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  • नन्ही ने ऋषि दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया

     02.06.2020
    नन्ही ने ऋषि दयानंद सरस्वती को जहर दे दिया

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    ईस्वी 1883 में आर्य समाज के संस्थापक ऋषिवर दयानन्द सरस्वती जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री सर प्रतापसिंह के निमंत्रण पर जोधपुर आये। राजा जसवंतसिंह ने ऋषि का भव्य स्वागत किया, उन्हें लाने के लिये रत्न जड़ित पालकी भेजी तथा उनके लिये अनेक सेवकों एवं सुरक्षा प्रहरियों का प्रबन्ध किया किंतु ऋषि ने पालकी लौटा दी और पैदल ही चलकर आये। जब उन्होंने अपने भाषण प्रारंभ किये तो पूरे जोधपुर में उनकी धूम मच गई। राईका बाग महल में बैठकर राजा ने उनके उपदेश सुने और उन्हें दुर्ग में पधारने का अनुरोध किया। स्वामीजी के उपदेशों का राजा से लेकर मन्त्रियों, राज्य कर्मचारियों और प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजा और मन्त्रियों ने राज्य और प्रजा की वास्तविक उन्नति की ओर ध्यान दिया। शिक्षा के लिये विद्यालय स्थापित किये गये और राज्य की अदालतों में उर्दू के स्थान पर हिन्दी को काम में लाया जाने लगा।


    एक दिन स्वामी दयानन्द बिना कोई सूचना दिये जोधपुर दुर्ग पहुंचे तो एक विचित्र दृष्य देखकर आष्चर्य से खड़े रह गये। उन्होंने देखा कि राजा नशे में धुत्त है और नन्ही की पालकी को कन्धे पर उठाये हुए महल से बाहर आ रहा है। रूप दर्प से दमदमाती नन्ही, सिंहनी की भांति पालकी में सवार थी। जब राजा की दृष्टि स्वामीजी की आंखों से टकराई तो राजा शर्म से जमीन में गढ़ गया। स्वामीजी ने राजा को कड़ी फटकार लगाई और किले से नीचे उतर गये।

    राजा ग्लानि और लज्जा से सिर झुका कर महल में चला गया। बाहर आकर स्वामीजी ने राजा को एक पत्र लिखा जिसमें राजा की तुलना नारकीय पशु से की। यह पत्र नन्ही के हाथ लग गया। नन्ही क्रोध और अपमान से फुंकार उठी। 29 सितम्बर 1883 को उसने स्वामीजी के दूध से पिसा हुआ काँच मिला दिया। ऋषि श्रेष्ठ को अजमेर ले जाया गया जहाँ 30 अक्टूबर को उनकी मृत्यु हो गई।

    ऋषि दयानन्द की मृत्यु हो जाने से राजा को बड़ा क्लेष पहुंचा किन्तु फिर भी वह उस रूप की पिटारी में छिपा बैठा रहा। एक दिन राजा की अनुपस्थिति में उमरावों और सरदारों ने नन्ही को अपमानित और प्रताड़ित किया तथा महल से निकाल दिया। जब नन्ही की माँ छोटी की मृत्यु हुई थी तब नन्ही का मन अपनी हवेली से उचट गया जिस पर राजा ने नन्ही के लिये उदयमार्ग पर एक भव्य मन्दिर बनवा दिया था। नन्ही उसी में रहने लगी। अपने जीवन का अंतिम काल नन्ही ने उसी मन्दिर में बिताया। नन्ही स्थाई रूप से रसिक बिहारी के मन्दिर के पिछवाड़े में बने कमरों में रहने लगी। राजा मन्दिर के दरवाजे पर बने रंग महल में बैठकर नन्ही के रूप सौंदर्य का पान करता रहा।

    ईस्वी 1880 में जसवन्तसिंह ने जोधपुर राज्य में अपने खर्चे से रेल लाइन का निर्माण आरंभ करवाया। अंग्रेजी सरकार के इन्जीनियर जूसलेन और उसके सहायक स्मिथ ने रेल कार्य की पैमाइश की तथा डब्लू. होम नामक इन्जीनियर ने यह निर्माण करवाया। होम ने जोधपुर राज्य को प्रशंसनीय सेवायें दीं। तब जोधपुर शहर में पानी का बड़ा अभाव था। होम ने पत्थर की पक्की नहरें, पहाड़ों की तली में होकर बर्नाइं जिनसे दस मील के घेरे में स्थित पहाड़ियों पर होने वाली वर्षा का पानी शहर के तालाबों तक आता था। ईस्वी 1896 में होम के प्रयत्नों से कन्जरवेन्सी ट्रामवे खुली जो उस समय उत्तर भारत में अपने ढंग की पहली थी। इसमें शहर का कूड़ा करकट, मैला आदि डिब्बों में भरा जाकर छोटे से स्टीम इन्जन द्वारा शहर से 8-9 मील दूर खाइयों में गाढ़ा जाता था जो खाद बन जाता था। रेल्वे वर्कशाप, कचहरी की विशाल इमारतें, दरबार के बंगले, बालसंमद झील की टनल आदि इसी इन्जीनियर की देखरेख में बनवाये गये। जोधपुर में पी. डब्लू. डी. महकमा भी इसी की अधीनता में स्थापित किया गया।

    ईस्वी 1895 में राजा जसवंतसिंह बीमार पड़ा और तरह-तरह के दुःख भोग कर मर गया। उसकी मृत्यु के बाद नन्ही ने अपनी हवेली से सदा-सदा के लिये नाता तोड़ लिया। जसवन्तसिंह के काल में जोधपुर में बालसमंद बांध से गुलाबसागर तथा फतहसागर तालाबों के लिये नहर बनवाई गई तथा बिलाड़ा के पास पिचियाक में जसवन्त सागर बांध तैयार करवाया गया। जसवन्तसिंह के रनिवास में 9 रानियां, 13 पड़दायतें तथा नन्ही भगतन (नन्हीजी) नामक गणिका थी।

    राजा के मरने के बाद नन्ही 14 वर्ष तक इस संसार में जीवित रही। ये चौदह वर्ष अपमान, उपेक्षा और कष्टों से भरे हुए थे। अपने अन्तिम दिनों में नन्ही को खूनी बवासीर हो गई। अन्त में 61 वर्ष की आयु में 23 अगस्त 1909 को वह इस असार संसार से कूच कर गई। उसके मरने के बाद उसके मन्दिर स्थित आवास से छः सौ जोड़ी जड़ाऊ जूतियां, आठ सौ रेषमी घाघरे और लाखों रुपये का कीमती सामान निकला जो षिक्षण संस्थाओं को दान कर दिया गया। मन्दिर के जिस हिस्से में नन्ही रहती थी, वहाँ पाठषाला खोली गयी तथा जहाँ उसकी पालकियां एवं रथ रखे जाते थे, षिक्षा विभाग का कबाड़ा पटक दिया गया। आज बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी इस परिसर से जोधपुर राज्य के अनेक महत्वपूर्ण आदेष जारी किये जाते थे।

    जसवन्तसिंह की मृत्यु के बाद नन्ही की हवेली में जोधपुर राज्य की टकसाल स्थापित की गई। सिक्कों के अतिरिक्त अन्य कीमती सामग्री हीरे, जवाहरात तथा नगदी भी इसी भवन में रखे जाने लगे और इसका नाम जवाहर खाना हो गया। इसके निचले भाग में धातु पिघलाने की भट्टियां लगाई गईं तथा इसे लोहे के मोटे सीखचों वाले दरवाजे से सुरक्षित कर दिया गया। इस टकसाल में लोहे के बाट भी बनते थे।

    टकसाल के एक भाग में सोने-चान्दी की कुटाई होती थी तथा महारानी विक्टोरिया के नाम के सिक्के भी ढाले जाते थे। राज्य की तिजोरियां यहाँ पर दोहरे ताले में रखी जाती थीं जिनकी सुरक्षा के लिये गार्ड तैनात किये गये थे। सिक्के ढालने के बाद बचे हुए सोने-चांदी की जालियां बनाई जाती थीं जिसमें विक्टोरिया का चित्र भी सांचे में ढाल कर बनाया जाता था। ऐसी 50 जालियां आज भी जवाहर खाना के मुख्य भाग के ऊपरी हिस्से में लगी हुई हैं। आजादी के बाद यह टकसाल बन्द हो गई तथा यहाँ खाद्य मसालों, हल्दी, धनिया, मिर्च आदि की प्रयोगषाला स्थापित की गई। ई.1955 में यहाँ देषी घी की जांच करने की प्रयोगशाला बनाई गई जिसमें जालोर, बाड़मेर तथा सांचोर आदि परगनों से आने वाले घी की जांच होती थी तथा उस पर ठप्पा लगाकर बाजार में बेचा जाता था। दस वर्ष बाद 1966 में यह प्रयोगशाला भी बन्द हो गई।

    उसके बाद यहाँ विद्यालय तथा स्टेट बैण्ड आदि स्थापित किये गये। स्टेट बैण्ड जोधपुर राज्य की ओर ई.1891 में राजदादीजी के नोहरे में खोला गया था जिसे बाद में यहां स्थानान्तरित कर दिया गया। आजादी के बाद इस भवन में भूमि एवं भवन का पंजीयन कार्यालय भी खोला गया जो कुछ समय बाद कलक्ट्रेट परिसर में चला गया। जवाहरखाना के नाम से प्रसिद्ध नन्ही बाई की हवेली बाहर से डेढ़ी होने के कारण आज भी दो भागों में बंटी दिखाई देती है। इक्का खां के मकान में अब लुहार रहते हैं। नन्ही की हवेली भी जर्जर हो चली है। इसकी खिड़कियां, बारादरी तथा कंगूरे अपने अतीत की यादें संजोये अपने उद्धार की प्रतीक्षा में टिके हुए हैं।

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