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  • जयपुर नरेश ने लंदन की टेम्स नदी पर गंगाजी का परचम फहरा दिया

     02.06.2020
    जयपुर नरेश ने लंदन की टेम्स नदी पर  गंगाजी का परचम फहरा दिया

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    ई.1880 में जयपुर नरेश रामसिंह की मृत्यु हो गयी। उसके कोई पुत्र नहीं था इसलिये उसने ईसरदा ठिकाने के ठाकुर रघुनाथसिंह के द्वितीय पुत्र माधोसिंह को गोद लिया था। अंग्रेजो ने रामसिंह के इस दत्तक पुत्र को सवाई माधोसिंह (द्वितीय) के नाम से जयपुर का राजा स्वीकार कर लिया। अपने राज्याभिषेक के समय वह 19 वर्ष का था तथा विशेष पढ़ा लिखा नहीं था।


    यद्यपि माधोसिंह वयस्क था तथापि उसे शासन कार्य का अनुभव नहीं होने के कारण अंग्रेजों ने राज्य शासन के पूरे अधिकार नहीं सौंपे। पोलिटिकल एजेण्ट की देख-रेख में राज्य परिषद के द्वारा ही राजकाज किया जाता रहा। शासन पर ब्रिटिश वर्चस्व बुरी तरह हावी रहा फिर भी माधोसिंह के पास इस बात के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था कि वह अंग्रेज शक्ति के प्रति भरपूर स्वामिभक्ति दिखाये। उसके शालीन व्यवहार के कारण अंग्रेज अधिकारी भी जीवन भर माधोसिंह के प्रति शालीनता से पेश आते रहे।

    विदेशी इतिहासकारों तथा तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने उसके पुरातन पंथी विचारों और उसकी धार्मिक प्रवृत्ति को लेकर टिप्पणियां की हैं। कर्जन ने लिखा है- माधोसिंह पुराने चलन वाली श्रेणी के उन भारतीय राजाओं में से है जिन्हें उत्साहित करने के लिये मैंने अपनी ओर से वह सब कुछ किया जो मेरी शक्ति में है, ये पुरातन पंथी, अपने राज्य को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी जाने के अनिच्छुक, अपने कोष को उदारता से बांटने वाले, रानी एवं ब्रिटिश सम्बंधों के प्रति सघनता से स्वामिभक्त तथा किसी बात के लिये अत्यधिक व्याकुलता से परांग्मुख हैं किंतु यदि इन्हें दक्षता पूर्वक तथा सहानुभूति पूर्वक संचालित किया जाये तो ये मार्गदर्शित होने के लिये सक्षम हैं।

    भारतीय राजाओं की परम्पराओं को ध्यान में रखकर इस राजा का मूल्यांकन किया जाये तो वह एक श्रेष्ठ राजा था तथा अपने युग की महान विभूति था। उसने पं. मदनमोहन मालवीय का जयपुर नगर में भव्य स्वागत किया तथा बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के लिये पांच लाख रुपये प्रदान किये। उसका दीवान कांतिचंद मुखर्जी भी अच्छा प्रशासक था।

    ई.1902 में राजा माधोसिंह इंगलैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम् के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने के लिये लंदन गया। लंदन अर्थात् यवन देश में जाने के लिये उसने भारतीय संस्कृति के अनुरूप विशेष तैयारियां कीं। उसने चांदी के दो लोटे बनवाये तथा उनमें इतना गंगाजल भरवा लिया कि वह गंगाजल राजा के पीने के लिये चार महीने तक के लिये पर्याप्त हो ताकि राजा को म्लेच्छ देशों का जल नहीं पीना पड़े। उसने अपने लिये एकदम नया जहाज किराये पर लिया तथा उसे गंगाजल आदि से धुलवाकर पवित्र करवाया। जहाज में ही एक मंदिर बनाया गया जिसमें राजा के आराध्य राधा गोपालजी के विग्रह को प्रतिष्ठित करवाया। राजा माधोसिंह ने अपने जहाज पर जयपुर राज्य की पचरंगी पताका फहराई।

    जब राजा माधोसिंह इंगलैण्ड के विक्टोरिया स्टेशन पर जहाज से उतरा तो उसने अपने आगे राधा गोपालजी का रथ रखा और स्वयं हरे रामा-हरे कृष्णा का कीर्तन करता हुआ इंगलैण्ड की गलियों से निकला। कीर्तन करने वाले अनुचरों के विशाल जुलूस में सम्मिलित राजा ऐसा दिखायी देता था मानो जयपुर का राजा माधोसिंह नहीं राधा गोपालजी हैं। उसके इस भव्य आगमन को देखकर पूरे यूरोप में धूम मच गयी थी।

    राजा माधोसिंह ने इंगलैण्ड के राजा एडवर्ड सपतम् को 5 लाख रुपये मूल्य की एक तलवार तथा अन्य कीमती वस्तुएं उपहार में दीं। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय ने उसे एल.एल.डी. की उपाधि प्रदान की। वह पांच माह लंदन में रहकर फिर से भारत लौट आया। इंगलैण्ड से लौट कर राजा ने राधा गोपालजी का विग्रह सिटी पैलेस परिसर में स्थित गोपालजी के मंदिर में स्थापित करवाया। इस मंदिर के सामने ही गंगाजी का मंदिर है जिसमें गंगा मैया की वह प्रतिमा स्थापित है जो राजा माधोसिंह की पटराणी जादूणजी की पूजा में रहा करती थी। उन दिनों रनिवास की समस्त महिलाएं गंगा मैया के इसी विग्रह की पूजा करती थीं।

    माधोसिंह ने गंगा मैया का एक मंदिर गंगोत्री में भी बनवाया था। वह ग्रीष्म काल में अन्य राजाओं की तरह पहाड़ी स्थानों पर जाकर आमोद-प्रमोद में व्यस्त नहीं होता था। जब भी ग्रीष्म ऋतु होती तो राजा माधोसिंह हरिद्वार में जाकर गंगाजी के किनारे वास करता था। जिन रजत पात्रों में राजा माधोसिंह गंगाजल भरकर लंदन ले गया था वे आज भी जयपुर के सिटी पैलेस स्थित सर्वतोभद्र के रिक्त प्रांगण में रखे हैं तथा उन्हें विश्व के सबसे बड़े चांदी के बर्तन होने का गौरव प्राप्त है। इनका कुल वजन 680 किलोग्राम है।

    जब अंग्रेजों ने गंगाजी का प्रवाह हर की पौढ़ी के स्थान पर किसी अन्य स्थान से करने की योजना बनायी तो मदनमोहन मालवीय ने हरिद्वार में एक विशेष बैठक बुलाई जिसमें भारत भर के हिन्दू राजाओं को आमंत्रित किया गया ताकि अंग्रेजों के इस निर्णय का विरोध किया जा सके। हिन्दू नरेशों में जयपुर नरेश माधोसिंह सर्वाधिक अग्रणी था जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा गंगाजी का प्रवाह बदले जाने का विरोध किया था।

    जयपुर नरेश माधोसिंह ब्रिटिश अधिकारियों के चहेते राजाओं में से था। उसका कारण यह था कि राजा ने गंगाजी के प्रकरण को छोड़कर कभी किसी बात को लेकर अंग्रेजों के लिये परेशानी खड़ी नहीं की। अंग्रेज अधिकारियों के प्रति राजा का व्यवहार अत्यंत शिष्ट था। ई.1903 में उसे अंग्रेजों की ओर से जी.सी.वी.ओ. तथा 1911 में जी.वी.आई.की उपाधियों से विभूषित किया गया। ये वे उपाधियां थीं जिन्हें पाने के लिये राजाओं में परस्पर होड़ मची रहती थी तथा भारत भर के राजा अपने आदमियों को अंग्रेज अधिकारियों के पीछे दौड़ाते रहते थे। ई.1904 में माधोसिंह को भारतीय सेना में कर्नल बनाया गया । ई.1911 में उसे मेजर जनरल का पद दिया गया।

    राजा माधोसिंह ने उत्तर पश्चिमी सीमा के युद्ध में अंग्रेजों की भरपूर सहायता की। प्रथम विश्वयुद्व में राजा ने अपने निजी व्यय से अंग्रेजों को पंद्रह लाख रुपये प्रदान किये तथा इतनी ही राशि अपने सामंतों व अधिकारियों से जुटा कर उपलब्ध करवायी। ई.1921 में अंग्रेजों ने राजा माधोसिंह को भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल का पद प्रदान किया। अंग्रेज शक्ति भारतीय राजाओं को सेनाओं में ऑनरेरी कमीशन तथा रैन्क इसलिये दिया करती थी ताकि भारतीय राजाओं को अपनी अधीनस्थता का अहसास सदैव बना रहे।

    राजा माधोसिंह के शासनकाल में राज्य में स्कूलों, सड़कों, रेल्वे लाइनों तथा औषधालयों का अच्छा विकास हुआ। ई.1921 में राजा माधोसिंह को अंग्रेजों की ओर से अपने राज्य की सीमा में 21 तोपों की सलामी लेने का अधिकार दिया गया। ई.1922 में उसकी मृत्यु हो गयी।

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