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  • अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

     02.06.2020
    अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री

    अध्याय - 2 राजस्थान के संग्रहालयों की आधारभूत सामग्री


    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    किसी भी देश, प्रदेश अथवा क्षेत्र की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत से अवगत कराने में संग्रहालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संग्रहालय की सफलता अथवा लोकप्रियता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें किस प्रकार की सामग्री संजोई गई है तथा आमजन की उस सामग्री तक पहुंच कितनी है! आधुनिक काल में पुरातत्व, इतिहास, विज्ञान, प्रकृति आदि विविध विषयों पर आधारित संग्रहालयों की स्थापना की जाती है। संग्रहालयों के लिए विश्वसनीय, स्तरीय एवं प्रामाणिक सामग्री की उपलब्धता अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसके लिए विविध स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है तथा सतर्क रहकर सामग्री का चयन करना होता है। राजस्थान के संग्रहालयों में पाषाण कालीन सभ्यताओं के प्रस्तर उपकरणों से लेकर प्राचीन एवं मध्य काल की ऐतिहासिक सामग्री एवं कलाकृतियों से लेकर हस्तलिखित ग्रंथ, ताड़पत्र, पाण्डुलिपियां, चित्रित ग्रंथ, चित्रमालाएं, तांत्रिक यंत्र आदि मसाग्री संजोई गई है। इस विशद सामग्री का परिचय प्राप्त करने से पहले राजस्थान के उन स्थलों के बारे में जानना आवश्यक है जहाँ से यह विविध सामग्री प्राप्त की गई है।

    पाषाण कालीन सभ्यता स्थल

    राजस्थान में मानव सभ्यता पुरा-पाषाण, मध्य-पाषाण तथा उत्तर-पाषाण काल से होकर गुजरी। राजस्थान में आदि मानव द्वारा प्रयुक्त जो प्राचीनतम पाषाण उपलब्ध हुए हैं, वे लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने हैं। पुरा-पाषाण काल डेढ़ लाख वर्ष पूर्व से पचास हजार वर्ष पूर्व तक का काल समेटे हुए है। इस काल में हैण्ड एक्स, क्लीवर तथा चॉपर आदि का प्रयोग करने वाला मानव बनास, गंभीरी, बेड़च, बाधन तथा चम्बल नदियों की घाटियों में (आज जहाँ बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, बूंदी, कोटा, झालावाड़ तथा जयपुर जिले हैं) रहता था जहाँ प्रस्तर युगीन मानव के चिह्न मिले हैं। इस युग के भद्दे तथा भौंडे हथियार अनेक स्थानों से मिले हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि लगभग पूरे प्रदेश में इस युग का मानव फैल गया था। इन उपकरणों एवं औजारों का उपयोग करने वाला मनुष्य शिकार से प्राप्त वन्य पशु, प्राकृतिक रूप से प्राप्त कन्द, मूल, फल, पक्षी, मछली आदि खाता था।

    नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अनचर, ऊणचा देवड़ी, हीराजी का खेड़ा, बल्लू खेड़ा (चित्तौड़ जिले में गंभीरी नदी के तट पर), भैंसरोड़गढ़, नगघाट (चम्बल और बामनी के तट पर) हमीरगढ़, सरूपगंज, बीगोद, जहाजपुर, खुरियास, देवली, मंगरोप, दुरिया, गोगाखेड़ा, पुर, पटला, संद, कुंवारिया, गिलूंड (भीलवाड़ा जिले में बनास के तट पर), लूणी (जोधपुर जिले में लूनी के तट पर), सिंगारी और पाली (गुड़िया और बांडी नदी की घाटी में), समदड़ी, शिकारपुरा, भावल, पीचक, भांडेल, धनवासनी, सोजत, धनेरी, भेटान्दा, धुंधाड़ा, गोलियो, पीपाड़, खींवसर, उम्मेदनगर (मारवाड़ में), गागरोन (झालवाड़), गोविंदगढ़ (अजमेर जिले में सागरमती के तट पर), काकोनी, (बारां जिले में परवन नदी के तट पर), भुवाणा, हीरो, जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, पच्चर, तारावट, गोगासला, भरनी (टोंक जिले में बनास तट पर) आदि स्थानों से उस काल के पत्थर के हथियार प्राप्त हुए हैं।

    राजस्थान में मध्य-पाषाण काल आज से लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। इस काल के उपकरणों में स्क्रैपर तथा पाइंट विशेष उल्लेखनीय हैं। ये औजार लूनी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में और विराटनगर में भी प्राप्त हुए हैं। इस समय तक भी मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं हुआ था। उत्तर-पाषाण काल का आरंभ लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व से माना जाता है। इस काल में पहले हाथ से और फिर से चाक से बर्तन बनाए गए। इस युग के औजार चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च एवं गंभीरी नदियों के तट पर, चम्बल और वामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़ एवं नवाघाट, बनास के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली एवं गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, बनास नदी के तट पर टौंक जिले में भरनी आदि अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इस युग के उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा नामक स्थानों पर मिले हैं।

    ताम्र युगीन दुर्लभ सामग्री

    राजस्थान में प्राप्त प्राचीनतम ताम्र सामग्री ईसा से लगभग 3000 साल पुरानी है। अर्थात् आज से लगभग 5000 साल पुरानी। सीकर जिले की नीमकाथाना तहसील में कांटली नदी के मुहाने पर स्थित गणेश्वर में हजारों की संख्या में ताम्बे के तीर, ताम्बे के 60 परशु, मछली पकड़ने के कांटे, ताम्बे के कंगन, ताम्बे की अंगूठियां आदि मिली हैं तथा इस क्षेत्र के आसपास ताम्रअयस्क को गलाकर ताम्बा निकालने की भट्टियां भी प्राप्त हुई हैं। किराडोत गांव से ताम्बे के छल्ले प्राप्त हुए हैं। ई.1934 में कुराड़ा (जिला नागौर) से ताम्बे की 103 वस्तुएं प्राप्त हुई थीं जिनमें से केवल 10 वस्तुएं नमूने के लिए रखकर शेष सामग्री जानकारी के अभाव में कबाड़ियों को नीलामी में बेच दी गई। ई.1982 में भरतपुर क्षेत्र में ताम्रयुगीन दुर्लभ अस्त्रों का खजाना मिला। इनमें चार जोड़े कांटे वाले हारपून-9, एक जोड़े कांटे वाले हारपून-3, ताम्रपरशु- सात, ताम्रछेणी-दो, ताम्रभालों के अग्रभाग-4 तथा ताम्बे की तलवारें-3, इस प्रकार कुल 33 वस्तुएं एक साथ प्राप्त हुई थीं। राजस्थान के अन्य स्थलों से भी ताम्रयुगीन सभ्यता की सामग्री प्राप्त हुई है। यह सभ्यता महाभारत काल के लगभग पांच सौ वर्ष बाद की तथा आज से लगभग 5000 साल पुरानी है।

    ताम्र, कांस्य एवं लौह युगीन सभ्यताओं के स्थल

    गणेश्वर (सीकर), आहड़ (उदयपुर), गिलूण्ड (राजसमंद), बागोर (भीलवाड़ा) तथा कालीबंगा (हनुमानगढ़) से ताम्र-पाषाण कालीन, ताम्रयुगीन एवं कांस्य कालीन सभ्यताएं प्रकाश में आयी हैं। ताम्रयुगीन प्राचीन स्थलों में पिण्डपाड़लिया (चित्तौड़), बालाथल एवं झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), साबणिया एवं पूगल (बीकानेर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत एवं चीथवाड़ी (जयपुर), ऐलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल- माहोली (सवाईमाधोपुर) तथा मलाह (भरतपुर) विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सभी स्थलों पर ताम्र उपकरण मिले हैं। लौह युगीन सभ्यताओं में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता के थेड़

    सिंधु नदी हिमालय पर्वत से निकल कर पंजाब तथा सिंध प्रदेश में बहती हुई अरब सागर में मिलती है। इस नदी के दोनों तटों पर तथा इसकी सहायक नदियों के तटों पर जो सभ्यता विकसित हुई उसे सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं मोहेनजोदड़ो सभ्यता कहा जाता है। यह तृतीय कांस्यकालीन सभ्यता थी तथा इसका काल ईसा से 5000 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा से 1750 वर्ष पूर्व तक माना जाता है। राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष कालीबंगा, पीलीबंगा एवं रंगमहल आदि में प्राप्त हुए हैं। गंगानगर जिले में नाईवाला की सूखी धारा, रायसिंहनगर से अनूपगढ़ के दक्षिण का भाग तथा हनुमानगढ़ से हरियाणा की सीमा तक के सर्वेक्षण में पाया गया है कि नाईवाला की सूखी धारा में स्थित 4-5 टीलों पर गाँव बस चुके हैं।

    दृषद्वती के सूखे तल में भी काफी दूर तक टीले स्थित हैं। इस तल में स्थित 7-8 थेड़ों में हड़प्पाकालीन किंतु खुरदरे एवं कलात्मक कारीगरी रहित मिट्टी के बरतन के टुकड़ों की बहुतायत थी। सरस्वती तल में हड़प्पाकालीन छोटे-छोटे एवं उन्हीं के पास स्लेटी मिट्टी के बरतनों वाले उतने ही थेड़ मौजूद थे। हरियाणा की सीमा पर ऐसे थेड़ भी पाये गए जिन पर रोपड़ की तरह दोनों प्रकार के हड़प्पा एवं स्लेटी मिट्टी के ठीकरे मौजूद थे। हनुमानगढ़ किले की दीवार के पास खुदाई करने पर रंगमहल जैसे ठीकरों के साथ कुशाण राजा हुविश्क का तांबे का एक सिक्का भी मिला जो इस बात की पुष्टि करता है कि भाटियों का यह किला एवं अंदर का नगर कुशाण कालीन टीले पर बना है। बीकानेर के उत्तरी भाग की सूखी नदियों के तल में 4-5 तरह के थेड़ पाये गए।

    सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पाकालीन 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। हनुमानगढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर स्थित पीलीबंगा से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कालीबंगा में पूर्वहड़प्पा कालीन एवं हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। इस स्थान का पता पुरातत्व विभाग के निदेशक अमलानंद घोष ने ई.1952 में लगाया था। ई.1961-62 में बी. के. थापर, जे. वी. जोशी तथा वी. वी. लाल के निर्देशन में इस स्थल की खुदाई की गयी। कालीबंगा के टीलों की खुदाई में दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों, घरों एवं धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। घरों में चूल्हों के अवशेष भी मिले हैं। कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर घर बनाते थे। 

    कालीबंगा से प्राप्त सामग्री में बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले एवं ऊपर से प्यालानुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, देवी की छोटी-छोटी मृदा-प्रतिमाएँ, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि सम्मिलित हैं। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं। यहाँ से मिली मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बाएं लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री भी प्राप्त हुई है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन केवल इसी स्थल पर मिले हैं।

    रंगमहल-बड़ोपल के थेड़

    सूरतगढ़-हनुमानगढ़ क्षेत्र में रंगमहल, बड़ोपल, मुण्डा, डोबेरी आदि स्थलों के आसपास के क्षेत्र में कई थेड़ मौजूद हैं जिनमें से कुछ की खुदाई की गयी है। इनमें रंगमहल का टीला सबसे ऊँचा है। ई.1952-54 के बीच स्वीडिश दल द्वारा रंगमहल के टीलों की खुदाई की गई। इस खुदाई से ज्ञात हुआ है कि प्रस्तर युग से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व तक यह क्षेत्र पूर्णतः समृद्ध था।यहाँ से प्रस्तर युगीन एवं धातु युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रंगमहल के टीलों पर पक्की ईंटें एवं रोड़े, मोटी परत एवं लाल रंग वाले बरतनों पर काले रंग के मांडने युक्त हड़प्पा कालीन सभ्यता के बरतनों के टुकड़े बिखरे हुए दिखाई देते हैं। यहाँ से ताम्बे के दो कुषाण कालीन सिक्के, गुप्त कालीन खिलौने एवं परवर्ती काल के तांबे के 105 सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

    आहड़ सभ्यता

    सरस्वती-दृश्द्वती नदी सभ्यता से निकलकर इस प्रदेश के मानव ने आहड़, गंभीरी, लूनी, डच तथा कांटली आदि नदियों के किनारे अपनी बस्तियां बसाईं तथा सभ्यता का विकास किया। इन सभ्यताओं को पश्चिमी विद्वानों ने 7 हजार से 3 हजार वर्ष पुराना ठहराया है। कुछ भारतीय विद्वानों ने पश्चिमी विद्वानों द्वारा बताए गए ईसा पूर्व के इतिहास को इन तिथियों से भी तीन हजार वर्ष पूर्व का होना सिद्ध किया है। यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ नदी के आस-पास, बनास, बेड़च, चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी, वागन, भीलवाड़ा जिले में खारी तथा कोठारी आदि नदियों के किनारे अजमेर तक फैली थी। इस क्षेत्र में प्रस्तर युगीन मानव निवास करता था। आहड़ टीले का उत्खनन डॉ. एच. डी. सांकलिया के नेतृत्व में हुआ था। प्राचीन शिलालेखों में आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती अंकित है।

    दसवीं एवं ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर अथवा आघट दुर्ग कहा जाता था। बाद के काल में इसे धूलकोट भी कहा जाता था। उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर 1600 फुट लम्बे और 550 फुट चौड़े धूलकोट के नीचे आहड़ की पुरानी बस्ती दबी हुई है जहाँ से ताम्रयुगीन सभ्यता प्राप्त हुई है। ये लोग लाल, भूरे एवं काले मिट्टी के बर्तन काम में लेते थे जिन्हें उलटी तपाई शैली में पकाया जाता था। घर पक्की ईंटों के होते थे। पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था। आहड़ से मानव सभ्यता के कई स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रथम स्तर में मिट्टी की दीवारें और मिट्टी के बर्तन मिले हैं। दूसरा स्तर प्रथम स्तर के ऊपर स्थित है। यहाँ से बस्ती के चारों ओर दीवार भी मिली है। तीसरे स्तर से चित्रित बर्तन मिले हैं। चतुर्थ स्तर से ताम्बे की दो कुल्हाड़ियां प्राप्त हुई हैं। घरों से अनाज पीसने की चक्कियां, ताम्बे के औजार तथा पत्थरों के आभूषण मिले हैं। गोमेद तथा स्फटिक मणियां भी प्राप्त हुई हैं। तांबे की छः मुद्रायें एवं तीन मोहरें मिली हैं। एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता अंकित है जो तीर एवं तरकश से युक्त है। इस पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह मुद्रा दूसरी शताब्दी ईस्वी की है। यहाँ के लोग मृतकों को कपड़ों तथा आभूषणों के साथ गाढ़ते थे।

    बालाथल सभ्यता

    बालाथल उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील में स्थित है। यहाँ से ई.1993 में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 2500 तक की ताम्रपाषाण युगीन संस्कृति के बारे में पता चला है। यहाँ के लोग भी कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे। ये लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में निपुण थे तथा कपड़ा बुनना जानते थे। यहाँ से तांबे के सिक्के, मुद्रायें एवं आभूषण प्राप्त हुए हैं। आभूषणों में कर्णफूल, हार और लटकन मिले हैं। यहाँ से एक दुर्गनुमा भवन भी मिला है तथा ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन भी प्राप्त हुए हैं।

    बागोर सभ्यता

    भीलवाड़ा कस्बे से 25 किलोमीटर दूर कोठारी नदी के किनारे वर्ष ई.1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र के नेतृत्व में हुई खुदाई में ई.पू. 3000 से लेकर ई.पू. 500 तक के काल की बागोर सभ्यता का पता लगा। यहाँ के निवासी कृषि, पशुपालन तथा आखेट करते थे। यहाँ से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं। घर पत्थरों से बनाए गए हैं। बर्तनों में लोटे, थाली, कटोरे, बोतल आदि मिले हैं।

    गणेश्वर सभ्यता

    सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांटली नदी के तट पर गणेश्वर टीले की खुदाई ई.1979-87 के मध्य की गयी थी। यहाँ से तीन विभिन्न सांस्कृतिक चरणों की पहचान हुई है। निम्न स्तरों में सूक्ष्म पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनका उपयोग बाणाग्र, मत्स्य कांटे, भालाग्र, सुए आदि के रूप में होता था। मध्य स्तरों से हस्तनिर्मित एवं चाक निर्मित मृण्पात्र प्राप्त हुए हैं जिन्हें गणेश्वर-जोधपुरा मृदभाण्ड कहा जाता है। इनमें गोल एवं बल्ब के आकार के बड़े मटके, कैरीनेटेड घड़े, उथली परात एवं कटोरे आदि सम्मिलित हैं। अंतिम एवं ऊपरी स्तर से बड़ी संख्या में ताम्र वस्तुएं- बाणाग्र, छल्ले, चूड़ियां दरांती, गेंद, कुल्हाड़ियां आदि प्राप्त हुई हैं।

    ऊपरी चरण से प्राप्त कलश, तलसे, प्याले, हाण्डी आदि मृण्पात्रों में चित्र सज्जा भी उपलब्ध है। यहाँ से प्राप्त बर्तन हड़प्पा सभ्यता एवं गेरूवर्णीय मृणपात्र सभ्यताओं से अलग हैं। यह सभ्यता लगभग 2800 वर्ष पुरानी है। ताम्र युगीन सभ्यताओं में यह अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन केन्द्र है। यह सभ्यता सीकर से झुंझुनूं, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली थी। यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय कांटली नदी में पर्याप्त जल था। यहाँ का मानव भोजन संग्रहण की अवस्था में था। यहाँ से ताम्र उपकरण एवं बर्तन बड़ी संख्या में मिले हैं। ऐसा संभवतः इसलिए संभव हो सका क्योंकि खेतड़ी के ताम्र भण्डार यहाँ से अत्यंत निकट थे।

    सरस्वती नदी सभ्यता के स्थल

    राजस्थान में वैदिक काल तथा उससे भी पूर्व सरस्वती एवं दृषद्वती नदियाँ प्रवाहित होती थीं। दसवीं सदी के आसपास दक्षिणी-पश्चिमी राजस्थान की गणना सारस्वत मण्डल में की जाती थी। यह पूरा क्षेत्र लूणी नदी बेसिन का एक भाग है। लूनी नदी सरस्वती की सहायक नदी थी। सरस्वती आज भी राजस्थान में भूमिगत होकर बह रही है। कुछ विद्वान घग्घर (हनुमानगढ़-सूरतगढ़ क्षेत्र में बहने वाली नदी) को सरस्वती का परवर्ती रूप मानते हैं। सरस्वती के किनारे काम्यक वन नामक घना वन था। महाभारत में सरस्वती के मरुप्रदेश में विलीन हो जाने का उल्लेख है। हनुमानगढ़ जिले में घग्घर को नाली कहा जाता है। यहाँ पर एक दूसरी धारा जिसे नाईवाला कहते हैं, घग्घर में मिल जाती है, जो असल में सतलज का प्राचीन बहाव क्षेत्र है। यह सरस्वती नदी का पुराना हिस्सा था। तब तक सिंधु में मिलने के लिए सतलज में व्यास का समावेश नहीं हो पाया था। हनुमानगढ़ के दक्षिण पूर्व की ओर नाली के दोनों किनारे ऊंचे-ऊंचे दिखाई देते हैं। सूरतगढ़ से तीन मील पहले ही एक और सूखी हुई धारा आकर घग्घर में मिलती है। यह सूखी धारा वास्तव में दृशद्वती है। सूरतगढ़ से आगे अनूपगढ़ तक तीन मील की चौड़ाई रखते हुए नदी के दोनों किनारे और भी ऊंचे दिखाई देते हैं। बीकानेर जिले में पहुँच कर घग्घर जल रहित हो जाती है। दृशद्वती हिमालय की निचली पहाड़ियों से कुछ दक्षिण से निकलती है। पंजाब में इसे चितांग बोलते हैं। भादरा में फिरोजशाह की बनवाई हुई पश्चिम यमुना नहर, दृशद्वती के कुछ भाग में दिखाई पड़ती है। भादरा के आगे नोहर तथा दक्षिण में रावतसर के पास इसके रेतीले किनारे दिखते हैं। आगे अनुपजाऊ किंतु हरा-भरा क्षेत्र है। इस पूरे क्षेत्र में जो थेड़ दिखाई देते हैं, उनके नीचे सरस्वती सभ्यता के स्थल दबे हुए हैं जिनसे काले एवं सलेटी रंग के बर्तन मिलते हैं।

    ऋग्वैदिक सभ्यता की सामग्री

    सरस्वती और दृश्द्वती के बीच के हिस्से को मनु ने ब्रह्मावर्त बताया है जो अति पवित्र एवं ज्ञानियों का क्षेत्र माना गया है। आगे उत्तर-पूर्व में कुरुक्षेत्र स्वर्ग के समान माना गया है। सरस्वती-दृश्द्वती के इस क्षेत्र में अनूपगढ़ क्षेत्र से उत्तर पूर्व की ओर चलने पर हड़प्पा कालीन सभ्यता से बाद की सभ्यता के नगर बड़ी संख्या में मिलते हैं जो भूमि के नीचे दबकर टीले के रूप में दिखाई पड़ते हैं। इन टीलों में स्लेटी मिट्टी के बर्तन काम में लाने वाली सभ्यता निवास करती थी। यह सभ्यता हड़प्पा कालीन सभ्यता से काफी बाद की थी। अनूपगढ़ तथा तरखानवाला डेरा से प्राप्त खुदाई से इस सभ्यता पर कुछ प्रकाश पड़ा है। राजस्थान में इस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य टीलों में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर) एवं सुनारी (झुंझुनूं) प्रमुख हैं ये सभ्यताएं लौह युगीन सभ्यता का हिस्सा हैं। सुनारी से लौह प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

    महाभारत कालीन सभ्यता की सामग्री

    महाभारत काल के आने से पूर्व मानव बस्तियां सरस्वती तथा दृशद्वती क्षेत्र से हटकर पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसक आयीं थीं। उस काल में कुरु जांगलाः तथा मद्र जांगलाः के नाम से पुकारे जाने वाले क्षेत्र आज बीकानेर तथा जोधपुर के नाम से जाने जाते हैं। इस भाग के आस पास का क्षेत्र सपादलक्ष कहलाता था। कुरु, मत्स्य तथा शूरसेन उस काल में बड़े राज्यों में से थे। अलवर राज्य का उत्तरी विभाग कुरुदेश के, दक्षिणी और पश्चिमी विभाग मत्स्य देश के और पूर्वी विभाग शूरसेन के अंतर्गत था। भरतपुर तथा धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अंतर्गत थे। शूरसेन देश की राजधानी मथुरा, मत्स्य की विराट तथा कुरु की इन्द्रप्रस्थ थी। महाभारत काल में शाल्व जाति की बस्तियांे का उल्लेख मिलता है जो भीनमाल, सांचोर तथा सिरोही के आसपास थीं।

    जनपद काल सभ्यता की सामग्री

    ई.पू. 1000 से लेकर ई.पू. 300 तक का समय जनपद काल कहलाता है। इस काल से इतिहास की आधारभूत सामग्री, सिक्के, आभूषण अभिलेख आदि मिलने लगते हैं। सिकंदर के आक्रमण के काल में और उसके बाद गुप्तों तक राजस्थान में अनेक छोटे-छोटे जनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें भरतपुर के आस-पास राजन्य जनपद तथा मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद और अलवर के निकट शाल्व जनपद प्रमुख हैं।

    मौर्यकालीन सभ्यता की सामग्री

    मौर्यकाल में लगभग पूरा राजस्थान मौर्यों के अधीन था। चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही मौर्यों की सत्ता इस क्षेत्र में फैल गयी। कोटा जिले के कण्सवा गाँव से मिले शिलालेख से यह पता चलता है कि वहाँ मौर्य वंश के राजा ‘धवल’ का राज्य था। ई.733 के लगभग जब बप्पा रावल ने चित्तौड़ विजय किया तब वहाँ मौर्य राजा ‘मान’ का राज्य था। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास पूठोली गाँव में मानसरोवर नामक तालाब के किनारे राजा मान का ई.713 का एक शिलालेख मिला है। मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात तथा कोंकण का क्षेत्र अपर जनपद अथवा पश्चिम जनपद कहलाता था।

    बैराठ सभ्यता की सामग्री

    बैराठ सभ्यता मौर्य कालीन सभ्यता है। यहाँ से मौर्य कालीन सभ्यता के अवशेष बड़े स्तर पर प्राप्त हुए हैं। जयपुर से 85 किलोमीटर दूर विराटनगर की भब्रू पहाड़ी से मौर्य सम्राट अशोक का एक शिलालेख मिला है। ई.1840 में यह शिलालेख एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (कलकत्ता) को स्थानांतरित कर दिया गया। ई.1909 में बीजक की पहाड़ी में एक बौद्ध विहार (गोलमंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस विहार को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ है। इस स्थान से अलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक के चिह्न प्राप्त हुए हैं। जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के शासन काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। चीनी चात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में 8 बौद्ध विहार देखे थे जिनमें से 7 का अब तक पता नहीं चल पाया है। अशोक ने जिस योजना के अनुसार शिलालेख लगवाए थे, उसके अनुसार इन 8 बौद्ध विहारों के पास 128 शिलालेख लगवाए होंगे किंतु इनमें से केवल 2 शिलालेख ही प्राप्त हुए हैं।

    विदेशी शासकों के स्थलों से प्राप्त सामग्री

    यूनानी राजा मिनेण्डर ने ई.पू. 150 में मध्यमिका नगरी पर अधिकार किया तथा अपने राज्य की स्थापना की। तब से भारत में विदेशी जातियों का शासन होना आरंभ हो गया। यूनानी राजाओं के सिक्के सांभर झील के पास स्थित मीठे पानी की झील नलियासर से प्राप्त हुए हैं। उनके कुछ सिक्के बैराठ तथा नगरी से भी प्राप्त हुए हैं। ई.पू. प्रथम शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान पर सीथियनों के आक्रमण आरंभ हुए। कुषाण, पह्लव तथा शकों को सम्मिलित रूप से सीथियन कहा जाता है। ईसा से लगभग 90 वर्ष पहले राजस्थान से यूनानी शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा सीथियनों ने अपने पांव जमा लिये। सौराष्ट्र से प्राप्त उषवदात के लेख के अनुसार शकों का राजा पुष्कर होता हुआ मथुरा तक पहुँचा। ये लोग ई.पू. 57 तक मथुरा पर शासन करते रहे। शक मूलतः एशिया में सिकंदरिया के रहने वाले थे। राजस्थान में नलियासर से शक शासक हुविष्क की मुद्रा प्राप्त हुई है। उसका शासनकाल ई.95-127 के बीच था। पश्चिमी भारत में शकों की दो शाखायें- क्षहरात एवं चष्टन, कुषाणों के अधीन रहकर शासन करती थीं। कनिष्क के शिलालेख के अनुसार ई.83-119 तक कुषाण राजस्थान के पूर्वी भाग पर शासन करते रहे। ई.150 के सुदर्शन झील अभिलेख से ज्ञात हुआ है कि कुषाणों का राज्य मरुप्रदेश से साबरमती के आसपास तक फैला हुआ था।

    देशी जनपदों के पुनरुत्थान काल की सामग्री

    देशी जनपदों के सिर उठाने से, ई.176 के लगभग कुषाणों की कमर टूटने लगी तथापि वे ई.295 तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे। ई.226 में मालवों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। कर्कोट नगर से प्राप्त मुद्राओं पर ‘मालवानाम् जयः’ अंकित है। इसके बाद चौथी शताब्दी तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल है। ये सब जातियाँ अथवा जनपद वस्तुतः महाभारत कालीन जातियों के उत्तरकालीन अवशेष हैं। मालव जयपुर के आसपास के क्षेत्र में थे जो बाद में अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गए। समुद्रगुप्त के काल तक मालव अपनी सत्ता गणतंत्रात्मक बनाए रहे। मालवों ने अर्जुनायनों के साथ मिलकर कुषाणों को परास्त किया। अर्जुनायन भरतपुर-अलवर क्षेत्र में फैले थे। राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र के यौधेय (अब जोहिये) भी गणतंत्रात्मक अथवा अर्द्ध राजतंत्रात्मक व्यवस्था बनाकर रहते थे। यौधयों ने राजस्थान से कुषाण सत्ता को उखाड़ फैंका। इस युग में आभीर तथा मौखरी गणराज्य भी अपना अस्तित्व रखते थे। इनके प्रमाण स्वरूप कई मुद्राएं प्राप्त हुई हैं जो विभिन्न संग्रहालयों में संगृहीत की गई है।

    गुप्तकालीन सामग्री

    भारतीय इतिहास में ई.320-495 तक का काल गुप्तकाल कहलाता है। समुद्रगुप्त ने पश्चिमी भारत के गणराज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इनमें से अधिकांश गणराज्यों ने बिना लड़े ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की। समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (द्वितीय) ने इन गणराज्यों को नष्ट कर इस सम्पूर्ण क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया। उसके आक्रमणों से शक क्षत्रपों का अस्तित्व हमेशा के लिए नष्ट हो गया। पश्चिमी राजस्थान के नाग शासक भी गुप्तों के अधीन सामंत हो गए। गुप्त कालीन भवनों एवं मंदिरों के अवशेष जालोर जिले के भीनमाल तथा मण्डोर आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं। इस काल की मूर्तियां, सिक्के, कलात्मक तोरण, स्तम्भ तथा अभिलेख राजस्थान के विभिन्न संग्राहालयों में रखे गए हैं।

    हूणों द्वारा नष्ट सभ्यता स्थलों से प्राप्त सामग्री

    हूणों के आक्रमण गुप्त काल में आरंभ हुए। कई शताब्दियों तक गुप्त शासकों ने हूणों से देश की रक्षा की किंतु अंत में हूणों के कारण गुप्त साम्राज्य अस्ताचल को चला गया। हूण राजा तोरमाण ने ई. 503 में गुप्तों से राजस्थान छीन लिया। छठी शताब्दी के आसपास हूणों ने सभी गणतंत्रात्मक तथा अर्द्ध राजतंत्रात्मक राज्य छिन्न-भिन्न कर दिए तथा उस काल के सभ्यता के प्रमुख केन्द्र नष्ट कर दिए। इनमें बैराठ, रंगमहल, बड़ोपल और पीर सुल्तान की थड़ी आदि स्थान प्रमुख हैं। इन स्थलों से प्राप्त सामग्री विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित की गई है जिनमें बीकानेर दुर्ग का संग्रहालय प्रमुख है।

    हर्षवर्धन काल की सामग्री

    सातवीं शताब्दी में पुष्यभूति वंश का राजा हर्षवर्धन प्रतापी सम्राट हुआ। उसका राज्य उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र से लेकर पूर्व में आसाम तक फैला हुआ था। हर्ष के बारे में हमें दो गं्रथों- बाणभट्ट द्वारा लिखित हर्षचरित तथा ह्वेनसांग द्वारा रचित सी-यू-की से जानकारी मिलती है। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। चीनी लेखक मा-त्वान-लिन ने भी हर्ष की विजयों का वर्णन किया है। नौसारी दानपत्र, खेड़ा से प्राप्त दद्द के दानपत्र में हर्ष के वलभी युद्ध का उल्लेख है। कल्हण की राजतरंगिणी हर्ष के कश्मीर का राजा होने की पुष्टि करती है। हर्ष के दरबार में रहने वाले राजकवि बाणभट्ट ने कादम्बरी तथा हर्ष चरित की रचना की। हर्ष के दरबार में रहने वाले मतंग नामक कवि ने सूर्यशतक की रचना की। स्वयं हर्ष ने संस्कृत में तीन नाटक नागानंद, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। बाणभट्ट लिखता है कि हर्ष की संस्कृत भाषा की कविताओं में अमृत की वर्षा होती थी। हर्ष के काल में राजपूताना चार भागों में विभक्त था- (1.) गुर्जर, (2.) बघारी, (3.) बैराठ तथा (4.) मथुरा। बयालीस वर्ष तक सफलता पूर्वक शासन करने के बाद ई.648 में हर्षवर्धन की मृत्यु हुई। हर्ष कालीन समाज के चिह्न एवं कलाकृतियां राजस्थान के विभिन्न भागों से प्राप्त हुई हैं जिन्हें विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है।

    राजपूत काल एवं मुगल काल की सामग्री

    राजस्थान के इतिहास पर ई.648 से ई.1206 तक राजपूत काल, ई.1206 से ई. 1526 तक दिल्ली सल्तन काल तथा ई.1526 से ई.1737 तक मुगल काल का प्रभाव रहा। इस कालखण्ड की विभिन्न प्रकार की ऐतिहासिक सामग्री संग्रहालयों में रखी गई है। इस सामग्री में शिलालेख, ताम्रपत्र, मुद्राएं, ताड़पत्र, प्राचीन ग्रंथ, चित्रित ग्रंथ, नक्शे, अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, वेशभूषाएं, आभूषण, सिक्के, पाण्डुलिपियां, रियासती दस्तावेज, पत्राचार, बहियां आदि प्रमुख हैं। शासकों के कोठारों, भण्डारों, शासकीय कार्यालयों की बहियों के साथ-साथ रावों एवं भाटों द्वारा लिखी गई बहियां एवं वंशावलियां भी संग्रहालयों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई हैं।

    मृण्प्रतिमाओं का योगदान

    राजस्थान में मृणप्रतिमाओं का इतिहास हजारों साल पुराना है। सिंधु सभ्यता के प्रमुख केन्द्र कालीबंगा से पांच हजार वर्ष पुरानी सैंकड़ों सुंदर मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। यहाँ से प्राप्त एक भद्र पुरुष के शीश की मृण्मूर्ति अत्यंत सुंदर है। इस मूर्ति से उस काल के उच्च वर्गीय पुरुषों द्वारा किए जाने वाले केश विन्यास का ज्ञान होता है। इस काल में पुरुष दाढ़ी रखते थे। सैंधव सभ्यता के पश्चात् लगभग 2 हजार साल तक राजस्थान में अपेक्षाकृत कम संख्या में मृण्प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। उदयपुर जिले के आहाड़-धूलकोट के उत्खनन से ई.पू.1700 से ई.पू.1500 के समय के बैल, हाथी, घोड़ा आदि पशुओं की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

    आहड़ से प्राप्त इस श्रेणी का घोड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण पुरावशेष है। भरतपुर जिले के नोह नामक स्थल के उत्खनन से प्राप्त चित्रित सलेटी रंग के पक्षी की मृण्मूर्ति पुरातत्व जगत की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मृण्मूर्ति लगभग ई.पू.1100 की मानी जाती है। मौर्य युग की सैंकड़ों मृण्मूर्तियां नोह क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं। इनके सामने का भाग चपटा एवं चौड़ा है। इनमें उभरती नारी आकृतियों का घघरीदार पहनावा विलक्षण है। छाती का ऊपरी भाग चपटा एवं ऊंचा है। कमर बिल्कुल पतली है जबकि नितम्ब तथा जांघ के ऊपर का भाग भारी है। मूर्ति निर्माण की यह शैली उत्तर भारत में बहुत लम्बे समय तक प्रचलन में रही। नोह एवं बैराठ से मौर्यकालीन अनेक मृण्मूर्तियां मिली हैं।

    शुंग काल की मृण्प्रतिमाओं की पहचान उनके परिधान के अंकन से होती है। इनमें दो गांठों वाली पगड़ी को भी स्थान मिला है। इस युग की प्रतिमाओं में पैरों के बीच धोती का तिकोना छोर धरती को स्पर्श करता है। राजस्थान में शुंग काल की कला के प्रमुख केन्द्र रैढ, सांभर, बैराठ और नगर थे। रैढ से प्राप्त एक स्त्री मूर्ति में उसे भी पगड़ी पहनाई गई है। उसने दो वेणियां बना रखी हैं। इससे केश विन्यास की परम्पराओं को समझने में सहायता मिलती है। कुषाण कालीन मृण्प्रतिमाओं की पहचान भी बड़ी आसानी से हो जाती है। ये अत्यधिक संख्या में मिलती हैं। ये भी चपटी हैं किंतु शुंग कालीन प्रतिमाओं से ही अधिक उभरी हुई हैं। इनका मुखमण्डल अधिक चौड़ा है, आकृति मोटी एवं सुघड़ है। नारी आकृतियां अधिक मांसल एवं कमनीय हैं। इनकी केश सज्जा पूर्व की एवं पश्चात् की प्रतिमाओं से अलग प्रकार की है। सामने झूलते हुए बालों की गोल बनावट होती है और नीचे से दोनों ओर बाल पीछे की ओर खींच लिए जाते हैं। चपटी एवं चौड़ी करघनी इस काल की प्रतिमाओं की मुख्य पहचान है।

    गुप्त काल की मृण्मूर्तियां, मूर्तिकला के चरम उत्कर्ष का दर्शन कराती हैं। इन प्रतिमाओं में सुघराई, अभिप्रायों की रुचि एवं अलंकरण की शोभा अनुपम है। मृण्प्रतिमाओं का उभरा हुआ अण्डाकार चेहरा, पतला शरीर तथा सिर के घुंघराले बाल सजीवता का आभास देते हैं।

    राजस्थान में कुषाण काल, कुषाणोत्तर काल एवं गुप्त कालीन मिट्टी के खिलौने तथा मृण्मूर्तियां रैढ़, सांभर, नगर, नगरी, आहाड़, रंगमहल आदि स्थलों से बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं जो राजस्थान के विभिन्न संग्रहालयों में प्रदर्शित किए गए हैं।

    उत्कीर्णित लेखों एवं अभिलेखों का योगदान

    शिलाखण्डों, भित्तियों, गुहाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों आदि पर खुदे हुए लेखों से मानव सभ्यता का प्रामाणिक इतिहास प्राप्त होता है। ऐसे अनेक लेख विभिन्न भवनों के खण्डहरों, मंदिरों, किलों एवं अन्य स्थलों से प्राप्त हुए हैं जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज और संस्कृति का दिग्दर्शन होता है। ये लेख राज-प्रशासन, दान-धर्म, भवन-मंदिर निर्माण एवं वीर-प्रशस्ति आदि से सम्बन्धित हैं। कुछ लेख जन कल्याणकारी कार्य और राज निर्देशन को इंगित करते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों एवं सामंतों आदि के नाम, वंश-परिचय, संधि-विग्रह, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक कार्य कलाप लिखे गए हैं। इनमें अशोक के अभिलेख, धौली शिलालेख, एर्रगुडी शिलालेख, ब्रह्मगिरि शिलालेख, दिल्ली-मेरठ स्तम्भलेख, रामपुरवा स्तम्भलेख, रूमिन्देई स्तम्भलेख, समुद्रगुप्त का प्रयाग अभिलेख, स्कन्दगुप्त का भीतरी अभिलेख, कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को उद्घाटित करते हैं।

    राजस्थान के प्राचीन दुर्गों, मंदिरों, सरोवरों, बावड़ियों एवं महत्वपूर्ण भवनों की दीवारों, देव प्रतिमाओं, लाटों एवं विजय स्तंभों आदि पर राजाओं, राजकुमारियों, राजमहिषियों, सामंतों, दानवीरों, सेठों और विजेता योद्धाओं द्वारा समय-समय पर उत्कीर्ण करवाए गए शिलालेख मिलते हैं जो लाखों की संख्या में हैं। अशोक के शिलालेख खरोष्ठी एवं ब्राह्मी लिपि में हैं। उसके बाद के शिलालेख संस्कृत एवं राजस्थानी भाषा में हैं। मुस्लिम शासकों के शिलालेख फारसी भाषा एवं अरबी लिपि मंे मिलते हैं। ई.608 का गोठ मांगलोद स्थित दधिमती माता मंदिर का अभिलेख, ई.661 का अपराजित का शिलालेख, ई.685 का मण्डोर शिलालेख, 8वीं ईस्वी का मान मोरी का शिलालेख, ई.861 के घटियाला के शिलालेख, ई.956 का ओसियां शिलालेख, ई.1170 का बिजोलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के निकट एक चट्टान पर उत्कीर्ण लेख, ई.1273 का चौखा शिलालेख, ई.1274 का रसिया की छतरी का शिलालेख, ई.1460 का चित्तौड़ दुर्ग का कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति शिलालेख, ई.1285 का आबू पर्वत शिलालेख, ई.1434 का देलवाड़ा का शिलालेख, ई.1428 का श्ृंगी ऋषि का शिलालेख, ई.1428 का समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख, ई.1439 की रणकपुर प्रशस्ति, ई.1460 की कुंभलगढ़ प्रशस्ति, ई.1613 का जमवा रामगढ़ का प्रस्तर लेख, ई.1594 की रायसिंह की बीकानेर प्रशस्ति, ई.1652 की उदयपुर के जगदीश मंदिर की जगन्नाथ राय की प्रशस्ति तथा ई.1676 का राजसमंद झील के किनारे उत्कीर्ण राजप्रशस्ति महाकाव्य, राजस्थान के प्रमुख एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण शिलालेखों में से हैं।

    इनमें से बहुत से शिलालेख प्रदेश के विभिन्न संग्रहालयों में रखे गए हैं। कुछ शिलालेख राष्ट्रीय संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    मुद्राओं का योगदान

    प्रदेश के आर्थिक एवं सामाजिक इतिहास के निर्माण में मुद्राओं एवं सिक्कों का अभूतपूर्व योगदान है। इन मुद्राओं से तत्कालीन शासक और उसका समय तो ज्ञात होता ही है, साथ ही उस युग की भाषा, लिपि, धर्म, समाज और आर्थिक दशा का भी ज्ञान होता है। आहत अथवा पंचमार्क सिक्के सबसे पुराने हैं, जिनसे उस युग की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति का पता चलता है। राजस्थान से मिले पंचमार्का सिक्के, गधैया सिक्के, ढब्बू सिक्के, आहड़ उत्खनन से प्राप्त सिक्के, मालवगण के सिक्के और सीलें, राजन्य सिक्के, यौधेय सिक्के, रंगमहल से प्राप्त सिक्के, सांभर से प्राप्त मुद्राएं, सेनापति मुद्राएं, रेड से प्राप्त सिक्के, मित्र मुद्राएं, नगर मुद्राएं, बैराट से प्राप्त मुद्राएं, गुप्तकालीन सिक्के, गुर्जर प्रतिहारों के सिक्के, चौहानों के सिक्के तथा मेवाड़ी सिक्के राजस्थान के प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।

    मौर्य युग के पश्चात की मुद्राएं अधिक व्यवस्थित और सुन्दर हैं तथा विभिन्न राजाओं और राजवंशों की स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्राएं समय-समय पर मिलती रहती हैं, जिनसे समाज और धर्म की जानकारी प्राप्त होती है। यवन, पह्लव, शक, कुषाण एवं सातवाहन, गुप्त, राजपूत, मुगल इत्यादि विभिन्न राजवंशों के सिक्के मिले हैं, जो अपने-अपने युग पर प्रकाश डालते हैं। गुप्त सम्राटों के सोने के सिक्के अभूतपूर्व हैं जो गुप्तों और लिच्छवियों के सम्बन्धों पर प्रकाश डालते हैं तथा उस युग की समृद्धि एवं राजकीय शक्ति की गाथा कहते हैं। गुहिल राजा कालाभोज का सोने का सिक्का उस युग के इतिहास को जानने का एकमात्र साधन है। अजमेर से मिले एक सिक्के में एक तरफ पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है तथा दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम अंकित है। इससे अनुमान होता है कि पृथ्वीराज चौहान को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने उसके सिक्कों को जब्त करके उन्हें अपने नाम से दुबारा जारी किया था।

    राजस्थान के संग्रहालयों में मुगल शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्के बड़ी संख्या में मिलते हैं। इनमें जहांगीर द्वारा जारी किए गए राशि बोधक सिक्के विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसने सिक्कों पर अपने नाम के साथ नूरजहाँ का नाम भी उत्कीर्ण करवाया तथा सिक्कों पर अपना आवक्ष चित्र मुद्रित करवाया जिसमें वह पालथी मारे बैठा है तथा उसके दाहिने हाथ में मदिरा का चषक है। उसकी ऐसी मुहरें हिजरी 1023 में अजमेर टकसाल में बनीं जिन पर फारसी में शबीह-हजरत-शाह जहांगीर तथा पृष्ठभाग में सूर्य का चिह्न बना है एवं इसके चारों ओर फारसी में अल्लाहु अकबर-जरब-अजमेर लिखा है। यह सिक्का लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संगृहीत है। हिजरी 1027 (ई.1618) अर्थात् अपने राज्य के 13वें वर्ष में उसने राशिबोधक सिक्के चलाए। प्रत्येक सिक्के को ढालते समय सूर्य जिस राशि में था, सिक्कों पर वही राशि उत्कीर्ण की गई। उससे पहले अकबर के समय में हिजरी सन् के साथ चंद्र माह का नाम सिक्कों पर लिखा जाता था। जहांगीर के इस आदेश से आगरा टकसाल से मुहरें तथा अहमदाबाद की टकसाल से चांदी के रुपए जारी किए गए। ये सिक्के बहुत कम संख्या में बनाए गए थे तथा जनता को इतने पसंद आए कि जनता द्वारा संगृहीत कर लिए गए और बाजार में चलन में नहीं आए। जहांगीर के बाद के बादशाहों ने इन सिक्कों को इस्लाम के खिलाफ मानकर बंद कर दिया।

    जहांगीर के राशिबोधक सिक्कों का पूरा सेट वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम लंदन के अतिरिक्त और कहीं उपलब्ध नहीं है। वर्नियर के अनुसार स्वयं जहांगीर के शासन काल में दो या तीन राशि बोधक मुहरों को प्राप्त करना अत्यंत कठिन था। बीकानेर के गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम में मेष राशि बोधक एक मुहर (119 ग्रेन), सरदार संग्रहालय जोधपुर में मेष और कर्क राशि बोधक दो चांदी के रुपए और केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर में सिंह राशि बोधक रुपया (154 ग्रेन) संगृहीत है।

    भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान निकाली गई विभिन्न प्रकार की मुद्राएं ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश क्राउन का भारत में विस्तार एवं देशी रियासतों से उनके सम्बन्धों की गाथा तो कहते ही हैं, साथ ही भारत के सामाजिक विषयों के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी समझाने में सहायक हैं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्कों पर भगवान राम, लक्ष्मण एवं वैदेही का चित्रांकन किया गया है। ये सिक्के भी देश के अनेक संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    ताम्रपत्रों का योगदान

    जब शासक किसी महत्वपूर्ण अवसर पर भूमि, गाँव, स्वर्ण एवं रत्न आदि दान देते थे या कोई अनुदान स्वीकृत करते थे, तब वे इस दान या अनुदान को ताम्बे की चद्दर पर उत्कीर्ण करवाकर देते थे ताकि पीढ़ियों तक यह साक्ष्य उस परिवार के पास उपलब्ध रहे। हजारों की संख्या में ताम्रपत्र उपलब्ध होते हैं। इन दानपत्रों से इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने में सहायता मिली है। अब तक सबसे प्राचीन ताम्रपत्र ई.679 का धूलेव का दानपत्र मिला है। ई.956 का मघनदेव का ताम्रपत्र, ई.1002 का रोपी ताम्रपत्र, ई.1180 का आबू के परमार राजा धारावर्ष का ताम्रपत्र, ई.1185 का वीरपुर दानपत्र, ई.1194 का कदमाल गाँव का ताम्रपत्र, ई.1206 का आहाड़ ताम्रपत्र, ई.1259 का कदमाल ताम्रपत्र, ई.1287 का वीरसिंह देव का ताम्रपत्र तथा ई.1437 का नादिया गाँव का ताम्रपत्र प्रमुख हैं। इन ताम्रपत्रों को राजस्थान के विभिन्न संग्रहालयों में रखा गया है। कुछ ताम्रपत्र राष्ट्रीय अभिलेखागारों एवं संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।

    अस्त्र-शस्त्रों का योगदान

    राजस्थान के राजा हजारों वर्षों से युद्ध लड़ते आए थे। इस कारण उनके शस्त्रागारों में ना-ना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उपलब्ध थे। राजस्थान में जयपुर, मारवाड़, मेवाड़, कोटा, बूंदी, अलवर, सिरोही आदि राज्यों में अलग-अलग प्रकार की तलवारें बनती थीं। राजपूताने में बनी तलवारों की पूरे देश में आपूर्ति होती थी। तलवारों को उनकी बनावट एवं उनकी मारक क्षमता के आधार पर अलग-अलग नाम दिए गए थे। इनमें सांकेला, बट, असील, रोटी, कित्ती, काबरा, लहरिया, ईरानी, नलदार, कर्णशाही अथवा शाही कीरच, नागफणी, सोसणकत्ती, फलसी, खांडा, मोती लहर, जामा तलवार कहते थे। इनके अतिरक्त जमधर, छुरी, कटार, गुप्ती आदि भी काम में लाई जाती थीं। सिरोही में नीलकण्ठ महादेव की बावड़ी के पानी और सिरोही की मिट्टी से तलवार को धार देने पर तलवार की धार बहुत तीखी हो जाती थी जिससे एक ही वार में पेड़ भी काटा जा सकता था। इन तलवारों की धार एवं नोक पर जहर भी लगाया जाता था। इनकी मूठें एवं म्यानें भी बहुत कलात्मक होती थीं तथा कई प्रकार की डिजाइनों में बनती थीं।

    भारत के कई राजा-महाराजा एवं बादशाह अपनी सेना के लिए सिरोही में तलवारें बनवाते थे। मध्यकाल में सिरोही में 500 लोहार एवं मियांगर कार्यरत थे। राजाओं की सेनाएं भाले, ढाल, बख्तरबंद, शिरस्त्राण (सिर के टोप), तीर-कमान, तरकष आदि का उपयोग करती थीं। युद्ध में काम आने वाले हाथी, घोड़े, ऊँट, बैल आदि के लिए भी कवच बनाए जाते थे। मुगलों के समय में तोपें, बंदूकें एवं अन्य आग्नेय अस्त्र बनने लगे थे। तोपों के साथ-साथ उनकी पहियेदार गाड़ियां, बारूद के गोले, मोटे रस्से भी कई प्रकार के बनाए जाते थे। संग्रहालयों में देशी रियासातों के शस्त्रागारों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्रों को भी प्रमुख स्थान दिया गया है।

    पालकियाँ एवं डोलियां

    रियासती काल में महत्वपूर्ण पुरुषों एवं राजमहिषियों को लाने ले जाने के लिए पालकियों एवं डोलियों का प्रयोग किया जाता था। इन्हें भी बहुत कलात्मक ढंग से बनाया जाता था। राजस्थान के संग्रहालयों में विभिन्न रियासतों से प्राप्त पालकियाँ एवं डोलियां भी प्रदर्शित की गई हैं।

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