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  • अध्याय - 23 राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा

     01.07.2018
     अध्याय - 23 राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा

     अध्याय - 23 राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय कोटा


    राजस्थान के हाड़ौती अंचल में पर्यटन हेतु आने वाले देशी एवं विदेशी पर्यटकों में जिन दर्शनीय स्थानों पर जाने की ललक दिखाई देती है उनमें कोटा नगर के प्राचीन गढ़ परिसर स्थित महलों में गैर सरकारी स्तर से संचालित किया जा रहा राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय प्रमुख है। इस संग्रहालय की स्थापना कोटा एवं हाड़ौती अंचल की कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण एवं प्रदर्शन के लिए उद्देश्य से दृष्टि से राजस्थान दिवस पर 30 मार्च, 1970 को की गई थी।

    राजमहल के मुख्य प्रवेश द्वार ‘हथियापोल’ से प्रवेश कर इस संग्रहालय में पहुंचा जाता है। हथियापोल में दोनों ओर स्थित कलात्मक हाथियों को कोटा शासक महाराव भीमसिंह (प्रथम) (वि.सं. 1764-1777) बूंदी से लाया था और उसने ही द्वार पर स्थापित करवाया था। हथियापोल से प्रवेश करने पर पहले कोटा राजपरिवार के आराध्य देव बृजनाथजी का मंदिर आता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप बोरसली की ड्यौढ़ी से अंदर जाने पर विशाल खुला चौक आता है जो राजमहल का आन्तरिक चौक है। यहीं पर संग्रहालय के विविध कक्ष बने हुए हैं जिनमें प्रदर्शित प्राचीन सामग्री दर्शकों को लुभाती है। इस संग्रहालय को चित्रकला की दृष्टि से अनुपम माना जाता है।

    संग्रहालय के दरबार हाल की पुरा-वस्तुओं में महाराव उम्मेदसिंह (द्वितीय) की आदमकद आकर्षक मूर्ति, राजसी साजो समान, विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र यथा-पैरों से बजाए जाने वाला हारमोनियम, सुबिर वाद्य बांक्या, करनाल, ईसर गणगौर की प्रतिमाएं, 120 पत्तों का खेल गंजीफा, चौपड़, खिलौने, राजसी वó तथा उन्हें रखने का पिटारा, हाथीदांत, संगमरमर तथा चीनी मिट्टी की कलात्मक वस्तुएं केरोसीन से चलने वाला पंखा, सवारी में प्रयुक्त होने वाला सुनहरी हौदा, राजचिन्ह का कलात्मक चिह्न, चांदी का हौदा, हाथी दांत एवं धातुओं की चौपड़, चांदी के खिलौने तथा अन्य कलात्मक वस्तुएं यथा सिंहासन, सुनहरी महाजन, पालकियां, श्रीनाथजी का सिंहासन एवं बाजोट, चांदी के दीप स्तम्भ, मीनाकारी तथा जड़ाऊ के काम का ठाकुरजी का पालना, तैरने के तूम्बे, कलमदान, सिद्धयंत्र, राजसी हुक्के, झाला जालिमसिंह के नहाने का 29 सेर वजन का पीतल का चरा, संगमरमर का कलात्मक ऐरावत, कमर में बांधा जा सकने वाला कलमदान आदि सैकड़ों कलात्मक, दुर्लभ एवं आकर्षक वस्तुएँ हैं।

    दरबार हाल के बाहर बरामदे में जलघड़ी, धूपघड़ी, खगोल यंत्र प्रदर्शित हैं। राजमहल चौक में पुरानी नौबतें रखी हैं जिसमें मुकुन्द सिंह के काल की नौबत भी है जो कोटा रियासत का द्वितीय शासक था।

    शस्त्र कक्ष

    दरबार के आगे राजमहल के दाहिनी ओर की गैलेरी में मध्ययुगीन अस्त्र-शस्त्रों के अलावा कोटा के शासकों द्वारा काम में लिए गए शस्त्र भी प्रदर्शित हैं। एक म्यान में दो तलवारें, पिस्तौल सहित तलवार, ढालें, अनेक प्रकार की कटारें, भाले, बरछे, नेजे, तीर-कमान, फरसा, गदा, खुखरी, गुप्तियां, छड़ियां, खंजर, पेशकब्ज, कारद, बन्दूकें, सुनहरी पिस्तौल के अलावा राज्य का झण्डा, निशान, सुनहरी चोब, सुनहरी मोरछल एवं चंवर दर्शनीय हैं। सोने का मुगल-कालीन राजकीय चिन्ह माही मरातिब’ भी इसी कक्ष में देखा जा सकता है। कोटा नरेश महाराव भीमसिंह (प्रथम) को उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए मुगल बादशाह मोहम्मदशाह ने ई.1720 में प्रदान किया था। इसी मुगल शासक द्वारा प्रदत्त सर्वधातु की नक्कारा जोड़ी तथा योद्धा एवं अश्व को पहनाने का जिरह बख्तर भी माधोसिंह संग्रहालय की अनूठी चीजें हैं।

    वन्यजीव कक्ष

    इस कक्ष में कोटा के राजपरिवार के सदस्यों द्वारा शिकार के दौरान मारे गए चुनिन्दा वन्य जीव हैं, जिनमें शेर, तेन्दुआ, सिंह, सांभर, भालू, घड़ियाल, गौर मछली, खरमौर एवं काले तीतर आदि सम्मिलित हैं। सैकड़ों वर्षों पूर्व मारे गए जीव-जन्तु विशेष तकनीक से सुरक्षित रखे हुए हैं जो आज भी जीवन्त प्रतीत होते हैं।

    छायाचित्र कक्ष

    वन्यजीव कक्ष से लगे छायाचित्र कक्ष में ई.1880 से वर्तमान काल तक के अनेक छायाचित्र प्रदर्शित हैं। ई.1857 की क्रान्ति के दौरान कोटा में किस स्थान पर क्या घटना घटित हुई थी इसका चित्रण यहाँ प्रदर्शित एक मानचित्र में किया गया है। यह नक्शा कोटा के पूर्व महाराव बृजराज सिंह ने तैयार किया है।

    चित्र कक्ष

    इस कक्ष में मुगल तथा कोटा-बूंदी के चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। चित्रकारों द्वारा बनाए गए इन कलात्मक चित्रों में गज एवं अश्व में विश्व दर्शन, श्रीनाथजी का नवनिधि चित्र जिसमें गोस्वामी बालकों को विशेष वेशभूषा में दर्शाया गया है, कोटा चित्र शैली के प्रतिनिधि चित्र हैं।

    राजमहल कक्ष

    यह कक्ष भी संग्रहालय का ही हिस्सा है जिसमें अभी भी राजगद्दी की प्रतिकृति रखी है। रियासत काल में यहीं पर दरीखाना भी होता था। दरबार राजगद्दी पर बैठते थे और उमराव, सामन्त, उच्च अधिकारी, राज मान्यता प्राप्त विशिष्ट जन हाड़ौती की राज दरबारी पोशाक में अपने-अपने निर्धारित स्थान पर बैठते थे। इस कक्ष में कांच की कारीगरी का काम मुगलयुगीन है। कांच की कारीगरी में मीनाकारी, डाक की जड़ाई, जामी कांच की जड़ाई, गोलों के कांच की जड़ाई, साणा की जड़ाई कोटा के बेगरी परिवार के शिल्पकारों द्वारा निर्मित है। राजमहल की दीवारों में सफेद चूने में गहरे नीले, हरे तथा कत्थई रंगों के कांच का काम दर्शनीय है। इसी कक्ष में कोटा राज्य का केसरिया गरुड़ ध्वज एक चित्र पर प्रदर्शित है। दाहिनी ओर कोटा राज्य का सुन्दर नक्शा, बाईं ओर बूंदी राजघराने का वंशवृक्ष तथा उसी के पास कोटा राजघराने का वंशवृक्ष प्रदर्शित किया गया है। एक बड़े चार्ट में दरीखाने में उपस्थित व्यक्तियों की बैठने की स्थिति दर्शायी गई है।

    राजमहल की ऊपरी मंजिल के अधिकांश कक्ष चित्रित हैं जिनमें लक्ष्मी भंडार तिबारी, अर्जुन महल, छत्र महल में कोटा शैली के अनुपम भित्तिचित्र बने हैं। भीम महल में लगे कालीन बहुत सुन्दर एवं कलात्मक हैं जिन्हें कोटा जेल के कैदियों ने बनाया था। तीसरी मंजिल पर स्थित बड़ा महल का निर्माण कोटा के प्रथम शासक राव माधोसिंह (वि.सं. 1681-1705) ने करवाया था। इस महल में राजस्थान की सभी चित्र शैलियों में बनाए गए भित्तिचित्र प्रदर्शित हैं। पूरा महल चित्रों से भरा हुआ है। सवारी, दरबार और उत्सव आदि विविध विषयों को कलमकारों ने प्राकृतिक रंगों से चित्रित किया है। महल के बाह्य कक्ष में अधिकांश चित्र कांच के फ्रेम में दीवार पर जड़े हुए हैं। इसी से लगा हुआ एक आकर्षक झरोखा है, जिसे ‘सूरज गोख’ कहते हैं। इसमें रंगीन कांच का काम बड़ा ही सुन्दर बन पड़ा है।


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