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  • नेताओं ने गोरों को हटाने के लिये राजाओं का मनोबल तोड़ने का निश्चय किया!

     06.09.2017
    नेताओं ने गोरों को हटाने के लिये राजाओं का  मनोबल तोड़ने का निश्चय किया!

    10 वर्ष के भारी प्रयासों के उपरांत भी कांग्रेस ब्रिटिश भारत के 11 प्रांतों एवं रियासती भारत के 562 राज्यों का एकीकरण नहीं करवा पाई। राजाओं ने इसे विफल करके रख दिया। इससे राष्ट्रीय नेताओं के मन में खीझ उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। अब वे राज्यों के अस्तित्व की आवश्यकता एवं वैधता पर चोट करने लगे। ऐसा करके वे दोधारी तलवार चलाना चाहते थे। एक तो राजाओं के मनोबल को तोड़कर वे उन्हें कमजारे करना चाहते थे और दूसरी ओर वे रियासती भारत की जनता में भी बेचैनी पैदा करना चाहते थे।

    कांग्रेस ने ई.1938 के हरिपुरा सम्मेलन में और उसके पश्चात अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद ने ई.1939 के लुधियाना सम्मेलन में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प व्यक्त किया। सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि भारतीय राज्यों का अस्तित्व इसलिये बचा रहा क्योंकि अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने उन्हें कृत्रिम समर्थन दिया हुआ था। इनमें आंतरिक जीवन रस सूख चुका था और इनकी शक्ति केवल अंग्रेजी साम्राज्यवाद पर आधारित थी। नेहरू ने इन राज्यों द्वारा अंग्रेजों के साथ स्थापित संधियों को भी मानने से इन्कार कर दिया तथा भारतीय राज्यों की पद्धति को भी अस्वीकार्य घोषित कर दिया।

    राजाओं के अड़ियल रवैये पर टिप्पणी करते हुए फरवरी 1940 में गांधी ने हरिजन में लिखा- ''मेरा अनुमान है कि राजा लोग ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे ताज से वरिष्ठ तो हो ही नहीं सकते। यदि ताज जो कि आज पूरे भारत पर शासन कर रहा है, वह भी अपनी सत्ता छोड़ने जा रहा है तो राजा लोग भी स्वतः अपनी सत्ता खो देंगे। राजाओं को इस बात पर गर्व होना चाहिये कि ब्रिटिश ताज के उत्तराधिकारी जो कि राजाओं के सम्मान की सुरक्षा करेंगे, भारत के लोग हैं। मैं यह दावा कांग्रेस की ओर से नही, अपितु भारत के लाखों बेजुबान लोगों की ओर से कर रहा हूँ।"

    गांधीजी का मानना था कि ब्रटिश भारत साम्राज्य के निर्माताओं ने इसके चार स्तंभ खड़े किये हैं- यूरोपियन हित, सेना, राजा लोग तथा सांप्रदायिक विभाजन। आखिरी तीन स्तंभों को पहले स्तंभ की सेवा करनी है। यदि साम्राज्य निर्माताओं को सम्राज्य समाप्त करना है तो उन्हें ये चारों स्तंभ नष्ट करने होंगे किंतु वे राष्ट्रवादी लोगों अथवा साम्राज्यवादी भावना के विध्वंसक लोगों से कहते हैं कि तुम्हें इन चारों स्तंभों से स्वयं निबटना होगा। दूसरे शब्दों में वे ये कह रहे हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की गारण्टी दो, अपनी सेना स्वयं बनाओ तथा राजाओं और अल्पसंख्यक कहे जाने वाले साम्प्रदायिक लोगों से निबटो।

    साम्राज्य को नष्ट करने को आतुर लोगों का कहना है कि अंग्रेजों ने यूरापीय लोगों के हितों को हम पर लादा, उनकी रक्षा के लिये सेना बनायी, उन हितों की बेहतरी से सुरक्षा की और अपने उद्देश्यों के लिये राजाओं का उपयोग किया। अंग्रेजों ने राजाओं को बनाया और बिगाड़ा, नये राजाओं का निर्माण किया, उन्हें शक्तियां दीं, इससे पहले वे सुरक्षा के साथ आनंद नहीं मना सकते थे। वास्तव में अंग्रेजों ने भारत का विभाजन कर दिया ताकि पूरा देश एक साथ उनके विरुद्ध खड़ा नहीं हो सके।

    राष्ट्रीय नेताओं का यह भी मानना था कि यद्यपि संघ हमारे लिये अपरिहार्य है किंतु इसके लिये हम कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाना चाहते। यदि संघ के निर्माण के लिये हमसे अत्यधिक कीमत मांगी जाती है तो उचित यह होगा कि हम अधिक अनुकूल परिस्थितियों के आने तक प्रतीक्षा करें।

    राष्ट्रीय नेताओं द्वारा ब्रिटिश सरकार पर आरोप लगाया कि ब्रिटिश सरकार ही राजाओं के माध्यम से संघ निर्माण की योजना में रोड़े अटका रही थी। यदि अधिनियम में संघ निर्माण के लिये रखी गयी केवल इसी शर्त की जाँच की जाये कि देशी राज्यों को संघ मिलाया जाना केवल उसी स्थिति में संभव था जबकि कम से कम इतने देशी राज्य संघ में सम्मिलित होने की सहमति दें, जिनके द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में कम से कम 52 प्रतिनिधि भेजे जाते हों तथा संघ में सम्मिलित होने की घोषणा करने वाले राज्यों की जनसंख्या देशी राज्यों की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम न हो, तो भी ब्रिटिश सरकार के इरादों की सच्चाई सामने आ जायेगी।

    उस समय भारत के देशी राज्यों में रहने वाली जनसंख्या 7 करोड़़ 90 लाख थी जिसका 50 प्रतिशत 3 करोड़़ 95 लाख होता है। जबकि भारत की सबसे बड़ी केवल 17 रियासतों की जनसंख्या 5 करोड़़ 3 लाख 77 हजार थी जो कि कुल रियासती जनसंख्या की तीन चौथाई थी किंतु इन रियासतों के संघ में मिलने का निर्णय लेने पर भी संघ का निर्माण किया जाना संभव नहीं था क्योंकि इन रियासतों द्वारा काउंसिल ऑफ स्टेट्स में मात्र 41 सदस्य ही भेजे जाते थे। इस प्रकार संघ के निर्माण के लिये अधिनियम में अत्यंत अव्यवहारिक शर्त रखी गयी थी।

    वी. पी. मेनन ने लिखा है कि भारत सरकार द्वारा छोटे राज्यों को संघीय प्रस्ताव नहीं भेजे गये थे क्योंकि इस योजना के आरंभिक चरण में यह विचार बनाया गया था कि ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा सक्षम राज्यों का ही संघ बनाया जाये तथा बाद में छोटे राज्यों को भी इसमें सम्मिलित किया जाये। भारत सचिव का मानना था कि लघु राज्यों को पृथक इकाई के रूप में संघ में सम्मिलित किये जाने में कई कठिनाइयां थीं। इन राज्यों में प्रशासनिक व्यय चलाने के लिये पर्याप्त आर्थिक स्रोत नहीं थे। इन राज्यों की जनता संघ में प्रवेश पाने के बाद इस बात की प्रत्याशा करती कि उन्हें भी वैसा ही प्रशासन मिले जैसा कि बड़े राज्यों में है या ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में है। इन राज्यों के कार्मिक बहुत कम वेतन पाते थे तथा उनका प्रशिक्षण भी पर्याप्त नहीं था। वे इतने सक्षम नहीं थे कि संघीय कानून के अनुसार प्रशासन चला पाते।

    ब्रिटिश भारत के प्रमुख राजनीतिक घटकों की रुचि इस बात में थी कि रियासती प्रजा संवैधानिक संघर्ष में उलझ जाये तथा राज्य के प्रशासन में प्रत्यक्ष तथा निर्णयकारी भागीदारी प्राप्त करें। बड़े राज्यों में तो इस प्रकार के आंदोलनों को समाप्त किया जाना सरल था किंतु लघु राज्यों में राज्यों के प्रशासन के लिये इस प्रकार के आंदोलनों पर नियंत्रण पाने के लिये पर्याप्त साधन नहीं थे।

    के. टी. शाह ने संघीय योजना के बारे में लिखा है- जड़ें सड़ी हुई हैं, पूरा ढांचा रद्दी वस्तुओं से बनाया गया है जिसके बाहर की ओर वार्निश, पॉलिश, रंग करके उसे नया रूप दे दिया गया है। इस प्रकार की जड़ों से किसी स्वस्थ विकास की आशा नहीं की जा सकती। इस प्रकार की संरचना में किसी प्रसन्नतादायी जीवन की संभावना नहीं हो सकती।

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