Blogs Home / Blogs / राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय / अध्याय - 55 गोल्डन-गंगा राजकीय संग्रहालय बीकानेर
  • अध्याय - 55 गोल्डन-गंगा राजकीय संग्रहालय बीकानेर

     19.05.2020
    अध्याय - 55 गोल्डन-गंगा राजकीय संग्रहालय बीकानेर

     अध्याय - 55


    गोल्डन-गंगा राजकीय संग्रहालय बीकानेर

    बीकानेर के तीन प्रमुख संग्रहालयों- गंगा-गोल्डन जुबली संग्रहालय, जूनागढ़ के करणी संग्रहालय तथा श्री सार्दूल संग्रहालय में इतिहास एवं पुरातत्व से जुड़ी दुर्लभ सामग्री जुटाई गई है। पुरातत्व महत्व की वस्तुओं के संग्रहण की दृष्टि से बीकानेर के संग्रहालयों का राज्य में विशिष्ट स्थान है। गंगा-गोल्डन जुबिली म्यूजियम का उद्घाटन 5 नवम्बर 1937 को भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा महाराजा गंगासिंह के राज्यारोहण के स्वर्ण जयन्ती वर्ष में किया गया। महाराजा की मृत्यु के लगभग 10 वर्ष बाद इस संग्रहालय के लिए जनसहयोग से एक वृत्ताकार भवन बनाया गया जिसका उद्घाटन 4 सितम्बर 1954 को हुआ।

    इस संग्रहालय में महाराजा गंगासिंह (ई.1887-43) के जीवन से सम्बन्धी चित्र एवं सामग्री कला कक्ष, पट्ट-परिधान कक्ष, ऐतिहासिक कक्ष, 
    शृंगार, पुरातत्व कक्ष, चित्रशाला तथा लोककला दीर्घा आदि कक्षों में दुर्लभ कलाकृतियों का अमूल्य संग्रह है। इस संग्रहालय में 71 प्रस्तर प्रतिमाएँ, 10 शिलालेख, 192 लघुचित्र, 124 टैराकॉटा सामग्री, 27 धातु सामग्री, 574 शस्त्र, 22,241 सिक्के तथा 1,108 स्थानीय कला नमूने एवं वस्त्र नमूने रखे गए हैं। संग्रहालय में कई तरह के मध्यकालीन एवं आधुनिक काल के शिल्प, चित्र, गलीचे (कालीन), पॉटरी, टेराकोटा की सामग्री, विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र सम्मिलित हैं।

    गंगा दीर्घा

    महाराजा गंगासिंह (ई.1887-1943) के शासनकाल में बीकानेर राज्य ने बहुत उन्नति की। इस संग्रहालय की स्थापना भी उनके शासनकाल में हुई। इसे दृष्टिगत रखते हुए संग्रहालय की प्रथम दीर्घा महाराजा गंगासिंह को समर्पित की गई है। इस दीर्घा में महाराजा के जीवन से सम्बन्धित तैलचित्र, फोटोग्राफ, विश्वयुद्ध के समय कार्य में ली गई सामग्री, प्रमाण-पत्र एवं उनके द्वारा शिकार किए हुए चीते और शेर, महाराजा द्वारा प्रयुक्त सामग्री तथा अन्य वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।

    लोककला दीर्घा

    लोककला दीर्घा में लकड़ी, लाख, ऊँट की खाल आदि से निर्मित कलात्मक सामग्री प्रदर्शित की गई है जिस पर भव्य कलात्मक कार्य किया गया है। यहाँ प्रदर्शित शुतुरमुर्ग के अण्डों पर चित्रकारी की गई है। प्रस्तर पर नक्काशी का मनमोहक कार्ययुक्त झरोखा एवं स्तम्भ, मोर की लड़त, बीकानेर की मिट्टी से निर्मित कांच की सामग्री, इक्का, हुक्का पीते हुए पुरुष, नोहर से प्राप्त मृण्मय पात्र, प्राचीन वाद्ययंत्र, ढोलक, नगारा, झांझर, मोरचंग, पाबूजी का माटा आदि प्रदर्शित हैं। इससे बीकानेर रियासत के कलात्मक स्वरूप का परिचय प्राप्त होता है। पट्ट-परिधान दीर्घा में बीकानेर जेल में निर्मित उच्चकोटि के कलात्मक गलीचे और राजाओं की पोशाकें प्रदर्शित हैं। लोककला दीर्घा में जनजीवन को प्रदर्शित करने वाले मॉडल, चित्र, वस्त्र, पाबूजी की पड़ तथा अन्य कलात्मक सामग्री प्रदर्शित है।

    चित्र दीर्घा

    चित्रकला दीर्घा में राजस्थान की विभिन्न चित्रशैलियों के चित्र प्रदर्शित हैं। 18वीं शताब्दी में चित्रित बारहमासा का पूरा सैट महत्वपूर्ण है, जिन पर गोविन्द कवि के ब्रजभाषा के छंद भी अंकित हैं। विख्यात अंग्रेज चित्रकार ए. एच. मूलर ने बीकानेर नरेशों से जुड़ी हुई कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को चित्रित किया। इन ऐतिहासिक घटनाक्रमों के चित्र, दीर्घा में प्रदर्शित किए गए हैं। बीकानेर के संस्थापक राव बीका (ई.1472-1504) का जोधपुर से अपने पैतृक राज्यचिह्न लाने का चित्र, राव जैतसिंह का बाबर के पुत्र कामरान के साथ रात्रिकालीन युद्ध का चित्र तथा बीकानेर नरेश रायसिंह द्वारा गुजरात के गवर्नर मिर्जा मुहम्मद हुसैन के वध का चित्र इतिहास एवं कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

    महाराणा प्रताप (ई.1572-97) ने अकबर से संधि करने के लिए अकबर को पत्र द्वारा संदेश भेजा था किंतु अकबर के दरबारी एवं बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीसिंह (पीथल) ने पत्र की विश्वसनीयता पर संदेह प्रकट कर महाराणा को पत्र लिखा। इस पत्र ने महाराणा के मन में नवीन साहस का संचार किया तथा इतिहास के पृष्ठों को बदल दिया। इस घटनाक्रम पर आधारित दो चित्र मूलर ने बनाए, जो दीर्घा में प्रदर्शित हैं। हिन्दू धर्म की रक्षार्थ महाराजा करणसिंह (1631-69) का शाही नावों को तोड़कर 'जय जंगलधर बादशाह' की उपाधि प्राप्त करने का दृश्य चित्र भी बहुत महत्वपूर्ण है।

    अस्त्र-शस्त्र दीर्घा

    शस्त्रागार दीर्घा में प्राचीन शस्त्रास्त्रों का अद्धुत संग्रह किया गया है। तीर कमान, तुक्के, तलवारें, कटार, छुरी, बिछुवा, जांभिया, बुग्दा, गुप्ती, सांग, गुर्ज, गेड़िया, तवाल, फरसी, बंदूक, तोप आदि अपने क्रमिक विकास के परिचय के साथ उन वीरों का भी स्मरण कराते हैं, जिन्होंने इनका प्रयोग किया। संग्रहालय में प्रदर्शित मैचलाक किस्म की बंदूकों के साथ-साथ अन्य श्रेणी की टोपीदार कारतूसी बंदूकें भी प्रदर्शित हैं। स्थानीय जनता में 'रामचंगी' के नाम से प्रसिद्ध बंदूक लगभग 8 फुट लम्बी है। प्रदर्शित तलवारों में विशेषकर फारसी, अरबी, गुजराती, धूप, खुरासानी, करणसाही, हकीमसाही, किर्च आदि हैं। कोफ्त तथा तहनिशा काम की तलवारें भी दृष्टव्य हैं।

    महाराजा अनूपसिंह (ई.1669-98) द्वारा ई.1678 में आदूनी (दक्षिण भारत) की लूट में प्राप्त एक तलवार की मूंठ सर्प, मयूर, सिंह और हाथी आदि पशुओं की आकृति से बनी है। खांडा तलवार की ब्लेड पर हनुमान, भैरव, गणेश, दुर्गा आदि देवी-देवताओं की आकृतियां उत्कीर्ण हैं। कुछ तलवारों की ब्लेड पर शिकार आदि का अंकन किया गया है। धार्मिक कार्यों में प्रयोग ली जाने वाली तलवारें और राठौड़ कुशलसिंह की वि. सं. 1799 की लेखयुक्त तलवार महत्वपूर्ण है। कटार, पेशकब्ज, खंजर, कमान, जांभिया, छुरी, गदा, तबाल, फरसी, भाले, जगनोल हिरनसिंही आदि भी विशेष रूप से प्रदर्शित हैं। महाराणा गंगासिंह (ई.1888-1943) की सेवाओं के सम्मानार्थ भारतीय सेना के ब्रिटिश मुख्य सेनापति द्वारा प्रदत्त तोप भी शस्त्र दीर्घा की शोभा बढ़ा रही है।

    प्रतिमा दीर्घा

    प्रतिमा दीर्घा में हड़प्पा सभ्यता के काल से लेकर, मौर्यकाल, शुंगकाल एवं गुप्त काल के आरम्भिक काल की मृण्मय मूर्तियों का अमूल्य भण्डार उपलब्ध है। यह सामग्री भारत के प्राचीन इतिहास के निर्माण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। रंगमहल से प्राप्त एकमुखी शिवलिंग, उमा-माहेश्वर, दानलीला, चक्रपुरुष, अजैकपाद, गोवर्धनधारी कृष्ण, पीर सुल्तान की पेड़ी से अप्सरा, बड़ोपल से पुजारिन, प्रेमदृश्य, चिन्तामग्न स्त्री आदि मृण्मय मूर्तियां आरंभिक गुप्तकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी देने के साथ-साथ इस क्षेत्र में मूर्तिकला के विकास की प्राचीनता पर प्रकाश डालती हैं।

    बीकानेर संग्रहालय में राजस्थान से प्राप्त कुषाण काल की कुछ मूर्तियाँ प्रदर्शित की गई हैं जिनमें एक स्त्री का केवल उर्ध्व भाग ही मिला है जिसके दाहिने हाथ में दर्पण है। जैन सरस्वती (ईसा की 10वीं शती), उमा माहेश्वर (ईसा की 13वीं शती), नर्तन-गायन मुद्रा में स्त्री-पुरुष प्रतिमाएँ (रतनगढ़ 12वीं शती) तथा लक्ष्मीनारायण (झज्जू 16वीं शती) उल्लेखनीय प्रस्तर प्रतिमाएं हैं।

    रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा तथा पीर सुल्तान की थेड़ी से प्राप्त गुप्तकालीन फलक, इटालियन विद्धान डॉ. एल. पी. टैस्सीटेरी ने ढूंढे थे। मिट्टी से बनी सामग्री आग में अच्छी तरह पकाई गई है। इन फलकों पर गांधार एवं मथुरा की कला का सम्मिश्रण हुआ है। ये ईसा की चौथी शताब्दी अर्थात् गुप्तकाल में बनाए गए थे तथा स्थानीय ईंटों से निर्मित मंदिरों के बाह्य भागों पर जड़े गए थे।

    रंगममहल से प्राप्त गोवर्धन फलक भारतीय शिल्प की अनुपम थाती है। यहाँ सरस्वती-दृषद्वती की संयुक्त धारा बहती थी। कृष्ण की क्रीड़ास्थली मथुरा से भी अब तक ऐसा गोवर्धनधारण फलक प्रकाश में नहीं आया है। इस फलक में कृष्ण को गांधार कला में बनाया गया है तथा कृष्ण को मूंछों सहित दर्शाया गया है। रंगमहल से प्राप्त मिट्टी के बने इस फलक पर कृष्ण के गले में ग्रैवेयक मथुरा-कला की द्योतक है और हृष्ट-पुष्ट कृष्ण की युवक के रूप में प्रस्तुति की गई है। इसी प्रकार बाललीला विषयक फलक लकुटधारी कृष्ण में भगवान एक गोपी से अठखेली करते हुए दर्शाए गए हैं। गोपी के सिर पर दूध की मटकी रखी है। गोपी की वेशभूषा 'रोमन' प्रतीत होती है। उसके सिर पर ओढ़नी एवं अधोवस्त्र के रूप में स्कर्ट (घाघरी) आकर्षक ढंग से प्रदर्शित की गई है। बीकानेर संग्रहालय के अन्य समकालीन मृण्मय फलक और भी रोचक हैं।

    शिव-पार्वती संदर्भ में शिव को त्रिमुखी दर्शाकर हाथों में सूर्य एवं चन्द्र को प्रदर्शित करना अध्यात्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण है और कृष्णकालीन मथुरा कला के प्रभाव का परिचायक है। यहाँ योगी शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती ने गांधार शैली का लहंगा पहन रखा है जिसका प्रचलन आज भी राजस्थान में सर्वत्र दिखाई देता है। रंगमहल के अन्य अद्वितीय फलकों में 'स्वतंत्र चक्र पुरुष' एवं 'एकमुख शिवलिंग उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त 'अजैकपाद अभिप्राय' विषयक फलक तो भारतीय शिल्प में अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं है। यहाँ स्थानीक अजमुखी देव को एकपाद और वह भी हाथी के पैर वाला दर्शाया गया है। वैदिक साहित्य में रुद्रों के विवरण में ऐसा ही उल्लेख किया गया है। बीकानेर संग्रहालय के ये गुप्तकालीन मृण्मय फलक भारतीय शिल्प की अनुपम निधि हैं।

    अमरसर ग्राम से प्राप्त धातु प्रतिमाओं से ज्ञात होता है कि मध्यकाल में बीकानेर क्षेत्र धातु-मूर्ति निर्माण कला में भी समृद्ध था। ये मूर्तियां 9वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी की हैं तथा इनमें से कुछ मूर्तियों पर कुटिल लिपि में लेख उत्कीर्ण हैं। नागौर जिले के गौराऊ नामक ग्राम से चौहान कालीन जैन धातु प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं, वे भी इसी संग्रहालय में रखी गई हैं। बीकानेर क्षेत्र के पल्लू नामक स्थान से प्राप्त प्रसिद्ध जैन सरस्वती की दो संगमरमर प्रतिमाएं मूर्तिकला की सर्वोत्तम कृतियाँ हैं।

    इनमें से एक प्रतिमा बीकानेर के इस संग्रहालय में तथा दूसरी प्रतिमा राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में रखी गई है जो कुछ वर्ष पूर्व लंदन में एक प्रदर्शनी में भी भेजी गई थी।

    बीकानेर राज्य के कालीबंगा, पीलीबंगा, दुलमाणी, भद्रकाली, भंवर, बड़ोपल, मानक और रंगमहल से प्राप्त प्रागैतिहासिक काल के विभिन्न प्रकार के आभूषण जैसे कंगन, अंगूठी, कान के गहने, मनके आदि मिट्टी और चर्ट के बने खेलने के पासे, मिट्टी के पशु-पक्षी और मानवाकृतियां एवं सादे तथा चित्रित मृण्मय पात्र आदि भी इस दीर्घा में प्रदर्शित हैं। शुक्रवार को संग्रहालय बंद रहता है।

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

  •  अध्याय - 55  अध्याय - 55  अध्याय - 55
    Share On Social Media:
Categories
x
SIGN IN
Or sign in with
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×