Blogs Home / Blogs / ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ / एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य
  • एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य

     29.06.2017
    एक दूसरे को लूटते थे सिरोही और जोधपुर राज्य

    राजपूताने और गुर्जरात्रा की सीमाओं पर चौहानों की एक पुरानी और प्रसिद्ध रियासत सिरोही के नाम से जानी जाती थी। सिरोही का अर्थ होता है- शीश काटने वाली अर्थात् तलवार। सिरोही राज्य का क्षेत्रफल 1,994 वर्ग मील था। सिरोही का राजवंश देवड़ा चौहानों के नाम से प्रसिद्ध था।

    ई.1760 में महाराव वैरीशाल द्वितीय सिरोही का राजा हुआ। उस समय राज्य बर्बादी के मुँह में था। भील और मीणे प्रजा को जी भर कर लूटते थे। राज्य के सामंत और सरदार महाराव का कहना नहीं मानते थे तथा राज्य की सीमा पर स्थित पालनपुर एवं जोधपुर राज्यों से सीमा सम्बन्धी झगड़े चलते रहते थे। पालनपुर राज्य ने सिरोही राज्य के लगभग 250 गाँव दबा लिये थे जिससे सिरोही राज्य में उस समय कुल 40-50 गाँव ही रह गये थे जिनसे इतनी आय नहीं होती थी कि सिरोही का राजा एक मजबूत सेना का निर्माण करके पालनपुर से अपने गाँवों को वापस छीन सके।

    महाराव वैरीशाल समझता था कि उसके राजपूत सरदार उसका साथ नहीं देंगे इसलिये उसने बाहर से मकरानी तथा सिंधी मुसलमानों और नागों को फौज में भरती करना आरंभ किया। छः साल में महाराव ने मुसलमानों की बड़ी फौज तैयार करके पालनपुर राज्य पर आक्रमण किया किंतु जो राजपूत सामंत महाराव के साथ सिरोही से सेना लेकर चले वे पालनपुर की सीमा पर पहुँच कर पालनपुर के नवाब की ओर हो गये। इस पर महाराव पालनपुर से लड़ने का विचार त्यागकर राजधानी को लौट आया। बल से काम बनता न देखकर महाराव ने छल से काम लेना आरंभ किया। उसने अपने सरदारों के मुखिया अमरसिंह डूंगरावत को सिंधी मुसलमानों के मुखिया देसर सिंधी को रुपये देकर अमरसिंह डूंगरावत की हत्या करवा दी। अमरसिंह के मरने पर सरदारों के मनोबल में काफी गिरावट आयी।

    जब जोधपुर के राज्य पर महाराजा भीमसिंह ने अधिकार कर लिया और राज्य के दावेदारों को मारना आरंभ किया तब महाराज मानसिंह ने सिरोही राज्य में शरण लेने के लिये अपने पुत्र छत्रसिंह को महाराजा वैरिशाल के पास भेजा। इससे पहले औरंगजेब के समय में सिरोही राज्य ने महाराजा अजीतसिंह को शरण दी थी किंतु महाराज वैरीशाल ने भीमसिंह से मित्रता होने के कारण मानसिंह तथा उसके पुत्र को शरण देने से मना कर दिया।

    जब ई.1803 में मानसिंह जोधपुर का राजा बन गया तब मानसिंह ने जोधपुर राज्य की सेना को सिरोही पर आक्रमण करने भेजा। इस सेना ने सिरोही राज्य को जमकर लूटा किंतु इस पर भी मानसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। वह आजीवन सिरोही राज्य को लूटता रहा। वह सिरोही राज्य को मारवाड़ में सम्मिलित करना चाहता था किंतु इस उद्योग में सफल नहीं हो सका। ई.1812 में मानसिंह ने फिर से सिरोही पर आक्रमण किया तथा उसे जी भर कर लूटा और बर्बाद किया।

    ई.1813 में सिरोही का महाराव उदयभाण अपने छोटे भाई शिवसिंह के साथ सोरों की यात्रा को गया। मार्ग में वह पाली नगर में ठहरा तथा वहाँ वेश्याओं के नाच गान में रम गया। पाली के हाकिम ने मानसिंह को गुप्त सूचना पहुंचाई कि महाराव उदयभाण पाली में ठहरा हुआ है। इस पर मानसिंह ने तत्काल सेना भेजकर महाराव उदयभाण, उसके भाई शिवसिंह तथा सिरोही राज्य के अधिकारियों को पकड़ लिया तथा जोधपुर ले आया। तीन माह तक सिरोही का महाराव जोधपुर में कैद रहा। इस दौरान मानसिंह ने उदयभाण से कई प्रकार की शर्तें अपने पक्ष में लिखवा लीं। इसके बाद सवा लाख रुपये देने का वचन देकर महाराव जोधपुर की कैद से छूटा। इसके बाद मानसिंह, उदयभाण से ऐसे मिला जैसे एक राजा, दूसरे राजा से मिला करता है।

    उदयभाण अपने वचन का पक्का नहीं था। वह तो केवल कैद से छूटने के लिये ही मानसिंह की शर्तें स्वीकार करता चला गया था। जब कई महीनों तक उसने मानसिंह को सवा लाख रुपये नहीं भिजवाये तो जोधपुर राज्य की सेना ने सिरोही राज्य में घुसकर लूट मचायी।

    महाराव उदयभाण को उसके आदमियों ने सलाह दी कि जब जोधपुर की सेना हमारे राज्य में लूट करती है तो हमें भी जोधपुर राज्य में घुसकर लूटमार करनी चाहिये। इस पर महाराव ने अपनी सेना को जोधपुर राज्य में लूट करने के लिये भेज दिया। जब महाराजा मानसिंह ने सिरोही राज्य की इस ढिठाई के बारे में सुना तो उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह सिराही राज्य को नष्ट कर दे। जोधपुर राज्य की सेना के भय से उदयभाण सिरोही छोड़कर पहाड़ों में भाग गया। जोधपुर राज्य की सेना पूरे दस दिन तक सिरोही नगर और आस पास के गाँवों को लूटती रही तथा ढाई लाख रुपये इकटठे करके जोधपुर लौटी।

    जोधपुर की सेना ने सिरोही से लौटते समय सिरोही के राजकीय कार्यालयों को आग की भेंट कर दिया। सिरोही राज्य को जलता हुआ देखकर महाराव उदयभाण ने महाराजा मानसिंह को सवा लाख रुपये लौटाने का मन बनाया ताकि दोनों पक्षों में शांति स्थापित हो सके किंतु राजकीय खजाना तो खाली था। इस पर महाराव ने महाजनों से रुपये वसूलने के लिये उन पर सख्ती की जिससे महाजन सिरोही राज्य को छोड़कर हमेशा के लिये गुजरात और मालवा की ओर भाग गये तथा वहीं पर बस गये।

    इसी बीच भीलों और मीणों ने गाँव-गाँव में घुसकर लूट मचानी शुरू कर दी। वे जानवरों के झुण्डों को पकड़ कर ले जाते तथा उन्हें मारकर पकाते खाते थे। महाजनों आदि को बंधक बनाकर पहाड़ों में ले जाते तथा वहाँ उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देते थे। उन्होंने कई गाँवों से अपनी चौथ भी बांध ली।

    राज्य की यह दुर्दशा देखकर सिरोही राज्य के सरदार नांदिया गाँव के ठाकुर शिवसिंह के पास गये जिसे राजा साहब की पदवी प्राप्त थी। ठाकुर शिवसिंह महाराव उदयभाण का छोटा भाई था। उसने ई.1817 में महाराव उदयभाण को नजरबंद कर लिया तथा स्वयं राज्यकार्य चलाने लगा।

    महाराजा मानसिंह ने जोधपुर से सेना भेजकर महाराव उदयभाण को नजरबंदी से मुक्त करवाने का उपक्रम किया किंतु सफलता नहीं मिली। महाराव तीस वर्ष तक नजरबंद रहा तथा नजरबंदी की अवस्था में ही ई.1847 में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका छोटा भाई शिवसिंह सिरोही राज्य का स्वामी हुआ।

    शिवसिंह ने 1817 से ही सिरोही राज्य का शासन कार्य अपने हाथ में ले लिया था किंतु बड़े भाई के जीवित रहते तक उसने अपने आप को महाराव नहीं कहाँ ई.1818 में उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता करने का प्रयास किया किंतु जोधपुर नरेश मानसिंह ने अंग्रेजों को लिखा कि सिरोही राज्य पहले से ही जोधपुर राज्य के अधीन है इसलिये सिरोही राज्य से अंग्रेज अलग से समझौता नहीं कर सकते किंतु कर्नल टॉड ने मानसिंह के इस दावे को ठुकरा दिया और ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सिरोही राज्य के साथ अलग से समझौता किया।

  • राजपूताने औ"/> राजपूताने औ"> राजपूताने औ">
    Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×