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  • अध्याय - 52 मरु सांस्कृतिक संग्रहालय, जैसलमेर

     19.05.2020
    अध्याय - 52 मरु सांस्कृतिक संग्रहालय, जैसलमेर

    अध्याय - 52 


    मरु सांस्कृतिक संग्रहालय, जैसलमेर 

    जैसलमेर के गड़सीसर सरोवर पर स्थित लोक-सांस्कृतिक संग्रहालय देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है जिसमें मरू प्रदेश की विलुप्त होती संस्कृति को संजोया गया है। संग्रहालय में लोक जीवन से सम्बद्ध वस्तुओं, ऐतिहासिक दस्तावेजों, चित्रों, पट्टों, परवानों, सिक्कों, मिट्टी की कलाकृतियों, लोकवाद्यों, वस्त्रों, आभूषणों, राजा-महाराजाओं के चित्रों, जीवाश्मों, तालों, सुरमा-दानियों, बैलगाड़ियों, कठपुतलियों, ऊँटों एवं घोड़ों के शृंगार में काम आने वाली वस्तुओं, अमल छानने की चलनियों, हुक्कों, कावड़ों के साथ-साथ पितरों-भोमियों तथा लोक देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का प्रदर्शन किया गया है।

    इस संग्रहालय की स्थापना ई.1984 में स्थानीय शिक्षक नन्दकिशोर शर्मा ने की। उन्होंने गांव-गांव घूमकर प्रदर्शन योग्य वस्तुओं का संग्रह किया तथा सेवगों की बगीची में किराये के तीन कमरों में संग्राहालय स्थापित किया। वर्ष 1986 में शर्मा ने जैसलमेर के इतिहासकारों, कवियों, लेखकों तथा लोक-कलाकारों को मिला कर 'कवि तेज लोक कला विकास समिति' का गठन किया। वर्ष 1997 में इस संग्रहालय के लिए नवीन भवन बनाया गया जिसका उद्घाटन 1 फरवरी 1997 को तत्कालीन उप राष्ट्रपति के. आर. नारायणन् द्वारा किया गया। प्रतिवर्ष 40 से 50 हजार देशी एवं विदेशी दर्शक इस संग्रहालय को देखने आते हैं।

    संग्रहालय के प्रथम कक्ष में प्रदर्शित मिट्टी का झरोखानुमा महल दर्शकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। देवड़ा निवासी मगाराम देवपाल द्वारा बनाये गये इस काल्पनिक महल को मूमल की कथा से जोड़ा गया है। ग्रामीण महिलाएं भी मिट्टी की इस सुंदर कलाकृति को देखने आती हैं। दूसरे कक्ष में विविध वस्त्र, मोती-माणक का कार्य, विभिन्न जातियों की वेशभूषा, शृंगार-प्रसाधन सामग्री, पीतल-तांबे के बरतन, दीपक, गणगौर-ईसर की प्रतिमाएं आदि प्रदर्शित की गई हैं। राजा रवि वर्मा के चित्र भी आकर्षण का मुख्य विषय हैं।

    दूसरे कक्ष में प्राचीन जीवाश्म (वुड फॉसिल), ताम्रपत्र, अभिलेख तथा लगभग 100 पुराने चित्र प्रदर्शित हैं जिनमें महारावलों के चित्र सम्मिलित हैं। बैलगाड़ियां, चांदी की अम्बाड़ी, रॉयल एम्बलम, मेघाडम्बर, पुराने पत्र, 100 वर्ष पुराने कार्ड, प्राचीन सिक्के, हुंडियां, पट्टे, परवाने, हस्तलिखित पुस्तकें, हाथ के बने लघुचित्र, तख्तियां आदि भी प्रमुख दर्शनयी सामग्री है।

    तीसरे कक्ष में कावड़, तोरण, मेहन्दी डिजाइन, वन्दनमाल, हटड़ियां तथा रेखाचित्र प्रदर्शित हैं।

    चौथे कक्ष में ऊँटों, अश्वों तथा गजों का शृंगार करने की सामग्री, पीतल एवं लोहे के ताले, अमल छानने की चलनियां, सुरमादानी, इण्डाणी, बैलगाड़ियां ढोला-मारू, मूमल-महेन्द्र की आकृतियां, सरोते, ऊँट के चमड़े के कूण्डिए, मोर, चौपड़, जैसलमेर के पत्थर से निर्मित तश्तरियां, पेपरवेट, लकड़ी के ठप्पे, पुस्तक रखने के स्टेण्ड, चाकू-छुरी रखने के स्टेण्ड, कपड़े की छपाई करने के विविध प्रकार के छापे, लकड़ी की पुरानी पेटियां, अनाज रखने की मिट्टी की कोठियां, कठपुतलियां, औरतों के चूड़े, लकड़ी की भाण तथा चूल्हा-चक्की आदि प्रदर्शित हैं।



    पंचम् कक्ष में मरूस्थल के लोकवाद्य- कमायचा, सारंगी, रेवाज, श्रीमंडल, मोचरंग, रावण हत्था, खड़ताल, मुरली, अलगोजा, हारमोनियम, ढोलक आदि प्रदर्शित किए गए हैं। एक गैलरी में लोक देवी-देवताओंकी स्मृतियां, जुझारों के स्मृति-स्तंभ तथा प्रतिमाओं आदि का संग्रह प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय में लोक संगीत की कई घण्टों की रिकार्डिंग, सैकड़ों पारदर्शियां तथा जैसलमेर में छपी पुस्तकों एवं अभिलेखों का संग्रह है। नंदकिशोर शर्मा के पिता सुगतमल से प्राप्त लोकनाट्यों की छवियों एवं हस्तलिखित पुस्तकों का एक संग्रह भी प्रदर्शित किया गया है। हिन्दी के कवि अज्ञेय, गायिका लता मंगेशकर, मॉरीशस के प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ, राजस्थान के राज्यपाल बलिराम भगत, मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत, पर्यटन मंत्री नरेन्द्र कंवर, मुख्य सचिव मीठालाल मेहता, पूर्व जलसेनाध्यक्ष रामलाल आदि ने इस संग्रहालय की प्रशंसा की है।

    प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने संग्रहालय के सम्बन्ध में लिखा है-
    'एक व्यक्ति यदि धुन का पक्का है तो क्या कर सकता है, उसकी छोटी सी झलक श्री शर्मा का लोक-सांस्कृतिक संग्रहालय देखकर पाई जा सकती है।'

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