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  • अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम उदयपुर

    अध्याय - 8 सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    उदयपुर के राजमहलों की नींव महाराणा उदयसिंह (द्वितीय) (ई.1540-72) ने ई.1559 में रखी। इसे सजाने-संवारने में मेवाड़ राजघराने की 24 पीढ़ियों का अनवरत योगदान रहा है। वर्तमान में यह परिसर 1800 फुट लम्बा तथा 800 फुट चौड़ा है, इसकी सर्वाधिक ऊँचाई 105 फुट है। राजमहल का एक हिस्सा ‘मर्दाना महल’ कहा जाता है। इसे महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ ने ई.1969 में संग्रहालय का रूप दिया। ई.1971 के पश्चात् इससे सटे ‘जनाना महल’ को भी इसके साथ जोड़कर संग्रहालय का विस्तार किया गया। यह संग्रहालय 1028 फुट लम्बा एवं 300 फुट चौड़ा है। सिटी पैलेस का ऐतिहासिक भवन वास्तुकला का एक अनूपम उदाहरण है। इसमें शुद्ध भारतीय शैली से लेकर मुगल एवं ब्रिटिश शैली का सुन्दर समायोजन देखा जा सकता है, इस कारण यह वास्तुशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का प्रमुख केन्द्र भी है।


    सिटी पैलेस म्यूजियम का प्रथम प्रवेश द्वार ‘बड़ीपोल’ के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण महाराणा अमर सिंह (प्रथम) (ई.1597-1620) ने करवाया था। इसके निकट स्थित बुकिंग काउण्टर से संग्रहालय में प्रवेश करने के लिए टिकिट प्राप्त किये जाते हैं। बड़ी पोल के ठीक सामने तीन पोलों वाला ‘त्रिपोलिया’ स्थित है, जिसे महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) ने बनवाया था। इससे आगे ‘माणक चौक’ है। इसी चौक के दाईं ओर के महल को संग्रहालय के रूप में प्रयुक्त किया गया है। संग्रहालय में प्रवेश ‘दरीखाने की पोल’ से होकर किया जाता है।

    इस पोल से आगे बढ़ने पर बाईं ओर ‘सभा शिरोमणि का दरीखाना’ है, जहाँ महाराणाओं के दरबार लगा करते थे तथा दाईं ओर ‘सलेहखाना’ (शस्त्रागार) स्थित है। इसकी स्थापना महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) के राज्यकाल में हुई। इसमें महराणाओं के निजी उपयोग के शस्त्रास्त्र- तलवारें, ढालें, छुरियां, कटारें, बन्दूकें, पिस्तोलें आदि प्रदर्शित की गई हैं। इससे आगे बढ़ने पर ‘गणेश चौक’ आता है। इसके उत्तर पूर्वी कोने में गणेश ड्योढ़ी स्थित है। यहाँ स्थापित गणेश एवं लक्ष्मी की सुन्दर प्रतिमाओं के चारों ओर रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम किया गया है। यहाँ से सीढ़ियां चढ़कर ‘राय आंगन’ में प्रवेश किया जाता है।

    राय आंगन के पश्चिम में गोस्वामी प्रेमगिरी की धूणी (नव चौकी महल) है, इन्हीं के आशीर्वाद से महाराणा उदयसिंह (ई.1540-72) ने उदयपुर नगर की स्थापना की थी। यहीं पर महाराणाओं का राजतिलक होता आया है। जबकि पूर्व दिशा में ‘नीका की चौपाड़’ एवं प्रताप कक्ष है। प्रताप कक्ष में महाराणा प्रताप (ई.1572-97) के अस्त्र-शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। नीका की चौपाड़ और इससे संलग्न कक्षों में महाराणा प्रताप से सम्बन्धित बड़े-बड़े तैल चित्र लगे हैं जो हिन्दुआ सूर्य प्रताप की गौरव गाथा कहते हैं।

    नवचौकी महल से सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाने पर चंद्रमहल आता है। इसमें एक ही पत्थर का बना सफेद संगमरमर का कुंड है। महाराणा के राजतिलक के समय इस कुंड को चांदी के एक लाख सिक्कों से भरा जाता था। इस कारण इसे ‘लक्खु कुंड’ कहा जाता है। ये सिक्के पास ही स्थित ‘लक्खु गोखड़े’ से प्रजा को लुटाए जाते थे। इस भवन के आगे शिव प्रसन्न अमर विलास महल (बाड़ी महल) में पहुंचा जाता है। यह महल श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इसमें बना मुगल शैली का चारबाग (उद्यान) कुण्ड एवं फव्वारे पर्यटकों को बरबस ही आकर्षित करते हैं। यहाँ लगे विशाल वृक्ष एवं सुगन्धित फूलों के पौधे पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। यहीं एक कक्ष में महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) का चित्र और उसके पास ही वह ऐतिहासिक कुर्सी रखी हुई है जो 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम द्वरा आयोजित इम्पीरियल दरबार में महाराणा फतहसिंह के लिए लगायी गई थी। महाराणा अपने कुलाभिमान एवं किसी शासक के आगे सर नहीं झुकाने की अपनी गौरवशाली वंश परम्परा के कारण दिल्ली जाकर भी इस दरबार में उपस्थित नहीं हुए थे।

    बाड़ी महल के दक्षिण में स्थित द्वार से ‘दिलखुशाल महल’ में जाया जाता है। इस परिसर में मेवाड़ शैली के कई चित्र लगे हैं, जिनमें महाराणाओं के विभिन्न अवसरों पर बनाए गए चित्र प्रदर्शित किये गए हैं। दिलखुशाल महल के उत्तर में स्थित ‘कांच की बुर्ज’ में दीवारों और छत पर रंगीन कांच का आकर्षक कार्य किया गया है वहीं दक्षिण में स्थित ‘चित्राम की बुर्ज’ में महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) (ई.1710-34) एवं महाराणा भीमसिंह (ई.1778-1828) द्वारा उत्सवों, सवारियों और त्यौहारों के सुन्दर भित्तिचित्रों का अंकन करवाया गया है, इन चित्रों में मेवाड़ के प्राचीन वैभव की झलक मिलती है।

    इससे आगे बढ़ने पर ‘चीनी चित्रशाली’ है जिसमें डेल्फ तथा पुर्तगाली ब्लू टाइलें जड़ी हुई हैं। यहाँ से उदयपुर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। इसके उत्तर में स्थित ‘वाणी विलास’ महाराणा सज्जन सिंह (ई.1874-84) द्वारा स्थापित पुस्तकालय का कक्ष है तथा दक्षिण में ‘शिव विलास’ स्थित है। शिव विलास के उत्तर में मदन विलास है जिसमें कर्नल जेम्स टोड के चित्र तथा उससे सम्बन्धित सामग्री प्रदर्शित की गई है। यहीं किशन विलास सात ताका नामक महल भी है, जिसकी दीवारों के नीचे एक पट्टी में सुन्दर ग्लास इन्ले वर्क के साथ काले कागज़ पर सुनहरी चित्रांकन किया गया है। यहीं उत्तरी दीवार की खिड़कियों से पिछोला झील का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

    इसके आगे संकरे गलियारों और घुमावदार सीढ़ियों से होते हुए ‘मोर चौक’ तक पहुंचा जा सकता है। इस बीच मोती महल, भीम विलास, सूर्य प्रकाश गैलेरी और पीतम निवास आते हैं, इनमें भी रंगीन कांच की पच्चीकारी का काम दर्शनीय है। पीतम निवास ई.1955 तक महाराणा भूपाल सिंह (ई.1930-55) का निवास स्थान रहा, इसे उसी रूप में अब तक संरक्षित रखा गया है। यहाँ से नीचे सीढ़ियां उतरकर सूर्य चौपाड़ आती है इसमें स्वर्ण मुलम्मा चढ़ा सूर्य लगा हुआ है। ऐसा ही एक सूर्य पूर्व में स्थित सूर्य गोखड़े में लगा है। इस कक्ष में दीवारों के नीचे एक पट्टी में आराई के उभरमा अंकन पर सुन्दर चित्रकारी की गई है।

    इसके आगे छोटी चित्रशाली है जिसमें महाराणा अपने अतिथियों का स्वागत-सत्कार करते थे। यहीं आमोद-प्रमोद के लिए गायन वादन के आयोजन होते थे। इसके आगे मोर चौक है जिसमें रंगीन कांच की बारीक कतरनों के ‘इन्ले वर्क’ से मोरों का निर्माण किया गया है। इस चौक की सम्पूर्ण पूर्वी दीवार कांच की कारीगरी का अनूठा दृश्य उपस्थित करती है। इस चौक के उत्तर में स्थित माणक महल भी रंगीन कांच की कारीगरी के लिए पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।

    इससे आगे संकरे गलियारे से होते हुए ‘जनाना महल’ में जाया जा सकता है। यहाँ सबसे पहले शरबत विलास एवं ब्रज विलास आते हैं, यह महाराणा भूपाल सिंह की तृतीय महाराणी का निवास स्थान था, इसे भी अब तक अपने पुराने रूप में ही संरक्षित किया हुआ है। यहाँ उनकी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। यहीं से कुछ दूरी पर भूपाल विलास है, यहाँ महाराणियाँ अपने अतिथियों से भेंट एवं स्वागत-सत्कार करती थीं, इसे भी उसी रूप में संरक्षित रखा गया है।

    महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउण्डेशन के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध न्यासी श्रीजी अरविन्द सिंह मेवाड़ संग्रहालय को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने में निरन्तर प्रयत्नशील हैं। सम्पूर्ण महल के कायाकल्प के साथ जनाना महल में विभिन्न गैलेरियों (वीथिकाओं) का निर्माण करवाया गया है। इनमें मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की संस्कृति से पर्यटकों का साक्षात्कार होता है। इन अलग-अलग वीथिकाओं में मूर्तियां, वस्त्र, वाद्य यंत्र, पालकियाँ एवं म्यानें, मेवाड़ शैली के चित्र तथा छायाचित्र कलात्मक ढंग से सजाए गए हैं। अमर महल में स्थित रजत वीथिका दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र है, इसमें महाराणाओं एवं उनके आराध्य देवों के उपयोग में ली जाने वाली चांदी की वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, इनमें चांदी की बग्गी, हाथी का हौदा, पालकी एवं हाथी-घोड़ों के आभूषण विशेष दर्शनीय हैं।

    यहाँ से मौती चौक होते हुए तोरण पोल पहुंचकर संग्रहालय दर्शन पूरा होता है। तोरण पोल पर राजपरिवार में होने वाले विवाहों के अवसर पर तोरण बांधा जाता है। इसके अतिरिक्त भी सिटी पैलेस संग्रहालय में देखने को बहुत कुछ है। प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक उदयपुर भ्रमण के लिए आते हैं, इनमें से अधिकांश सिटी पैलेस संग्रहालय देखने आते हैं।

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