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  • राजपूताने ने तात्यां टोपे तथा लक्ष्मीबाई को शरण नहीं दी

     02.06.2020
    राजपूताने ने तात्यां टोपे तथा लक्ष्मीबाई को शरण नहीं दी

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    1857 की क्रांति के समय अलवर रियासत का शासक विनयसिंह गंभीर रूप से बीमार चल रहा था। उसने चिमनसिंह के नेतृत्व में 800 पैदल, 400 घुड़सवार तथा 4 तोपें आगरा भिजवायीं ताकि आगरा के दुर्ग में घिरे हुए अंग्रेजों को बाहर निकाला जा सके। 11 जुलाई 1857 को अलवर राज्य की सेना पर नीमच तथा नसीराबाद के विद्रोही सैनिकों ने आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में अलवर के 55 सैनिक मारे गये जिनमें 10 बड़े अधिकारी थे। माना जाता है कि अलवर से जो सेना निक्सन की सहायता के लिये गयी थी वह विद्रोही सैनिकों से रिश्वत खाकर विद्रोहियों के साथ मिल गयी तथा बिना लड़े ही मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई। जिस समय विनयसिंह को यह सूचना मिली, वह मृत्यु शैय्या पर पड़ा हुआ अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। उसने तत्काल आदेश जारी किया कि अंग्रेजों को एक लाख रुपये की सहायता भेजी जाये। यह आदेश देकर विनयसिंह के प्राण पंखेरू उड़ गये।

    1857 की क्रांति के समय भरतपुर का शासक जसवंतसिंह नाबालिग था तथा प्रशासन का काम पोलिटिकल एजेण्ट मेजर मौरीसन देखता था। जब आगरा तथा नीमच में विद्रोह के समाचार मिले तो मथुरा तथा भरतपुर की सेनाओं में भी विद्रोह हो गया। भरतपुर के राज्याधिकारियों ने अंग्रेज अधिकारियों को सलाह दी कि वे भरतपुर छोड़कर चले जायें क्योंकि यहाँ उनकी जान को खतरा है। इस पर 8 जुलाई 1857 को मि. कोल्विन भरतपुर छोड़कर चला गया। इस क्रांति की आड़ में लूट मार मचाने के लिये अलवर तथा भरतपुर राज्यों के गूजरों तथा मेवातियों ने भी उत्पात मचाना आरंभ कर दिया। बहुत से जाट भी उनके साथ हो गये। इन सबको विश्वास था कि अब भारत में अंग्रेजों का शासन नहीं रहेगा।

    धौलपुर के गूजर नेता देवहंस ने तीन हजार भगोड़े सैनिक एकत्रित करके अपनी सेना बना ली और 9 जुलाई को इरदत नगर तहसील पर कब्जा करके वहाँ से दो लाख रुपये लूट लिये। उसके साथी भवानी शंकर ने भी यही किया। इस विद्रोह को कुचलने के लिये कैप्टेन निक्सन ने भरतपुर से कूच किया किंतु वह लम्बे समय तक बागियों पर काबू नहीं पा सका।

    इस क्रांति के समय सीकर, खेतड़ी तथा सिंघाना के ठाकुरों ने विद्रोहियों को सहायता पहुँचाई। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए जयपुर राज्य ने खेतड़ी तथा कोटपूतली को हड़पने की नीयत से उन पर अधिकार कर लिया किंतु अंग्रेजों ने जयपुर राज्य की इस कार्यवाही का समर्थन नहीं किया तथा ये स्थान फिर से ठिकाणेदारों को लौटा दिये गये।

    इन दिनों बीकानेर राज्य पर सरदारसिंह का शासन था। उसने तन, मन तथा धन से अंग्रेजों की सहायता की तथा ब्रिटिश अधिकारियों एवं उनके परिवारों को ढूंढ-ढूंढ कर अपने महलो में बुलावाया और उन्हें शरण प्रदान की। इतना ही नहीं उसने क्रांतिकारियों को ढूंढ-ढूंढ कर मारा। जनरल लॉरेंस ने लिखा है- अन्य राजाओं ने भी अंग्रेजी कुटुम्बों को आश्रय तथा सहायता दी किंतु विद्रोह के कारण भागे अंग्रेजों का पता लगाने और उसकी रक्षा करने में जैसी सहायता बीकानेर के राजा ने की, वैसी किसी दूसरे से न हुई। बड़े-बड़े अंग्रेज अधिकारियों ने बीकानेर महाराजा को धन्यवाद के पत्र भेजे तथा उसका गुणगान किया। उसे सिरसा जिले के 41 गाँवों का टीबी परगना पुरस्कार में दिया गया।

    1857 की क्रांति का सुप्रसिद्ध नायक तात्यां टोपे 22 जून 1857 को ग्वालियर के निकट अंग्रेजों से परास्त हो गया। तात्यां को आशा थी कि उसे कोटा तथा जयपुर से सहायता मिलेगी इसलिये वह राजपूताने की ओर मुड़ा किंतु कोटा से सहायता न मिलने पर उसने लालसोट की ओर रुख किया। कर्नल होम्स बराबर उसके पीछे लगा रहा। जब तात्यां टोंक पहुंचा तो टोंक नवाब ने किले के दरवाजे बंद करवा लिये किंतु टोंक की सेना ने तात्यां का स्वागत किया। तात्यां ने टोंक नगर पर अधिकार कर लिया।

    टोंक राज्य से निकल कर तात्यां टोपे ने 9000 सैनिकों के साथ मेवाड़ की सीमा में प्रवेश किया। महाराणा ने तात्यां का मार्ग रोकने के लिये नीमच से सैनिक सहायता मंगवा ली तथा उदयपुर की रक्षा का प्रबंध कर लिया। इसलिये तात्यां उदयपुर न आकर गिंगली एवं भीण्डर होता हुआ प्रतापगढ़ पहुँचा। तात्यां ने महाराष्ट्र की ओर भाग जाने का विचार किया किंतु वर्षा ऋतु के कारण वह चम्बल नहीं पार कर सका। 14 अगस्त 1858 को तात्यां ने करौली के निकट अंग्रेजों को बुरी तरह हराया। इसके बाद उसने कोटा तथा बूंदी होते हुए झालावाड़ राज्य में प्रवेश किया।

    झालावाड़ की जनता तथा सेना ने तात्यां का स्वागत किया। तात्यां ने झालावाड़ नरेश पृथ्वीसिंह से 20 लाख रुपये की मांग की, पृथ्वीसिंह ने उसे 5 लाख रुपये दिये। इस पर तात्यां ने राजमहल घेर लिया। पृथ्वीसिंह उसी रात चुपके से महल छोड़ कर भाग गया। तात्यां ने झालावाड़ राज्य पर अधिकार कर लिया। रॉबर्ट, हैम्बिल्टन, माइकल तथा होम्स आदि अंग्रेज सेनापति अपनी-अपनी सेना लेकर हण्टिंग डॉग्स की तरह उसके पीछे लगे हुए थे। उनके आदेश पर देशी राज्यों की सेनाएं भी तात्यां के पीछे लग गयीं।

    15 सितम्बर 1857 को तात्यां ने राजपूताना छोड़ दिया किंतु कुछ ही दिन बाद उसे फिर से राजपूताने में प्रवेश करना पड़ा। इस बार वह बांसवाड़ा की ओर से घुसा। उसने बांसवाड़ा पर अधिकार करके अहमदाबाद से आ रहे 16-17 उँटों को लूट लिया जिन पर कपड़ा लदा हुआ था। परिस्थितियों से विवश होकर तात्यां को बांसवाड़ा भी छोड़ना पड़ा। वहाँ से वह दौसा तथा सीकर गया। इसी बीच तात्यां के 600 सैनिकों ने बीकानेर नरेश के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया जिससे तात्यां की हालत पतली हो गयी।

    तात्यां भागता रहा और अंग्रेजों से लड़ता रहा। जिस राजपूताने से उसे सहायता की आशा थी, वह राजपूताना अंग्रेजों के विश्रामदायक अंक में ऐसी गहरी नींद सो गया था कि तात्यां को हर कदम पर पराजय, अपमान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला। वह दिन लद चुके थे जब राजपूताने के राजा मराठों का नाम सुनते ही पसीने से तर बतर हो जाते थे। अंग्रेजों ने राजपूताने में इस मराठा सरदार की ऐसी हालत की जिसकी 1818ई.से पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

    23 दिसम्बर 1858 को मेजर लॉक ने तात्यां को करारी मात दी। 14 जनवरी 1859 को ब्रिगेडियर रॉबर्ट्स ने उसे दौसा में हराया। फरवरी 1859 में तात्यां फिर से मेवाड़ में घुसा परंतु 7 अप्रेल 1859 को नरवर के जागीरदार मानसिंह ने दगाबाजी करके तात्यां को गिरफ्तार करवा दिया। 1859 में उसे फांसी दे दी गयी। ई.1862 में सीकर के राजा को भी फांसी दे दी गयी। तात्यां के पतन के साथ ही भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने राजपूताने में दम तोड़ दिया।

    झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधे, घोड़ा दौड़ाती हुई ग्वालिअर, गुना, बीना तथा बारां होती हुई झालावाड़ नगर के निकट काली सिंध नदी के तट पर आ पहुंची। जब झालवाड के राजराणा पृथ्वीसिंह को अपने सैनिकों से ज्ञात हुआ कि रानी अंग्रेजी सेना से जान बचाकर नगर के बाहर नदी के किनारे ठहरी है तो उसने रानी को अपने महल में आमंत्रित किया। रानी की दशा देखकर पृथ्वीसिंह को भारत भूमि के भाग्य की वास्तविक स्थिति का बोध हआ। पृथ्वीसिंह ने रानी और उसके पुत्र को दो दिन तक अपने महल में ठहराया और उन्हें नये वस्त्र प्रदान किये। अंग्रेजी सेना रानी का पीछा करती हुई झालावाड़ तक आ पहुंची। अंत में रानी को झालावाड़ भी छोड़ना पड़ा। असीम धैर्य, साहस स्वाभिमान और पराक्रम का परिचय देकर रानी ने अंग्रेजों को खूब छकाया और अंत में भारतीय इतिहास में अपना नाम अमर करके इस संसार को त्याग गयी।

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