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  • अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़

     27.06.2018
    अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़

    अध्याय - 20 राजकीय संग्रहालय चित्तौड़गढ़


    चित्तौड़गढ़ संग्रहालय की स्थापना राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा ई.1968 में चित्तौड़ दुर्ग में स्थित फतह प्रकाश महल में की गई। इस भवन का निर्माण महाराणा फतहसिंह (ई.1884-1930) द्वारा दुर्ग के मध्य भाग में करवाया गया। इस भवन के प्रांगण में बने कुण्ड में संगमरमर के कमलपुष्प पर महाराणा की प्रतिमा प्रदर्शित है।

    यह आयताकार भवन दो-मंजिला है तथा इसके चारों कोनों पर गुम्बज बनी हुई हैं जो 6-7 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देती हैं। गुम्बज पर सुवर्ण कलश अलंकृत हैं। महल के ऊपर की मंजिल में एक बड़ा हॉल बना हुआ है जिसमें रंगीन कांच की नक्काशी करके विभिन्न प्रकार के बेल-बूटे एवं पशु-पक्षियों की आकृतियां बनाई गई हैं। ऊपर की मंजिल में लकड़ी युक्त खिड़कियां, इस प्रकार बनाई गई हैं कि अन्दर की तरफ से व्यक्ति बाहर का दृश्य देख सके परन्तु बाहर खड़े व्यक्ति को अन्दर का दृश्य दिखाई न दे।

    महल का प्रवेश-द्वार उत्तर दिशा की ओर खुलता है जिसमें प्रवेश करते ही गणपति की भव्य प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इस संग्रहालय में 640 पाषाण प्रतिमाएं, 18 धातु प्रतिमाएं, 256 धातु कलाकृतियाँ एवं आभूषण, 85 मृण्मय सामग्री, 35 काष्ठ-कलाकृतियां, 100 लघुचित्र, 20 तैलचित्र, 2,060 सिक्के और 307 अन्य वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।

    पुरातत्व कक्ष

    इस कक्ष में पूर्व-पाषाण-कालीन उपकरण एवं नगरी से प्राप्त कुषाण-कालीन मृण्मय सामग्री प्रदर्शित की गई है, जिन पर विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी एवं पुष्पाकृतियां बनी हुई हैं। मोलेला (उदयपुर) के कुंभकारों द्वारा निर्मित देवी-देवताओं की आधुनिक मृण्मूर्तियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इनमें भैरव, काली, दुर्गा, चामुण्डा, नागदेव आदि प्रमुख हैं।

    प्रतिमा कक्ष

    प्रतिमा कक्ष में संजोए गए संग्रह में गुप्तकाल से लेकर आधुनिक काल तक की प्रतिमाओं को स्थान दिया गया है। अधिकांश प्रतिमाएं चित्तौड़ दुर्ग से प्राप्त हुई हैं। प्रतापगढ़, पानगढ, राश्मी (चित्तौड़गढ़) जहाजपुर, मेजाबांध (भीलवाड़ा) आदि स्थानों से प्राप्त प्रतिमाएं भी प्रदर्शित की गई हैं। यहाँ के संग्रह में केन्द्रीय पुरातत्व से प्राप्त अश्ववाहिनी देवी मध्योत्तर काल एवं जहाजपुर से प्राप्त गोधासन गौरी की श्वेत एवं कृष्ण की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। धातु प्रतिमाओं में विष्णु, वेणु-गोपाल एवं नन्दी की प्रतिमाएं महत्वपूर्ण हैं जो जिलाधीश कार्यालय चित्तौड़ से प्राप्त हुई हैं। एक प्रतिमा में भगवान विष्णु को चौकी पर विराजमान मुद्रा में दर्शाया गया है।

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष

    अस्त्र-शस्त्र कक्ष में मध्यकालीन हथियारों का संग्रह है जिनमें जिरहबख्तर, शिरस्त्राण, ढालें, तलवारें, बन्दूकें और कटारें मुख्य हैं। इस कक्ष की अधिकांश सामग्री उदयपुर संग्रहालय से तथा कुछ सामग्री जयपुर संग्रहालय से प्राप्त हुई है। जहांगीर कालीन चमड़े का कवच तथा बस्सी (चित्तौड़) से प्राप्त दस्ताने उल्लेखनीय हैं। यहाँ प्रदर्शित बन्दूकों की अधिकतम लम्बाई सात से आठ फुट तक है। ये बन्दूकें ऊँट पर बैठकर बारूद दागने के काम आती थीं।

    पेन्टिंग कक्ष

    पेन्टिंग कक्ष में मेवाड़ के महाराणाओं के मनुष्याकार तैलचित्र प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें बप्पा रावल, कुम्भा, सांगा, उदयसिंह, प्रतापसिंह, फतहसिंह एवं भूपालसिंह के चित्र महत्वपूर्ण हैं। पन्नाधाय का तैलचित्र भी प्रदर्शित किया गया है। अधिकांश चित्र विभागीय कलाकार मोहन लाल शर्मा द्वारा तैयार किए गए हैं। लघु चित्रों में उदयपुर संग्रहालय से प्राप्त 18वीं सदी के योगवशिष्ट, नैषध, मेवाड़ शैली के गोकुलचन्द के चित्र एवं भदेसर (चित्तौड़गढ़) से प्राप्त आधुनिक शैली के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

    आदिवासी दीर्घा

    चित्तौड़ संग्रहालय में आदिवासी युगल भील óी-पुरुष तथा गाड़िया लोहार के प्लास्टर निर्मित मॉडल प्रदर्शित हैं। मेवाड़ से इन जातियों का विशेष सम्बन्ध था। राणा प्रताप की सेना में आदिवासी वीरों ने महत्वपूर्ण योगदान किया।

    दरबार हॉल

    स्वतंत्रता प्राप्ति की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर सितम्बर 1997 में संग्रहालय भवन के ऊपर की मंजिल दरबार-हॉल में ‘मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर’ प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसे बाद में स्थाई कर दिया गया।

    मीरांबाई के चित्र

    संग्रहालय के एक कक्ष में भक्त शिरोमणि महारानी मीरां से सम्बन्धित चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं जो मीरां समिति चित्तौड़गढ़ की ओर से वर्ष 1981 में संग्रहालय को भेंट स्वरूप प्राप्त हुए थे।

    काष्ठ कलाकृतियाँ

    संग्रहालय के एक कक्ष में बस्सी (चित्तौड़गढ़) में निर्मित काष्ठ कलाकृतियों के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं जिनमें ईसर, गणगौर, रासलीला दृश्य आदि महत्वपूर्ण हैं।

    सिक्के

    यहाँ के संग्रह में चित्तौड़गढ़ एवं भीलवाड़ा जिले से प्राप्त ताम्बे एवं चांदी के कुछ सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं जो मुगलकाल से लेकर आधुनिक काल तक के हैं। सोने का एक मुगलकालीन सिक्का ग्राम शंभूगढ़ (भीलवाड़ा) से प्राप्त हुआ है जिसके एक तरफ बादशाह शब्द स्पष्ट पढ़ने में आता है। इस संग्रहालय को देखने के लिए प्रतिवर्ष 1 से 2 लाख पर्यटक एवं शोधार्थी आते हैं।


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