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  • सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी हैरत में पड़ गए

     02.06.2020
    सर प्रताप की चेष्टाएं देख कर फिरंगी हैरत में पड़ गए

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    जोधपुर राज्य के इतिहास में सर प्रतापसिंह महत्वपूर्ण व्यक्ति हुआ है। वह राजा तखतसिंह की रानी राणावतजी का दूसरा पुत्र था। पहला पुत्र जसवन्तसिंह था जो तखतसिंह के बाद जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठा। जब जसवंतसिंह के दीवान फैजुल्लाखां ने जोधपुर राज्य में अव्यवस्था फैला दी तब ई.1878 में जसवन्तसिंह ने प्रतापसिंह को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। प्रतापसिंह ने जोधपुर राज्य का आधुनिक पद्धति से संचालन किया। उसके हाथों जोधपुर राज्य की बड़ी उन्नति हुई।

    ई.1887 में रानी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूरे होने पर लंदन में स्वर्ण जयंती समारोह मनाया गया। इस अवसर पर महाराजा जसवन्तसिंह ने सर प्रताप को महाराजधिराज की उपाधि देकर अपने प्रतिनिधि के रूप में लन्दन भेजा। प्रतापसिंह राजपूत राजाओं में पहला व्यक्ति था जिसने बम्बई से यूरोप तक जहाज में बैठकर यात्रा की। उसे अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी किंतु महारानी विक्टोरिया के सवालों का जवाब देने के लिये उसने समुद्री यात्रा के दौरान थोड़ी बहुत अंग्रेजी सीखी।

    जब वह रानी की सेवा में उपस्थित हुआ तो उसने अपनी तलवार रानी के पैरों में रख दी और अंग्रेजी तरीके से रानी का हाथ पकड़कर चूम लिया। इसके बाद उसने अचानक ही रानी का हाथ अपनी आंखों पर रख लिया। सर प्रताप की चेष्टायें देख कर फिरंगी लोग हैरत में पड़ गये। सर प्रताप ने बताया कि मैंने अपनी आंखों से रानी के हाथ साफ किये हैं। प्रिंस ऑफ वेल्स ने प्रसन्न होकर सर प्रताप को अपना अंगरक्षक बनाया। एक दिन अचानक ही रानी ने एक भोजन के दौरान सर प्रताप का नाम पुकारा। प्रताप इस बुलवाई से भौंचक्का रह गया। उस समय उसके पास रानी को देने के लिये कोई उपहार नहीं था इसलिये उसने अपने पगड़ी का सिरपेश खींचकर रानी के हाथों में रख दिया। रानी इस हिन्दुस्तानी अदा पर रीझ कर मुस्कुराई और उसने इस उपहार को स्वीकार कर लिया।

    कुछ दिन बाद जब रानी एक शाही भोज में उपस्थित हुई तो उसने सर प्रताप की पगड़ी का सिरपेश अपनी पोशाक पर हृदय के पास धारण कर रखा था। रानी ने प्रताप को बुलाकर कहा कि आपने हृदय से भेंट दी है इसलिये मैंने हृदय के पास ही उसे धारण किया है।

    रानी विक्टोरिया के शासन काल के 50 वर्ष पूरे होने पर प्रतापसिंह ने राईका बाग रेल्वे स्टेषन के पास जुबली कोर्ट का निर्माण करवाया। इसके निर्माण में अंग्रेजी इन्जीनियर डब्लू, होम की सेवायें ली गईं। यह 1886 ई.में बनना आरंभ होकर ई.1897 में तैयार हुआ। इस भवन के निर्माण पर 4 लाख रूपये खर्च हुए। अब संभागीय आयुक्त, जिला क्लेक्टर, पुलिस उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक से लेकर अनेक महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय इसी परिसर में चलते हैं। जिस समय यह भवन बनाया गया था तब इसके बीचों-बीच महकमा खास बनाया गया था जहां से पूरे जोधपुर राज्य का प्रशासन एवं प्रबन्ध किया जाता था। इस परिसर में पिछवाड़े की तरफ उम्मेद उद्यान से लगते हुए जोधपुर हाई कोर्ट परिसर है। मुख्य इमारत की तीन पोलों में से बीच वाली पोल में प्रतापसिंह की आदमकद प्रतिमा लगी है।

    ई.1895 में राजा जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जब सरदारसिंह अल्पावस्था में ही राज्यारूढ़ हुआ तो राज्य प्रबन्धन हेतु रीजेन्सी कौन्सिल की स्थापना की गई जिसका अध्यक्ष प्रतापसिंह को बनाया गया। ई.1909 में जंगी लाट (लॉर्ड) किचनर जोधपुर आया। उसे दिखाने के लिये मारवाड़ की हस्तकला की वस्तुएं एकत्र की गईं तथा उन्हें एक स्थान पर प्रदर्शित करने के लिये इण्डस्ट्रीयल म्यूजियम की स्थापना की गई। यह संग्रहालय अब सरदार संग्रहालय कहलाता है।

    ई.1910 में सरदारसिंह ने गिरदीकोट में घण्टाघर तथा सरदार मार्केट बनवाया। अपने पिता जसवन्तसिंह की स्मृति में उसने किले के नीचे जसवन्त थड़ा बनवाया। जब सरदारसिंह की मृत्यु हुई तो उसके जयेष्ठ राजकुमार सुमेरसिंह को 13 वर्ष की आयु में जोधपुर की गद्दी पर बैठाया गया तथा राज्य संचालन के लिये पुनः रीजेन्सी कौंसिल का गठन किया गया और प्रताप को उसका अध्यक्ष बनाया गया। सुमेरसिंह मात्र 7 वर्ष शासन करके मृत्यु को प्राप्त हुआ। वह निःसंतान था इसलिये उसका छोटा भाई उम्मेदसिंह जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठा। वह भी अल्पवयस्क था अतः राज्य संचालन हेतु तीसरी बार रीजेन्सी कौंसिल बनाई गई और उसका अध्यक्ष भी सर प्रताप को बनाया गया। इस प्रकार जसवन्तसिंह, सरदारसिंह, सुमेरसिंह तथा उम्मेदसिंह के काल में (ई.1873 से लेकर ई.1922 तक) सर प्रताप ने जोधपुर राज्य का प्रधानमन्त्रित्व किया।

    आज जोधपुर जिस सुन्दर शहर के रूप में देखने को मिलता है वह बहुत कुछ प्रतापसिंह की ही देन है। ई.1897 में लन्दन में महारानी विक्टोरिया के शासन के 60 वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती महोत्सव आयोजित किया गया। इसमें भी सर प्रताप को भेजा गया। लंदन पहुंच कर सर प्रताप की टांग टूट गयी तथा प्लास्टर चढ़ाना पड़ा। प्रिंस ऑफ वेल्स ने सर प्रताप को अपना अंगरक्षक नियुक्त किया। सर प्रताप अपनी टूटी टांग लेकर ही प्रिंस के समक्ष उपस्थित हो गया। प्रिंस ने प्रतापसिंह को न केवल अपने पास कुर्सी पर बैठाया अपितु प्रताप की टूटी टांग रखने के अलग से एक कुर्सी मंगवाई। इस क्षण को स्मरण करते हुए सर प्रताप ने लिखा है कि एक जमाना वह भी था जब मुगल बादशाहों के सामने बड़े से बड़े राजा को खड़े रहना पड़ता था। किसी भी हालत में बैठने की अनुमति नहीं मिलती थी किंतु एक जमाना इन उदार अंग्रेजों का है जो राजाओं की टूटी हुई टांग के लिये अलग से कुर्सी रखतवाते हैं।

    प्रतापसिंह ने काबुल में अंग्रेजों की ओर से लड़ी गई लड़ाई में जोधपुर की सेना का नेतृत्व किया। इस युद्ध में वीरता प्रदर्शन के लिये प्रतापसिंह को 'आर्डर ऑंफ बाथ’ से सम्मानित किया गया। युद्ध की समाप्ति के बाद प्रतापसिंह की नियुक्ति दक्षिण अफ्रीका में की गई किन्तु अचानक ई.1897 में चीन के साथ युद्ध छिड़ गया। अतः प्रतापसिंह को चीन के मोर्चें पर भेजा गया। वहां भी प्रतापसिंह ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन किया। उसकी सेवा से संतुष्ट होकर अंग्रेज सरकार ने जोधपुर राज्य को चार तोपें भेंट कीं।

    मारवाड़ में विक्रम संवत 1956 (ई.1899) का भयंकर अकाल जो छपनिया के अकाल के नाम से जाना जाता है, प्रतापसिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में पड़ा। इस अकाल की भंयकरता का परिचय देते हुए कवि अमरदान लालस ने लिखा है-

    मांणस मुरधरिया मांणक सम मूंगा।

    कोड़ी-कोड़ी रा करिया श्रम सूंगा।

    डाढ़ी मूंछाळा डलिया 
    में  डुलिया।

    रलिया जायोड़ा गलियां में रूलिया।।

    आफत मोटी ने खोटी पळ आई।

    रोटी रोटी ने रैय्यत रोवाई।।


    अर्थात् मरूधरा के मनुष्य माणिक और मूंगा आदि रत्नों के समान महंगे थे। वे एक-एक कौड़ी का सस्ता परिश्रम करने लगे। गर्व युक्त दाढ़ी-मूंछों वाले टोकरियां उठाने लगे। महलों में पैदा हुए गलियों में भटकने लगे। यह आपत्ति का पल था जब जनता रोटी-रोटी को रोने लगी।

    ऐसी विपत्ति में महाराजा सरदारसिंह ने लाखों रूपये खर्च कर बाहर से अन्न मंगवाया तथा अंग्रेजी सरकार से कर्ज लेकर प्रजाहित के कार्य करवाये। इस अकाल के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। चान्दी के सिक्के ढलने बन्द हो गये। मुख्यतः ताम्बे और थोड़ी मात्रा में सोने के सिक्के ही ढाले जाने लगे।

    जब प्रतापसिंह चीन के मोर्चे पर था तब एक अंग्रेज अफसर ने उसे बताया कि भारत से आये एक अखबार में छपा है कि राजपूताने का एक राजा निस्संतान मर गया है। जब प्रतापसिंह ने नाम पूछा तो बताया गया कि वह ईडर का राजा था। इस पर प्रताप ने कहा कि ईडर राजपूताने में नहीं गुजरात में है, वह राजा मेरे ही कुल का था और अब मैं उस राज्य का अधिकारी हूँ। इस प्रकार ई.1902 में 56 वर्ष की आयु में प्रतापसिंह ईडर की गद्दी पर बैठा किंतु वह मरते दम तक जोधपुर राज्य को अपनी अनुपम सेवाएं देता रहा।

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