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  • अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

     01.07.2018
    अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

    अध्याय - 24 राजकीय संग्रहालय झालावाड़

    हाड़ौती क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए ई.1915 में झालावाड़ राज्य में हाड़ौती क्षेत्र का पहला संग्रहालय स्थापित किया गया। उस समय इसका नाम आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम रखा गया। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा सर भवानीसिंह (ई.1874-1929) की इस संग्रहालय की स्थापना एवं वृद्धि में गहन रुचि रही। उनके संरक्षण में संग्रहालय में हाड़ौती क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से पुरासामग्री, शिलालेख, प्रतिमाएँ, सिक्के, हस्तलिखित ग्रंथ, अस्त्र-शस्त्र, दुर्लभ चित्र तथा हस्तशिल्प का संकलन कर संग्रहालय की श्रीवृद्धि की गई।

    वर्तमान में यह संग्रहालय राजस्थान सरकार के पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग के अधीन कार्य कर रहा है। वर्ष 2011 में इस संग्रहालय को गढ़-पैलेस में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ यह आज भी काम कर रहा है।

    हाड़ौती क्षेत्र में कोटा के आलनिया, गेपरनाथ, दरा, जवाहर सागर बांध, बारां के कन्यादह (कृष्ण विलास), कपिलधारा, बूंदी के गरड़दा, रामेश्वर, भीमलत, देवझर, नलदेह, केवड़िया, धारवा, पलका, सुई का नाका एवं झालावाड़ जिले के कालीसिंध एवं आहू के संगम पर गागरोन दुर्ग, आहू नदी के निकट भीलवाड़ी, आमझीरी नाला आदि क्षेत्रों से प्रस्तर युगीन मानव सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इस सामग्री में से बहुत सी सामग्री राजकीय संग्रहालय कोटा में रखी गई है तथा शेष प्रतिमाएँ, पुरा सामग्री एवं कलाकृतियां झालावाड़ संग्रहालय में छः दीर्घाओं में प्रदर्शित की गई हैं।

    प्रतिमा दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में प्रमुख रूप से हाड़ौती क्षेत्र के ध्वस्त मंदिरों से प्रतिमाएँ लाकर संगृहीत की गई हैं। प्रत्येक कालखण्ड के मूर्तिकारों ने अपने काल को अलग दिखाने के लिए अपनी प्रतिमाओं में कुछ विशिष्ट चिह्न बनाए हैं, जिनके आधार पर प्रतिमाओं के निर्माण काल का अनुमान लगाया जा सकता है। इन प्रतिमाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर बारहवीं शताब्दी ईस्वी तक इस क्षेत्र में मूर्तिकला का निरंतर विकास होता रहा।

    इन प्रतिमाओं में गुप्तकालीन प्रतिमाओं को देवी-देवताओं के शरीर के गठीलेपन के आधार पर पहचाना जाना संभव है। गुप्त काल के बाद की प्रतिमाओं में यह लक्षण शनैःशनैः कम होता चला गया है तथा उनके आभूषणों एवं वस्त्रों का अंकन बढ़ता चला गया है। जहाँ से ये प्रतिमाएँ लाई गई हैं, उन मंदिरों के अवशेष आज भी जंगलों में बिखरे पड़े हैं।

    झलावाड़ संग्रहालय की प्रतिमाएँ भले ही गुप्तकाल के लगभग पांच सौ साल बाद की हैं किंतु इनका वैभव किसी भी प्रकार कम नहीं है। शिल्पकारों ने नृत्यांगनाओं के अंगों की मांसलता, मुखमण्डल की कमनीयता एवं ऐन्द्रिक तृप्ति का भाव दर्शाने में किंचित भी कंजूसी नहीं बरती है। उन्नत उरोज, विशाल आंखें, लम्बी बाहें, पुष्ट जंघाएं एवं रमणभाव से खड़े होने की मुद्रा, दर्शक को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती हैं। दलहनपुर के देवालयों में निर्मित सभामण्डप एवं रंगमण्डप के गोलाकार स्तम्भों पर मूर्तिकला का अद्भुत अंकन किया गया है।

    दलहनपुर एवं सूर्यमंदिर झालरापाटन इस क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्यकला शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं। संग्रहालय में रखी गई अधिकांश प्रतिमाएँ अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में हैं। संग्रहालय के मुख्य हॉल एवं बरामदे में काकूनी, अटरू, विलास, रामगढ़, बारां आदि स्थालों से लाई गई प्रतिमाएँ प्रमुखता से प्रदर्शित हैं जो 6ठी से 18वीं सदी की हैं। इनमें अर्द्धनारीश्वर, नरवाराह, चामुण्डा, चक्रपुरुष, लकुलीश, सूर्य, बटुक भैरव, सुर-सुंदरी आदि महत्वपूर्ण हैं। हाड़ौती क्षेत्र से वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर, बौद्ध और जैन आदि विभिन्न सम्प्रदायों की प्रतिमाएँ उपलब्ध हुई हैं जिन्हें इस संग्रहालय में एक साथ देखा जा सकता है।

    वैष्णव प्रतिमाओं में चन्द्रभागा से प्राप्त 9वीं शताब्दी के वैकुष्ठ विष्णु (त्रिमुखी विष्णु), 10वीं शताब्दी की नरवराह प्रतिमा, बड़ी कलमण्डी (तहसील-पाटन) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की महावराह प्रतिमा, शंखोधरा पाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वामनावतार प्रतिमा, देवगढ़ (डग) से प्राप्त 10वीं शताब्दी की शेषशायी विष्णु प्रतिमा, बिन्जोरी (तहसील-पाटन) से प्राप्त बालमुकुन्द आदि प्रस्तर प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं।

    सूर्यमंदिर झलारापाटन से प्राप्त एक नृत्यांगना की प्रतिमा भी 10वीं शताब्दी ईस्वी की है, जिसे इस संग्रहालय में स्थान दिया गया है। कृष्ण बाललीला फलक रंगपाटन झालावाड़ से प्राप्त हुआ था। यह भी 10वीं शर्ती ईस्वी का है। इसमें नदी के दोनों ओर भारतीय जनजीवन की झांकी का चित्रण है। नदी में मछली एवं अन्य जलचर दिखाए गए हैं।

    फलक के ऊपरी भाग में एक परिवार में स्त्री-पुरुष एवं तीन बच्चे दिखाए गए हैं। एक बच्चा स्त्री की गोद में बैठा है। फलक के बाएं हिस्से में ऊपर की ओर श्रीकृष्ण, शकटासुर का वध कर रहे हैं। पूतनावध एवं दधिमंथन के दृष्य भी अंकित हैं। महिलाओं के सिर पर आकर्षक जूड़ा बंधा हुआ है। नीचे की ओर माता यशोदा एवं बालकृष्ण का अंकन है। इनके नीचे शंख, कच्छप एवं निधियां अंकित हैं।

    10वीं शताब्दी ईस्वी की चतुर्मुखी ब्रह्मा की प्रतिमा लाल पत्थर से निर्मित है। इस प्रतिमा के चारों हाथ खण्डित हैं। मुख पर दाढ़ी का अंकन है, उदर भाग उभरा हुआ तथा कटि मेखला के ऊपर लटका हुआ है। ब्रह्मा के कानों में कुण्डल, गले में माला तथा भुजाओं में बाजूबंद हैं। दोनों ओर परिचारक एवं परिचारिकाएं अंकित हैं। एक प्रस्तर फलक में केशी वध का अंकन किया गया है। भवानीमण्डी के निकट खोड़ से प्राप्त यह प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है। इस प्रतिमा में भगवान श्रीकृष्ण केशी नामक राक्षस का वध करते हुए दिखाए गए हैं।

    चतुर्भुज कृष्ण का दक्षिण ऊर्ध्वहस्त प्रहार करने की मुद्रा में है एवं दक्षिण निम्नहस्त में खड्ग का अंकन है। वाम ऊर्ध्वहस्त में चक्र का अंकन किया गया है जबकि वाम निम्नहस्त से भगवान, केशी के बल का प्रतिरोध कर रहे हैं। एक प्रस्तर फलक में संगीत एवं नृत्य की सभा का अंकन किया गया है। मध्यकालीन मंदिरों में रंगमण्डपों का निर्माण आवश्यक रूप से होता था जिनमें इस प्रकार की संगीत एवं नृत्यसभाओं का अंकन किया जाता था। झालावाड़ संग्रहालय में प्रदर्शित फलक 10वीं शताब्दी ईस्वी का है तथा इसे बारां जिले के काकूनी क्षेत्र से प्राप्त किया गया है। इसमें एक पुरुष वादक के हाथ में ढोलक, दूसरे के हाथ में मंझीरा बजाते हुए दर्शाया गया है। बीच में एक नर्तकी कत्थक नृत्य की मुद्रा में है। वादकों एवं नृतकी के पैर नृत्य की मुद्रा में हैं। उनकी शारीरिक रचना सुडौल है तथा सभी कलाकार युवावस्था में हैं।

    कमलासन पर विराजमान सूर्य की 10-11वीं शताब्दी ईस्वी की एक प्रतिमा रंगपाटन से प्राप्त हुई है। सूर्य के दोनों हाथों में कमल दल हैं। सूर्य के पैरों में बूट हैं तथा शरीर पर कवच धारण कर रखा है जिनसे यह सिद्ध होता है कि इस प्रतिमा पर पारसियों की मूर्ति कला का प्रभाव है। सूर्यदेव ने अपने गले में वनमाला धारण कर रखी है। कुबेर की प्रतिमा 10-11वीं शती ईस्वी की है। यह काकूनी से प्राप्त हुई थी जो अब बारां जिले में है तथा झालावाड़ जिले की सीमा पर बहने वाली नदी के तट पर स्थित है। कुबेर ललितासन मुद्रा में हैं तथा उसके दाएं हाथ में धन की थैली है। दाईं ओर चंवरधारिणी का अंजलिबद्ध मुद्रा में सुंदर अंकन है। शैव प्रतिमाओं में चन्द्रभागा (पाटन) से प्राप्त 8वीं शताब्दी की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा, 9वीं शताब्दी की नटराज प्रतिमा, 10वीं शतब्दी का त्रिमुखी शिव, उमामहेश्वर प्रतिमा, रंगपाटन से प्राप्त 11वीं शताब्दी की अन्धकासुरवध प्रतिमा, डग से प्राप्त लकुलीश प्रतिमा, शंखोधरा से प्राप्त 10-11वीं शताब्दी की भैरव एवं गणेश प्रतिमाएँ आदि प्रदर्शित हैं।

    चंद्रावती से प्राप्त 8वीं शताब्दी की अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा चतुर्भुजी है जिसमें दायीं तरफ शिव विराजमान हैं। उनका दायां मुख्य हाथ नंदी के ऊपर रखा हुआ है, इस हाथ में कड़ा धारण किया हुआ है तथा ऊपरी दायें हाथ में त्रिशूल धारण किया हुआ है। त्रिशूल के पीछे सर्प का सुंदर अंकन है। बायीं ओर के हिस्से में पार्वती उत्कीर्ण हैं। उनका बायां ऊपरी हाथ खण्डित है तथा नीचे के हाथ में चूड़ियां धारण की हुई हैं। पुरुष भाग में ऊर्ध्व रेतस एवं स्त्री भाग में योनी का अंकन किया गया है।

    चंद्रभागा एवं कालीसिंध के संगम पर गोविंदपुरा नामक स्थान से 8वीं शती ईस्वी की लकुलीश की एक प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा मुकुटाकृति (शुकनास) गवाक्ष में पद्मासन में विराजमान है। प्रतिमा के दो हाथ हैं जिनमें से दायां हाथ अभय मुद्रा में है तथा बायें हाथ में लकुटी है। लकुलीश को ऊर्ध्व-रेत्स अवस्था में उत्कीर्ण किया गया है। लकुलीश के दोनों ओर लंगोटधारी परिचारकों का अंकन है। दायें हाथ की तरफ वाले साधु के सिर पर बालों का अंकन कोटा संग्रहालय के झल्लरीवादकों के सिर के बालों जैसा है। लकुलीश की यह प्रतिमा ठीक वैसी ही है जैसी कि इस श्लोक में वर्णित है-

    लकुलीश ऊर्ध्वमेढ पद्मासन सुंस्थितम्।

    दक्षिणे मातुलिंग च वामे च दण्डप्रकीर्तितम्।।


    नृत्यरत अष्टभुजी शिव का भी एक फलक दर्शनीय है। यह भी 10वीं शताब्दी ईस्वी का है तथा शिव के हाथ एवं पैर नृत्य की मुद्रा में हैं। दोनों ऊर्ध्व भुजाओं में सर्प लिपटा हुआ है। दाएं मध्य हस्त में बाण, दाएं अधोहस्त में त्रिशूल है, बाएं मध्य हस्त में धनुष, बाएं अधोहस्त में खट्वांग धारण कर रखा है। प्रतिमा के दोनों ओर आयताकार पुष्प एवं व्यालों का अंकन है। 10वीं शती की कल्याण सुंदर प्रतिमा भी लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित है।

    इस प्रतिमा में भगवान शिव एवं पार्वती के विवाह का दृश्य अंकित है। भगवान शिव, अपने वाम भाग में खड़ी पार्वती का वरण कर रहे हैं। चतुर्बाहु शिव विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित हैं। पार्वती के नेत्र धरती की तरफ झुके हुए हैं। उनके मुख पर नववधू का संकोच दिखाई दे रहा है। शिव दाएं ऊर्ध्व हस्त में त्रिशूल धारण किए हुए हैं तथा दूसरे हाथ से पार्वती की हथेली पकड़े हुए हैं। उनके बाएं ऊर्ध्व हस्त में नाग है तथा बाईं तरफ का दूसरा हाथ पार्वती के कंधे पर है। गोलाकार स्तम्भों के बीच शिव एवं पार्वती को प्रभामण्डल से सम्पन्न दर्शाया गया है। आसपास परिचारिकाएं एवं शार्दूल का अंकन है।

    10वीं शताब्दी ईस्वी की अंधकासुर वध की प्रतिमा रंगपाटन झालावाड़ से प्राप्त की गई थी। यह भी लाल बलुआ पत्थर की है। इस प्रतिमा में छः भुजाओं वाले शिव द्वारा अंधकासुर के वध करने का दृश्य अंकित किया गया है। दोनों तरफ के ऊर्ध्वहस्तों में भगवान ने सर्प धारण कर रखे हैं। दाएं मध्यहस्त में डमरू तथा दाएं अधोहस्त में खड्ग है। बाएं ऊर्ध्वहस्त में ढाल है। शिव ने अंधकासुर को त्रिशूल से बेधकर ऊपर उठा रखा है। शिव का बायां पैर एक अन्य राक्षस की पीठ पर रखा है।

    एक योगिनी, अंधक का रक्तपान कर रही है। प्रतिमा में दोनों ओर त्रिभंग मुद्रा में सेवक-सेविकाओं एवं शार्दूल का अंकन किया गया है। शाक्त प्रतिमाओं में 8वीं शताब्दी की चन्द्रभागा (पाटन) से प्राप्त चामुण्डा प्रतिमा, पाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वाराही प्रतिमा, झूमकी (पाटन) से प्राप्त 11वीं शताब्दी की महिषासरमर्दिनी आदि महत्त्वपूर्ण प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं।

    स्थानक सुंदरी की प्रतिमा 9वीं शताब्दी ईस्वी की है। इसे झालरापाटन में बहने वाली चन्द्रभागा नदी के किनारे से प्राप्त किया गया था। संयुक्त देव प्रतिमाओं में रंगपाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की मार्तण्ड-भैरव, चन्द्रभागा से प्राप्त पूर्व मध्यकालीन सूर्य-नारायण प्रतिमा, चन्द्रभागा से ही प्राप्त 10वीं शताब्दी की हरिहर प्रतिमा, पितामहमार्तण्ड प्रतिमा, काकूनी, रंगपाटन आदि स्थलों से प्राप्त संयुक्त देव प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। हरिहर की प्रतिमा 10वीं शताब्दी ईस्वी की है तथा बारां जिले के काकूनी से प्राप्त की गई है।

    इस चतुर्भुजी प्रतिमा के आधे दक्षिण भाग में शिव एवं वाम भाग में विष्णु का अंकन है। दक्षिण ऊर्ध्वहस्त में त्रिशूल एवं अधोहस्त में पुष्प है। वाम ऊर्ध्वहस्त में चक्र एवं अधोहस्त में शंख है। देव प्रतिमा विभिन्न आभूषणों से अलंकृत है। शिव की तरफ वाले भाग में नीचे की तरफ नंदी का अंकन है। दोनों ओर तीन-तीन परिचारक खड़े हुए हैं।

    जैन प्रतिमाओं में तीर्थंकर अजितनाथ की 9वीं शती इस्वी की प्रतिमा बलुआ लाल पत्थर की है। अजितनाथ को कायोत्सर्ग मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। सुसज्जित परिकर के ऊपरी भाग में घटाभिषेक का दृश्य अंकित है। दोनों ओर रथिका में एक-एक तीर्थंकर को पद्मासन में बैठे हुए दर्शाया गया है। पाद पीठ पर अजितनाथ के चिह्न के रूप में हाथी का अंकन है।

    झालरापाटन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की सर्वतोभद्र प्रतिमा, रतनपुरा से प्राप्त 10वीं शताब्दी की अजितनाथ प्रतिमा, गागरोन से प्राप्त 10वीं शताब्दी की वृषभनाथ प्रतिमा, काकूनी से प्राप्त चक्रेश्वर प्रतिमा, पंचपहाड़ से प्राप्त 16वीं शताब्दी की वासुपूज्य प्रतिमा, पार्श्व नाथ आदि प्रतिमाएँ प्रदर्शित हैं। कोटा-झालावाड़ क्षेत्र में बौद्धों की हीनयान शाखा का प्रभाव रहा है। यहाँ बौद्धों के कुछ आश्रम एवं उपाश्रय स्थित थे। इसलिए इस क्षेत्र से कतिपय बौद्ध मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। 10वीं शती ईस्वी के एक प्रस्तर फलक में शिल्पकार द्वारा गुरुकुल आश्रम में दो बौद्ध गुरुओं एवं दो शिष्यों का अंकन किया गया है। दोनों साधुओं के बीच में खड़े बालक के सिर पर बालों का अंकन राजकुमार सिद्धार्थ के सिर के बालों जैसा है। राजकुमार सिद्धार्थ को गुरुओं के उपदेशों को ध्यानमग्न होकर सुनते हुए प्रदर्शितत किया गया है। इन प्रतिमाओं पर गांधार, यूनानी एवं ईरानी मूर्तिकला का मिश्रण का प्रभाव परिलक्षित होता है।

    शिलालेख दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में पहली शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर 19वीं शताब्दी इस्वी तक की अवधि के कई प्राचीन शिलालेख प्रदर्शित किए गए हैं। कालाजी (जिला बारां) से प्राप्त कुई का अभिलेख प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व का है। बारां से प्राप्त तीसरी शताब्दी ईस्वी का लेख ब्राह्मी लिपि में है। गंगधार नरेश नरवर्मन के पुत्र विश्ववर्मन का ई.423 का शिलालेख उल्लेखनीय है, इसमें विष्णु के आयुध तथा भेदभाव का उल्लेख किया गया है। इस शिलालेख से ज्ञात होता है कि परम वैष्णवसचिव मयूराक्ष ने तांत्रिक दर्शन के अन्तर्गत मातृकाओं के पवित्र स्थान का भी निर्माण करवाया था। वैष्णव मतावलम्बी द्वारा तांत्रिक शैली के देवस्थान का निर्माण किया जाना उस युग के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है।

    चन्द्रावती (झालरापाटन) के चंद्रमौलेश्वर मंदिर का ई.689 का शिलालेख तथा यहीं से प्राप्त वि.स. 746 का राजा दुर्गमण का शिलालेख भी प्रदर्शित किए गए हैं। कंसुआ (जिला कोटा) के शिवमंदिर से प्राप्त 8वीं शताब्दी का शिलालेख, शेरगढ़ (जिला बारां) का 9वीं शताब्दी का बौद्ध परम्परा का शिलालेख भी उल्लेखनीय हैं। मगननाथ की डूंगरी (झालरापाटन) से प्राप्त उदयादित्य का ई.1086 का शिलालेख भी प्रदर्शित किया गया है। तुलसीराम के कुण्ड (झालरापाटन) से प्राप्त वि.स. 1193 का लेख भी महत्वपूर्ण है।

    रामगढ़, किशनगढ़, बारां से ई.1162-75 के शिलालेख, बड़वा, अंता तथा मध्यकालीन इतिहास के अनेक शिलालेख प्रदर्शित हैं। ग्राम बेड़ला (गंगधार) से प्राप्त वि.स. 1687 का झाला दयालदास का शिलालेख तथा झालरापाटन से प्राप्त वि.सं. 1853 का झाला जालिम सिंह का अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए हैं।

    ई.1796 में कोटा राज्य के सेनापति झाला जालिमसिंह ने चंद्रावती नगर के ध्वंसावशेषों से लगभग पौन किलोमीटर उत्तर में झालरापाटन नगर की स्थापना की। इस नवीन नगर में प्राचीन चंद्रावती नगर के ध्वस्त अवशेषों की सामग्री काम में ली गई। जालिमसिंह ने झालरापाटन नगर के मध्य में एक पत्थर लगावाया जिस पर राजकीय घोषणा अंकित करवाई कि जो व्यक्ति इस नगर में आकर रहेगा उससे चुंगी नहीं ली जाएगी तथा यदि उसे राज्य की तरफ से अर्थ-दण्ड दिया गया है तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा। इस घोषणा ने मारवाड़ तथा हाड़ौती क्षेत्र के व्यापारियों को तेजी से आकर्षित किया जिससे झालरापाटन एक समृद्ध नगर बन गया। ई.1850 में राजा पृथ्वीसिंह के कामदार ने यह पत्थर झील में फैंक दिया तथा ई.1796 की घोषणा को वापस ले लिया। ई.1876 में यह पत्थर पुनः झील से बाहर निकाला गया। अब यह पत्थर झालावाड़ संग्रहालय में रखा हुआ है। यह 9 फुट लम्बा और डेढ़ फुट चौड़ा है।

    मुद्रा दीर्घा

    प्राचीन चिह्नित (आहत) मुद्राएं, कुषाण सिक्के, सातवाहन सिक्के, गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं, इण्डोससेनियन (गधैया सिक्के), कोटा-बूंदी-झालावाड़ रियासतों की मुद्राएं, इण्डोग्रीक एवं इण्डोनेशिया की रजत एवं ताम्र मुद्राएं इस संग्रहालय की अनुपम धरोहर हैं। मुद्राओं के साथ उनका संक्षिप्त विवरण भी लिखा गया है। पंचमार्क अथवा आहत मुद्राएं ई.पू.600 से ई.पू.200 तक की हैं। इनके अग्रभाग पर सूर्य, षडचक्र, तीन शिवलिंग, बच्चे के साथ खरगोश, कुत्ता, सात पत्तियों के झाड़ वाला गमला आदि बने हुए हैं।

    समुद्रगुप्त का चौथी शताब्दी ईस्वी का सिक्का ध्वज प्रकार का है जिसके अग्रभाग पर सम्राट की प्रतिमा उत्कीर्ण है। सम्राट सीधा खड़ा हुआ है तथा उसने बाएं हाथ को ऊपर उठाकर उसमें ध्वज धारण किया हुआ है। सम्राट का दायां हाथ हवन वेदिका में आहुति देते हुए दिखाया गया है। सम्राट के सामने की ओर विजय-ध्वज अंकित है जिस पर शक्ति एवं गति का प्रतीक गरुड़ विराजमान है। सिक्के के उसी भाग में ब्राह्मी लिपि में ‘समरशतवितत विजयो जित रिपुरजितो दिवं जयति’ अर्थात् सर्वत्र विजयी सम्राट जिसने सैंकड़ों युद्धों में विजय प्रात कर शत्रु को पराजित किया है, स्वर्गश्री की प्राप्ति करता है, अंकित है। सिक्के के पृष्ठभाग पर देवी लक्ष्मी की प्रतिमा उत्कीर्ण है। लक्ष्मी सिंहासन पर आरूढ़ हैं तथा उनके सिर के पीछे प्रभामण्डल का अंकन किया गया है। सिक्के के इसी भाग पर ब्राह्मी लिपि में पराक्रमः अंकित किया गया है। देवी के बाएं हाथ में कॉर्नुफोनिया एवं दाएं हाथ में पाश है।

    झालावाड़ रियासत का सिक्का चांदी से निर्मित है। इस पर दोनों ओर अरबी लिपि में लेख अंकित है। अग्रभाग पर ‘मल्लिकाह मुआज्जमा विक्टोरिया सल्तनत इंग्लिस्तान’ अंकित है। पृष्ठभाग पर ‘मानूस मैमनत सनह् 39 जुलूस जरब झालावाड़’ लिखा गया है। इस सिक्के का वजन 11.29 ग्राम है।

    लघुचित्र एवं चित्रित ग्रंथ दीर्घा

    इस संग्रहालय में 18-19वीं शती के हस्तलिखित ताड़पत्र एवं दुर्लभ ग्रंथ प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें भागवत, औतारचरित, भाषा चरित्र, नहरदान, भारट द्वारा लिखित चित्रग्रंथ प्रमुख हैं। पुरुषोत्तम महाकाव्य, ताड़ के पत्ते पर लिखित वर्णन आदि प्रमुख हैं। शालीहोत्र चित्रित ग्रंथ अश्वचिकित्सा से सम्बन्धित है। चित्रित अरब शाहनामा तथा कुरान भी प्रदर्शित हैं। हस्तलिखित चित्रित ग्रंथों में श्लोकों का चित्रानुवाद दिया गया है। चित्रों में हाथों से रंग भरे गए हैं। अधिकांश चित्रों के रंग आज भी अच्छी अवस्था में हैं। लघुचित्र कला दीर्घा में वेद एवं देवचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

    चित्रवीथी में नायक-नायिका, बाहरमासा, विष्णु के दशावतार, विष्णु के चौबीस स्वरूप, कृष्ण लीला, लोकजीवन के प्रसंग भी प्रदर्शित हैं। कुछ चित्र जयपुर, बूंदी एवं किशनगढ़ शैली के हैं। एक चित्र में दो वृक्षों के मध्य छाया में चतुर्बाहु श्रीकृष्ण को शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए हुए दिखाया गया है। भगवान के सम्मुख गौएं अपने बछड़ों के साथ खड़ी हैं। गौधन के पीछे ग्वालवृंद भी भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में अंकित हैं। भगवान के पीछे की ओर सेविकाएं मोरपंखी, चंवर आदि लिए खड़ी हैं। नदी में मछली, कमल, बत्तख, नाव तथा पक्षियों का अंकन किया गया है। इसे भगवान के संकर्षण स्वरूप का चित्र कहा जाता है। झालवाड़ संग्रहालय में कांच एवं कपड़े पर बने चित्र भी संकलित हैं।

    हस्त-शिल्प दीर्घा

    झालावाड़ संग्रहालय में 19वीं-20वीं शती की हस्तशिल्प सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। संगमरमर के पत्थर पर कलात्मक कामसूत्र विषयक कलाकृतियां, हाथी, घोड़ा, देवी दुर्गा की प्रतिमा, हाथी दांत से बना पंखा, दूरबीन, चाकू, सलाइयां आदि प्रदर्शित हैं। एक कलात्मक ग्लोब में दीपक और भारत का नक्शा अंकित हैं। एक रैक में विभिन्न आकृतियों के सीप प्रदर्शित किए गए हैं। 19वीं शताब्दी में निर्मित रेशम का एक रूमाल भी संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

    संग्रहालय में 10वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी की लकड़ी की एक मुड़ी हुई छड़ी रखी है जो गोल्फ अथवा हॉकी जैसा कोई खेल खेलने के काम आती रही होगी। यह 101 सेंटीमीटर लम्बी तथा 10 सेंटीमीटर मोटी है। रेशम एवं मखमल के कपड़े से 18-19वीं शताब्दी में बनी एक पगड़ी भी प्रदर्शित है। अस्त्र-शस्त्र दीर्घा अस्त्र-शस्त्र दीर्घा में मध्ययुगीन हथियारों से लेकर 19वीं शती तक के अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शित हैं। इनमें प्रथम महायुद्ध के दौरान काम में ली गई रिवॉल्वर उल्लेखनीय है।

    इसके अतिरिक्त तलवारें, ढालें एवं तीर-कमान आदि भी विषयवार प्रदर्शित हैं। विभिन्न आकृति की छुरियां एवं विभिन्न धातुओं से बने तलवारों के दस्ते भी दर्शनीय हैं। कुछ तलवारों पर मध्यकालीन अरबी लिपि में लिखावट की गई है तथा सोने एवं चांदी की कारीगरी की गई है। कलात्मक ढालों पर तहनिशां एवं जरनिशा का काम किया गया है।


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