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  • राजाओं के भाग्य से द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया!

     06.09.2017
    राजाओं के भाग्य से द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया!

    लगभग 10 वर्षों तक भारतीय नेताओं एवं ब्रिटेन की गोरी सरकार ने देशी रियासतों को ब्रिटिश भारत के साथ मिलाकर भारत संघ के निर्माण के अथक प्रयास किये। कांग्रेस भारत संघ के माध्यम से देश की मुक्ति का रास्ता खोज रही थी तो गोरी सरकार भारत संघ के माध्यम से भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के साथ अवरोधक भार बांधा चाहती थी। राजा लोग पहले हाँ कहकर बाद में ना पर अड़ गये जिससे 10 वर्षों के दीर्घ प्रयासों के उपरांत भी संघ का निर्माण नहीं हो सका।

    राजाओं के भाग्य से सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। 11 सितम्बर 1939 को वायसराय ने घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण भारत संघ के निर्माण की योजना स्थगित की जा रही हैं। इस प्रकार संघ योजना असफल हो गयी तथा विगत 12 वर्षों से भी अधिक समय में व्यय किया गया धन, श्रम एवं समय व्यर्थ चला गया।

    अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के नेता तो शासकों की नीति से दुःखी हुए ही, राष्ट्रीय नेता भी शासकों की कूटनीति को समझ गये। राजाओं के आचरण पर टिप्पणी करते हुए चेतना मुद्गल ने लिखा है- ई.1937-39 के मध्य राज्यों के शासक वर्ग ने अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिये भारतीय संघ में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया। राजपूताना के शासकों ने अविश्वसनीय अयोग्यता का परिचय देकर अपने महत्व को सदा के लिये कम करवा लिया। उन पर न तो राष्ट्रीय नेता और न ही अंग्रेज किसी तर्क संगत नीति अपनाने के लिये भरोसा कर सकते थे। वे केवल अपने सम्मान, गौरव, प्रतिष्ठा में इतने डूबे रहे कि उन्हें पानी के गहरे होने का अनुभव ही नहीं हुआ। 1939 के पश्चात् उनके प्रभाव को घटने में अधिक समय नहीं लगा।

    एक ओर तो राजा लोग अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे थे तो दूसरी ओर राष्ट्रीय नेता भी संघ योजना में ब्रिटिश प्रांतों के सम्बन्ध में किये गये प्रावधानों से संतुष्ट नहीं थे। संघीय योजना के उन प्रावधानों को देखते हुए जिनके अनुसार प्रान्तीय स्वशासन की स्थापना नाम मात्र के लिये भी नहीं थी, कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने भी इस व्यवस्था का विरोध किया। मुहम्मद अली जिन्ना ने संघ योजना को अस्वीकार करते हुए कहा कि राजाओं ने संघ योजना को असंभव शर्तों से पूर्णतः खराब कर दिया था। उस समय केवल हिन्दू महासभा ही एक मात्र ऐसा राजनीतिक दल था जो अब भी संघ योजना के समर्थन में था।

    संघ निर्माण की योजना के असफल होने पर संतोष व्यक्त करते हुए वी. बी. कुलकर्णी ने लिखा है कि तथ्यों को देखते हुए हम आभारी होने का अनुभव कर सकते हैं कि भारत सरकार अधिनियम 1935 का संघीय योजना वाला भाग अस्तित्व में नहीं आया, इस प्रकार भारत के स्वतंत्र होने का मार्ग सरल हो गया तथा राज्यों के विलय का काम भी तीव्र गति से हो सका।

    देशी राज्यों के शासकों द्वारा भारतीय संघ में सम्मिलित होने से अत्यंत नाटकीय ढंग से इन्कार कर देने के पश्चात् राष्ट्रीय नेताओं का रवैया राजाओं के प्रति कठोर हो गया। जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ''जिन संधियों पर राजा लोग अत्यधिक जोर दे रहे हैं, वे संधियां केवल उन्हीं रियासतों और ब्रिटिश सत्ता के मध्य हुई थीं जिन रियासतों को ब्रिटिश सत्ता ने संधि के लिये चुना था और जो लगातार चलने वाली प्रक्रिया के द्वारा ब्रिटिश सत्ता की सुविधा के अनुरूप व्याख्यायित होती रही हैं तथा पूरी तरह बदल चुकी हैं। उन संधियों के पालन पर तभी जोर दिया जाता है जब वे ब्रिटिश सत्ता का हित साधन करती हों। जब कभी भी ब्रिटिश हितों पर विवाद होता है, उस समय या तो इन संधियों की उपेक्षा कर दी जाती है या फिर उनका निहितार्थ इस प्रकार निकाला जाता है जिनसे परमोच्च सत्ता के हितों की रक्षा होती हो। विवाद की स्थिति में परमोच्च सत्ता एक पक्ष भी होती है तथा अंतिम न्यायाधीश भी। इस फैसले के विरुद्ध किसी तरह की अपील करना भी संभव नहीं है। इस प्रकार ये संधियां देशी राज्यों अथवा उनके शासकों के हितों की रक्षा करने में सफल नहीं रही हैं।"

    राष्ट्रीय नेताओं का कहना था कि अधिकांश संधियां एक शताब्दी अथवा उससे भी अधिक पुरानी हैं। तब से लेकर अब तक विश्व में तथा भारत में अनेक परिवर्तन आ चुके हैं जिनके कारण इन संधियों का बाह्य स्वरूप भले ही वही हो किंतु इनका आंतरिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। इस कारण ये संधियां पूर्णतः दिखावटी हैं तथा वे इतने लम्बे समय से केवल इसलिये अस्तित्व में हैं क्योंकि ब्रिटिश सरकार उन्हें बनाये रखना चाहती है। ब्रिटिश सरकार की इच्छा के अतिरिक्त इन संधियों में कोई शक्ति अंतनिर्हित नहीं है। यदि इन संधियों के पीछे से ब्रिटिश सरकार का सहारा हटा लिया जाये तो ये संधियां गिर पड़ेंगी तथा नष्ट हो जायेंगी। यहाँ तक कि देशी राज्यों की प्रजा भी इनका विरोध करती है क्योंकि इनके माध्यम से देशी राज्यों में निरंकुश तथा सामंती शासन बना हुआ है। देशी राज्यों की जनता आज उत्तरदायित्वपूर्ण प्रजातांत्रिक सरकार की मांग कर रही है।

    राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश सत्ता द्वारा देशी राज्यों के साथ हुई संधियों की पवित्रता पर विशेष जोर भारत में लगातार बढ़ती हुई राष्ट्रीय भावना को कुचलने के लिये एक औजार के रूप में दिया जा रहा है। राजाओं को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये कि इन संधियों को भारत में प्रजातंत्र की स्थापना के विरुद्ध भले ही प्रयुक्त किया जा रहा हो किंतु इन संधियों के बल पर राजा लोग अपने राज्यों को अधिक दिनों तक संघ से बाहर नहीं रख सकेंगे। बटलर समिति का उद्धरण देते हुए डी. आर. मानकेकर ने लिखा है- ''वास्तविकता यह थी कि जब संधियां परमोच्च सत्ता की इच्छाओं एवं सुविधाओं का उल्लंघन करती थीं तो व्यवहारिक रूप से वे रद्दी के टुकड़े से अधिक नहीं थीं।" राष्ट्रीय नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश भारत को भारतीय रियासतों से राजनीतिक रूप से अलग रखने का विचार अच्छा नहीं है तथा वर्तमान शक्तियों एवं परिवर्तनों को देखते हुए उचित नहीं है। कोई भी राज्य अपने आप में इतना बड़ा एवं सुगठित नहीं है, न ही वह भौगोलिक दृष्टि से इस तरह स्थित है कि उन्हें भारत से अलग रखना समुचित जान पड़े। राज्यों में व्याप्त निरंकुशता तथा प्राचीन शासन पद्धतियां आधुनिक प्रवृत्तियों से नितांत असंगत हैं तथा अधिक दिनों तक बनी नहीं रह सकतीं। वर्तमान में राजा लोगों में यह प्रवृत्ति दिखायी दे रही है कि वे अपने आप को संघ से अलग रखें किंतु वास्तव में यह प्रवृत्ति भारत से अलग रहने की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करती, अपितु जहाँ तक हो सके वहाँ तक, भारत में राष्ट्रीयता एवं प्रजातंत्र के विकास का विरोध करती है।

    नेताओं का यह भी मानना था कि रियासतों में सामंती एवं प्रतिक्रियावादी हितों तथा निहित स्वार्थों को समाप्त करना होगा ताकि वे शेष भारत के साथ आ सकें। संघ तभी सफलता पूर्वक काम कर सकता है जबकि समान उद्देश्यों के लिये एक रूप ढांचा खड़ा किया जाये। देशी राजाओं के अड़ियल रवैये को देखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ई.1938 के हरिपुरा सम्मेलन में और उसके पश्चात ऑल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस ने ई.1939 के लुधियाना सम्मेलन में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प व्यक्त किया।

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