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     02.06.2020
    अध्याय - 48 अरणा-झरणा मरुस्थल संग्रहालय जोधपुर

    अध्याय - 48


    अरणा-झरणा मरुस्थल संग्रहालय जोधपुर

    हमारी नई वैबसाइट - भारत का इतिहास - www.bharatkaitihas.com

    अरणा-झरणा मरुस्थल संग्रहालय जोधपुर की स्थापना पद्मभूषण कोमल कोठारी ने की थी किंतु इस कार्य के बीच ही उनका निधन हो जाने के कारण उनके पुत्र कुलदीप कोठारी ने अरणा झरणा डेजर्ट म्यूजियम को अंतिम रूप दिया। इस म्यूजियम में राजस्थान के जनजीवन, पर्यावरण एवं प्रदर्शनकारी कलाओं की स्थायी एवं अस्थाई झांकियां संजोई गई हैं। लोकवाद्यों का संग्रह, कठपुतली प्रदर्शन एवं झाड़ुओं का संग्रह इस संग्रहालय की विशेषताएं हैं। यह म्यूजियम नगरीय जीवन में पल रहे बच्चों से लेकर भारत आने वाले दुनिया भर के पर्यटकों को मरुस्थलीय संस्कृति एवं जनजीवन की जीवंत झांकी के दर्शन करवाता है।

    इस संग्रहालय को देखने से पहले कोमल कोठारी के बारे में जानना आवश्यक है क्योंकि इस संग्रहालय में उनके जीवन भर की साधना का संग्रह किया गया है। कोमल कोठारी का जन्म ई.1929 में राजस्थान के कपासन गाँव में हुआ। उन्होंने संगीत वाद्यों, कठपुतलियों, आभूषणों, लोकनाट्यों, महाकाव्यों, लोक देवताओं आदि पर विस्तृत अनुसंधान किया। यह अनुसंधान विविध पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में उनके द्वारा लिखे गये लेखों के माध्यम से लोगों के सामने आया। कोमल कोठारी भारत में प्रदर्शनकारी कलाओं के प्रलेखन के प्रमुख प्रणेताओं में से थे। उन्होंने राजस्थान के पारम्परिक संगीत को हजारों घण्टों की रिकॉर्डिंग के माध्यम से संरक्षित किया। उनके शोध की गहराई आने वाले सैंकड़ों साल तक राजस्थान की संगीत लहरियों को जीवित रखेगी। उनके द्वारा 400 प्रकार की सारंगियों की पहचान करके उनकी सूचनाएं अंकित की गईं। उन्होंने थार मरुस्थल में रहने वाले सैंकड़ों गुमनाम कलाकारों को राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाई।

    वर्ष 1960 में उन्होंने जोधपुर, जैसलमेर तथा बाड़मेर आदि जिलों में गांव-गांव घूमकर लोक गायकों के गीत एवं संगीत को ध्वन्यांकित करना आरंभ किया। लंगा एवं मांगणियार गायक टेप रिकॉर्डर को संदेह की दृष्टि से देखते थे। एक बार जब वे अंतर खां मांगणियार का गीत टेप करने की तैयारी कर रहे थे तो अंतर खां अवसर पाते ही तेजी से भाग खड़ा हुआ। जब कोमल कोठारी ने पीछे भाग कर उसे पकड़ा और भागने का कारण पूछा तो अंतर खाँ ने कहा- 'इस मशीन में मेरी आवाज कैद हो जायेगी और मैं फिर कभी नहीं गा सकूंगा।' आरंभिक दिनों में वे लोक कलाकारों द्वारा लोक गीत रिकॉर्ड करवाने पर उन्हें चार आने प्रति गीत देते थे।

    कोमल कोठारी ने कई वर्र्षों तक लोक संगीत रिकॉर्ड किया। उनके पास लोक गीतों एवं लोक संगीत की लगभग 8 से 10 हजार घण्टों की रिकॉर्डिंग इकट्ठी हो गई। इस रिकॉर्डिंग के दौरान उन्होंने यह अनुभव किया कि यदि प्रयास किया जाए तो इन लोक गायकों को विश्व भर में प्रसिद्धि दिलवाई जा सकती है। उनका यह प्रयास जनजातीय समुदायों को पहचान दिलाने की दिशा में किया गया देश भर में सबसे पहला था। उनके मार्गदर्शन में कई शोधार्थियों ने शोध कार्य सम्पन्न कर पीएच.डी. की उपधि अर्जित की। कौन सा गीत किस अवसर पर गाया जाता है, उस अवसर के मांडणे एवं गीतों में क्या सामंजस्य है, लोक गीतों में हवा, पानी, बादल, वर्षा आदि की क्या जानकारियां संजोई गई हैं, आदि विविध विषयों पर उन्होंने पर्याप्त शोध किया। राजस्थान की मिट्टी, पशुधन, वनस्पति, ऋतुएं आदि की भी उन्हें गहरी जानकारी थी। खान पान सम्बन्धी सूचनाओं को वे बहुत महत्त्व देते थे। उन्होंने राजस्थान को बाजरे का क्षेत्र, ज्वार का क्षेत्र तथा मक्का का क्षेत्र नाम से तीन भागों में बांटा रखा था। बाजरा क्षेत्र में भगवान राम की, ज्वार क्षेत्र में भवागन कृष्ण की तथा मक्का क्षेत्र में भगवान शिव की पूजा होने को भी उन्होंने रेखांकित किया।

    ई.1965 में उन्होंने राजस्थानी लेखक विजयदान देथा के साथ मिलकर रूपायन संस्थान अध्ययन केन्द्र की स्थापना की। उन्होंने 15 अगस्त एवं 26 जनवरी पर दिल्ली में आयोजित होने वाले समारोहों में भाग लेने के लिए आंचलिक कलाकारों को अवसर दिलवाया। जब केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी ने विभिन्न आंचलिक भारतीय कलाओं को उजागर करने के लिए लोक उत्सव की शृंखला आरंभ की तब कामेल कोठारी ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए लंगा, मांगणियार तथा कालबेलिया जातियों के कुशल लोक गायकों और तेरहताली नर्तकों को प्रथम बार राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया तथा बातपोशी की कला को भी उजागर किया। लोक संगीत, लोक वाद्य यंत्र, कठपुतली कला, हाथ की कढ़ाई-छपाई, परम्परागत दागीनों की घड़ाई-जड़ाई, मरुस्थल के लोगों की जीवन शैली, मौखिक परम्पराएँ एवं मौखिक साहित्य का शोध, उनके कार्यक्षेत्र के प्रमुख विषय थे। बोरूंदा में रहते हुए उन्होंने 20 हजार कथाएं, 17 हजार गीत तथा 12 हजार लोकोक्तियां संगृहीत कीं। कालबेलियों की गायकी तथा उनके जीवन के विविध पक्षों को जानने के लिए उन्होंने एक कालबेलिए को तीन साल तक अपने साथ रखा।

    राजस्थान के लोकवाद्यों में सिंधी सारंगी एवं कमायचा जैसे अद्भुत लोक वाद्य उपलब्ध हैं। जब इन्हें बजाने वाले कम हो गये तो बनाने वाले भी लुप्त होने लगे। मांगणियार कमायचा छोड़कर हारमोनियम बजाने लगे। कोमल कोठारी ने कमायचा बनाने वाले कारीगरों को ढूंढा तथा उनसे एक सौ कमायचे बनवाकर, नई उम्र के मांगणियार कलाकारों को कमायचा बजाने का प्रशिक्षण दिलवाया। लंगाओं के मुख्य वाद्य 'सिंधी सारंगी' को बनाने वाले तो लुप्तप्राय ही गये थे। कोमल कोठारी ने सिंधी सारंगी का भी उद्धार किया। अस्सी के दशक में उन्होंने फलौदी कस्बे में सिंधी सारंगी बनाने वाले एक व्यक्ति को खोज निकाला। उससे सिंधी सारंगियां बनवाकर लंगाओं में बंटवाईं। इस प्रकार उन्होंने कमायचा तथा सिंधी सारंगी को लुप्त होने से बचाया तथा उन्हें फिर से लोकप्रिय बनाया।

    पाबूजी की पड़ जैसी लोक वार्ताएं तथा रम्मत-ख्याल जैसे लोक नाट्य उनके कार्यक्षेत्र के मुख्य अंग थे। जनजातियों पर उनका अध्ययन विशद था। भील, जोगी, कालबेलिया और गाडोलिया लुहार जैसे घुमंतू कबीलों के जीवन पर उन्होंने काफी कार्य किया। कोमल कोठारी ने औपनिवेशिक ब्रिटिश काल के बाद के युग में कलाकार-जजमान सम्बन्धों पर एक नई बहस आरंभ की। उन्होंने रेगिस्तान की परिस्थितियों को लोगों की सांस्कृतिक एवं आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा। उन्होंने पुस्तकें नहीं लिखीं किंतु वाचिक पद्धति से अपने ज्ञान को दूसरों के बीच खूब बांटा। कोमल कोठारी ने संगीत की विधिवत् शिक्षा नहीं पाई थी किंतु कलाकारों की संगति, शास्त्रीय संगीत के गहन अध्ययन और उस पर मनन-मंथन से, उसे बहुत निकट से सुन और गुन कर, उन्होंने ऐसी अद्भुत श्रवण संवेदना विकसित कर ली थी कि उन्हें स्वर के सही-गलत की अचूक पहचान हो गई थी। इसी पहचान के बल पर वे लोक गायकों की परख करते थे। शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत पर उन्होंने अल्प मात्रा में लिखा भी है।

    लोक संगीत के क्षेत्र में उनकी कार्य प्रणाली सबसे अलग थी। नार्वे की एक संगीत शिक्षिका विब्बे होमा के साथ मिलकर उन्होंने एक अद्भुत प्रयोग किया जो दिखाता है कि लोक में परम्परा कैसे जीवित रहती है। उन्होंने पांच वर्ष के बच्चों का संगीत रिकॉर्ड किया। फिर उन्हीं बच्चों के बड़े होने तक लगातार आठ-दस वर्षों तक उन्हें रिकॉर्ड किया। यह क्रमिक रिकॉर्डिंग यह दिखाती है कि विरासत का संरक्षण और विकास पीढ़ी दर पीढ़ी कैसे होता है। वे शास्त्रीय पद्धति को विभेदकारी कहते थे। उनका कहना था- यद्यपि यह विभेद फार्म के स्तर पर है किंतु यदि फार्म के स्तर पर विभेद है तो उसका कोई न कोई तात्विक आधार भी होगा ही। दूसरी ओर लोककलाओं में यह विभेदकारी तत्व नहीं है। राजस्थान की औरतें गाती हैं तो वही चार सुर हैं और बंगाल की औरतें गाती हैं तो भी वही चार सुर। इसी तरह लोकथाओं की संरचना और अभिप्रायों के सम्बन्ध में भी उनका मानना था कि लोककाख्यान के अंदर कोई भी विषय ऐसा नहीं है, जिसका स्वरूप अखिल भारतीय न हो या अखिल विश्व का न हो। चाहे वह संगीत हो, कथा हो, महाकाव्य हो या और कुछ। मैं यहाँ राजस्थान के एपिक को देखता हूँ, कर्नाटक, मणिपुर, बिहार-बंगाल के एपिक देखता हूँ तो मुझको अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकता का एक बोध सा होता है किंतु जब हम कला या संस्कृति के अन्य शास्त्रीय प्ररूपों की ओर देखते हैं तो हमें उनमें डिवीजन......... कई तरह की अलग उनकी अपनी विशिष्टताएँ और विभेद नजर आते हैं। अलग-अलग स्थानिकताओं, धर्मों, सम्प्रदायों से जुड़ी कला के जो क्लासिकल फार्म्स हैं, उनमें यह विभेद काफी दिखाई देता है।

    इस संस्थान द्वारा राजस्थान की लोक कथाओं, लोक कलाओं एवं लोक संगीत का बड़े स्तर पर प्रलेखीकरण किया गया। विजयदान देथा के साहित्यिक अवदान में 14 खण्डों में प्रकाशित 'बातां री फुलवारी' भी सम्मिलित है। इसमें राजस्थान के वाचिक साहित्य एवं लोककथाओं का संग्रह किया गया है। साथ ही 40 हजार लोक-कहावतों का कोश भी तैयार करके प्रकाशित करवाया गया है।

    जीवन के अंतिम वर्षों में कोमल कोठारी को कैंसर हो गया था। उन दिनों में वे डेजर्ट म्यूजियम की स्थापना पर कार्य कर रहे थे। 20 अप्रेल 2004 को जोधपुर में उनका निधन हो गया। उसी वर्ष 2004 में उन्हें पद्मभूषण दिया गया। उनकी पत्नी श्रीमती इंदिरा कोठारी ने राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अबुल कलाम के हाथों यह अलंकरण ग्रहण किया। ई.2012 को राजस्थान सरकार ने उन्हें राजस्थान रत्न पुरस्कार प्रदान किया। उनके पुत्र कुलदीप कोठारी ने अरणा झरणा डेजर्ट म्यूजियम को अंतिम रूप दिया। वर्ष 2008 में अरणा-झरणा संग्रहालय को यूनेस्को ने एथनोग्राफिक म्यूजियम की श्रेणी में सूचिबद्ध किया।

    इस संग्रहालय में लोक संगीत, लोकधुनों तथा लोककलाकारों के साक्षात्कारों की लगभग 25 हजार घण्टे की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है जिसका डिजीटलाइजेशन कर दिया गया है। चूंकि संग्रहालय शहर से दूर अरणा-झरणा क्षेत्र में स्थित है इसलिए रिकॉर्डिंग्स को जोधपुर शहर के पावटा क्षेत्र में स्थित एक भवन में रखा गया है। बहुत सी सामग्री का प्रलेखीकरण करके उसे भी पावटा कार्यालय में रखा गया है। डेजर्ट म्यूजियम के मुख्य परिसर में कठपुतलियां, लोकवाद्य, रेगिस्तानी प्रदेश की विभिन्न वनस्पतियों से बनी हुई झाड़ुएं, राजस्थानी लोकरंगमंच की लोकप्रिय लोकला की रंगीन कावड़, मरुस्थलीय पॉटरी आदि प्रदर्शित किए गए हैं। यह संग्रहालय सप्ताह में सातों दिन प्रातः 9 बजे से सायं 6 बजे तक खुलता है। इसके लिए देशी पर्यटक को 50 रुपए में तथा विदेशी पर्यटक को 150 रुपए में टिकट खरीदना होता है।

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