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  • राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध रूस के जार से सहायता मांगी

     02.06.2020
    राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध  रूस के जार से सहायता मांगी

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    ई.1818 में राजपूताना के शासक विभिन्न कारणों से ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि करने को विवश हुए थे किंतु 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद कम्पनी का स्थान ब्रिटिश ताज ने ले लिया। इसके बाद अंग्रेज जाति राजपूताना रियासतों की निरंकुश मालिक हो गयी। भारत में पदस्थापित अंग्रेज अधिकारियों को अब कम्पनी नहीं चलानी थी, ब्रिटिश ताज के प्रतिनिधि के रूप में भारत पर शासन करना था। इस कारण अंग्रेज अधिकारियों के साथ राजपूत राजाओं के जो सम्बन्ध ई.1818 से लेकर 1858 के बीच रहे थे, उन सम्बन्धों में ई.1858 के पश्चात् बड़ा परिवर्तन आ गया था। रूस के इतिहासकारों ने दावा किया है कि ई.1860 से ई.1866 के बीच राजपूताने के राजाओं ने रूस से आग्रह किया था कि वह भारत को अंग्रेजों के नियंत्रण से निकालने के लिये भारत पर आक्रमण करे। इन दस्तावेजों के अनुसार जोधपुर नरेश तख्तसिंह ने अपने दामाद जयपुर नरेश रामसिंह और अपने समधी रींवा नरेश महाराजा रघुराजसिंह जूदेव के सहयोग से अपना एक दूत रूस के जार निकोलस को भिजवाया तथा उससे कहलवाया कि वह भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने में राजाओं को सहायता दे। ई.1964 में रूस के पुरातत्वशास्त्री एन. ए. खालफिन ने इस तथ्य को उजागर किया कि ई.1860 में कश्मीर के महाराजा रणवीरसिंह ने मध्य एशिया में तुर्किस्तान के रूसी गवर्नर के पास संदेश भेजा कि भारत से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ने हेतु भारतीय राजा रूस की सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। खालफिन के अनुसार ई.1866 में जोधपुर, जयपुर, बीकानेर व हैदराबाद के शासकों ने इन्दौर महाराजा के नेतृत्व में निश्चय किया कि अंग्रेजों को भारत से निकालने हेतु रूस के शासकों से सहायता ली जानी चाहिये। इस निर्णय की क्रियान्विति हेतु उन्होंने एक शिष्टमण्डल ताशकंद भेजा था। 1858 के बाद से भारत का गवर्नर जनरल देशी रियासतों से वायसराय की हैसियत से सम्बन्ध स्थापित करने लगा था। इन गवर्नर जनरलों ने वायसराय की हैसियत से राजपूताना की रियासतों पर अपना प्रभुत्व प्रदर्शित करने के लिये कई उपाय किये। गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड मेयो ने 22 अक्टूबर 1870 को अजमेर दरबार का आयोजन किया जिसमें राजपूताने के समस्त नरेशों को सम्मिलित होने का आदेश दिया गया। इस प्रकार के दरबारों की पुनरावृत्ति बार-बार की गयी। इन दरबारों में गवर्नर जनरल और वायसराय इंग्लैण्ड के शासक के प्रतिनिधि के रूप में सर्वोच्च सत्ता के रूप में अध्यक्षता करने वाला अधिकारी होता था। अंग्रेज अधिकारियों के अनुचित हस्तक्षेप के कारण कई बार राजाओं और अंग्रेज अधिकारियों के बीच भारी टकराव हो जाता था किंतु ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर देशी राज्यों के शासकों को हानि ही उठानी पड़ती थी। लॉर्ड मेयो द्वारा आयोजित अजमेर दरबार में मारवाड़ (जोधपुर) रियासत के राजा तख्तसिंह की कुर्सी जयपुर और उदयपुर नरेशों की कुर्सियों के पीछे लगायी गयी थी। महाराजा तख्तसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और वह दरबार में शामिल हुए बिना ही जोधपुर लौट आया। अंग्रेजी सरकार जोधपुर नरेश के आगमन पर 17 तोपों की सलामी देती थी किंतु इस घटना से नाराज होकर लॉर्ड मेयो ने तखतसिंह को दी जाने वाली तोपों की सलामी की संख्या घटाकर 15 कर दी। भारतीय संसाधनों से अधिकतम लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने ई.1870 से 1880 के दशक में विभिन्न राज्यों से नमक संधियां व मादक पदार्थ संधियां कीं। इन संधियों के तहत प्रत्येक राज्य द्वारा उत्पादित किये जाने वाले नमक की सीमा निर्धारित की गयी तथा राज्य में बाहर से खरीदे जाने वाले नमक के लिये आवश्यक कर दिया गया कि केवल वही नमक खरीदा जायेगा जिस पर अंग्रेज सरकार द्वारा कर वसूली कर ली गयी हो तथा ऐसे नमक पर राज्य सरकार किसी तरह का मार्ग कर नहीं लगायेगी। इन संधियों के तहत राज्यों को अंग्रेज सरकार द्वारा वार्षिक धनराशि भी प्रदान की गयी। इस प्रकार की संधि जोधपुर राज्य के साथ ई.1870 में, जयपुर, बीकानेर मेवाड़, भरतपुर, सिरोही, धौलपुर तथा अलवर राज्यों के साथ ई.1879 में, झालावाड़ के साथ 1881 में एवं शाहपुरा, बूंदी, कोटा, करौली व अन्य राज्यों के साथ ई.1882 में की गयी। राजपूताने के मालवा क्षेत्र में अफीम के वृहत् उत्पादन तथा पूरे राजपूताना में इसके विशाल व्यापार को देखते हुए मादक द्रव्यों के सम्बन्ध में की गयी संधियों के तहत राज्यों पर प्रतिबंध लगाया गया कि वे राज्यों से ब्रिटिश भारत के क्षेत्रों में मादक द्रव्यों का निर्यात नहीं करेंगे। राजा लोग अनुभव कर रहे थे कि वे अपने ही राज्यों में सत्ता के कनिष्ठ भागीदार होते जा रहे हैं किंतु उन्होंने अधीनता की इस स्थिति को स्वीकार किया और वे साम्राज्य में कनिष्ठ भागीदार बन गये क्योंकि उन्हें अपने राज्यों के शासक के रूप में उनके अस्तित्व की निरंतरता का आश्वासन दे दिया गया था। अब राजाओं के स्थान पर देशी राज्यों में नियुक्त पोलिटिकल एजेण्ट निरंकुश शासक थे। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। ई.1900 में पोलिटिकल एजेंट कप्तान एस. एफ. बेली हनुमानगढ़ जिले में भ्रमण के लिये आया। उस समय बीकानेर राज्य में शिकार पर प्रतिबंध था तथा बिना अनुज्ञा पत्र (लाइसेंस) लिये किसी भी पशु-पक्षी का शिकार नहीं किया जा सकता था। अतः महाराजा गंगासिंह ने कप्तान बेली को शिकार खेलने का अनुज्ञा पत्र भिजवा दिया ताकि यदि बेली शिकार खेले तो किसी अप्रिय स्थिति का सामना नहीं करना पड़े। बेली ने महाराजा गंगासिंह को लिखा कि आपके द्वारा शिकार खेलने का अनुज्ञा पत्र पाकर मेरा बड़ा मनोरंजन हुआ। मैं इस अनुज्ञा पत्र को फ्रेम में मंढ़वा कर रखूंगा तथा अपने साथियों को भी दिखाऊंगा कि बीकानेर इतना उन्नत राज्य है जहाँ पोलिटिकल एजेंट भी बिना लाइसेंस के शिकार नहीं खेल सकते। महाराजा गंगासिंह पोलिटिकल एजेण्ट की इस हरकत से तिलमिला कर रह गये किंतु उसके विरुद्ध कर कुछ नहीं सके। उसके विरुद्ध कुछ करना तो दूर की बात है, जब 1900 में अंग्रेजों ने चीन युद्ध लड़ा तो महाराजा गंगासिंह ने बेली के समक्ष प्रस्ताव भेजा कि मैं भी इस युद्ध में जाना चाहता हूँ। कप्तान बेली ने महाराजा गंगासिंह के प्रस्ताव का उपहास उड़ाते हुए 5 नवम्बर 1900 को उन्हें एक पत्र लिखा- सर डब्लू. कनिंघम ने आशा जताई है कि यह जानकर आपका दुख हलका हो जायेगा कि ऐसे गहन दुर्भिक्ष तथा संकट के समय में, जैसा कि इस समय राजपूताने में विद्यमान है, एक नरेश साम्राज्ञी के शत्रुओं के विरुद्ध समरभूमि में अपनी व्यक्तिगत सेवा से भी अधिक, अपने राज्य तथा प्रजा के हितों की देखभाल करके साम्राज्ञी को अधिक मूल्यवान सेवायें अर्पित कर सकता है। इस उपहासात्मक इन्कार के बावजूद महाराजा गंगासिंह ने अपनी स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अंग्रेज सरकार से चीन युद्ध में लड़ने की स्वीकृति प्राप्त की और वह अपनी जनता को अकाल में तड़पता हुआ छोड़कर युद्ध में भाग लेने के लिये चीन गया।

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