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  • वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों से मोलभाव कर रहा था!

     01.09.2017
    वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों से मोलभाव कर रहा था!

    ई.1936 में लॉर्ड विलिंगडन के बाद मारकीस ऑफ लिनलिथगो को भारत का वायसराय बनाया गया। लिनलिथगो संयुक्त प्रवर समिति के अध्यक्ष भी रह चुके थे। वे अपने कार्यकाल में भारत संघ के उद्घाटन की इच्छा लेकर भारत आये। उन्हें भारतीय राजाओं से सहानुभूति थी। वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते थे जिससे राजाओं का दिल दुखे। उनकी राय में राजा ही भारत से ब्रिटिश सम्बन्धों का प्रमुख आधार एवं तत्व थे। संघ के निर्माण की योजना में राजाओं को अड़ंगा लगाते हुए देखकर लिनलिथगो ने देशी राज्यों में अपने तीन विशेष प्रतिनिधियों सर कोर्टने लेटीमर, सर फ्रांसिस वायली तथा सर आर्थर लोठियान को भेजा। फ्रांसिस वायली को राजपूताना के नरेशों से वार्त्ता करने के लिये भेजा गया। लिनलिथगो का मानना था कि संघ योजना देशी राज्यों के शासकों के हित में थी। उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को दायित्व सौंपा कि वे राजाओं तथा उनके मंत्रियों को संघ में सम्मिलन की प्रक्रिया तथा उसका अर्थ समझायें।

    जैसे ही शासकों को वायसराय के इस निर्णय की जानकारी हुई, वे चौकन्ने हो गये। वे पहले से ही कांग्रेस द्वारा प्रजा मण्डलों के माध्यम से बनाये जा रहे दबाव में थे कि शासक अपने आंतरिक शासन को समर्पित कर दें। शासकों ने समझा कि अब परमोच्च सत्ता उनसे राज्यों का आंतरिक शासन भविष्य में बनने वाले संघ को समर्पित कर देने के लिये दबाव बना रही है तथा परमोच्च सत्ता शासकों से सौदा करना चाहती है। इसलिये शासकों ने इन विशेष प्रतिनिधियों से वार्ता करने के लिये चालाक मंत्रियों एवं संवैधानिक विशेषज्ञों को नियुक्त किया। इन अधिकारियों को सम्मिलन पत्र की प्रतियाँ उपलब्ध करवायी गयीं जो कि राज्यों को पहले से ही भेजी जा चुकी थीं। इन अधिकारियों को वायसराय के लिखित आदेश भी दिये गये।

    वायसराय के इन विशेष अधिकारियों ने वर्ष 1936-37 की सर्दियों में विभिन्न राज्यों का दौरा किया तथा राज्याधिकारियों एवं शासकों से हुए विचार विमर्श के दौरान पाया कि राज्यों के शासकों का मानस संघ में सम्मिलन का नहीं था। वे प्रस्तावित संघ को अपनी सुरक्षा तथा सम्प्रभुता के लिये सबसे बड़ा खतरा समझते थे। इन विचार विमर्शों के दौरान राजाओं ने स्पष्ट कर दिया कि उनके लिये देश की एकता की प्रेरणा प्रमुख नहीं थी और न ही वे संघ में सम्मिलन के लिये चिरौरी करने की इच्छा रखते थे। उन्हें जिस प्रश्न ने विचलित कर रखा था वह यह नहीं था कि संघ का निर्माण उन्हें सम्पूर्ण भारत के हित के लिये भागीदारी निभाने का अवसर देगा, अपितु उनके समक्ष विचलित करने वाला प्रश्न यह था कि उनकी अपनी स्थिति संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और बेहतर होगी अथवा संघ से बाहर।

    जब 1936 में वायसराय के विशेष दूत फ्रांसिस वायली ने बीकानेर राज्य का दौरा किया तो उसने महाराजा गंगासिंह को संघ का सर्वाधिक दृढ़ विरोधी पाया। वायसराय का विशेष दूत फ्रांसिस वायली जोधपुर भी आया। वह जोधपुर नरेश उम्मेदसिंह से वार्तालाप के पश्चात् संतुष्ट हुआ। उसने वायसराय को जो रिपोर्ट भेजी, उसमें महाराजा उम्मेदसिंह की प्रवृत्ति की प्रशंसा की। जयपुर राज्य भी संघ में मिलने के लिये सहमत था किंतु कुछ शर्तों पर।

    अंग्रेज सरकार के लिये उदयपुर राज्य का रवैया इस दिशा में सर्वाधिक चौंकाने वाला था। महाराणा को संघ योजना की कोई जानकारी नहीं थी तथा रियासत का दीवान पण्डित धर्मनारायण ही इस विषय पर बात कर रहा था। दीवान ने अंग्रेज राजदूत को बताया कि महाराणा राजपूताने के समस्त राज्यों का एक सम्मेलन उदयपुर में आयोजित करने जा रहे हैं। इस सम्मेलन में राजपूताना के राजाओं की जो सामूहिक राय होगी, महाराणा उसी के अनुसार कार्य करेंगे। इस पर अंग्रेज राजदूत ने पण्डित धर्मनारायण को धमकाया कि वे किसी सम्मेलन का आयोजन न करें। क्योंकि यदि इस सम्मेलन में राजाओं ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि वे संघ में नहीं मिलेंगे तो अंग्रेज सरकार यह समझने के लिये स्वतंत्र होगी कि ऐसा महाराणा के उकसाने पर किया गया। राजदूत ने उदयपुर राज्य की गतिविधियों की सारी जानकारी वायसराय को लिख भेजी। राजदूत के समझाने पर उदयपुर ने सम्मेलन के आयोजन का निश्चय त्याग दिया।

    1937 के आरंभ में वायसराय के विशेष दूतों ने अपनी रिपोर्ट वायसराय को प्रस्तुत कर दी जिसमें कहा गया कि शासक संघ में सम्मिलन के प्रश्न पर सौदेबाजी करने की इच्छा रखते हैं तथा कई तरह की सुविधायें चाहते हैं। सर आर्थर लोठियान ने अपनी रिपोर्ट में मिशन की असफलता के छः कारण बताये। पहला यह कि प्रथम गोलमेज सम्मेलन से लेकर अब तक छः सात वर्ष का समय बीत चुका है जिसके कारण अब इस योजना में कई पेच खड़े हो गये हैं। संघीय योजना के लाभों को समझने में राजाओं की अदूरदर्शिता उन पर हावी रही है।

    राज्यों के शासकों ने भी वायसराय को अपनी ओर से पत्र भिजवाये जिसमें उन्होंने वे शर्तें लिखीं जिनके पूरा होने पर ही वे भारत संघ में सम्मिलन के लिये प्रस्तुत हो सकते थे। अधिकतर रियासतों ने मांग की कि उनके वर्तमान में मौजूद राजस्व के स्रोतों को संघ के समय में भी बने रहने का अधिकार दिया जाये। इस प्रकार राज्यों को संघ के भीतर राजस्व के मामले में यथापूर्व स्थिति मिलनी चाहिये।

    वायसराय को भी लगा कि यदि संघ में मिलते ही राजस्व में कमी आयेगी तो राज्यों को संघ में सम्मिलन के प्रति कोई आकर्षण नहीं होगा। यदि भारत सरकार अधिनियम 1935 में संशोधन करके राजस्व का अधिकार राज्यों के पास रहने दिया जाये और उन्हें संघ में मिलाने में सफलता प्राप्त की जा सके तो यह उचित होगा। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने वायसराय के इस प्रस्ताव का विरोध किया। उनकी दृष्टि में यह ब्रिटिश भारत की कीमत पर राज्यों के हित में किया गया स्थायी परिवर्तन होगा। यह संघ की मूल भावना के विरुद्ध होगा तथा ब्रिटेन तथा भारत में इसका बड़ा भारी विरोध होगा।

    जब वायसराय के अधीन कार्य कर रहे राजनीतिक विभाग ने देखा कि सेक्रेटरी ऑफ स्टेट वित्तीय मामलों पर राज्यों की यथापूर्व स्थिति को बनाये रखने के लिये संविधान में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है तो राजनीतिक विभाग ने इस दिशा में कार्य करना आरंभ किया कि वर्तमान संविधान के अंतर्गत ही राज्यों की मांगों को कहाँ तक पूरा किया जा सकता है तथा शासकों को कहाँ तक संतुष्ट किया जा सकता है!

    देशी राज्यों तथा ब्रिटिश भारत, दोनों ही पक्षों की तरफ से हो रहे विरोध के उपरांत भी ब्रिटिश सरकार ने अप्रेल 1937 से भारत सरकार अधिनियम 1935 को लागू कर दिया जिसके कारण अक्टूबर 1937 से संघीय न्यायालय ने कार्य करना आरंभ कर दिया।

    मई 1937 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मारकीस ऑफ जीटलैण्ड ने ब्रिटेन में भारतीय शासकों एवं ब्रिटिश भारतीय नेताओं से वार्तालाप किया तथा पाया कि वायसराय के प्रस्तावों ने राजाओं की आकांक्षाओं को बढ़ा दिया है। यदि राजाओं को यह अनुभव करवाया जाता कि वे संघ के भीतर अधिक सुरक्षित और आरामदेह स्थिति में होंगे तो स्थिति कुछ भिन्न होती। सामान्यतः राजा लोग संघ में सम्मिलन के इच्छुक नहीं थे तथा वायसराय सौदा बेचने के अनिच्छुक लोगों के साथ मोल-भाव कर रहा था।

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