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  • राजाओं और नेताओं के मध्य वाक्युद्ध आरंभ हो गया!

     08.09.2017
    राजाओं और नेताओं के मध्य वाक्युद्ध आरंभ हो गया!

    मार्च 1940 में नयी दिल्ली में वायसराय की अध्यक्षता में चैम्बर ऑफ प्रिसेंज की बैठक हुई जिसमें एक प्रस्ताव पारित किया गया कि भारत के राजा अपने राज्यों की सम्प्रभुता की गारण्टी, संधि में प्रदत्त अधिकारों की सुरक्षा तथा ब्रिटिश प्रभुसत्ता के किसी अन्य भारतीय सत्ता को स्थानांतरण से पूर्व राजाओं की सहमति प्राप्त किये जाने की अनिवार्यता की शर्त पर ही डोमिनियन स्टेटस के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान करेंगे। लंदन से प्रकाशित समाचार पत्र 'द टाइम्स’ ने इस पर टिप्पणी की कि यह प्रस्ताव प्रदर्शित करता है कि भारतीय राजा संवैधानिक प्रगति का विरोध करते हैं तथा वे भारतीय आजादी का भी विरोध करते हैं।

    नवानगर के जाम साहब ने मांग की कि राजाओं के राज्य की सुरक्षा के लिये नये संविधान में विशेष सुरक्षा उपाय एवं गारण्टियाँ होनी चाहिये तथा राजाओं की सहमति के बिना उनके अधिकारों में परिवर्तन का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये। भारत की सभी इकाईयों के लिये संवैधानिक बाध्यता होनी चाहिये कि वे एक दूसरे का सम्मान करें तथा उन इकाईयों के लिये विशेष आचरण संहिता होनी चाहिये। संविधान बनाने के लिये राजा लोग किसी भी विचार विमर्श में सम्मिलित होने के लिये तैयार हैं जो कि वायसराय द्वारा आरंभ किया गया हो किंतु तभी जबकि राजाओं की आवाज को उनकी महत्ता और ऐतिहासिक स्थिति के अनुसार आनुपातिक रूप से प्रमुखता दी जाये।

    बीकानेर नरेश गंगासिंह ने कहा कि राजाओं ने विगत 10 वर्षों में अपनी स्थिति बिना किसी त्रुटि के स्पष्ट की है। उन्होंने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया है जो ब्रिटिश ताज के अधीन डोमिनियन स्टेटस की ओर ले जाते हैं। इस समय राजा लोग केवल अपनी सम्प्रभुता की गारण्टी और सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहे हैं।

    गंगासिंह ने कहा कि भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक धड़ों में राजाओं को विश्वास में लिये बिना भारत का भविष्य निर्धारित किये जाने की मनोवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में यह दोहराया जाना उपयुक्त था कि राज्यों की पूर्ण स्वतंत्रता तथा ब्रिटिश सत्ता के साथ चुनौती विहीन समानता को ध्यान में रखे बिना लिया गया कोई भी फैसला राजाओं को स्वीकार्य नहीं होगा। संवैधानिक समझौता दो पक्षों के बीच नहीं अपितु तीन पक्षों- ब्रिटिश ताज, ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के मध्य होना चाहिये। अब तक यह देखा गया है कि भारतीय राजा तस्वीर में ही नहीं लाये गये हैं।

    महाराजा ने कहा कि कांग्रेस की तरफ से यह आरोप लगाया जा रहा है कि राजा लोग साम्राज्य की उपज हैं, यह भी कि राजा लोग ब्रिटिश ताज के चाकर हैं तथा ब्रिटिश ताज से अलग उनका कोई स्थान नहीं है, यह भी कि रियासतों का प्रश्न भारत की साम्राज्यिक प्रगति के उद्देश्य के लिये लटकायी गयी मछली है, यह कि रियासतों की समस्या ब्रिटिश सरकार द्वारा खड़ा किया गया भूत है, .........मुझे यह कहने की इजाजत होनी चाहिये कि कई छोटी और बड़ी रियासतें अपने अस्तित्व के लिये अपने प्राचीन शासकों की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं तथा भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से कहीं अधिक पुरानी हैं। उनके दावों को, ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करके हवा में खारिज नहीं किया जा सकता। यह तो ब्रिटिश भारत ही है जो कि ब्रिटिश सरकार की रचना है। यह आरोप भी लगाया गया है कि राजाओं ने कांग्रेस के प्रति अमित्रता का व्यवहार किया है किंतु यह स्थिति का सही विवेचन नहीं है। कांग्रेस ही लगातार देशी राजाओं के प्रति सक्रिय विरोध का प्रदर्शन करती रही है। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने बयान दिये हैं कि वे रियासतों को संघ में नहीं देखना चाहते। यह कि वे राज्यों की संधियों को रद्दी कागज का टुकड़ा समझ कर फाड़ देंगे और यहाँ तक कि वे रियासतों को समाप्त हुआ देखना चाहेंगे।

    सम्मेलन में उपस्थित राजाओं ने ब्रिटिश ताज के प्रति वफादारी निभाने तथा साम्राज्य के प्रति सहयोग करते रहने का प्रस्ताव भी पारित किया। इस पर लंदन से प्रकाशित होने वाले द टाइम्स समाचार पत्र ने टिप्पणी की कि ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा आवश्यकता पड़ने पर देशी राजाओं के इस प्रस्ताव से लाभ उठाने की तैयारियां कर ली गयी हैं तथा भारतीय सैनिक टुकड़ियां ब्रिटिश सेनाओं के साथ मिलकर युद्ध में भाग ले रही हैं।

    सम्मेलन में वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा कि यद्यपि संघीय योजना स्थगित कर दी गयी है किंतु साम्राज्यिक सरकार विश्वास करती है कि भारतीय एकता केवल संघ के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है तथा संघ को देशी राज्यों की विशेष परिस्थितियों एवं परम्पराओं को अनुमति देनी होगी। देशी राज्यों के बिना अखिल भारतीय संघ वैसा ही अविचारणीय होगा जैसा कि ब्रिटिश भारतीय संघ मुसलमानों के बिना।

    वायसराय ने कहा कि यह अच्छा होगा कि कांग्रेस इस सच्चाई को समझे कि भारत में संवैधानिक प्रगति को इसलिये स्थगित कर दिया गया है क्योंकि भारत की मुख्य पार्टियाँ परस्पर सहमति बनाने में असफल रही हैं। युद्ध के चलते हुए भी भारत सरकार एवं साम्राज्यिक सरकार ने कांग्रेस तथा ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग के बीच बन गयी खाई को पाटने के परिश्रम युक्त कार्य को छोड़ा नहीं है।

    बहुसंख्य छोटी रियासतों की समस्याओं की और भी वायसराय ने देशी राजाओं का ध्यान आकर्षित किया जिनके पास आधुनिक प्रशासन को चलाने के लिये न तो आदमी हैं और न धन। सामान्य सेवाओं के निष्पादन के लिये, जहाँ कहीं भी भौगोलिक रूप से संभव हो, इन रियासतों के समूहीकरण के द्वारा संघीय इकाईयों के निर्माण की योजना भी वायसराय के मस्तिष्क में थी। इससे इन देशी रियासतों के भारतीय संघ में सम्मिलन का मार्ग भी सरल हो जायेगा।

    बीकानेर नरेश द्वारा चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में दिये गये भाषण में कांग्रेस की आलोचना पर नेताओं में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई। महाराजा ने अपने पूर्वजों की बलिष्ठ भुजाओं का उल्लेख करके नेताओं को खुली चुनौती दी थी। महाराजा ने मानो पानी में ही आग लगा दी थी इसलिये भारतीय राजनीति का अप्रत्याशित रूप से गर्म हो उठना स्वाभाविक था। गांधीजी के परम सहयोगी प्यारे लाल ने हरिजन में विस्तृत लेख माला लिखकर राजाओं को उनकी वास्तविक सामर्थ्य बताने का बीड़ा उठाया जिसका विस्तार से उल्लेख आगे की कड़ियों में किया जायेगा।

    देश बड़ी ही विचित्र स्थिति में जा पहुंचा था। एक ओर तो ब्रिटिश भारत की जनता गोरों से आजादी प्राप्त करने के लिये सड़कों पर संघर्ष कर रही थी तो दूसरी ओर भारतीय नौजवान सेनाओं में भर्ती होकर अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद की रक्षा के लिये लड़ रहे थे। एक ओर कांग्रेस गोरों को देश से भगाने का उपक्रम कर रही थी तो दूसरी ओर राजा लोग किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि गोरे भारत छोड़कर जायें। एक ओर कांग्रेस ब्रिटिश भारत और रियासती भारत को एक करने के लिये जूझ रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग अलग मुस्लिम देश की मांग करके कांग्रेस के सिर में दर्द पैदा कर रही थी और गोरी सरकार की मुश्किलों को दूर करने में सहयोग दे रही थी।

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