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  • अध्याय - 47 लोक वाद्य संग्रहालय जोधपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 47 लोक वाद्य संग्रहालय जोधपुर

     अध्याय - 47

    लोक वाद्य संग्रहालय जोधपुर

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    राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की स्थापना राजस्थान सरकार द्वारा 16 दिसम्बर 1957 को जोधपुर नगर में की गई। 12 जनवरी 1959 को इसे स्वायत्तशासी संस्था घोषित किया गया। इस अकादमी द्वारा राज्य में संगीत एवं नाटक की विविध विधाओं को बढ़ावा देना तथा इन विधाओं से जुड़े कलाकारों को संरक्षण देना है। यह लोककलाओं पर शोध कार्य को भी प्रोत्साहित करती है तथा कलाकारों के लिए विभिन्न कार्यशालाओं एवं विचार गोष्ठियों का आयोजन करवाने के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों के कलाकारों के कार्यक्रम भी आयोजित करवाती है। साथ ही राजस्थान के कलाकारों को देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करती है।

    अकादमी द्वारा लोकसंगीत की पांच हजार घण्टे की रिकॉर्डिंग करवाकर संगृहीत की गई है। साथ ही प्रदर्शनकारी लोककलाओं पर डोक्यूमेंट्री बनवाकर सहेजी गई हैं। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के जयनारायण व्यास स्मृति भवन में राजस्थान में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न प्रकार के लोकवाद्यों का समृद्ध संग्रहालय स्थित है। इस संग्रहालय में रखे गए लोक
    वाद्यों  का प्रथम प्रदर्शन जयपुर में आयोजित प्रथम बैले समारोह में बिड़ला सभागार जयपुर में किया गया था। अकादमी के संग्रहालय में चारों प्रकार के- अनवद्ध, तत्, घन एवं सुषिर वाद्यों का संग्रह किया गया है।

    अनवद्ध वाद्यों में (खाल मंढे हुए) खंजरी, डफ तथा चंग; लकड़ी या लोहे की चादर के घेरे से बने हुए वाद्यों में मादल, ढोल, डमरू; उपरी भाग खाल से मढ़ा हुआ एवं नीचे से कटोरीनुमा वाद्यों में नगाड़ा, दमामा, माटा आदि रखे गए हैं।

    तत्वाद्यों में सारंगी, जन्तर, रावणहत्था, कमायचा, खाज, तन्दूरा, इकतारा आदि संगृहीत हैं। घनवाद्यों में झांझ, मंजीरा, थाली, खड़ताल आदि संगृहीत हैं।

    सुषिर वाद्यों में बंसी, अलगोझा, पुंगी, शहनाई, सतारा, मशक तथा नड़ प्रमुख हैं।

    देवजी की पड़, पाबूजी की पड़, माताजी की पड़ आदि का भी प्रदर्शन किया गया है। पड़ एक कपड़े पर चित्रित गाथा होती है जिसमें देवी-देवताओं तथा शूरवीरों का गुणगान किया जाता है।

    संग्रहालय में परम्परागत कठपुतलियों, लोकनृतकों के वस्त्राभूषणों, विभिन्न शैलियों के नाट्य-मंचनों के छायाचित्रों तथा पॉटरी आदि का प्रदर्शन भी किया गया है। अकादमी द्वारा लोककलाओं पर विभिन्न प्रकार के प्रकाशन भी करवाए गए हैं जिनमें से कुछ प्रकाशन विक्रय हेतु भी उपलब्ध हैं।

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