Blogs Home / Blogs / राजस्थान के संग्रहालय एवं अभिलेखागार / अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर
  • अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर

     27.06.2018
    अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर

    अध्याय - 21 राजमाता देवेन्द्र कुंवर राजकीय संग्रहालय डूंगरपुर


    डूंगरपुर राजकीय संग्रहालय की स्थापना ई.1959 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा वागड़ क्षेत्र की पुरा सामग्री एवं कला सामग्री के संरक्षण एवं प्रदर्शन के उद्देश्य से की गई। ई.1960 में डूंगरपुर पंचायत समिति हॉल में प्रतिमाओं एवं पुरावस्तुओं का प्रदर्शन किया गया। समय के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की सामग्री का अध्ग्रिहण किया जाता रहा जिससे यह संग्रहालय समृद्ध होता चला गया।

    ईस्वी 1970 में पूर्व डूंगरपुर रियासत के राजपरिवार के सदस्य महारावल लक्ष्मणसिंह तथा डॉ. नगेन्द्रसिंह ने डूंगरपुर राजवंश से सम्बद्ध प्राचीन वस्तुओं एवं व्यक्तिगत संग्रह की वस्तुओं को संग्रहालय को देने का निश्चय किया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत संग्रह की समस्त कलाकृतियां, धातु प्रतिमाएँ तथा ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं राजकीय संग्रहालय को प्रदान कर दीं।

    ई.1973 में पुरासामग्री को विधिवत रूप से प्रदर्शित कर इसे राजकीय संग्रहालय का स्वरूप प्रदान किया गया। राजपरिवार द्वारा संग्रहालय के लिए भूमि भी उपलब्ध कराई गई। इस भूमि पर सरकार द्वारा एक भवन का निर्माण किया गया तथा 11 फरवरी 1988 को नवीन संग्रहालय भवन का उद्घाटन किया गया। वर्तमान में इस संग्रहालय में तीन दीर्घाएं हैं जिनमें 197 मूर्तियां, 23 शिलालेख, धातु प्रतिमाएँ, सिक्के तथा वागड़ क्षेत्र के आदिवासी जनजीवन से सम्बन्धित सामग्री प्रदर्शित की गई है।

    डूंगरपुर राजस्थान के दक्षिण-पश्चिम सीमांत क्षेत्र में स्थित है। यहाँ की प्रतिमाओं का पत्थर स्थानीय खानों से प्राप्त किया गया था। यह पत्थर गाढ़े नीले-हरे रंग का है। इसे मेवाड़ में परेवा पत्थर कहा जाता था। डूंगरपुर संग्रहालय में 5-6वीं शताब्दी की गुप्तकालीन प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित की गई हैं। मृगचर्म युक्त ब्रहमी, पद्मपाणि-यक्ष, कौमारी आदि की प्रतिमाएँ महत्वपूर्ण हैं।

    वीणाधारी शिव, कुबेर एवं गणेश की मूर्तियां भी उल्लेखनीय हैं। खण्डित अवस्था में होने पर भी ये प्रतिमाएँ अपने काल की मूर्तिकला पर प्रकाश डालने में पर्याप्त सक्षम हैं। वीणाधर शिव तल्लीन भाव में नन्दी पर आरूढ़ हैं। शिव की यह प्रतिमा इस क्षेत्र से प्राप्त प्रतिमाओं में सबसे प्राचीन है। प्रारंभिक मध्यकाल स्थानक वराह का अधोभाग, आसनस्थ कुबेर, दम्पत्ति, सुर-सुन्दरी का धड़, आसनस्थ ध्यानमुद्रा में आदिनाथ, महिषासुरमर्दिनी तथा स्थानक चामुण्डा की प्रतिमाएँ भी दर्शनीय हैं।

    डूंगरपुर से 25 किलोमीटर दूर आमझरा नामक स्थान से गुप्तोत्तर कालीन प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ की पहाड़ियों को देखने से विशाल भवनों की नीवें दिखाई देती हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि किसी समय यहाँ विशाल मंदिर रहे होंगे। पुरातत्वविद् रत्नचंद्र अग्रवाल ने इस क्षेत्र से अनेक प्राचीन मूर्तियों को खोजा। ये मूर्तियाँ गुप्तोत्तर काल की थीं। उत्तर मध्यकाल की प्रतिमाओं में स्थानक सूर्य, हरिहर (संयुक्त प्रतिमा) दशावतार के अंकन के साथ उत्कीर्ण की गई हैं।

    मध्योत्तर कालीन प्रतिमाओं में तपस्यारत पार्वती, गरुड़ासीन लक्ष्मीनारायण एवं महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमाएँ उल्लेखनीय हैं। इसी काल की अनेक जैन प्रतिमाएँ भी प्रदर्शित हैं। महारावल लक्ष्मणसिंह एवं डॉ. नगेन्द्र सिंह डूंगरपुर से भेंट स्वरूप प्राप्त प्रतिमाएँ, शिलालेख, लघुचित्र एवं वास्तु खण्ड भी मध्योत्तर युगीन कला का प्रतिनिधित्व करते हैं।

    डॉ. नगेन्द्रसिंह के सौजन्य से प्राप्त नटराज, भगवान बुद्व, अर्द्धनारीश्वर, भैरवी आदि प्रतिमाएँ संग्रहालय की विशिष्ट कला सम्पदाएं हैं। इस संग्रहालय में चित्रों के माध्यम से वागड़ क्षेत्र की अनेक सांस्कृतिक परम्पराओं का प्रदर्शन किया गया है। सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताओं तथा सांस्कृतिक केन्द्रों के छाया चित्रों तथा स्थानीय कलाकृतियों को भी संजोया गया है।


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×