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  • अध्याय - 42 ज्योतिष यंत्र संग्रहालय, जयपुर

     02.06.2020
    अध्याय - 42 ज्योतिष यंत्र संग्रहालय, जयपुर

     अध्याय - 42


    ज्योतिष यंत्र संग्रहालय, जयपुर

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    जयपुर नगर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय) (ई.1699-1743) ने पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों तथा जर्मन विद्वानों को जयपुर में बुलाकर उनके यहाँ विकसित हो रहे ज्ञान की जानकारी प्राप्त की। वहाँ से पुस्तकें खरीद कर मंगवाईं तथा जयपुर के लोगों को उस ज्ञान से परिचित करवाया। जयसिंह की बनाई वेधशालाओं में अनेक विदेशी विद्वान काम करते थे। उसने सूरत से अंग्रेजों के कीप जैसे यंत्र, मानचित्र तथा ग्लोब भी मंगवाए। जयसिंह ने मेनोल फिगूएरेडो नामक यूरोपीय विद्वान को पुर्तगाल भेजा ताकि वह पुर्तगाल से ग्रंथ और यंत्र क्रय करके ला सके। पैड्रो दा सिल्वा का पौत्र हकीम शेवायर के नाम से प्रसिद्ध था।

    वेधशालाओं का निर्माण

    सवाई जयसिंह को गणित, ज्योतिष एवं नक्षत्र विद्या के अध्ययन में गहन रुचि थी। जयसिंह ने अपने बारे में लिखा है- 'मैंने बचपन से गणित का अध्ययन किया जो युवावस्था तक चलता रहा। मुझे भगवत् कृपा से यह ज्ञात हुआ कि संस्कृत, अरबी और यूरोपियन पंचांगों के ग्रहों की स्थिति उससे भिन्न मिलती है जो स्वयं के पर्यवेक्षण से पता चलती है, विशेषतः द्वितीया के चंद्र की स्थिति।' ई.1725 में उसने बादशाह मुहम्मदशाह से अनुमति लेकर दिल्ली के जयसिंहपुरा क्षेत्र में एक वेधशाला का निर्माण करवाया। राजा जयसिंह, जहाँ-जहाँ रहा, वहाँ-वहाँ उसने वेधशालाएँ बनवाईं। जयपुर उसकी स्वयं की राजधानी थी। उज्जैन उसके मालवा सूबे की राजधानी थी। बनारस और मथुरा उसके आगरा सूबे में स्थित थे। दिल्ली की वेधशाला भी जयसिंहपुरा नामक उपनगर में बनवाई गई जो जयसिंह का अपना क्षेत्र था। उसने वेधशालाओं में बडे़-बडे़ यन्त्र बनवाकर नक्षत्रों की गति को शुद्ध रूप से जानने के साधन उपलब्ध कराये। मथुरा की वेधशाला अब अस्तित्व में नहीं है तथा दिल्ली की वेधशाला काम नहीं करती है। शेष वेधशालाएं आज भी काम करती हैं।

    वेधशाला यंत्रों का आविष्कार

    जयसिंह ने प्रथम प्रयास में पीतल धाुत से निर्मित छोटे यंत्र लगाए जिससे समय के छोटे खण्डों का सही पता नहीं चल पाता था। धातु से बने यंत्रों की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे तापमान के बढ़ने और घटने के साथ फैलते और संकुचित होते थे। इसलिए जयसिंह ने पत्थर और चूने की सहायता से स्वयं अपने द्वारा आविष्कार किये हुए बड़े यंत्र बनवाये। माना जाता है कि जय प्रकाश, राम यंत्र तथा सम्राट यंत्र, जयसिंह के स्वयं के आविष्कार थे।

    सम्राट यंत्र

    सम्राट यंत्र पर एक ऐसी घड़ी बनी हुई है जो भूमध्य रेखा पर सूर्य के समय को दर्शाती है। उसके नीचे एक त्रिभुजाकार सुई लगी है जो सूर्य की स्थिति को छाया के रूप में दर्शाती है। इसका त्रिभुजाकार सुई का कर्ण पृथ्वी की धुरी के समानान्तर है और उसका दूसरा पक्ष गोले का एक चौथाई भाग बनाता है जो भूमध्य रेखा के समानान्तर है। इसके सिरों पर घण्टे, मिनिट और डिग्री अंकित हैं और त्रिभुज के तीनों छोर चौथाई गोलों पर अलग-अलग स्पर्श रेखाएं बनाते हैं जिनके दोनों छोर चिह्नित हैं। जयपुर की वेधशाला के इस यंत्र की ऊँचाई 90 फुट और लम्बाई 147 फुट है। गोले के दोनों चौथाई भागों का अर्धव्यास 50 फुट है। दिल्ली का सम्राट यंत्र आकार में इससे कुछ छोटा है।

    जयप्रकाश यंत्र

    जयप्रकाश यंत्र एक गोलार्द्ध है जिसके भीतरी ओर कुछ चिह्न अंकित हैं। इस पर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम जाते हुए तार लगे हुए हैं और जहाँ तार एक दूसरे को काटते हैं, उस बिंदु की छाया से सूर्य की स्थिति का पता चलता है। चिह्नित स्थानों पर दृष्टि डालने से दूसरे ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति जानी जा सकती है। जिस ग्रह-नक्षत्र का चिह्न है, उस पर पड़ती हुई छाया की स्थिति नक्षत्र की स्थिति बताती रहती है। इसलिए यह यंत्र अलग-अलग दो गोलार्द्धों में बनाया गया है। दिल्ली के जयप्रकाश यंत्र का व्यास 27 फुट और जयपुर के जयप्रकाश यंत्र का व्यास 17 फुट है।

    रामयंत्र

    रामयंत्र दो बेलनाकार शीर्षों की ओर खुला हुआ है। इसकी भीतरी और बाहरी दीवारों पर चिह्न अंकित हैं। इनसे नक्षत्र की ऊँचाई आदि का ज्ञान होता है। पर्यवेक्षण की सुविधा के लिए नीचे की ओर से दोनों ओर खुले हुए खण्ड हैं। इस यंत्र में दिक्-अंश यंत्र और नाड़ी वलय भी हैं जो ज्योतिषीय पर्यवेक्षण में उपयोगी हैं। इससे पूर्व इतने सटीक यंत्र नहीं बन सके थे। इन्हें भारत में सर्वप्रथम होने का गौरव भी प्राप्त है। जयसिंह ने पंचांग के शुद्धिकरण का कार्य किया ताकि तिथियां सही समय पर पहचानी जा सकें। ग्रहण कब पड़ेगा, इसकी भी सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।

    यंत्रों के लघु प्रारूप

    वेधशालाओं में विशालाकाय यंत्रों को स्थापित करने से पहले लकड़ी, क्ले, पत्थर तथा पीतल के लघु प्रारूप तैया करवाए गए थे। ये नमूने यंत्रशाला के संग्रहालय में रखे हुए हैं। महाराजा सवाई जयसिंह की 309वीं जयंती के अवसर पर 3 नवम्बर 1996 को पहली बार इन यंत्रों की प्रदर्शनी लगाई गई।

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