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  • राजा के मुँह लगे इक्का के सामने नन्ही बाई की भी नहीं चली

     02.06.2020
    राजा के मुँह लगे इक्का के सामने नन्ही बाई की भी नहीं चली

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    जोधपुर नरेश जसवंतसिंह द्वितीय (ई.1873-1895) ने फैजुल्लाखां को अपना दीवान नियुक्त किया। फैजुल्लाखां राजा को प्रसन्न करने के लिये नवाब रामपुर से भगतन जाति की अद्वितीय सौंदर्य की स्वामिनी नृत्यांगना नन्ही बाई को मांग लाया और उसे जसवंतसिंह को भेंट कर दिया। भगतनों का ब्याह मिट्टी के गणेषजी से किया जाता था और फिर उन्हें रुपये या आठ आने में किसी साधु को बेच दिया जाता था। इस साधु को पति के सब अधिकार प्राप्त होते थे। साधु से उत्पन्न लड़कियां भगतन कहलाती थीं। इस प्रकार यह परम्परा चलती रहती थी किन्तु कुछ साधुओं की लड़कियां-चरित्र भ्रष्ट होकर
    वेश्यावृत्ति करने लगती थीं। इन्ही में से नन्ही एक थी। इस अद्वितीय सुन्दरी को देख कर राजा दीन और दुनिया दोनों भूल गया। रानियां, महारानियां सब राजा की नजर से उत्तर गईं और राजा उस रूपगर्विता के चरणों में जा गिरा। राजा ने शहर से बाहर एक मकान में नन्ही और उसकी मां छोटी के रहने का प्रबन्ध किया।

    नन्ही जोधपुर के इतिहास में नैनी बाई तथा नन्ही भगतन के नाम से भी जानी जाती है। वह जोधपुर के इतिहास में ऐसा व्यक्तित्व बनकर उभरी जिसे न तो राजकीय स्वीकृति थी और न सामाजिक फिर भी कई दषकों तक वह जोधपुर नरेष के सिर का मुकुट और मारवाड़ की आंख की किरकिरी बनी रही। नन्ही के रूपपाष में बंध कर राजा अपनी रानियों, पड़दायतों और पासवानों को भूल गया। लोक मर्यादा के भय से राजा ने नन्ही को अपनी पासवान या पड़दायत तो घोषित नहीं किया किन्तु व्यवहारिक रूप में वही सब कुछ थी और उसी की मर्जी से राजा शासन करता था। नन्ही की भौंह में बल बड़ते तो अच्छों-अच्छों को राजकीय सेवा से खड़े-खड़े निकाल दिया जाता। उसकी एक-एक मुस्कुराहट पर बड़े-बड़े राजकीय पद भरे जाते।

    नृत्य और गायन में निपुण यह रूपाजीवा राजा के हृदय की स्वामिनी तो थी ही, अपनी बुद्धि, चातुर्य और रूप दर्प के बल पर अमीर-उमरावों को भी नचाती थी। खुली महफिल में वह राजकीय चिन्ह के रूप में कटार धारण करके राजा की बगल में बैठती। नख से शिख तक स्वर्ण आभूषण और कीमती हीरे-जवाहरात धारण करती तथा बालों को धोने के बाद गुलाब जल और केवड़े से सींचती जिसकी महक से होश खोकर राजा उसके पाश में बन्धा रहता।

    राजा उसका स्वागत दुर्ग की ड्यौढ़ी पर करता। जोधपुर के पूरे इतिहास में यही एक वेष्या थी जो जोधपुर दुर्ग की देहरी लांघ सकी थी। जब वह जाती तो राजा उसकी पालकी को कन्धा लगाता और सारी मर्यादायें तोड़कर उससे मिलने घासमण्डी स्थित उसकी हवेली पर जाता। राजा का यह आचरण देखकर उसकी रानियां, महारानियां, अमीर, उमराव, सांमत और राज परिवार के सदस्य राजा से नाराज हो गये। राजा का छोटा भाई प्रतापसिंह तो जोधपुर छोड़ कर जयपुर राज्य की सेवा में चला गया।

    कुछ दिनों बाद राजा ने नन्ही के रहने के लिये एक बड़ी हवेली बनवाई जो जवाहरखाना के नाम से प्रसिद्ध हुई। जिस स्थान पर यह हवेली बनी हुई है, अब घास मण्डी कहलाता है तथा किसी समय वेष्याओं का निवास क्षेत्र होने के कारण बदनाम इलाका माना जाता था। जिस समय जोधपुर शहर बहुत छोटा था तब यह क्षेत्र निर्जन था तथा तवायफों, वेश्याओं, पातुरियों और नाचने-गाने वालियों के अड्डे के रूप में विकसित हुआ। नन्ही बाई की हवेली लगभग 50 फुट ऊंची थी। लाल घाटू पत्थरों से बनी इसकी मजबूत दीवारें ढाई से तीन फुट तक चौड़ी थीं। इस हवेली को बनवाने में भी नन्ही ने अपने ठसके का बखूबी इस्तेमाल किया और राजाज्ञा प्रसारित करवाई कि इसके आस-पास बनने वाली समस्त इमारतें इससे 10 फुट छोटी बनाई जायें। इस राजाज्ञा का नन्ही के जीते जी बड़ी कड़ाई से पालन किया गया।

    नन्ही का ठसका देखकर अच्छों-अच्छो की हिम्मत उसके सामने बोलने की नहीं होती थी किन्तु यह ठसका उसके कुछ काम न आया जब वह राजा के मुंह लगे 'इक्का’ से उलझ पड़ी। जब नन्ही का छोटा सा मकान बड़ी हवेली में परिवर्तित किया जाने लगा तो राजा के वफादार सिपाही मोहम्मद खां इक्का का मकान बीच में आ गया। नन्ही का मकान कुछ तिरछा था जिसे वह सीधा करना चाहती थी ताकि चौरस मकान पर हाथी बंद दरवाजे से जड़ी जंगी हवेली का मुकाबला घासमण्डी की कोई अन्य इमारत न कर सके। इक्का अड़ गया किन्तु नन्ही भी नहीं मानी और अपने रूप के ठसके में उसने इक्का के मकान का एक हिस्सा गिरवा दिया। इक्का ने राजा पर अनेक एहसान किये थे। राजा ने उसे रोहट के समीप नीलामी ठिकाने की जागीर बख्शी थी।

    जब नन्ही ने इक्का का मकान गिरवा दिया तो जेठ की भरी दुपहरी में इक्का तलवार लेकर राइका बाग पैलेस में राजा के पास गया। राजा उस समय आराम कर रहा था। इक्का ने बाहर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया और नन्ही को भी गालियां दीं। राजा ने कहलवाया कि वह शाम को आये। इक्का नहीं माना और कहा कि यदि राजा अभी नहीं मिलेगा तो वह तलवार से अपनी गर्दन उड़ा लेगा। राजा फौरन बाहर आया और इक्का को समझा-बुझाकर शांत किया। जब राजा ने इक्का से अनुरोध किया कि वह नन्ही की हवेली सीधी बन जाने दे तो इक्का फिर बिगड़ गया। हार कर राजा ने नन्ही को आदेष दिया कि वह अपनी हवेली तिरछी ही बना ले। इक्का का मकान न तोड़ा जाये। इस कारण जवाहरखाना आज भी तिरछा ही खड़ा है।

    राजा ने नन्ही की हवेली में 22 कमरे बनवाये। मुख्य भाग में दो बड़े हॉल बनवाये गये जिनमें से एक नन्ही के उठने-बैठने तथा दूसरा शयन करने के लिये बनवाया गाया। पोल के ठीक सामने वाले हॉल में मुजरा होता था। बीच में एक बड़ा चौगान बनवाया गया जहां महफिल जमती थी। पोल के दायीं ओर नीचे के कमरों में पालकी, मिजस, रथ तथा बहल नैनात रहते थे जिनका उपयोग नन्ही मेहरानगढ़ दुर्ग या राईकाबाग पैलेस जाने के लिये करती थी। कहा जाता है जवाहरखाना में एक सुरंग दुर्ग तक बनवाई गई थी जो गधियों की गली और कुत्तों की पोल से होती हुई दुर्ग तक जाती थी। अब यह सुरंग पत्थरों से बन्द कर दी गई है। हवेली के ऊपरी हिस्से में जाने के लिये दोनों तरफ सीढ़ियां बनी हुई हैं। एक मन्दिर भी इस हवेली में बनवाया गया था हवेली में राज्य की ओर से सुरक्षा प्रहरी तैनात किये गये थे।

    राजा को भोग-विलास में डुबोकर तथा समस्त विष्वसनीय और समर्पित लोगों से अलग कर फैजुल्ला खां बेखटके राज काज चलाने लगा। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। जोधपुर राज्य कर्ज में डूब गया। जब उमरावों और सरदारों ने ज्यादा हल्ला मचाया तो राजा ने फैजुल्ला को निकाल दिया और अपने भाई प्रतापसिंह को बुलाकर एवं उससे क्षमा याचना कर जोधपुर राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। प्रजा की दुर्दषा देखकर प्रतापसिंह ने राज-काज संभल लिया किन्तु राजा को नैनी (नन्ही) से अलग न कर सका। प्रतापसिंह के हाथों में राज्य और प्रजा दोनों को सुरक्षित जानकर राजा फिर नन्ही के रूप सरोवर में डूब गया। राजा नन्ही के रिष्तेदारों का भी दुर्ग में स्वागत करता। रानियों का विरोध बढ़ने लगा तो राजा राईकाबाग पैलेस में ही अधिक समय बिताने लगा।

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