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  • अध्याय - 46 छीतर पैलेस संग्रहालय जोधपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 46 छीतर पैलेस संग्रहालय जोधपुर

     अध्याय - 46


    छीतर पैलेस संग्रहालय जोधपुर

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    छीतर पैलेस के नाम से विख्यात इस भव्य राजप्रासाद का निर्माण महाराजा उम्मेदसिंह (ई.1918-47) ने 18 नवम्बर 1929 को अकाल राहत कार्य के रूप में आरंभ कराया। इसे उम्मेद भवन पैलेस भी कहते हैं। जोधपुर नगर के दक्षिण-पूर्व में छीतर की पहाड़ी पर बना यह महल 16 वर्षों में बनकर पूरा हुआ जिस पर 1 करोड़ 21 लाख रुपया व्यय हुआ। यह जोधपुर रियासत का अन्तिम बड़ा निर्माण था। इसके पूरा होने के 5 वर्ष बाद देश को स्वतंत्रता मिल गई।


    यह भव्य महल जोधपुर राज्य के स्थापत्य का सर्वोत्कृष्ट नमूना है। इसके एक भाग में पांच सितारा होटल चलता है। एक भाग में पुराना राज परिवार रहता है एवं एक भाग में संग्रहालय स्थापित किया गया है। महल में स्थित स्विमिंग पूल, नृत्यघर तथा लॉन अपूर्व सौंदर्य समेटे हुए हैं। घड़ियों का एक संग्रहालय, थियेटर, भूतल अस्पताल तथा केन्द्रीय हॉल भी देखने योग्य हैं। सम्पूर्ण महल 26 एकड़ भूमि घेरे हुए है जिसमें से 3.5 एकड़ पर महल तथा 15 एकड़ पर बगीचा फैला हुआ है।

    छीतर पैलेस संग्रहालय मारवाड़ रियासत के इतिहास, साहित्य, कला और युद्ध-कौशल की झांकी प्रस्तुत करता है। इस संग्रहालय में जोधपुर राजपरिवार की बंदूकें तथा तलवारें प्रदर्शित की गई हैं। संग्रहालय में उम्मेद पैलेस भवन का भी एक मॉडल प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय के एक कक्ष में मारवाड़ के शासकों के तैलचित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय के अन्य कक्ष में महाराजा उम्मेदसिंह एवं हनवन्तसिंह (ई.1947-49) के कार्यकाल में हवाई उड़ानों में प्रयुक्त होने वाले एयर क्राफ्ट्स के मॉडल रखे हैं। इनके पास ही महाराजा को फ्लाइंग दक्षता के सम्बन्ध में मिले ब्रिटिश प्रमाण पत्र एवं महाराजा द्वारा फ्लाइट के दौरान प्रयुक्त कपड़े भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पौलेण्ड का एक चित्रकार 'स्टेपन नॉर्बलिन' शरणार्थी के रूप में बम्बई आया। महाराजा उम्मेदसिंह ने उसे जोधपुर बुला लिया। उस चित्रकार ने कुछ पेंटिंग्स बनाईं एवं छीतर पैलेस की दीवारों पर भित्तिचित्र अंकित किए। स्टेपन नॉर्बलिन द्वारा बनाए गए एक चित्र में औरंगजेब के काल में हुए एक युद्ध का सजीव चित्रण किया गया है। एक चित्र महाराजा उम्मेदसिंह के विवाह के अवसर का है। इसमें महाराजा की जोधपुर से जैसलमेर गई बारात का ठीक वैसा ही चित्रण किया गया है, जैसी कि बरात दिखाई देती थी।

    जोधपुर राजपरिवार की निजी निधि के रूप में 44 चित्रों की एक जिल्द है जिसमें जयपुर तथा जोधपुर के शासक एवं राजकुमार तथा मुगल शासकों के 300 वर्ष पुराने चित्र हैं। इस जिल्द को लंदन एवं वाशिंगटन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भी भेजा गया था। दरबार-ए-खास हॉल में एसत्र सोर्बलिन नामक चित्रकार द्वारा तैयार किए गए चित्रों की एक शृंखला प्रदर्शित की गई है। यह शृंखला इस संग्रहालय की अमूल्य निधि है। इस चित्र शृंखला में रामायण के पौराणिक काल के आधा दर्जन चित्र बने हुए हैं। राजा-रानियों, लोककथा नायक ढोला-मारू तथा देवी-देवताओं के अवतारों के चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। 

    इस संग्रहालय में लगभग 100 विदेशी घड़ियों का अनूठा संग्रह है। इसमें लंदन, स्विट्जरलैण्ड, बैल्जियम, हॉलेण्ड, जर्मनी आदि देशों में बनी हुई आकर्षक घड़ियां रखी हुई हैं। इस संग्रह में मनुष्य के आकार के बराबर वाली घड़ियों से लेकर अंगूठी के आकार की घड़ियां प्रदर्शित की गई हैं।

    संग्रहालय की लॉबी में शृंगार, डिनर, लेखन, आदि के काम में आने वाली मेजें सजा कर रखी गई हैं जो तत्कालीन काष्ठकला का अनुपम उदाहरण हैं। जंगली जानवरों की ट्राफियां, देश-विदेश की कांच की क्रॉकरी तथा चीन देश की महंगी एवं अनूठी क्रॉकरी भी प्रदर्शित की गई है।

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