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  • अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)

     01.07.2018
    अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)

    अध्याय - 25 केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर (अल्बर्ट हॉल)


    केन्द्रीय संग्रहालय जयपुर को अल्बर्ट म्यूजियम भी कहा जाता है। संग्रहालय भवन का शिलान्यास ब्रिटिश राजकुमार प्रिन्स ऑफ वेल्स प्रिंस अल्बर्ट द्वारा जयपुर नरेश रामसिंह (द्वितीय) के शासनकाल में 6 फरवरी 1876 को किया गया। उसी के नाम से इस संग्रहालय का नाम एल्बर्ट म्यूजियम रखा गया।

    इस संग्रहालय का कला संग्रह ई.1881 में अस्थायी रूप से किशनपोल बाजार में स्थित वर्तमान स्कूल ऑफ आटर््स के भवन में रखा गया। संग्रहालय हेतु पुरा एवं कला सामग्री का संकलन जयपुर राज्य के अंग्रेज चिकित्सा अधिकारी कर्नल हैण्डले की देख-रेख में आरम्भ हुआ जो कला विशेषज्ञ भी था। अल्बर्ट हॉल भवन का निर्माण अंग्रेज इन्जीनियर सर सैम्युअल स्विंटन जैकब की देखरेख में जयपुर के राजमिóियों चन्दर और तारा ने किया। स्थापत्य की दृष्टि से यह भवन महत्वपूर्ण है। इसमें हिन्दू, इस्लामी और ईसाई स्थापत्य शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है। भवन निर्माण में पांच लाख एक हजार छत्तीस रुपये व्यय हुए।

    महाराजा माधोसिंह (द्वितीय) (ई.1880-1922) के शासनकाल में ई.1886 में संग्रहालय, अल्बर्ट हॉल में स्थानान्तरित कर दिया गया। ई.1887 में सर एडवर्ड ब्रेडफोर्ड ने इसका विधिवत उद्घाटन किया। अल्बर्ट म्यूजियम को शैक्षणिक संस्था का रूप दिया गया। इसमें इतिहास, भू-गर्भ 
    शास्त्र, अर्थ शास्त्र, विज्ञान और कला आदि विषयों पर आधारित सामग्री भारत, ब्रिटेन, ईरान, मिश्र, बर्मा, लंका, जापान, तिब्बत, नेपाल आदि देशों से एकत्रित की गई।

    कर्नल हैण्डले के पश्चात् कर्नल पैक, रॉबिन्सन पिशर आदि चिकित्सा अधिकारी इस संग्रहालय के अधिष्ठाता रहे किंतु वे संग्रहालय विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं रख्ते थे। कर्नल हैण्डले ने इस संग्रहालय में जिस सामग्री का संयोजन किया, वही संयोजन देश की आजादी तक चलता रहा। डॉक्टर दलजन सिंह प्रथम भारतीय अधिकारी थे जो 1920 के लगभग इस पद पर रहे। राजस्थान के एकीकरण के पश्चात् ई.1950 में डॉ. सत्यप्रकाश श्रीवास्तव के नेतृत्व में राजस्थान राज्य के सभी संग्रहालयों को रखा गया। उसी समय अल्बर्ट म्यूजियम को राज्य स्तरीय केन्द्रीय संग्रहालय का रूप दिया गया।

    देशी राज्यों में संग्रहालयों की छवि अजायबघर वाली थी। स्वतंत्र भारत में उस छवि को मिटाकर इन्हें शैक्षणिक संस्थाओं का स्वरूप प्रदान किया गया तथा राज्य के संग्रहालयों को शिक्षा विभाग के अधीन किया गया। संग्रहालयों के पुनर्गठन, परिवर्तन और साज सज्जा सम्बन्धी महत्वपूर्ण कार्य किए गए तथा संगृहीत सामग्री का विधिवित वर्गीकरण किया गया।

    ई.1959 में राज्य के संग्रहालय विभाग के अधिकारी डा. सत्य प्रकाश जनसामान्य को संग्रहालयों की ओर आकृष्ट करने हेतु अमेरिका से नवीन दृष्टिकोण लेकर आए। उनके निर्देशन में संग्रहालय में राजस्थान की विभिन्न जातियों एवं जनजातियों के मॉडल प्रदर्शित किए गए। इनमें राजपूत, मीणा, वणिक, भील, गाड़िया लुहार आदि जातियों के व्यक्तियों की रूपाकृति, वेशभूषा, आभूषण, उनके परिवेश आदि का प्रदर्शन किया गया तथा उन्हें आधुनिक प्रकार के ‘शोकेस’ में रखा गया। देश में पहली बार जयपुर संग्रहालय में सांस्कृतिक कक्ष का निर्माण किया गया जिसमें विभिन्न प्रकार के शासकीय और लोक वाद्यों का प्रदर्शन किया गया। साथ ही होली, गणगौर तथा विवाह आदि के अवसर पर किए जाने वाले नृत्य तथा कत्थक आदि शास्त्रीय नृत्य एवं घूमर तथा डांडिया आदि लोक नृत्यों के दृश्य एवं ‘मॉडल’ प्रदर्शित किए गए। दर्शकों को नृत्यों से सम्बन्धित गीत एवं संगीत सुनाने के लिए स्वचालित ध्वनियंत्र लगाए गए। यह प्रयोग अपने आप में अनूठा था तथा उस समय तक किसी अन्य संग्रहालय में उपलब्ध नहीं था।

    ‘मॉडलों’ के माध्यम से देशी-विदेशी पर्यटक राजस्थान की जनजातियों तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त करने लगे। संग्रहालय में राजस्थान की हस्तकलाओं, पत्थर की कुराई, सोने एवं मीना का काम, हाथी दांत की कुराई, सुनहरी बर्तन, ऊँट के चमड़े के बर्तनों पर सुनहरी काम, पीतल की चिताई, थलाई एवं कुराई का काम, प्राचीन प्रतिमाओं, आयुधों एवं प्राचीन चित्रों के क्रमिक विकास को भी प्रदर्शित किया गया। प्रकाश व्यवस्था और शो केसों के नवीनीकरण एवं लेबलिंग की नवीन पद्धतियां प्रयोग में लाई गईं।

    संग्रहालय में अस्थाई प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाने लगीं जिनसे देशी-विदेशी पर्यटकों को राजस्थान के कला-कौशल के बारे में जानने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, उप राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, इन्दिरा गांधी, अरब के राष्ट्रपति कर्नल नासिर, नेपाल नरेश, ईरान के शाह, बंगलादेश के सांस्कृतिक मंत्री तथा अनेक देशी-विदेशी अतिविशिष्ट व्यक्तियों ने अल्बर्ट संग्रहालय का भ्रमण किया और संग्रहालय के नवीन रूप की प्रशंसा की।

    संग्रहालय की नीचे की मंजिल में राजस्थान की सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत की गई तथा ऊपर की दीर्घा में दाईं तरफ देश के विभिन्न प्रान्तों का कला-कौशल प्रदर्शित किया गया। बीच के तीन बड़े हॉल में प्राचीन लघु चित्रों को प्रदर्शित किया गया जिनमें विभिन्न प्रकार की चित्र-शैलियों के चित्र उपलब्ध हैं। ऊपर की मंजिल में बाईं ओर की दीर्घा में भू-गर्भशाó, प्राणीशाó विज्ञान एवं शरीर विज्ञान सम्बन्धी मॉडल प्रदर्शित किए गए।

    वर्तमान में इस संग्रहालय में 24,930 कला एवं पुरा वस्तुएं प्रदर्शित हैं जिनमें से मिस्र की ममी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुओं में से है। अल्बर्ट हॉल में देश-विदेश के महंगे एवं कलात्मक गलीचों का प्रदर्शन किया गया है। इस विशाल हॉल में सोलहवीं शताब्दी ईस्वी का ईरान का एक बहुमूल्य गलीचा भी प्रदर्शित है जिसमें ईरान के शाह अब्बास के उद्यान का दृश्य बुना गया है। यह गलीचा 28 फुट गुणा 12 फुट आकार का है तथा इसमें एक इंच में 250 गाठें हैं। दुनिया में ऐसे कुल छः गलीचे हैं। यह गलीचा मिर्जा राजा जयसिंह को ईरान के शाह द्वारा ई.1640 में भेंट किया गया था जो विश्व की अप्रतिम बहुमूल्य कला वस्तुओं में से एक है।

    संग्रहालय में तिब्बत एवं नेपाल से प्राप्त ताम्र सामग्री भी प्रदर्शित की गई है। राजस्थान के अनेक स्थलों से प्राप्त प्रतिमाएँ, इंग्लैण्ड के राजा-रानी के चित्र, जयपुर महाराजाओं के चित्र, मुगल पेंटिंग्स, कलात्मक हुक्का, ब्लू पॉटरी, सुराहियां, ढालें, विभिन्न प्रकार की हस्तकला सामग्री, अस्त्र-शस्त्र, तीर-कमान-भाले, बग्घियां, कठपुतलियां, लोकवाद्य, धातु पात्र, मृदभाण्ड, रियासत कालीन पोषाकें, मॉडल्स एवं सिक्के आदि प्रदर्शित किए गए हैं।

    संग्रहालय में प्रदर्शित ममी मिस्र के राजपरिवार के पुजारी परिवार की महिला तुतु की है। इसे 19वीं सदी के अंतिम दशक में मिस्र की राजधानी काहिरा से जयपुर लाया गया था। यह ममी मिस्र के प्राचीन नगर पैनोपोलिस में अखमीन से प्राप्त हुई थी। यह ई.पू.322 से ई.पू.200 के बीच की अवधि की है तथा टौलोमाइक युग की बताई जाती है। यह महिला ‘खेम’ नामक देव के उपासक पुरोहितों के परिवार की सदस्य थी। देह के ऊपरी आवरण पर प्राचीन मिस्र का पंखयुक्त पवित्र भृंग (गुबरैला) का प्रतीक अंकित है जो मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है। पवित्र भृंग के दोनों ओर प्रमुख देव का शीर्ष तथा सूर्य के गोले को पकड़े श्येन पक्षी (बाज) अंकित है। यह बाज होरस देवता का प्रतीक है। तुतु ने गर्दन से कमर तक चौड़े मोतियों से सज्जित परिधान कॉलर के रूप में पहन रखा है। तुतु की मृत देह की सुरक्षा के लिए पंखदार देवी का अंकन किया गया है।

    ममी के नीचे के तीन हिस्सों में से पहले में मृतदेह के दोनों ओर महिलाएं बनाई गई हैं। दूसरे हिस्से में पाताल लोक के निर्णायकों की तीन बैठी हुई छवियां हैं और तीसरे हिस्से में होरस देव के चार बेटे अंकित हैं जो चारों दिशाओं के रक्षक अर्थात् दिक्पाल हैं। इनके मुंह क्रमशः मानव, सियार, बंदर और बाज पक्षी के रूप में दर्शाए गए हैं। रक्षित मृतदेह के पार्श्व भाग में एक अभिलेख लिखा है जिसके अनुसार अनुबिस नेक्रोपोलिस के अधिष्ठाता देव हैं और ओसिरिस तुतु को पुनर्जन्म हेतु संरक्षण प्रदान करते हैं। अंतिम फलक में मृत आत्माओं के देवता ओसिरिस का शीर्ष अंकित है जिसके दोनों और दो विषधर नाग हैं। ओसिरिस स्थिरता और सुदृढ़ता का प्रतीक है और दोनों सांप आईसिस और नेफ्टीज नामक देवियों के प्रतीक हैं। यह फलक मृतदेह के संरक्षण एवं मृत्यु के बाद आत्माओं के पुनर्जीवन के लिए न्याय विधान का चित्रण करता है। ओसिरिस वाले फलक के नीचे का फलक पांवों के ऊपरी आवरण पर बना है। इस फलक में अनुबिस देवता मृतदेह को पकड़े हुए हैं तथा मृतदेह को औषधि के माध्यम से सुरक्षित रखने में सहायता करते हुए दिखाया गया है अनुबिस देवता की पहचान उसके सियार वाले मुंह से की जाती है यह श्मशान भूमि के देवता है जो मृतदेह का संरक्षण करता है और मृत आत्माओं को अपने पिता ओसिरिस के पास ले जाता है जो पाताल लोक का देवता है। इस लोक में मृत्यु के बाद जीवन के बारे में निर्णय होता है। मृत्यु शैय्या के नीचे पांच कुंडीय पात्र आंतों को एकत्रित करने के लिए अंकित है। यहीं चार प्रेतात्माओं की आकृतियां भी दिखाई गई हैं।


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