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  • अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

     02.06.2020
    अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    अध्याय - 3 पुरावशेष संग्रहण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का योगदान

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    ई.1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की स्थापना हुई। इसने पुरावशेषों की खोज एवं संग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुरातत्व सर्वेक्षण के माध्यम से सिन्धु सभ्यता के अवशेषों को पहली बार प्रकाश में लाया जा सका। राजस्थान में कालीबंगा एवं पीलीबंगा से प्रस्तर-मूर्तियाँ, धातु-मूर्तियाँ, मृण्मूर्तियाँ, मृदभाण्ड, मणियां, स्नानागार, अन्नागार, मुद्राएं, मुहरें आदि प्राप्त की गईं जिनसे सिन्धु सभ्यता के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है तथा अनुमान होता है कि कालीबंगा, सिंधु सभ्यता के पूर्वी भाग की राजधानी थी। इस सामग्री को देश के विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया, जिस पर वैज्ञानिकों, भाषाविदों, इतिहासकारों तथा शोधार्थियों द्वारा शोध कार्य किए जाते रहे हैं। कालीबंगा खुदाई स्थल के निकट एक संगहालय की स्थापना की गई है।

    इसी प्रकार नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), कोकानी, (कोटा जिले में परवन नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से पुरापाषाण कालीन पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं जिन्हें विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।

    चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च एवं गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ एवं नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली एवं गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी, उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा आदि अनेक स्थानों से उत्तर-पाषाण काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं। गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आई हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत एवं चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल-माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) से ताम्र उपकरणों के भण्डार मिले हैं। नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) से लौह युगीन सभ्यताओं के उपकरण प्राप्त हुए हैं। रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी पीलीबंगा, आहाड़, नगरी, आदि अन्य भागों से शुंग कालीन सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस समस्त सामग्री को विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।


    राजस्थान पुरातत्व तथा संग्रहालय विभाग

    ई.1950 में पुरातत्व तथा संग्रहालय विभाग की स्थापना की गई। यह विभाग प्रदेश में बिखरी हुई पुरा सम्पदा तथा सांस्कृतिक धरोहर की खोज, सर्वेक्षण एवं संग्रहण करता है तथा इस सामग्री का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार भी करता है। इस विभाग में निदेशक, उपनिदेशक, क्षेत्रीय अधीक्षक, अधीक्षक खोज एवं उत्खनन, अधीक्षक स्थापत्य सर्वेक्षण, अधीक्षक कला सर्वेक्षण, अधीक्षक आमेर महल, अधीक्षक केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर, मुख्य पुरारसायन वेत्ता, मुद्रा विशेषज्ञ आदि विभिन्न अधिकारी कार्यरत हैं। केन्द्र प्रवर्तित योजना में रजिस्ट्रीकरण अधिकारी राज्य के निजी स्वामित्व वाली पुरा सामग्री एवं कला संग्रहों का पंजीकरण करते हैं। विभाग द्वारा 222 स्मारक तथा पुरास्थल संरक्षित घोषित किए गए हैं। विभाग इनका जीणोद्धार भी करवाता है। प्राचीन दुर्गों, स्मारकों, देवालयों, प्रासादों, हवेलियों, भित्तिचित्रों, सिक्कों एवं अन्य कला तथा पुरा सामग्री का अधिग्रहण भी यही विभाग करता है। विभाग की उत्खनन शाखा पुरास्थलों की खुदाई करती है। मुद्रा शाखा सिक्कों का संरक्षण, रासायनिक उपचार तथा कैटलॉगिंग का कार्य करती है। संग्रहालयों के पुनर्गठन एवं विकास का कार्य भी यही विभाग करता है। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग चित्रकला प्रदर्शनी, पुरासामग्री प्रदर्शनी तथा भाषणमाला का भी आयोजन करता है। विभाग ‘द रिसर्चर’ नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित करता है।


    राजस्थान के संग्रहालयों के लिए पुरातत्व एवं इतिहास

    विषयक सामग्री जुटाने वाले पुरातत्ववेत्ता

    राजस्थान के संग्रहालयों के लिए सामग्री जुटाने में भारत के कई प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ताओं का अमूल्य सहयोग रहा। इनमें अलैक्जेण्डर कनिंघम, टी. एच. हैण्डले, अमलानंद घोष, दयाराम साहनी, रत्नचंद्र अग्रवाल, मुनि जिन विजय आदि उल्लेखनीय हैं।

    अलैक्जेण्डर कनिंघम

    ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता अलैक्जेण्डर कनिंघम ने उन्नीसवीं सदी के अंत में जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण एवं पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जिससे जयपुर रियासत तथा राजपूताना के प्राचीन काल के इतिहास की विश्वसनीय शोध सामग्री उपलब्ध हो सकी।

    टी. एच. हैण्डले

    1880 के दशक में इन्होंने जयपुर रियासत के विविध स्थलों का भ्रमण करके पुरासामग्री जुटाकर कुछ लेख छपवाए। बाद में 1930 के दशक में दयाराम साहनी ने उन लेखों में रह गई त्रुटियों को ठीक किया।

    अमलानंद घोष

    अमलानंद घोष ने ई.1952 में कालीबंगा सभ्यता की खोज की। बाद में ई.1961-69 के बीच कालीबंगा की खुदाई हुई। इस कार्य में देश के सुप्रसिद्ध पुरातत्वविदों- बी. बी. लाल, बी. के. थापर, एन. डी. खरे, के. एम. श्रीवास्तव तथा एस. पी. जैन की सेवाएं ली गईं।

    दयाराम साहनी

    ये स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व जयपुर रियासत में पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। इन्होंने जयपुर रियासत के विविधि स्थलों का सर्वेक्षण करके पुरातात्विक महत्व के स्थलों की खोज की तथा पुरा सामग्री जुटाई जिससे जयपुर रियासत के इतिहास लेखन के लिए विश्वसनीय जानकारी एवं प्रमाण उपलब्ध हो सके।

    रत्नचन्द्र अग्रवाल

    श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल का जन्म 21 जून 1926 को साढ़ौरा, हरियाणा में हुआ था। वे राजस्थान के महत्त्वपूर्ण पुरातत्वविदों में से थे। वे राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने राजस्थान के प्राचीन शिल्प एवं मूर्ति विज्ञान पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनके प्रसिद्ध ग्रंथों में ‘स्कल्पचर्स फ्रॉम उदयपुर म्यूजियम’ तथा ‘पॉटरी हैण्डल्स विद वुमन फिगराइन्स’ प्रमुख हैं।

    मुनि जिन विजय

    मुनि जिन विजय का जन्म मेवाड़ रियासत के रूपाहेली गाँव में ई.1888 में हुआ। इनका बचपन का नाम रिणमल परमार था। वे 15 वर्ष की आयु में जैन धर्म में दीक्षित हो गये। उन्होंने तीन वर्ष तक सूत्र और आगम पढ़े तथा वडोदरा में रहकर कुमार पाल प्रतिबोध नामक ग्रंथ का संपादन किया। लोकमान्य तिलक के सम्पर्क से उन पर देशभक्ति का रंग चढ़ा तथा उन्होंने जैन साहित्य संशोधक समिति की स्थापना की। वे गुजरात पुरातत्व मंदिर के निदेशक रहे। उन्होंने जर्मनी जाकर इण्डो-जर्मन केन्द्र की स्थापना की तथा वापस आकर दाण्डी कूच में भाग लिया। छः माह जेल में भी रहे। इसके बाद वे बम्बई में भारतीय विद्या भवन के संचालक बने। ई.1942 में उन्होंने जैसलमेर आकर 200 ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार करवाईं। ई.1950 में उनके निर्देशन में राजस्थान पुरातत्व मंदिर की स्थापना की गयी। उनके द्वारा लिखित लेखों और गं्रथों की संख्या सैंकड़ों में है। राजस्थान सरकार ने उन्हें पुरातत्व विभाग का निदेशक बनाया। ई.1976 में उनका निधन हुआ।

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