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  • अध्याय - 60 पुरातत्व संग्रहालय कालीबंगा

     21.12.2018
    अध्याय - 60 पुरातत्व संग्रहालय कालीबंगा

    अध्याय - 60

    पुरातत्व संग्रहालय, कालीबंगा

    कालीबंगा का पुरातत्व संग्रहालय हनुमानगढ़ जिले के कालीबंगा कस्बे से बाहर उन थेड़ों के निकट स्थित है जहाँ से कालीबंगा की सभ्यता प्राप्त की गई थी। इसकी स्थापना भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण द्वारा ई.1983 में की गई थी। सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पाकालीन 30-35 थेड़, जिनमें कालीबंगा का थेड़ सबसे ऊँचा है, की खुदाई साठ के दशक में की गयी। हनुमानगढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर स्थित पीलीबंगा से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कालीबंगा में पूर्वहड़प्पा कालीन एवं हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। इस स्थान का पता पुरातत्व विभाग के निदेशक अमलानंद घोष ने ई.1952 में लगाया था। ई.1961-62 में बी. के. थापर, जे. वी. जोशी तथा बी. बी. लाल के निर्देशन में इस स्थल की खुदाई की गयी।

    कालीबंगा के टीलों की खुदाई में दो भिन्न कालों की सभ्यता प्राप्त हुई है। पहला भाग 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू. तक का है तथा दूसरा भाग 2200 ई.पू. से 1700 ई.पू. तक का है। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों, घरों एवं धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। घरों में चूल्हों के अवशेष भी मिले हैं। कालीबंगा के लोग मिट्टी की कच्ची या पक्की ईंटों का चबूतरा बनाकर घर बनाते थे, बरतनों में खाना खाने की मिट्टी की थालियां, कूण्डे, नीचे से पतले एवं ऊपर से प्यालेनुमा गिलास, लाल बरतनों पर कलापूर्ण काले रंग की चित्रकारी, देवी की छोटी-छोटी मृदा-प्रतिमाएँ, बैल, बैलगाड़ी, गोलियां, शंख की चूड़ियां, चकमक पत्थर की छुरियां, शतरंज की गोटी तथा एक गोल, नरम पत्थर की मुद्रा आदि मिले। बरतनों पर मछली, बत्तख, कछुआ तथा हरिण की आकृतियां बनी हैं।

    यहाँ से मिली मुहरों पर सैंधव लिपि उत्कीर्ण है जिसे पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि दाहिने से बाएं लिखी हुई है। यहाँ से मिट्टी, तांबे एवं कांच से बनी हुई सामग्री भी प्राप्त हुई है। छेद किये हुए किवाड़ एवं मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन केवल इसी स्थल पर मिले हैं।

    खुदाई में प्राप्त कुछ सामग्री इस संग्रहालय में प्रदर्शित की गई है तथा बहुत सी सामग्री राष्ट्रीय संग्रहालयों सहित अन्य संग्रहालयों को भेज दी गई है। इस संग्रहालय में तीन दीर्घाएं हैं जिनमें से पहली दीर्घा में हड़प्पा काल से पूर्व की सभ्यता में मिली वस्तुएँ संगृहीत हैं और दूसरी एवं तीसरी दीर्घा में हड़प्पा काल की सभ्यता की खुदाई में मिली वस्तुए हैं।

    दीर्घाओं में प्रदर्शित वस्तुओं में कालीबंगा के क से ड. तक के हड़प्पा-पूर्व स्तर की हड़प्पा मुद्राएं, चूड़ियां, टेराकोटा की वस्तुएं, टेराकोटा की मूर्तियां, ईंटें, चक्की, पत्थर की गेंदें तथा प्रसिद्ध छः भवनों वाली पात्र-निर्माणशाला शामिल हैं। खुदाई के विभिन्न स्तरों के खुली संरचनाओं के चित्र भी दर्शाए गए हैं।

    प्रथम शोकेस में मृदभाण्ड, जालीदार गिलास, लोटे कूंडे, स्टोरेज जार, चषक तथा लाल-गुलाबी बर्तन रखे गए हैं। मिट्टी के बर्तनों के साथ, विभिन्न प्रकार के जार, ताम्बे के शस्त्र, कुल्हाड़ी, छैनी, नोक वाला बरछा और भाला भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    दूसरे शोकेस में टेराकोटा, पशुआकृतियां, मनुष्य आकृतियां, आग में पके हुए मिट्टी के खिलौने प्रदर्शित किए गए हैं।

    तीसरे शोकेस में मुहरें, मुद्रा, मुहरबंदी आदि प्रदर्शित की गई हैं।

    चौथे शोकेस में विभिन्न प्रकार के मनके प्रदर्शित किए गए हैं। ये मनके पत्थर, कांच, हड्डी, हाथीदांत, धातु तथा अर्धमूल्यवान पत्थरों से निर्मित हैं। कालीबंगा के लोगों का कलात्मक रुझान इन मनकों से समझा जा सकता है। चूड़ियां, सीप एवं हड्डियों से निर्मित अंगूठी, माला और स्वर्ण आभूषण भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    पांचवे शोकेस में हड़प्पा से पहले की सभ्यता की पॉटरी प्रदर्शित की गई है। साथ ही सात प्रकार के कपड़े के नमूने रखे गए हैं। इन वस्तुओं के अध्ययन से अनुमान होता है कि ईसा के जन्म से साढ़े तीन हजार साल पहले भी भारत से कपड़ा, शृंगार-प्रसाधन, मनके, सोने-चांदी के आभूषण विदेशों को निर्यात किए जाते होंगे।

    छठे शोकेस में पत्थर से निर्मित सामग्री रखी गई है। पत्थर के विभिन्न प्रकार के बर्तनों पर कई तरह की आकृतियां उत्कीर्ण हैं।

    सातवें शोकेस में उत्खनन से प्राप्त कच्ची ईंट, पक्की ईंट एवं टायल्स (केलू) प्रदर्शित किए गए हैं।

    आठवें शोकेस में खेलों से सम्बन्धित सामग्री रखी है। इसमें शतरंज की गोटियां, पत्थरों से निर्मित खिलौने के आकार के प्यादे आदि सम्मिलित हैं।

    नौवें शोकेस में बांट-बंटकरी प्रदर्शित है। संग्रहालय में कुछ चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें कालीबंगा के उत्खनन के विभिन्न चरणों को दर्शाया गया है। यह संग्रहालय सप्ताह में छः दिन प्रातः 9.00 बजे से सायं 5.00 बजे तक खुला रहता है। शुक्रवार के दिन अवकाश रहता है।

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