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  • कैप्टन स्टेवार्ड जबर्दस्ती जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बन गया

     04.07.2017
    कैप्टन स्टेवार्ड जबर्दस्ती  जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बन गया

    राजमाता भटियानी तथा प्रधानमंत्री ठाकुर बैरीसाल सिंह के झगड़ों पर अंकुश लगाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कैप्टन स्टेवार्ड को जयपुर में पोलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किया। जयपुर में इस नियुक्ति का सर्वत्र विरोध हुआ किंतु राजमाता भटियानी की एक न चली। स्टेवार्ड ने 17 अप्रेल 1821 को जयपुर में आकर जबर्दस्ती अपना कार्यालय जमा लिया। तभी से जयपुर में पोलिटिकल एजेंसी की स्थापना हो गयी। गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने राजमाता और बैरीसाल को निर्देश भेजे कि राजस्व सम्बन्धी मामलों में स्टेवार्ड की राय से ही कार्य करें। धीरे-धीरे जयपुर राज्य में पोलिटिकल एजेण्ट ने वास्तविक शासक के अधिकार हथिया लिये।

    यह कहना अधिक उचित नहीं होगा कि सारी ज्यादती अंग्रेज अधिकारियों की तरफ से थी। शासक का नाबालिग होना, राजपरिवार के सदस्यों में सत्ता प्राप्ति के लिये खींचतान होना तथा सत्ता से चिपके हुए लोगों का एक दूसरे को जान से मार डालने के लिये आतुर रहना, आदि कई ऐसे कारण थे जिनके कारण अंग्रेज अधिकारियों की स्थिति दृढ़ होती चली गयी। ई.1823 में राजदरबार में दरोगा की नियुक्ति को लेकर राजमाता तथा प्रधानमंत्री बैरीसाल के बीच झगड़ा हो गया। रीजेण्ट ऑक्टरलोनी ने खुलकर बैरीसाल का पक्ष लिया तथा राजमाता के कृपापात्र झूथाराम को जयपुर राज्य से बाहर निकाल दिया। रेजीडेण्ट ऑक्टरलोनी तथा पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टन स्टेवार्ड ने राजमाता की प्रतिष्ठा और गरिमा गिराने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। बैरीसाल का पक्ष लेने के कारण ऑक्टरलोनी पूरे जयपुर राज्य में बदनाम हो गया।

    बैरीसाल निकम्मा प्रशासक सिद्ध हुआ। उसके काल में जयपुर राज्य में भ्रष्टाचार, राजकीय आय का दुरुपयोग, प्रशासकीय अव्यवस्था तथा गबन चरम पर
    पहुंच गये। ईशरदा और शेखावाटी की सेनाओं को वेतन नहीं दिया जा सका जिससे उनमें विद्रोह हो गया। ई.1824 में तोरावाटी की चार बटालियनों ने वेतन न मिलने पर विद्रोह कर दिया। शेखावाटी के सैनिक विद्रोह के लिये ऑक्टरलोनी बैरीसाल को जिम्मेदार मानता था तो पोलिटिकल ऐजेण्ट रपर (स्टेवार्ट का उत्तराधिकारी) इसे राजमाता की साजिश मानता था।

    ई.1824 में ऑक्टरलोनी स्वयं जयपुर आया। उसने डिग्गी के ठाकुर मेघसिंह को मुख्तार के पद पर नियुक्त कर दिया। राजमाता को नीचा दिखाने के लिये बैरीसाल को अधिकार दिया गया कि वह पोलिटिकल एजेंसी में अपना वकील नियुक्त कर सकता है। जब तक रपर जयपुर में पोलिटिकल एजेण्ट रहा राजमाता तथा उसके बीच छत्तीस का आंकड़ा बना रहा। ई.1825 में चार्ल्स मेटकाफ दिल्ली में रेजीडेण्ट बना। उसने रपर के स्थान पर कैप्टेन लो को जयपुर राज्य का पोलिटिकल ऐजेण्ट नियुक्त किया तथा उसे निर्देश दिये कि वह राज्य के आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप न करे तथा राजमाता को शासन संचालन में पूर्ण स्वतंत्रता दे। मेटकाफ ने झूथाराम को फिर से जयपुर राज्य में आने की अनुमति दिलवाई।

    कैप्टेन लो भी अपने पूर्ववर्ती पोलिटिकल एजेण्टों की तरह अत्यंत महात्वाकांक्षी एवं दुराग्रही था। उसने राजमाता को चैन से नहीं बैठने दिया तथा उन सामंतों को संरक्षण दिया जो रानी के विरुद्ध थे तथा राज्य को नुक्सान पहुंचा रहे थे जिससे जयपुर राज्य की आय और अधिक गिर गयी। राज्य ने खिराज समय पर चुकाने के लिये प्रजा पर नये कर लगाये व पुराने करों में वृद्धि की जिससे जनता रुष्ट हो गयी। प्रजा का यह क्रोध अंग्रेजों के प्रति था न कि राजा के प्रति। कर वृद्धि के कारण प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी थी।

    कैप्टेन लो ने राजमाता पर जोर डाला कि वह शिशु महाराजा को प्रकट करे। राजमाता की प्रभुसत्ता को समाप्त करने के लिये लो ने यह चाल चली थी। उसकी धारणा थी कि महाराजा के प्रकट होने से रीजेंसी की अवधि समाप्त हो जायेगी तथा प्रशासन का कार्य राज्य के सामंतों की परिषद के द्वारा किया जाने लगेगा तथा राजमाता के स्थान पर बैरीसाल को शासन के अधिकार मिल जायेंगे। पोलिटिकल एजेण्ट कैप्टेन लो की महत्वाकांक्षा के मार्ग में रेजीडेण्ट चार्ल्स मेटकाफ बहुत बड़ा रोड़ा सिद्ध हुआ। उसने निर्णय दिया कि भले ही महाराजा प्रकट हो जाये किंतु शासन के अधिकार राजमाता के पास ही रहेंगे।

    मेटकाफ का बल पाकर रानी नये जोश से भर गयी उसने प्रशासन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये तथा मेघसिंह को मुख्तार के पद से हटाकर चान्दसिंह को मुख्तार बनाया। चूंकि परम्परा को तोड़ते हुए रानी के अधिकारों को चुनौती देने के लिये सामंतों की बैठक बुलायी गयी थी इसलिये सामंतों को रानी से मुँहजोरी करने का दुःसाहस होने लगा जिससे राज्य की आय और गिर गयी तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को खिराज नहीं दिया जा सका। राजमाता ने प्रार्थना की कि खिराज की रकम 8 लाख प्रतिवर्ष से घटाकर कम कर दी जाये किंतु कैप्टन लो ने राजमाता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इस समय तक दिल्ली में रेजीडेण्ट बदल चुका था तथा मेटकाफ का स्थान कोल ब्रक ने ले लिया था। उसने राजमाता को अनुमति दी कि वह झूंथाराम को राज्य का मुख्तार बना सकती है।

    झूथाराम सामंतों पर अंकुश नहीं लगा सका, लगा भी नहीं सकता था क्योंकि सामंतों को पोलिटिकल एजेण्ट का संरक्षण प्राप्त था। राज्य की आय बढ़ाने के लिये झूथाराम को अपने बलबूते पर ही कुछ करना था। चूंकि राज्य अंग्रेजों के संरक्षण में था इसलिये झूथाराम ने किलों में रखी जाने वाली सेना कम कर दी ताकि राज्य के व्यय में कमी आये। सैनिकों के निर्वहन के लिये जागीर में दी गयी भूमि फिर से खालसा में मिला ली गयी। इससे रुष्ट होकर रणथंभौर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इन विद्रोहियों को जागीरदारों ने ही उकसाया था। झूथाराम ने जो सेना इस विद्रोह को दबाने के लिये भेजी वह विद्रोहियों को नहीं दबा सकी। इस पर रानी ने पोलिटिकल एजेण्ट से सहायता मांगी किंतु एजेण्ट ने इसे राज्य का आंतरिक मामला बताकर सहायता करने से इन्कार कर दिया।

    इसी समय नवम्बर 1830 में ब्रिटिश ऐजेंसी को जयपुर से अजमेर स्थानांतरित कर दिया गया। इस पर पोलिटिकल एजेण्ट की तरफ के सामंतों ने समझा कि यह राजमाता तथा कैप्टेन लो के बीच शक्ति परीक्षण चल रहा है और उन्होंने लो के हाथ मजबूत करने के लिये स्थान-स्थान पर विद्रोह कर दिया। इसे दबाने के लिये रीजेण्ट (राजमाता भटियानी) तथा मुख्तार (झूथाराम) को बड़े पापड़ बेलने पड़े जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गयी। इसी काल में जयपुर राज्य को जोधपुर, बीकानेर, करौली तथा टौंक राज्यों से भी सरहदों पर उलझना पड़ा।

    ई.1833 में राजमाता भटियानी का देहांत हो गया। महाराजा जगतसिंह की मृत्यु (1818) से लेकर पूरे 15 साल तक वह जयपुर राज्य को बचाने के लिये जूझती रही और अंत में राजनीति की गंदी गलियों में हाथ-पांव मारते हुए अपने अवयस्क पुत्र जयसिंह को झूथाराम के हवाले करके इस संसार से कूच कर गयी। राज्य का सारा बोझ झूथाराम पर आ पड़ा। झूथाराम न तो जयपुर राज्य के सामंतों पर अंकुश लगा सका, न राज्य की अर्थव्यवस्था को सुधार सका और न अंग्रेज अधिकारियों का विश्वास पात्र बना रह सका।केवल राजमाता भटियानी ही उसे राज्य का शुभचिंतक मानकर किसी तरह प्रधानमंत्री बनाये रखने में सफल रही थी।

    कहा नहीं जा सकता था कि झूथाराम सही था या गलत किंतु उस युग की प्रवृत्ति ही ऐसी थी कि झूठ इतनी सफाई से, इतनी बार और इतने लोगों द्वारा बोला जाता था कि झूठ तो सच बन जाता था और सच- झूठ। इस प्रोपेगण्डा के चलते झूथाराम जयपुर राज्य में अलोकप्रिय हो गया। अब उसका पतन निकट दिखायी देने लगा था।

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