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  • अध्याय - 1 संग्रहालय की अवधारणा का विकास

     02.06.2020
    अध्याय - 1 संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    अध्याय - 1


    संग्रहालय की अवधारणा का विकास

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    जब भी मनुष्य में यह समझ विकसित हुई होगी कि अपने द्वारा संचित ज्ञान को उसके प्रमाणों, चिह्नों एवं प्रतीकों के साथ, भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज कर रखा जाए, उसी समय संग्रहालय की भी नींव पड़ी होगी।

    आदिम संग्रहालय एवं चित्रशालाएं

    आदिम युगीन शैल-चित्रों को संग्रहालयों अथवा चित्रशालाओं का सबसे प्रारंभिक रूप माना जा सकता है। भारत के विभिन्न प्रांतों में स्थित पर्वतीय गुफाओं में ये शैल-चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें पशु-पक्षी, मानव, शिकारी, खेत आदि का चित्रण किया गया है। जम्मू-काश्मीर राज्य के श्रीनगर की मदानी मस्जिद में चट्टान के एक टुकड़े पर 5000 साल पुराने भित्ति चित्र मिले हैं जिनमें एक ओर तारे बने हुए हैं तथा दूसरे छोर पर ड्रैगन जैसा सिर है। इस स्थान का मूल भित्तिचित्र धुंधला पड़ चुका है किंतु उसकी एक प्रति कश्मीर विश्वविद्यालय में सहेजकर रखी गई है। इस भित्तिचित्र में भारतीय खगोल की एक दुर्लभ घटना का चित्रांकन किया गया है तथा इसमें दो सूर्य एक साथ दिखाए गए हैं। इस भित्तिचित्र में दिखाई दे रहा दूसरा सूर्य वास्तव में एक सुपरनोवा है जो किसी पुराने तारे के टूटने से उत्पन्न हुई ऊर्जा होती है। भीषण विस्फोट के बाद यह कई दिनों तक चमकदार दिखाई देता है जो दूसरे सूर्य के समान लगता है। इस चित्र में तारों के साथ सूर्य दिखाने का आशय है कि यह सुपरनोवा तब भी चमक रहा था जब रात्रि में तारे चमक रहे थे।

    राजस्थान में शेखवाटी क्षेत्र के अजीतगढ़, डोकन, सोहनपुरा, गुढागौड़जी में शैलचित्र खोजे गए हैं। रावतभाटा से 33 कलिोमीटर दूर दरा अभ्यारण्य में तिपटिया नामक स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के शैल-चित्र मिले हैं। धरती से लगभग 500 फुट ऊँचा तीन मंजिल वाला शैलाश्रय है जिसकी दूसरी एवं तीसरी मंजिलें चित्रित हैं। उत्तरपाषाण कालीन मानवों द्वारा चित्रित इन शैल-चित्रों में बैल, गाय, हिरण, सूअर एवं काल्पनिक पशुओं के चित्रों का अंकन किया गया है। इन चित्रों का रंग गहरा कत्थई तथा लाल रंग का है तथा ये रेखाओं के माध्यम से बनाए गए हैं। प्रागैतिहासिक काल के अनेक चित्रों के ऊपर ही ऐतिहासिक काल के चित्र भी बना दिए गए हैं। इस काल के चित्रों में देवी-देवता, योद्धा, घुड़सवार एवं ऊँट सवार प्रमुख हैं। ये पीले रंग तथा गेरू से बने हैं। इस काल के चित्रों में गौपालक द्वारा गायों को चराने, कहारों द्वारा वधू की डोली ले जाने एवं एक नृत्यांगना द्वारा नृत्य करने के दृश्य भी अंकित हैं जिनसे स्पष्ट है कि इस काल में मानव सभ्यता काफी आगे बढ़ चुकी थी। आहू नदी के तट पर झालावाड़ जिले में आमझीरी नाला के निकट कई शैलाश्रय खोजे गए हैं जिनमें प्रस्तर युगीन मानवों द्वारा बनाई गई चित्रशाला देखी जा सकती है। इन चित्रों में बैल, हिरण, बकरी, बारहसिंघा, नीलगाय, चीता, मानव आकृतियां, धनुष-बाण, पशु-शिकार के दृश्य आदि अंकित हैं।

    पूर्वोत्तर भारत की कुछ आदिम जातियों की बस्तियों में उन मनुष्यों की खोपड़ियों के संग्रह पाये गए हैं जिन्हें इन आदिम जातियों द्वारा मारकर खा लिया गया था। ये खोपड़ियां जातीय गौरव एवं शौर्य प्रदर्शन के लिए संगृहीत की गईं। इन्हें भी संग्रहालयों का आदिम रूप माना जा सकता है। इसी प्रकार मनुष्यों द्वारा विविध पशुओं के सिर, सींग, खाल आदि के संग्रहालय भी बनाए जाते रहे हैं।

    परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय

    विश्व के कुछ देशों में मिले शैल-चित्रों में अंतरिक्ष यानों एवं अंतरक्षि यात्रियों जैसी आकृतियां देखी गई हैं। वर्ष 2017 में फ्रांस में 38 हजार वर्ष पुराना एक ऐसा चित्र पाया गया है जिसमें पिक्सल्स की सहायता से आकृतियां उकेरी गई हैं। आधुनिक कम्प्यूटर भी इसी पिक्सल तकनीक का प्रयोग करते हैं। इसे विश्व का सबसे पुराना शैलचित्र माना गया है। उस समय धरती पर उत्तर-पाषाण काल चल रहा था तथा होमोसेपियन मानवों द्वारा पिक्सल्स का उपयोग करके चित्रों का निर्माण करना संभव नहीं था। इसलिए अनुमान है कि शैल-चित्रों में मिले अंतरिक्ष यानों तथा अंतरिक्ष यात्रियों के चित्रों और इस पिक्सल युक्त चित्र में कोई सम्बन्ध होना चाहिए। ये संभवतः उस काल में धरती पर परग्रही मनुष्यों की हलचल का परिणाम थे जो इनके माध्यम से अपनी कहानी धरती पर भविष्य में आने वाली मानव प्रजातियों के लिए छोड़कर गए थे।

    यद्यपि धरती पर परग्रही जीवों के आवागमन को अभी तक अकादमिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है किंतु इस दिशा में अनुसंधान कार्य अनवरत चल रहे हैं। कुछ स्थानों पर पत्थरों की विशालाकाय रचनाएं एवं पत्थरों के माध्यम से धरती पर बनाई गई ज्यामितीय रचनाएं पाई गई हैं, इन्हें भी परग्रही जीवों द्वारा छोड़े गए संग्रहालय माना जा सकता है। कुछ विद्वान मिश्र, चीन, कम्बोडिया सहित अनेक देशों में मिलने वाले पिरामिडों को भी परग्रही जीवों द्वारा एक विशिष्ट क्रम में बनाए गए संग्रहालय एवं अंतरिक्ष से आने वाले मानवों के लिए दिशा सूचक अथवा संकेतक मानते हैं। मिश्र के पिरामिडों में शवों के साथ मिली बहुमूल्य सामग्री भी एक प्रकार के संग्रहालय ही हैं।

    धार्मिक संग्रहालयों का विकास

    सभ्यता के विकास के साथ जब कलात्मक मंदिरों का निर्माण आरम्भ हुआ तो संग्रहालयों को एक नया आयाम प्राप्त हुआ। भारतीय देवालय स्वयं ही देव-विग्रहों के संग्रहालयों के रूप में सामने आए। मंदिरों की प्रत्येक वस्तु पवित्र मानी जाती थी। इसलिए मंदिर में कुछ समय तक उपयोग होने के बाद अनुपायोगी हो गई सामग्री यथा- कलात्मक प्रस्तर, शिखर खण्ड, स्तम्भ, देव-प्रतिमाएँ, धर्म-ग्रंथ, धार्मिक चित्र, लोक साहित्य, बर्तन तथा अन्य वस्तुएं कचरे में नहीं फैंकी जाती थीं, वरन् मंदिर परिसर किसी स्थान पर रख दी जाती थीं, धीरे-धीरे यह सामग्री संग्रहालय का रूप ले लेती थी। भारतीयों की इसी प्रवृत्ति के कारण अजमेर में स्थित ढाई दिन का झौंपड़ा (मूलतः बारहवीं शताब्दी का सरस्वती मंदिर) से अनेक महत्वपूर्ण शिलालेख, पत्थर पर उत्कीर्ण नाटक एवं दुर्लभ देव-प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं जिनमें से कुछ आज भी इस परिसर में बने कक्षों में देखी जा सकती हैं। इसमें से कुछ सामग्री अजमेर के राजकीय संग्रहालय में संजोई गई है तथा भारतीय संग्रहालय कलकत्ता को भेजी गई है। बीकानेर के तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के मंदिर में बहुत सी दुर्लभ प्रतिमाएँ संगृहीत की गई हैं। बीकानेर के दसवें राठौड़ शासक अनूपसिंह (ई.1638-98) ने मुगलों की ओर से दक्षिण में अनेक लड़ाइयां लड़ीं एवं उस दौरान दक्षिण भारत से अनेक प्रतिमाओं को सुरक्षित बचाकर बीकानेर भेज दिया। अन्यथा ये मूर्तियां औरंगजेब द्वारा नष्ट कर दी जातीं।

    राज्याश्रित संग्रहालयों का विकास

    रियासती काल में राजाओं-महाराजाओं द्वारा अपने पुरखों के चित्रों, तलवारों, बंदूकों, भालों, ढालों, पालकियों, रथों, शिरस्त्राणों, कवचों, तूणीरों, वस्त्राभूषणों आदि विविध राजसी सामग्री को नष्ट नहीं करके, उन्हें एक स्थान पर संजो लिया जाता था ताकि उन पुरखों की स्मृति बनी रहे। इन संग्रहालयों तक जन-सामान्य की पहुंच नहीं होती थी। ये केवल राजसी व्यक्तियों द्वारा देखे जाने के लिए होते थे। इस तरह के संग्रहों का उल्लेख प्राचीन भारतीय इतिहास एवं साहित्य में हुआ है।

    चित्रशालाएं एवं चित्रित पोथियाँ

    रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्यों में रंगशाला, चित्रशाला एवं विश्वकर्मा मन्दिर का उल्लेख मिलता है। कृष्ण-धर्मोत्तर पुराण में चित्रशालाओं का उल्लेख हुआ है जहाँ चित्र संगृहीत किए जाते थे। गुरुकुलों, ऋषि-आश्रमों, हिन्दू मंदिरों, जैन स्थानकों एवं बौद्ध उपाश्रयों आदि में भी सचित्र पोथियाँ लिपिबद्ध की जाती थीं। ये चित्र पौराणिक एवं धार्मिक कथाओं के अंकन के साथ-साथ कला के अप्रतिम उदाहरण भी हैं। भारतीय शासकों ने अपने दरबारी चित्रकारों से साहित्यिक एवं धार्मिक विषयों के चित्र बनवाए तथा उनका संग्रह किया, राजाओं-महाराजाओं के संग्रहालय पुस्तक प्रकाश, सरस्वती भण्डार, सूरतखाना आदि नामों से जाने जाते थे। मुगल शासकों के पुस्तकालय कुतुबखाना के नाम से एवं चित्रसंग्रह तस्वीरखाना के नाम से जाने जाते थे। इन्हें पोथीखाना तथा कारखाना भी कहा जाता था और इनमें चित्रित एवं अचित्रित ग्रंथों का प्रतिलिपिकरण एवं संग्रहण होता था। मुगलकाल में भी अरबी, फारसी, संस्कृत, हिन्दी, ब्रज, डिंगल आदि विविध भाषाओं के लेखकों और कवियों की कृतियों को संरक्षण प्रदान किया गया।

    भारत के लगभग सभी प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों एवं राजमहलों में भित्तिचित्रों का अंकन किया गया। ये उस काल की चित्रशालाओं एवं चित्रवीथियों का ही रूप हैं। बीकानेर के भांडाशाह जैन मंदिर में रंगमंडप की चित्रकारी बीकानेर के प्रसिद्ध मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों द्वारा की गई है जिनमें जैन कथा साहित्य, नरक यातना, रोहणियाचार, उग्रसेन का महल और गिरनार आदि के अनेक चित्र अंकित हैं। बीकानेर के सुप्रसिद्ध चित्रकार मुराद बख्श ने इस मंदिर की दीवारों पर स्वर्णयुक्त मीनाकारी का कार्य किया। मीनाकारी के माध्यम से ही चित्रकार द्वारा पशु-पक्षियों और फूल-पत्तियों के आकर्षक एवं अद्भुत चित्र बनाए गए हैं। बीकानेर के जूनागढ़, जोधपुर के मेहरानगढ़, नागौर के स्थल दुर्ग, शेखावाटी की हवेलियों में बनाए गए भित्तिचित्रों पर कई शोध ग्रंथ लिखे जा सकते हैं।

    बीकानेर के जूनागढ़ के महलों में सोने और मीने की कारीगरी देखकर लगता है मानो महंगे एवं सुंदर फारसी गलीचों को काटकर ही छतों और दीवारों पर चिपका दिया गया है। दीवारों, छतों एवं खम्भों पर तरह-तरह के बेल-बूटे, फूलपत्ती, पशु-पक्षी और भांति-भांति के चित्र बने हुए हैं। छतों एवं खम्भों के बीच की दीवारों पर लम्बी-लम्बी चित्रकथाएं भी अंकित हैं। अनूप महल के दरवाजों एवं किवाड़ों की चित्रकारी देखते ही बनती है। बादल महल की छतें कड़कड़ाती हुई बिजली से चित्रांकित हैं तथा दीवारों पर पानी की धाराएं गिरती हुई दिखाई देती हैं। बीकानेर की रामपुरिया हवेली में बने आयताकार आंगन के बरामदे में लगभग तीन दर्जन धार्मिक चित्र बने हुए हैं। इस हवेली के अतिथि गृह में बीकानेर शैली के लगभग एक दर्जन चित्र बने हुए हैं। राजपूताना की बहुत से रियासतों में बनी साधु-संतों एवं राजा-रानियों की छतरियों के भीतर भी चित्र बनाए गए हैं जो चित्रवीथियों का काम करते थे। जोधपुर एवं जालोर के नाथ सम्प्रदाय के मंदिरों में नाथ साधुओं एवं नाथ सम्प्रदाय से सम्बन्धित देवी-देवताओं के चित्र बने हुए हैं। मेहरानगढ़ दुर्ग में भी नाथशैली के चित्र देखे जा सकते हैं। इस प्रकार पूरे राज्य में स्थित मध्यकालीन दुर्गों, महलों, मंदिरों, हवेलियों आदि में चित्रवीथियां एवं चित्रशालाएं बनी हुई हैं। शेखावाटी की हवेलियों में भारत की सर्वश्रेष्ठ चित्रशालाएं बनी हुई हैं।

    ब्रिटिश काल में संग्रहालयों की विषय-वस्तु का विस्तार

    अंग्रेजों के आगमन के साथ ही संग्रहालयों की विषय-वस्तु का विस्तार होने लगा। उनकी विषय-वस्तु निजी न होकर सार्वजनिक होने लगी। संग्रहालयों का आयाम राजसी वस्त्राभूषणों तथा अस्त्र-शस्त्रों आदि से ऊपर उठकर सामाजिक परम्पराओं, क्षेत्रीय संस्कृतियों एवं हस्तकला सामग्रियों आदि के लिए भी खुलने लगा। उन्होंने प्राकृतिक इतिहास को संग्रहालयों की विषय वस्तु का आधार बनाया तथा संग्रहालयों के दरवाजे विश्व भर के देशों से संगृहीत की गई सामग्री के लिए खोल दिए। 17वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक संग्रहालय शब्द का आशय प्रायः एक ऐसे भवन से लगाया जाता था जिसमें पुरावस्तुओं, प्राकृतिक इतिहास तथा परम्परागत कलाकृतियों जैसी पुरानी वस्तुओं को रखा जा सके। समय के साथ विश्वभर में संग्रहालयों की भूमिका और उद्देश्य में परिवर्तन आया। इसे कला को सीखने की इच्छा को समर्पित भवन के रूप में देखा गया। संग्रहालय शब्द को पहचान मिली और समाज में संग्रहालय की भूमिका महत्वपूर्ण बन गयी। आज का संग्रहालय न केवल विविध वस्तुओं को संकलित करके रखने वाला भवन है, अपितु यह सीखने और सिखाने का प्रमुख संस्थान भी है। इस प्रकार आधुनिक संग्रहालय ज्ञान के संरक्षण के साथ-साथ ज्ञान के विस्तार एवं शोध केन्द्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।

    आधुनिक संग्रहालयों की विषय-वस्तु

    आधुनिक संग्रहालय एक ऐसा स्थान है जहाँ, विभिन्न युगों में घटित घटनाओं के चिह्न, अवशेष, चित्र, मॉडल आदि का संग्रहण किया जाता है। अर्थात् संग्रहालय में धरती के किसी भी भाग में अथवा ब्रह्माण्ड के किसी भी पिण्ड पर किसी भी कालखण्ड में विकसित मिट्टी, चट्टान, शैवाल, खनिज, वनस्पति, पुष्प, तितली, कीट, पक्षी, विविधि प्रकार के जीव-जन्तु, उनके जीवाश्म, जीवों के अस्थि-पंजर, मानवों द्वारा प्रयुक्त उपकरण, औजार, शिल्प, स्थापत्य आदि विविध सामग्री का संग्रह किया जाता है। साथ ही खगोलीय घटनाओं से लेकर भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामरिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक जगत में घटी घटनाओं तथा उनसे सम्बद्ध महापुरुषों आदि के चित्र, प्रतिमाएँ, चार्ट, ग्राफ, यंत्र, वेशभूषा आदि का संकलन किया जाता है।

    सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि विविध कालखण्डों में प्रकृति एवं जीवों द्वारा छोड़े गए अवशेष ही संग्रहालय की मुख्य विषय-वस्तु होते हैं। मानव द्वारा अर्जित ज्ञान का जिस किसी भी प्रकार से निरूपण किया जा सके, वह सब, संग्रहालय की विषय वस्तु बन सकती है। डाक टिकटों से लेकर माचिस की डिब्बियों, सिगरेट केस, कुर्सियों, रेलवे इंजन एवं डिब्बे, बाथरूम यूटेंसिल्स, ताले, घड़ियाँ, बंदूकें, तोपें, कारें, हस्तलिखित पोथियां, चित्रित पोथियां, ताड़पत्र, जन्म कुण्डलियाँ, शिलालेख, मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन, ग्रामीण जीवन में काम आने वाली सामग्री, कृषियंत्र, झाड़ू, ग्रामोफोन, रेडियो, गुड़ियाएं, पेपरवेट आदि विभिन्न प्रकार की सामग्री को विश्व भर के संग्रहालयों एवं भारत के संग्रहालयों की विषय-वस्तु बनाया गया है। अमरीका में फर्स्ट लेडी (अर्थात् अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी) के गाउन भी संग्रहालय को दान किए गए तथा उनका प्रदर्शन आज भी किया जा रहा है।

    आधुनिक संग्रहालयों की स्थापना के उद्देश्य

    सामान्यतः संग्रहालय के माध्यम से युग-युगीन मानवीय कार्यकलापों, इतिहास एवं पर्यावरण की विरासतों के संरक्षण के लिए उनका संग्रह, शोध, प्रचार या प्रदर्शन किया जाता है। इस सामग्री का उपयोग इतिहास लेखन, शिक्षण, अध्ययन और मनोरंजन आदि विविध उद्देश्यों के लिए होता है। संग्रहालयों के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटकों के बीच क्षेत्र विशेष की संस्कृति का प्रदर्शन करके लाभार्जन किया जाता है।

    आधुनिक संग्रहालयों का वर्गीकरण

    आज किसी भी विषय-वस्तु को लेकर संग्रहालय स्थापित कर दिया जाता है। विषय वस्तु के आधार पर संग्रहालयों का निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

    (1.) कला संग्रहालय: चित्रकला, संगीत कला, लोक वाद्ययंत्र, शास्त्रीय वाद्ययंत्र, हस्तकलाओं के नमूने, नृत्यकला से सम्बन्धित सामग्री आदि।

    (2.) ऐतिहासिक संग्रहालय: स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, देशी रजवाड़ों का इतिहास, संवैधानिक प्रगति का इतिहास, धार्मिक सम्प्रदायों का इतिहास आदि।

    (3.) पुरातत्व संग्रहालय: प्राचीन सभ्यता के स्थलों से प्राप्त बर्तन, मूर्तियां, भवन सामग्री, आभूषण, सिक्के, खेत, कुंए आदि।

    (4.) विज्ञान और प्रौद्योगिकी संग्रहालय: मिट्टियां, पुष्प, तितलियां, खनिज, अंतरिक्ष विज्ञान, विज्ञान के सिद्धांत आदि।

    (5.) नृशास्त्रीय संग्रहालय: विभिन्न काल खण्डों के आदिमानवों के कंकाल, खोपड़ी, ममी आदि।

    (6.) महापुरुषों पर केन्द्रित संग्रहालय: सुभाषचंद्र बोस, बालगंगाधर तिलक, अरविंद घोष, महाराजा अग्रसेन, महाराजा रणजीतसिंह आदि पर केन्द्रित संग्रहालय।

    (7.) पुस्तक मुद्रण कला संग्रहालय: प्रारंभिक मुद्रण कला, ट्रेडल मुद्रण मशीन, ऑफसेट मुद्रण मशीन आदि।

    (8.) डाक टिकट संग्रहालय: भारत में अब तक केवल दिल्ली में ऐसा संग्रहालय स्थापित किया गया है। निजी संग्रहकर्ताओं के पास अपने छोटे-छोटे डाक टिकट संग्रह हैं।

    (9.) बाल संग्रहालय: बालोपयोगी विज्ञान, कला सामग्री, खिलौने, ट्राइसाइकिल, फोटोग्राफ, पेंटिंग आदि।

    (10.) स्वास्थ्य संग्रहालय: स्वच्छता, स्वास्थ्य समस्याएं, घातक बीमारियां, चिकित्सा पद्धतियां, आदि।

    (11.) अस्त्र-शस्त्र संग्रहालय: तोपें, बंदूकें, भाले, तलवार, ढालें, खुकरी, चाकू, छुरे, टैंक, लड़ाकू विमान आदि। जोधपुर दुर्ग में प्राचीन तोपों का संग्रहालय है।

    (12.) दैनिक उपयोग की वस्तुएं: वस्त्र, जूते, टोपियां, पगड़ियां, साफे, कोट, ताले, घड़ियां, कैंचियां, बागवानी के उपकरण, खेती के उपकरण आदि। जोधपुर में पाग-पगड़ियों का संग्रहालय अपने आप में अनूठा है। उदयपुर में बागोर की हवेली में भी पाग-पगड़ियों का संग्रहालय है।

    (13.) चित्रशालाएं: इस प्रकार के संग्रहालयों में विविध कालखण्डों में, विविध क्षेत्रों अथवा प्रांतों में, विविध शैलियों अथवा उपशैलियों में एवं विविध कलाकारों द्वारा निर्मित चित्रों अर्थात् पेंटिंग एवं फोटोग्राफ प्रदर्शित किए जाते हैं।

    (14.) राष्ट्रीय संग्रहालय: इस प्रकार के संग्रहालय में देश-विदेश के दर्शकों को सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व करने वाली एवं जीवन के लगभग प्रत्येक पक्ष से सम्बन्ध रखने वाली सामग्री का प्रदर्शन किया जाता है तथा उसे पुरातत्व, कला, पेंटिंग्स, अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र एवं वेशभूषा आदि विभागों में विभक्त किया जाता है। इन संग्रहालयों में देश से बाहर से भी सामग्री प्राप्त कर प्रदर्शित की जाती है।

    संग्रहालयों की समस्याएं

    संग्रहालयों की स्थापना, संरक्षण एवं संचालन का कार्य कठिनाइयों से भरा हुआ है। इसके लिए दक्ष व्यक्तियों, विपुल धन एवं विस्तृत भवन आदि की आवश्यकता होती है। संग्रहालयों में संकेतकों की स्थापना करने, दस्तावेजीकरण करने और श्रेणीकरण करने के लिए उत्साही एवं योग्य व्यक्ति बहुत कम संख्या में उपलब्ध हो पाते हैं। संग्रहालयों का परिवेश आकर्षक एवं उत्साहवर्द्धक बनाया जाना आवश्यक है, जहाँ दर्शक बिना किसी तनाव एवं संकोच के पहुंच सके। भारतीय संग्रहालयों के लिए इसी प्रकार के आधारभूत ढांचे की आवश्यकता है, ताकि यह विश्व भर के संग्रहालयों की तुलना में स्वयं को स्तरीय सिद्ध कर सकें। संग्रहालय में प्रदर्शित प्रत्येक सामग्री का विवरण, साधारण दर्शक को सहज रूप से उपलब्ध कराया जाना आवाश्यक है। बहुभाषी प्रदर्शकों (गाइड) की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है। प्रशिक्षित एवं योग्य गाइड के बिना संग्रहालय को देखने को कोई अर्थ नहीं है। जब तक दर्शकों को संग्रहालय में प्रदर्शित प्रमुख वस्तुओं की विस्तृत और सटीक जानकारी नहीं मिलेगी, तब तक दर्शक का संग्रहालय से समुचित जुड़ाव होना संभव नहीं है।

    राजस्थान का निर्माण होने के बाद राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी (जोधपुर) की स्थापना ई.1955 में, साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर की स्थापना ई.1955 में तथा प्रताप शोध प्रतिष्ठान की स्थापना ई.1967 में हुई थी। राजस्थान में इस प्रकार की संस्थाओं की स्थापना का उद्देश्य इतिहास एवं पुरातत्व के विद्यार्थियों को शोध सामग्री के मूल स्रोत उपलब्ध करवाना था। इन संस्थाओं को राजस्थान सरकार द्वारा 60 से 90 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध करवाया जाता था किंतु लगभग 50 वर्ष तक राजकीय संरक्षण देने के बाद, सरकार की नीतियों में परिवर्तन आने के कारण वर्ष 2011 में राजकीय अनुदान बंद कर दिया गया। इन संस्थाओं के प्रशिक्षित एवं अनुभवी कर्मचारियों एवं अधिकारियों को अन्य कार्यों में लगा दिया गया। राज्य सरकार के इस कदम के कारण प्रदेश में शोध कार्य को धक्का लगा है।

    संग्रहालयों से अपेक्षाएं

    संग्रहालय संचालकों का पहला और अंतिम उद्देश्य केवल यही होना चाहिए कि वे संग्रहालय में आने वाले प्रत्येक दर्शक की जिज्ञासाओं का समाधान करें। दर्शकों को संग्रहालय में लम्बी अवधि व्यतीत करने का अवसर दिया जाना चाहिए, जिससे वे शिक्षा और ज्ञान की अपनी जिज्ञासाओं का शमन कर सकें। साथ ही, वे कला, विज्ञान एवं विविध विषय पर आधारित सामग्री को भलीभांति समझ सकें। जन साधारण के लिए संग्रहालय किसी अजूबे से कम नहीं होता। उसके इस भाव को स्थायी बने रहने देने के लिए यह आवश्यक है कि संग्रहालय का संयोजन किसी अजूबाघर की ही तरह किया जाए। तभी जनसाधारण का जुड़ाव संग्रहालयों से बना रह सकेगा और वह अपने अतीत की सुनहरी एवं गौरवमयी परम्परा से भिज्ञ रह सकेगा।

    भारत में सार्वजनिक संग्रहालयों की स्थापना

    भारत के अनेक देशी रजवाड़ों में पुराने एवं नए हथियारों को एक स्थान पर एकत्रित करके रखने की परम्परा थी। जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी का आगमन हुआ तो इस परम्परा को और अधिक बढ़ावा मिला। ई.1784 में सर विलियम जोन्स ने कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी बंगाल की स्थापना की। सोसायटी द्वारा अपने पुस्तकालय में हस्तलिखित पोथियों, मानचित्रों, मुद्राओं, आवक्ष आकृतियों, चित्रों तथा अन्य सामग्री का संकलन किया गया। इस छोटे से संग्रहालय की स्थापना, देश में भावी संग्रहालयों की स्थापना के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुई तथा इसे व्यापक लोकप्रियता मिली। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत में पहली बार व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक संग्रहालय ने जन्म लिया।

    उन्नीसवीं शताब्दी संग्रहालयों की स्थापना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। एशियाटिक सोसायटी के प्रयासों से ई.1814 में भारतीय संग्रहालय कलकत्ता की स्थापना हुई जिसे भारत का प्रथम संग्रहालय होने का गौरव प्राप्त है। इसके बाद अन्य संग्रहालयों की स्थापना आरम्भ हुई। ई.1851 में केन्द्रीय संग्रहालय मद्रास की स्थापना हुई। इसी वर्ष बम्बई के ग्रांट मेडिकल कालेज में एशिया का प्रथम मेडिकल संग्रहालय स्थापित किया गया। ई.1863 में राजकीय संग्रहालय लखनऊ की स्थापना हुई। यह उत्तर प्रदेश का पहला संग्रहालय था। ई.1865 में राजकीय संग्रहालय मैसूर, ई.1868 में दिल्ली नगर पालिका संग्रहालय और ई.1874 में मथुरा संग्रहालय की स्थापना हुई। ई.1887, 1888, 1890 तथा ई.1894-95 में त्रिचूर, उदयपुर, भोपाल, जयपुर, राजकोट, पूना, बड़ौदा, भावनगर एवं त्रिचनापल्ली इत्यादि शहरों में विभिन्न संग्रहालयों की स्थापना हुई।

    बीसवीं शताब्दी में संग्रहालयों की स्थापना का काम और तेजी से आगे बढ़ा। ई.1914 में प्रिन्स ऑफ वेल्स म्यूजियम मुम्बई, ई.1920 में भारत कला भवन बनारस, हिन्दू विश्वविद्यालय संग्रहालय वाराणसी, ई.1929 में बॉटनीकल म्यूजियम इन्दौर तथा ई.1931 में इलाहाबाद संग्रहालय आदि संग्रहालयों की स्थापना हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में संग्रहालयों की नई भूमिका अनुभव की जाने लगी और अनेक बहुआयामी संग्रहालयों की स्थापना हुई। आजादी के दो वर्ष बाद ई.1949 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किया गया। आज यह बैद्धिक और शैक्षणिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र है। भारत में अब तक सरकारी क्षेत्र में 400 से अधिक संग्रहालयों की स्थापना हो चुकी है। निजी क्षेत्र के संग्रहालयों की संख्या अलग है।

    आधुनिक भारत के निर्माता भारत के ऐतिहासिक अतीत से अवगत थे और वे इसकी समृद्धि, इसके महत्व तथा भावी पीढ़ियों के लिए इसकी उत्सुकता से भी परिचित थे। उन्हें संग्रहालय जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के निर्माण करने की प्रासंगिकता का भी ज्ञान था। संग्रहालयों की यह यात्रा निश्चित रूप से आने वाले समय में अपने कलेवर और वस्तु-विषय में और भी बड़े परिवर्तन करेगी।

    भारत में संग्रहालयों का वैज्ञानिक पद्धति से विकास

    भारत सरकार द्वारा देश में वैज्ञानिक पद्धति से संग्रहालयों का विकास किया गया है। राष्ट्रीय स्तर के प्राकृतिक इतिहास संग्रहालयों की स्थापना एवं नियंत्रण का कार्य भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा किया जाता है। देश में संस्कृति मंत्रालय के अधीन सात राष्ट्रीय संग्रहालय स्थापित किए गए हैं-

    (1.) इलाहाबाद संग्रहालय,

    (2.) भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता,

    (3.) राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथी, नई दिल्ली

    (4.) राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, मुम्बई

    (5.) राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, बैंगलुरू

    (6.) सालारजंग संग्रहालय हैदराबाद,

    (7.) विक्टोरिया मैमोरियल कलकत्ता।

    देश में विज्ञान के प्रति रुचि जाग्रत करने एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद के अधीन 25 संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। साथ ही राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद द्वारा राज्य सरकारों के लिए 18 रीजनल साइंस सेंटर, साइंस सेंटर एवं सबसेंटर भी स्थापित किए गए हैं। भारत सरकार द्वारा 44 संग्रहालय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन स्थापित किए गए हैं। देश में बहुत से संग्रहालय राज्य सरकारों द्वारा स्थापित एवं संचालित किए जा रहे हैं।

    देश में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक एवं औद्योगिक संगठनों द्वारा भी अनेक संग्रहालय स्थापित किए गए हैं। कुछ धार्मिक सम्प्रदायों ने अपने प्राचीन गौरव का स्मरण बनाए रखने एवं आगामी पीढ़ियों को इस गौरव से परिचित कराने के उद्देश्य से भी संग्रहालय स्थापित किए हैं जिनमें सेंट्रल सिक्ख म्यूजियम हरमिंदर साहिब अमृतसर, महाराजा रणजीतसिंह मार्टिªयल आर्ट म्यूजियम अमृतसर, शहीद ए आजम सरदार भगतसिंह म्यूजियम कपूरथला, पंजाब स्टेट वार हीरोज मेमोरियल एण्ड म्यूजियम अमृतसर, विरासत ए खालसा आनंदपुर साहिब, द पार्टीशन म्यूजियम अमृतसर तथा इण्टरनेशलन सिक्ख म्यूजियम लुधियाना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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