Blogs Home / Blogs / राजस्थान के संग्रहालय एवं अभिलेखागार / अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा
  • अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा

     01.07.2018
    अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा

    अध्याय - 22 राजकीय संग्रहालय कोटा


    अंग्रेज पुरातत्वविद् सी. एस. हैक्ट ने बून्दी राज्य के इन्दरगढ़ क्षेत्र से क्वार्टजाइट से निर्मित पाषाण-कालीन उपकरण खोजे थे जो भारतीय संग्रहालय कलकत्ता में रखे गए। इसी प्रकार कोटा राज्य से प्राप्त कुछ अन्य सामग्री भी देश-विदेश के अन्य संग्रहालयों को चली गई।

    कोटा महाराव उम्मेद सिंह (द्वितीय) के समय ई.1936 में कोटा राज्य की प्राचीन एवं कलात्मक सामग्री का सर्वेक्षण एवं संग्रहण कर, संग्रहालय बनाने का विचार सामने आया। इस विचार को क्रियान्वित करने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. ए. एस. अल्टेकर से कोटा रियासत का पुरातात्विक सर्वेक्षण करवाया गया। फलस्वरूप कोटा के आस-पास चौदह प्राचीन स्थल प्रकाश में आए।

    कोटा संग्रहालय की स्थापना को मूर्त स्वरूप प्रदान करने के लिए सुप्रसिद्ध इतिहासकार डा. मथुरालाल से ई.1943 में पुनः सर्वेक्षण करवाया गया। परिणामस्वरूप लगभग एक सौ प्रतिमाएं एवं शिलालेख प्रकाश में आए। कोटा राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पुरा सामग्री एवं कलाकृतियों को ब्रजविलास भवन में रखवाया गया तथा ई.1946 में राजकीय संग्रहालय कोटा की विधिवत नींव रखी गई।

    ई.1946 से 1951 तक यह संग्रहालय ब्रजविलास भवन में रहा। स्वतंत्रता प्रािप्त के पश्चात् यह संग्रहालय कोटा गढ़महल स्थित हवामहल में स्थानांतरित किया गया। ई.1991 तक यह संग्रहालय हवामहल में रहा किंतु संग्रहालय-सामग्री में वृद्धि हो जाने से स्थान कम पड़ने लगा। अतः इसे पुनः छत्रविलास उद्यान के ब्रजविलास भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। पुरासामग्री एवं कलासामग्री के प्रदर्शन के लिए संग्रहालय दीर्घाओं का वैज्ञानिक ढंग से निर्माण करवाया गया तथा संग्रहालय का पुनर्गठन कर दिसम्बर 1995 में जनसाधारण के लिए खोला गया।

    ब्रजविलास संग्रहालय भवन उत्तर मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य शिल्प का सुन्दर नमूना है तथा सरकार द्वारा घोषित संरक्षित स्मारक है। इस संग्रहालय को मूर्तिकला की विविधता एवं चित्रकला संग्रह की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। संग्रहालय में संगृहीत प्रतिमाएँ, शिलालेख, सिक्के, लघुचित्र, हस्तलिखित ग्रंथ तथा विविध कला सामग्री को कालक्रम, विषय-वस्तु एवं प्राप्ति-स्थल के आधार पर वर्गीकृत कर छः दीर्घाओं में प्रदर्शित किया गया है।

    पुरा सामग्री कक्ष

    पुरा सामग्री दीर्घा में हाड़ौती क्षेत्र से प्राप्त मध्यपाषाण युग से लेकर गुप्तकाल तक की पुरासामग्री एवं कलासामग्री का प्रदर्शन किया गया है जिसमें झालावाड़ जिले में कालीसिन्ध तथा आहू नदी के संगम पर स्थित गागरोन दुर्ग, कालीसिन्ध के निकट तीनधार और आहू नदी के निकट स्थित भीलवाड़ी गांव आदि स्थलों से प्राप्त मध्यप्रस्तर युग (50 हजार वर्ष पूर्व से 10 हजार वर्ष पूर्व तक) के पाषाण उपकरणों का प्रदर्शन किया गया है जिनमें कुल्हाड़ी, स्क्रैपर, बाण की नोक आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त लघुपाषाण कालीन अर्थात् नवपाषाण कालीन (10 हजार वर्ष पूर्व से 5 हजार वर्ष पूर्व तक) के प्रस्तर उपकरण भी प्रदर्शित हैं जिनमें कोर, फलक, ब्लेड आदि प्रमुख हैं।

    ताम्रयुगीन एवं ऐतिहासिक स्थलों यथा धाकड़खेड़ी, कैथून, मानसगांव (जिला कोटा), नमाणा, केशोरायपाटन (जिला बूंदी), बड़वा (जिला बारां) आदि से प्राप्त मृदपात्र जिनमें मालवा क्षेत्र की पुरा संस्कृति से सम्बन्धित पात्रखण्ड (मालावा वेयर अथवा ब्लैक ऑन रैड वेयर) काले और लाल धरातल वाले पात्रखण्ड (ब्लैक एण्ड रैड वेयर), सलेटी रंग के पात्रखण्ड (ग्रे वेयर) तथा ऐतिहासिक काल की मृणमूर्तियां, पक्की मिट्टी का शतरंज का पासा एवं मोहरें, कर्णाभूषण, पहिया आदि अनेक प्रकार की मनोरंजन एवं श्ृंगार सामग्री प्रदर्शित की गई है। इस पुरा एवं कला सामग्री के माध्यम से मानव जाति के सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है। आदि-मानव के भोजन संग्रहण अवस्था से निकलकर भोजन उत्पादन की अवस्था में प्रवेश करने तक की विकास यात्रा को दो तैल-चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। कोटा के समीप चंद्रसेन नामक स्थान पर शतुमुर्ग के चालीस हजार वर्ष प्राचीन अण्डशतक मिले हैं जिन्हें रेखांकन से सजाया गया है। उन्हें भी इस संग्रहालय में रखा गया है।

    मुद्रा कक्ष

    संग्रहालय में सर्वाधिक प्राचीन सिक्का चांदी से निर्मित पंचमार्क चौकोर सिक्का है जिस पर फूल बने हुए हैं। इस प्रकार के सिक्कों का चलन ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व था। कोटा-बूंदी क्षेत्र से प्राप्त प्राचीनतम सिक्के इण्डोससैनियन और गधिया प्रकार के हैं जो ग्राम निमोदा, तहसील दीगोद और बूंदी-नमाना रोड पर खुदाई के दौरान प्राप्त हुए थे। चौहान राजा अजयदेव तथा उसकी रानी सोमलदेवी के सिक्के एक दफीने के रूप मिले हैं, वे भी इस संग्रहालय में सुरक्षित हैं। अजयदेव के सिक्कों पर चित की तरफ नागरी लिपि में अजयदेव अंकित है और पट की ओर लक्ष्मी देवी की आकृति उत्कीर्ण है। सोमल देवी के सिक्कों पर नागरी लिपि में सोमल देवी एवं पट की ओर अश्वारोही की आकृति बनी है।

    कोटा संभाग के विभिन्न स्थलों से प्राप्त अल्लाउद्दीन खिलजी, मुबारकशाह, गयासुद्दीन तुगलक और अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब आदि के सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं। हाड़ौती क्षेत्र की कोटा, बूंदी एवं झालावाड़ रियासतों के सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं। मेवाड़, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, करौली, भरतपुर और टोंक आदि रियासतों के सिक्के भी प्रदर्शित हैं जो कोटा राज्य के रानीहेड़ा गांव में मिले थे। ये सिक्के मुगल बादशाह अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजेब और मुहम्मदशाह के समय के हैं।

    प्रतिमा कक्ष

    हाड़ौती क्षेत्र स्थापत्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से अत्यन्त सम्पन्न रहा है तथा भौगोलिक रूप से मालवा क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण मालवा की संस्कृति से प्रभावित रहा है। इस क्षेत्र में वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध एवं जैन मतावलम्बियों से सम्बन्धित स्थापत्य एवं मूर्तिकला के अवशेष प्रचुर संख्या में प्राप्त होते हैं। संग्रहालय में 150 से अधिक प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। इनमें बाड़ौली, दरा, अटरू, रामगढ़ विलास, काकोनी, शाहबाद, आगर, औघाड़, मन्दरगढ़ आदि से प्राप्त प्रतिमाएँ प्रमुख हैं। संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र से प्राप्त गुप्तकाल से लेकर मध्यकाल तक निर्मित देवालयों के अवशेषों, मूर्तियों, उत्कीर्ण पाषाणों आदि सामग्री को संकलित किया गया है। संग्रहालय में विलास से प्राप्त यमराज की एक प्रतिमा प्रदर्शित की गई है जो हाथ में कपाल लिए हुए है। विषय-वस्तु एवं प्राप्ति स्थल के आधार पर प्रतिमा कक्ष को छः उपकक्षों में विभाजित किया गया है।

    दरा प्रतिमा कक्ष में दरा क्षेत्र से प्राप्त गुप्तकालीन प्रस्तर प्रतिमाएं रखी गई हैं। ख्यातिलब्ध तंत्रपट्टिका (झल्लरी वादक) इंग्लैण्ड में हुए भारत महोत्वस में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। नन्दी तथा कलात्मक प्रस्तर स्तम्भ-खण्ड आदि भी प्रदर्शित हैं। शैव प्रतिमा कक्ष में काकूनी, अटरू आदि स्थलों से प्राप्त उमा-महेश्वर, शिव के विभिन्न स्वरूपों यथा विलास के लकुलीश एवं अंधकासुर वध, रामगढ़ से प्राप्त शिव ताण्डव आदि प्रतिमाएं, बारां के शक्ति-गणेश, काकूनी के कार्तिकेय, भैरव आदि प्रतिमाएं प्रदर्शित की गई हैं। ये सभी प्रतिमाएं 9वीं-10वीं शताब्दी की हैं। संयुक्त देव प्रतिमा कक्ष में 9वीं शताब्दी ईस्वी की गांगोभी से प्राप्त योगनारायण, विलास से प्राप्त हरि-हर, पितामह-मार्तण्ड की संयुक्त देव प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। गंगोभी से प्राप्त प्रतिमाएँ सफेद पत्थर की हैं। शेषशायी विष्णु की प्रतिमा भूरे पत्थर से निर्मित है।

    वैष्णव प्रतिमा कक्ष में शाहबाद से प्राप्त 8वीं शताब्दी की बैकुण्ठ-विष्णु (नृसिंह, वराह, विष्णु) प्रतिमा, बाड़ौली से प्राप्त 9वीं शताब्दी की संयुक्त राज्य अमेरिका एवं रूस में हुए भारत महोत्सव में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली शेष-शायी विष्णु प्रतिमा, औघाड़ (शाहबाद) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की विष्णु प्रतिमा, वराह, वामन, नृसिंह आदि विष्णु-दशावतार प्रतिमाओं सहित विष्णु के 24 स्वरूपों की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। मातृकाएं एवं दिक्पाल कक्ष में ऐन्द्रीय, वाराही, वैष्णवी, ब्रह्माणी, चामुण्डा, लक्ष्मी आदि मातृकाओं की प्रतिमाएं, अग्नि, वरुण, ईशान, वायु, कुबेर, यम आदि दिक्पाल तथा नवग्रह पटल आदि का प्रदर्शन है। हाड़ौती क्षेत्र के रामगढ़, काकूनी, विलास, अटरू, गांगोभी आदि स्थलों से प्राप्त ये प्रतिमाएं 9वीं से 11वीं शताब्दी की हैं।

    अधिकांश हिन्दू नरेश बौद्ध एवं जैन धर्म को भी श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। इस कारण इस क्षेत्र से इन दोनों धर्मों से सम्बन्धित प्रतिमाएं भी बड़ी संख्या में मिली हैं। इस क्षेत्र में 8वीं से 13वीं शताब्दी तक की काकूनी, अटरू केशोरायपाटन, झालरापाटन, विलास, रामगढ़ आदि स्थलों से जैन तीर्थंकरों ऋषभनाथ, अजितनाथ, विमलनाथ, शांतिनाथ, मणिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी आदि की प्रस्तर प्रतिमाएं प्रदर्शित की गई हैं। बाड़ौली से प्राप्त 9वीं शताब्दी की शेषशायी विष्णु प्रतिमा का छायाचित्र प्रदर्शित किया गया है।

    ऐतिहासिक कक्ष

    ऐतिहासिक कक्ष में शिलालेखों, अó-शó, पट्ट-परिधान तथा हाड़ौती क्षेत्र के स्वतन्त्रता संग्राम से सम्बन्धित इतिहास की झांकी प्रस्तुत की गई है।

    मौखरी राजकुमारों के यूप स्तम्भ: बड़वा ग्राम से प्राप्त वि.सं. 295 के यूप स्तम्भों से वैदिक यज्ञों की जानकारी प्राप्त होती है। इन स्तम्भों को संग्रहालय में एक अलग चबूतरे पर प्रदर्शित किया गया है। इन स्तूपों से यज्ञ अश्व बांधे गए थे। वैदिक परम्परा के अनुसार ये यूप आधार भाग में चौकोर, मध्य भाग में अष्टकोणीय और शीर्ष भाग पर मुड़े हुए हैं तथा पीले रंग के बलुआ पत्थर से निर्मित हैं। इन यूपों पर कुषाण कालीन ब्राह्मी लिपि में (ई.238 का) एक शिलालेख अंकित है जिससे ज्ञात होता है कि इन यूपों के निर्माणकर्ता मौखरी वंश के बल के पुत्र बलर्धन सोमदेव और बलसिंह थे, जिन्होंने यहाँ त्रिराज एवं ज्योतिषेम यज्ञ करके इन्हें स्थापित किया था। राजस्थान में तीसरी शताब्दी ईस्वी में मौखरी राज्य की सूचना देने वाला यह अकेला शिलालेख प्राप्त हुआ है।

    शिलालेख: संग्रहालय में प्रदर्शित विश्ववर्मा का वि.सं. 480 का गंगधार (झालावाड़ जिले में स्थित) से प्राप्त लेख विष्णु मंदिर के निर्माण का उल्लेख करता है। चारचौमा का वि.सं. 557 का अभिलेख, चन्द्रभागा (झालरापाटन) का शीतलेश्वर महादेव का वि.सं. 746 का लेख तथा कन्सुआ (कोटा) का वि.सं. 795 का लेख शिव मन्दिरों के निर्माण की तिथि की सूचनाएं देते हैं। शेरगढ़ के कोषवर्धन अभिलेख से ज्ञात होता है कि वि.सं. 847 में नागवंश के राजा देवदत्त ने एक मंदिर तथा बौद्ध विहार का निर्माण करवाया था। रामगढ़ से प्राप्त वि.सं. 1219 का त्रिशावर्मा का अभिलेख इसी वंश के राजा मलयवर्मा द्वारा 10वीं शताब्दी में विजय के उपलक्ष्य में किए गए शिवालय के जीर्णोद्धार का उल्लेख करता है। शेरगढ़ में भण्डदेवरा से प्राप्त विक्रम की 12वीं एवं 13वीं शताब्दी के लेख तथा चांदखेडी का वि.सं. 1476 का लेख प्रमुख हैं। संग्रहालय में प्रदर्शित शिलालेखों में रामगढ़ से प्राप्त शिलालेख, श्रीमलयदेव वर्मण का शिलालेख भी सम्मिलित हैं।

    बाद के शिलालेखों में कोटा रियासत के सम्बन्ध में सूचनाएं मिलती हैं जिनमें चाकरी बन्द करने की सूचना, वि.सं.1861 में महाराव रामसिंह का जैसलमेर में विवाह होने की सूचना, महाराव रामसिंह (वि.सं.1884-1922) द्वारा दरा में शेर का शिकार करने पर मनाए गए उत्सव का विवरण, वि.सं. 1906, शाहबाद का सं. 1678 का शिलालेख, झाला जालिम सिंह (प्रथम) का 19वीं शताब्दी का शिलालेख आदि प्रदर्शित है। इन शिलालेखों से हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है। इन प्रसिद्ध शिलालेखों के साथ-साथ हाड़ौती में अन्य कई स्थानों से प्राप्त प्रसिद्ध शिलालेखों की देवनागरी में प्रतिलिपियां रखी गई है।

    ताम्रपत्र एवं खरीते आदि: संग्रहालय में कुछ ताम्रपत्रों के मूल लेख तथा कुछ ताम्रपत्रों के अनुवाद भी उपलब्ध हैं। शाहबाद और दरा से लाए गए कुछ शिलालेख भी उपलब्ध कराए गए हैं। शिलालेखों के साथ ही खरीतों पर लगाए जाने वाली चपड़ी की सील के कुछ लेख भी मौजूद हैं जिनमें राव माधोसिंह, महाराव रामसिंह, वजीरखान नसरतजंग, बलवन्तसिंह, जार्ज रसेल आदि के लेख प्रमुख है। कोर्ट स्टाम्प की मोहर के लेख भी प्रदर्शित हैं।

    अस्त्र-शस्त्र एवं पट्ट-परिधान कक्ष

    अस्त्र-शस्त्र एवं पट्ट-परिधान कक्ष में 18वीं-19वीं शताब्दी के अó-शó, तोड़ेदार बन्दूकें, कोटा-बून्दी-उदयपुर की कटारें, छुरियां, तलवारें-ढालें, भाले, धनुष एवं तीर तथा जिरहबख्तर आदि को सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया गया है। कोटा शासकों के पट्ट-परिधान, चोगा मारगर्दानी, चोगा मखमल, सुरमई, पशमीना, बागा मलमल केसरिया आदि भी प्रदर्शित हैं।

    हस्तलिखित ग्रन्थ

    हस्तलिखित कक्ष में 18वीं-19वीं शताब्दी के सचित्र हस्तलिखित ग्रन्थ- व्रतोत्सव चन्द्रिका, गीता पंचरत्न, गीता सूक्ष्माक्षरी भागवत, भागवत सूक्ष्माक्षरी, कल्पसूत्र, विष्णु सहस्रनाम, कुरानमज़ीद आदि प्रदर्शित की गई हैं। कोटा राज्य का सरस्वती भण्डार पहले इसी संग्रहालय से जुड़ा हुआ था जिसमें 5000 हस्तलिखित ग्रंथ थे। सरस्वती भण्डार के अलग हो जाने के पश्चात् कुछ विशिष्ट हस्तलिखित ग्रंथ ही संग्राललय में रह गए हैं। इनमें से अधिकांश ग्रंथ चित्रित हैं। ये ग्रंथ चित्र तथा चार्ट स्वर्ण अक्षरी, चित्र काव्य, भोजपत्री एवं नक्काशी से अलंकृत हैं।

    चित्रित ग्रंथों में 1190 पृष्ठों की भागवत प्रमुख है जिसमें प्रत्येक पृष्ठ पर लगभग 11 पंक्तियों का लेखन है। ग्रंथ की भाषा संस्कृत एवं लिपि नागरी है। इसका लेखन 18वीं शताब्दी ईस्वी का है। इसका आकार 14 इंच गुणा 6 इंच माप का है। दूसरी महत्वपूर्ण चित्रित पुस्तक भागवत सूक्ष्म-अक्षरी है जिसका आकार 6.9 इंच गुणा 3 इंच है। इसमें सुनहरी रेखांकन का काम है तथा इसमें 18वीं शताब्दी में बने दशावतार के चित्र हैं। यहाँ एक गीता भी सूक्ष्म अक्षरी है जिसमें इतने बारीक अक्षर हैं कि इसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से पढ़ने में भी कठिनाई आती है। इसका आकार साढे़ आठ इंच गुणा साढ़े पांच इंच है।

    एक अन्य गीता सप्त श्लोकी कर्त्तारित अक्षरी है। गीता पंचरत्न नामक ग्रंथ में 236 पृष्ठ एवं 23 चित्र हैं तथा कई जगह अक्षर स्वर्ण में लिखे गए हैं। स्वर्ण अक्षरों से युक्त एक अन्य ग्रंथ में शत्रुशल्यस्तोत्र भी सम्मिलित है। दुर्जनशल्यस्तोत्र काले रंग के पृष्ठ पर सफेद स्याही से लिखा गया है।

    आशीर्वचन तथा सिद्धान्त रहस्य भी प्रमुख ग्रन्थ हैं। अन्य प्रमुख ग्रन्थ हैं- कल्पसूत्र, यक्रसार, वल्लभोत्सव चन्द्रिका, सर्वाेत्तम नवरत्न, पृथ्वीराज-युद्ध, डूंगसिंह की वीरगाथा, अश्व परीक्षा, ज्ञान चौपड़ आदि। उम्मेदसिंह चरित काव्य में कोटा के पुराने इतिहास का उल्लेख है। कुरान मजीद ग्रन्थ का आकार 7 इंच गुणा 4 इंच है। इसमें 764 पृष्ठ हैं। यह अरबी लिपि में लिखा है तथा इसमें सुन्दर कारीगरी का काम है।

    एक चावल पर उत्कीर्ण गायत्री मंत्र भी इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण वस्तु है। इसमें 268 अक्षर हैं। यह उत्कीर्ण चावल 11 सितम्बर 1939 को महाराव उम्मेदसिंह की सालगिरह पर दिल्ली के फतह संग्रहालय द्वारा तैयार कर भेंट किया गया था।

    चित्रशाला कक्ष

    चित्रशाला कक्ष में 10वीं से 19वीं शताब्दी के लघुचित्रों को प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शित लघुचित्रों में कृष्णलीला (नामकरण, कृष्ण लालन, बाल-लीला, माखन चोरी, गौ-चारण, कालियादमन, रासक्रीड़ा, केशि वध, तृणावत वध, बकासुर वध, दावानल पान आदि) से सम्बन्धी चित्र, सांस्कृतिक उत्सवों, होली, गणगौर, घुड़-दौड़, शिकार आदि के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। 18वीं-19वीं सदी के कुछ चित्रों में बहुत ही रोचक चित्रण दर्शाया गया है। एक हाथी ने दूसरे हाथी पर अपना दांत गड़ाकर उसे लहूलुहान कर दिया है। दूसरा भी हार मानने को तेयार नही है। वह झुक कर शत्रु हाथी के पेर में सूंड डालकर पटखनी देने का प्रयास कर रहा है।

    स्वतन्त्रता संग्राम कक्ष

    स्वतन्त्रता संग्राम कक्ष में हाड़ौती क्षेत्र के ई.1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के दो चित्रों का प्रदर्शन किया गया है। ई.1857 से स्वतन्त्रता प्राप्ति तक के संग्राम में अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने वाले कतिपय स्वतन्त्रता सेनानियों का योगदान, उनके छायाचित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय भवन

    संग्रहालय भवन अर्थात् ब्रज विलास भवन राज्य सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है। भवन के कक्षों की जालियाँ, झरोखे, घुमावदार तथा उन पर टिके हुए तिकोन, आयाताकार छज्जे, चौकोर एवं गोलाकार स्तम्भों पर टिकी छज्जों से युक्त छतरियाँ एवं बरामदे आदि स्थापत्य शिल्प उत्तर मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य शैली का सुन्दर नमूना है। रियासती काल में यह भवन अनेक महत्वपूर्ण प्रयोजनों जैसे कोटा राज्य शासकों की अन्य शासकों के साथ गुप्त संधियाँ, मन्त्रणाएं, विभिन्न उत्सवों पर कोटा महाराव द्वारा अपने सगे-सम्बन्धियों, सरदारों, उमरावों आदि को दिए जाने वाले भोज हेतु उपयोग में आता रहा था। इस प्रकार ब्रज विलास संग्रहालय भवन अपने में हाड़ौती अंचल की पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए है।

    बावड़ी

    संग्रहालय परिसर में बनी हुई एक मध्यकालीन बावड़ी भी दर्शनीय है।


  • Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×