संग्रहालय के पुरातत्व विभाग में सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहेनजोदड़ो (अब पाकिस्तान में) से उत्खनन में प्राप्त की गई मिट्टी की चूड़ियां, बरछी, तीर-शीर्ष, अनाज के दाने, चाकू के रूप में प्रयोग होने वाले फ्लिट-फ्लेक, शंख, हथियारों में धार करने के पत्थर, मातृदेवी की प्रतिमाएं, खिलौने, विभिन्न प्रकार की ईंटें, कलश, ढक्कन, खिलौना-गाड़ी के पहिये आदि मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त उन मुहरों के नमूने भी रखे गए हैं जो सिन्धु नदी घाटी में पाई गई थीं। जिन वास्तविक वस्तुओं के ये नमूने हैं वे ईसा से 3000 वर्ष पूर्व की हैं। कुछ नमूनों में पशुओं के चित्रों के ऊपर चित्रलिपि की एक पंक्ति भी उत्कीर्ण है।

    प्रतिमा दीर्घा

    संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में अनेक प्राचीन प्रतिमाओं को प्रदर्शित किया गया है जो अजमेर के अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (12वीं शताब्दी ईस्वी की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला एवं मंदिर), पुष्कर, पीसांगन, हर्षनाथ, अर्थूणा, ओसियां, मंडोर, चन्द्रावती, कामां, बयाना आदि स्थानों से प्राप्त की गई हैं। इन प्रतिमाओं में सौन्दर्यभाव की अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। इन प्रतिमाओं में भद्रता, सरलता, आध्यात्मिकता तथा जनजीवन का अद्भुत दर्शन देखने को मिलता है। इस संग्रह में गुप्तकाल से लेकर 16वीं शती तक की प्रतिमाएं भी प्रदर्शित हैं। इनमें चतुर्मुखी शिवलिंग, शिव-पार्वती तथा शिव-पार्वती विवाह से सम्बन्धित प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। दर्शक गुप्त कालीन प्रतिमाओं को थोड़े से ही प्रयास से उनकी मांसलता के आधार पर पहचान सकता है।

    चौहानों के शासन काल में नागौर से लेकर सांभर, सीकर एवं अजमेर आदि स्थानों पर स्थापत्य एवं शिल्पकला के क्षेत्र में चहुंमुखी प्रगति हुई। छठी से 12वीं शताब्दी की अवधि में इस क्षेत्र की कला, समृद्धि के शिखर पर पहुँच गई। अजमेर संग्रहालय की प्रतिमा दीर्घा में मुख्यतः चौहान काल में 10वीं से 12वीं शती के मध्य बने शिल्प एवं स्थापत्य कला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। मुख्य प्रतिमाओं में लिंगोद्भव महेश्वर, नक्षत्र, वराह स्वामी, लक्ष्मीनारायण, कुबेर तथा सूर्य प्रतिमा चित्ताकर्षक हैं जो पुष्कर, अढा़ई दिन का झोंपड़ा, बघेरा, हर्षनाथ (सीकर) आदि स्थलों से प्राप्त की गई हैं। लिंगोद्भव महेश्वर की सीकर से प्राप्त प्रतिमा लंदन एवं रूस में आयोजित कला प्रदर्शनियों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। कटारा से प्राप्त ब्रह्मा-विष्णु-महेश, अर्थूणा के इन्द्र एवं कुबेर, कुसुमा से प्राप्त शिव-पार्वती, आउवा से प्राप्त बलदेव-रेवती एवं विष्णु की चित्ताकर्षक प्रतिमाएं, इस संग्रहालय की उल्लेखनीय प्रतिमाएँ हैं।

    जैन मूर्ति-दीर्घा में लगभग तीन दर्जन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं जो राजस्थान में जैन धर्म के प्रभाव की गाथा कहती हैं। इन प्रतिमाओं को अजमेर, पुष्कर, किशनगढ़, बघेरा, टांटोटी, लाडनूं, तलवाड़ा, अर्थूणा, कटारा, झालरापाटन, बड़ौदा (डूंगरपुर) एवं बदनोर (उदयपुर) आदि स्थानों से प्राप्त किया गया। ये स्थान जैन धर्म के केन्द्र स्थल रहे हैं तथा अधिकतर प्रतिमाएं 10वीं से 17वीं शती का प्रतिनिधित्व करती हैं। बघेरा से प्राप्त कुंथुनाथ, पार्श्वनाथ तथा आदिनाथ, टांटोटी से प्राप्त शांतिनाथ, किशनगढ़ से प्राप्त सुपार्श्वनाथ, अजमेर से प्राप्त शंातिनाथ, चन्द्रप्रभु एवं जैन प्रतिमा का छत्र, पुष्कर से प्राप्त जैन प्रतिमा का छत्र, कटारा से प्राप्त आदिनाथ, महावीर स्वामी तथा पार्श्वनाथ, अर्थूणा से प्राप्त जैन सरस्वती, बड़ौदा से प्राप्त आदिनाथ एवं वासुपूज्य, लाडनूं से प्राप्त कुंथुनाथ एवं हाथनों (जोधपुर) से प्राप्त गौमुखी-यक्ष इस संग्रहालय की विशिष्ट जैन प्रतिमाएँ हैं।

    शिलालेख

    अजमेर संग्रहालय में दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व से लेकर मध्य युग तक के प्राचीन महत्वपूर्ण शिलालेख विद्यमान हैं। इसके साथ ही अभिलेखयुक्त प्रतिमाएं, स्मृतिफलक शिलालेख तथा ताम्रपत्रों का भी अच्छा संग्रह है। ये शिलालेख ब्राह्मी, कुटिल एवं देवनागरी आदि लिपियों तथा संस्कृत, हिन्दी, डिंगल एवं फारसी आदि भाषाओं में उत्कीर्ण हैं। बरली का शिलालेख राजस्थान का प्राचीनतम शिलालेख कहलाता है। इस शिलालेख को अजमेर से 36 किलोमीटर दूर बरली के निकट भिलोत माता मंदिर से प्राप्त किया गया। यह दूसरी शताब्दी ईस्वी-पूर्व का है तथा ब्राह्मी लिपि में है। संभवतः यह किसी जैन मंदिर का शिलालेख है। नगरी का लेख वि.सं. 481 का है। इस लेख में वैश्य सत्यसूर्य और उसके भाइयों द्वारा भगवान नारायण (विष्णु) के चरण पर मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है। यह लेख मेवाड़ के नगरी (मध्यमिका) नामक प्राचीन नगर से मिला है।

    प्रतिहार वंशीय राजा बाउक के मण्डोर लेख (वि.सं. 894) में मंडोर के प्रतिहारों का ब्राह्मण हरिश्चन्द्र के वंश में होना तथा हरिश्चन्द्र से लेकर बाउक तक की वंशावली और उनका कुछ वृत्तान्त दिया है। बयाना के नाना अभिलेख (8वीं शर्ती ईस्वी) में बलिआ के पुत्र तथा उकेश्वर के पौत्र दुर्गादित्य का, गायों को छुड़ाने के प्रयास में चोरों के हाथों मारे जाने का उल्लेख है। वाक्पतिराज के पुष्कर लेख में 10वीं शती ईस्वी में रुद्रादित्य नामक व्यक्ति द्वारा एक विष्णु मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है। चामुण्डराज अर्थूणा लेख (वि.सं.1137) बागड़ के परमार राजा चामुण्डराज के समय का है। इसमें उसके एक अधिकारी के तीन पुत्रों आसदेव, मत्यासराज तथा अनंतपाल के नाम दिए गए हैं। अनंतपाल ने एक शिव मंदिर बनवाया था, यह लेख अर्थूणा के उक्त शिवालय से मिला है।

    अजमेर के अढाई दिन का झोंपड़ा परिसर से चौहान राजा विग्रहराज (चतुर्थ) के समय के छः शिलापट्ट मिले हैं जिन पर राजा विग्रहराज द्वारा लिखित संस्कृत भाषा का नाटक हरकेलि उत्कीर्ण है। इस नाटक में शिव-पार्वती की अभ्यर्थना की गई है और उनकी विभिन्न क्रीड़ाओं का वर्णन है। इसके एक खण्ड में नारायण तथा अन्य देवी-देवताओं की स्तुति है। बारहवीं शताब्दी ईस्वी का चौहान नरेश विग्रहराज (चतुर्थ) साहित्य प्रेमी राजा था और साहित्यकारों का आश्रयदाता भी। उसके समय के लोग उसे कविबांधव कहते थे। इतिहास में उसे वीसलदेव नाम से भी सम्बोधित किया गया है। उसने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय एवं सरस्वती मंदिर बनवाया जो मुहम्मद गौरी की सेनाओं द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद अढ़ाई दिन का झौंपड़ा के नाम से अवशेष रूप में रह गया है। इस विद्यालय परिसर से 75 पंक्तियों का एक विस्तृत शिलालेख प्राप्त हुआ है जो इस बात की घोषणा करता है कि इस विद्यालय का निर्माण वीसलदेव ने करवाया था। सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर परिसर से विग्रहराज द्वारा संस्कृत में लिखित हरकेलि नाटक के छः चौके मिले हैं जो 22 नवम्बर 1153 की तिथि के हैं। राजपूताना संग्रहालय में रखा उसका शिलालेख घोषणा करता है कि चौहान शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

    रंगचित्र

    संग्रहालय के चित्रकला विभाग में कोटा, बूंदी, उदयपुर, जोधपुर, किशनगढ़ एवं बीकानेर आदि रियासतों से प्राप्त विभिन्न चित्रशैलियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें कोटा, करौली, टोंक, बीकानेर, जोधपुर, डूंगरपुर, भरतपुर, झालावाड़ तथा जयपुर के प्रमुख शासकों के चित्रों के साथ-साथ मथुराधीशजी, वल्लभ संप्रदाय, श्रीनाथजी, वासुदेव द्वारा कृष्ण को लेकर यमुना पार करने के चित्र, विभिन्न राग-रागिनियों के चित्र, गेरखनाथजी, अष्टछाप कवि, गुंसाईजी, चीर हरण, राम-रावण युद्ध, वल्लभाचार्यजी, विट्ठलनाथजी, भीष्म पितामह आदि के चित्र सम्मिलित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में विभिन्न प्रकार के प्राचीन अस्त्र-शस्त्र का प्रदर्शन किया गया है। इनमें विभिन्न प्रकार की तलवारें, ढाल, कटार, फरसा, जागनोल, बंदूक, धनुषबाण तथा अनेक प्रकार के हथियार संगृहीत हैं। साथ ही एक मनुष्याकार राजपूत योद्धा का मॉडल रखा है जो मध्य-कालीन युद्धों के समय पहनी जाने वाली वेशभूषा से सुसज्जित है।

    सिक्के एवं मुद्राएं

    अजमेर संग्रहालय में सोना, चांदी, तांबा, लैड तथा निकल के 3000 से अधिक सिक्के सुरक्षित हैं जिनमें भारतवर्ष के पूर्वेतिहासिक काल के पंचमार्का (आहत) सिक्के सबसे पुराने हैं। नगरी से प्राप्त जनपद के सिक्कों पर वृक्ष, स्वास्तिक, ब्रह्मी लिपि के लेख तथा पट्ट और मेहराब युक्त पहाड़ी के नीचे टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से बने नदी के चिह्न अंकित हैं। तक्षशिला से प्राप्त इण्डोग्रीक सिक्के के चित्त की ओर राजा का ऊर्ध्व चित्र है तथा पट्ट की ओर यूनानी देवी एवं देवता, ‘जियस’ लिखा हुआ है एवं वृषभ के चित्र बने हैं। कुषाणकालीन सिक्कों में ईरानी वेशभूषा में अंकित राजा दाहिने हाथ से अग्नि वेदी पर आहुति देते हुए अंकित है तथा बायां हाथ कटि पर बंधी तलवार थामे दिखाया गया है। राजा के पृष्ठ भाग पर शिव तथा त्रिशूल का अंकन है। राजा का शिरस्त्राण (टोप) नुकीला है।

    कनिंघम को पुष्कर से पश्चिमी क्षत्रपों महपान, पायदामन, रुद्रदामन तथा रुद्रसिंह की कई मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। गुप्तकालीन सिक्कों में चन्द्रगुप्त (प्रथम) के राजा-रानी के सिक्के, समुद्रगुप्त के ध्वजधारी, धनुर्धारी, परशुधारी, वीणाधारी तथा अश्वमेध प्रकार के सिक्के, कांच का दुर्लभ सिक्का तथा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विभिन्न प्रकार के सिक्के इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण निधि हैं। चौहान अजयदेव के सिक्के में एक ओर बैठी हुई देवी का अंकन है तथा दूसरी ओर देवनागरी में अजयदेव लिखा हुआ है। अश्वारोही-वृषभ प्रकार के सिक्के के चित भाग पर ढाल और भाला लिए अश्वारोही तथा पट्ट भाग पर शिव-वाहन नंदी बैठा है। गधिया प्रकार के सिक्कों के चित भाग पर राजा का भद्दा चेहरा है तथा पट्ट भाग पर सिंहासन या अग्निवेदी को बिन्दुओं के माध्यम से बनाया गया है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों के विभिन्न सिक्के भी इस संग्रहालय में संगृहीत हैं।

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