Blogs Home / Blogs / ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ
  • राजा के मुँह लगे इक्का के सामने नन्ही बाई की भी नहीं चली

     11.08.2017
    राजा के मुँह लगे इक्का के सामने नन्ही बाई की भी नहीं चली

    जोधपुर नरेश जसवंतसिंह द्वितीय (ई.1873-1895) ने फैजुल्लाखां को अपना दीवान नियुक्त किया। फैजुल्लाखां राजा को प्रसन्न करने के लिये नवाब रामपुर से भगतन जाति की अद्वितीय सौंदर्य की स्वामिनी नृत्यांगना नन्ही बाई को मांग लाया और उसे जसवंतसिंह को भेंट कर दिया। भगतनों का ब्याह मिट्टी के गणेष

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  • नन्ही ने ऋषि दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया

     14.08.2017
    नन्ही ने ऋषि दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया

    ईस्वी 1883 में आर्य समाज के संस्थापक ऋषिवर दयानन्द सरस्वती जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह के निमंत्रण पर जोधपुर आये। राजा जसवंतसिंह ने ऋषि का भव्य स्वागत किया, उन्हें लाने के लिये रत्न जड़ित पालकी भेजी तथा उनके लिये अनेक सेवकों एवं सुरक्षा प्रहरियों का प्रबन्ध किया कि

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  • सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी हैरत में पड़ गए

     07.09.2018
    सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी हैरत में पड़ गए

    जोधपुर राज्य के इतिहास में सर प्रतापसिंह महत्वपूर्ण व्यक्ति हुआ है। वह राजा तखतसिंह की रानी राणावतजी का दूसरा पुत्र था। पहला पुत्र जसवन्तसिंह था जो तखतसिंह के बाद जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठा। जब जसवंतसिंह के दीवान फैजुल्लाखां ने जोधपुर राज्य में अव्यवस्था फैला दी तब ई.1878 में ज

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  • जयपुर नरेश ने लंदन की टेम्स नदी पर गंगाजी का परचम फहरा दिया

     07.09.2018
    जयपुर नरेश ने लंदन की टेम्स नदी पर  गंगाजी का परचम फहरा दिया

    ई.1880 में जयपुर नरेश रामसिंह की मृत्यु हो गयी। उसके कोई पुत्र नहीं था इसलिये उसने ईसरदा ठिकाने के ठाकुर रघुनाथसिंह के द्वितीय पुत्र माधोसिंह को गोद लिया था। अंग्रेजो ने रामसिंह के इस दत्तक पुत्र को सवाई माधोसिंह (द्वितीय) के नाम से जयपुर का राजा स्वीकार कर लिया। अपने राज्याभिषेक के

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  • राजाओं को दबाने के लिये अंग्रेजों ने जागीरदारों से दोस्ती गांठ ली

     15.08.2017
    राजाओं को दबाने के लिये अंग्रेजों ने जागीरदारों से दोस्ती गांठ ली

    1857 के विद्रोह में देशी राज्यों के जागीरदारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रमुख भूमिका निभायी थी इसलिये अंग्र्रेज उनकी वास्तविक शक्ति को समझ गये थे। अब उन्होंने जागीरदारों से उस उपकरण के रूप में काम लेने का निर्णय किया जिसके द्वारा वे देशी राजाओं पर नकेल कस सकते थे। यही कारण है कि ई.185

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  • भारतीय राजाओं के किस्से यूरोपीय अखबारों में छा गये

     16.08.2017
    भारतीय राजाओं के किस्से यूरोपीय अखबारों में छा गये

    उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से यूरोपीय अखबारों में भारतीय नरेशों के रोचक किस्से छपने लगे थे। इन किस्सों में भारतीय राजाओं और रानियों के विविध शौक, उनकी सम्पत्तियां, उनकी प्रेम कहानियां तथा उनकी सनक के वाकये नमक मिर्च लगाकर बड़े चटखारों के साथ प्रस्तुत किये जाते थे। बीसवीं सदी के आ

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  • तोपों की सलामियों के लिये लड़ते थे राजा

     07.09.2018
    तोपों की सलामियों के लिये लड़ते थे राजा

    सन् 1858 की घोषणा में रानी विक्टोरिया ने एलान किया था कि भारतीय रियासतों के शासकों को व्यक्तिगत और राजनीतिक तौर पर तोप की सलामियां दी जायेंगी। राजपूताना में 19 राज्यों के शासकों को तोपों की सलामी लेने का अधिकार था। इनमें से उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ एवं शाहपुरा गुहिलोत शा

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  • पाँच सौ से अधिक बौनी रियासतों का संग्रहालय था भारत

     18.08.2017
    पाँच सौ से अधिक बौनी रियासतों का  संग्रहालय था भारत

    स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में कुल 562 देशी राज्य थे जिन्हें रियासतें भी कहा जाता था। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें तीन श्रेणियों में विभक्त कर रखा था। पहली श्रेणी में 108 रियासतें थीं जो स्वाधिकार से नरेन्द्र मण्डल की सदस्य थीं। दूसरी श्रेणी में 127 रियासतें थीं जिनके 13 प्रतिनिधि नरे

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  • ई.1901 में जोधपुर राज्य में केवल 224 इसाई रहते थे

     18.08.2017
    ई.1901 में जोधपुर राज्य में केवल 224 इसाई रहते थे

    ई.1901 में मारवाड़ राज्य अथवा जोधपुर राज्य का क्षेत्रफल 34,963 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह राज्य पहले स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह दूसरे स्थान पर आता था। जोधपुर राज्य राजपूताना के सर्वाधिक महत्वपूर्ण 4 राज्यों में से एक था तथा भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण

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  • ढूंढाड़ देस राच्छस धरा, दई वास नह दीजिये

     19.08.2017
    ढूंढाड़ देस राच्छस धरा, दई वास नह दीजिये

    ग्यारहवीं शती के प्रारंभ में नरवर से आये कच्छवाहों (कछुओं) ने मत्स्य क्षेत्र के मीनों (मछलियों) से ढूंढाड़ प्रदेश छीनकर आम्बेर के प्रबल कच्छवाहा राज्य की स्थापना की थी। प्राचीन काल में तथा मध्यकाल में भी ढूंढाड़ प्रदेश को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। एक कवि ने ढूंढाड़ प्रदेश की

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