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  • पोलिटिकल एजेण्ट मेजर रॉस से प्रसन्न नहीं थीं जयपुर की राजमाता चन्द्रावती

     14.07.2017
    पोलिटिकल एजेण्ट मेजर रॉस से प्रसन्न नहीं थीं जयपुर की राजमाता चन्द्रावती

    राजमाता भटियानी की मृत्यु (ई.1833) के बाद जयपुर राज्य के प्रधानमंत्री झूथाराम की मुश्किलें और बढ़ गयीं। जोधपुर राज्य ने अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष आरोप लगाया कि शेखावाटी के डाकू जोधपुर राज्य में घुसकर लूटपाट करते हैं। जब झूथाराम डाकुओं पर काबू नहीं पा सका तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शेखावाटी तथा तोरावाटी पर अधिकार कर लिया। इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने शेखावाटी ब्रिगेड का गठन किया जिसका सारा व्यय जयपुर राज्य के सिर डाला गया। जयपुर राज्य से तुरंत धन न मिलने पर 27 जनवरी 1835 को ब्रिटिश सरकार द्वारा सांभर झील तथा उससे संलग्न गाँवों पर अधिकार कर लिया गया।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा की गयी इस लूट खसोट थी के कारण राज्य की आय और गिर गयी तथा राज्य पर 13 लाख रुपये का कर्ज हो गया। उधर जयपुर का महाराजा समय की गति के साथ बड़ा हो रहा था किंतु इससे पहले कि उसे राज्याधिकार मिल पाते, 4 फरवरी 1835 को उसका निधन हो गया। राज्य में अफवाह फैल गयी कि झूथाराम ने महाराजा को जहर दे दिया। जिस समय अवयस्क महाराजा जयसिंह तृतीय मृत्यु को प्राप्त हुआ उस समय उसका पुत्र रामसिंह मात्र 16 महीने का था। उसका जन्म 28 सितम्बर 1833 को हुआ था। जयपुर राज्य में नयी प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिये मेजर अवेल्स अजमेर से जयपुर आया। उसने रामसिंह को जयपुर का महाराजा घोषित किया तथा झूथाराम को जयपुर से बाहर निकालकर बैरीसाल को फिर से जयपुर का मुख्तार (प्रधानमंत्री) बना दिया।

    इससे पहले कि झूथाराम को जयपुर से बाहर निकाला जाता, 4 जून 1835 को मेजर एवेल्स, अपने साथियों- लूडलो, मेक नाकटन तथा कैप्टेन ब्लैक को लेकर राजमाता चंद्रावती के साथ विचार विमर्श करने के लिये जयपुर के महलों में आया। जब वह विचार विमर्श करके जयपुर के राजमहल से निकला तो उसने महल के बाहर हजारों आदमियों को खड़े हुए पाया। इस भीड़ ने अचानक ही अंग्रेज अधिकारियों पर हमला बोल दिया। फतहसिंह नामक एक व्यक्ति ने मेजर एवेल्स को घायल कर दिया। एवेल्स बच गया तथा फतहसिंह पकड़ा गया। लुडलो तथा मेक नागटन भी बचकर भाग गये। कैप्टेन ब्लैक मारा गया।

    इस घटना की जांच करवाने के लिये पाँच अधिकारियों की एक समिति बनायी गयी। इस समिति में बीकानेर का वकील हिन्दूमल, जैसलमेर का वकील सरदारमल तथा जयपुर राज्य के तीन ठाकुर लिये गये। समिति ने रिपोर्ट दी कि यह एक पूर्व नियोजित षड़यंत्र था जिसमें झूथाराम और उसके आदमियों का हाथ था। समिति की रिपोर्ट के आधार पर दीवान अमरचंद और हिदायतुल्ला को फांसी पर लटका दिया गया। शिवलाल, मानिकचंद, झूथाराम तथा उसके भाई हुकमचंद को आजीवन कारावास में रखा गया। इसी के साथ झूथाराम की कहानी का पटाक्षेप हो जाता है।

    इस घटना के बाद फिर से बैरीसाल को राज्य का मुख्तार बनाया गया। बैरीसाल को लोकप्रिय बनाने के लिये ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शेखावाटी तथा तोरावाटी फिर से जयपुर को लौटा दिये। कुछ समय बाद बैरीसाल मर गया तथा उसका पुत्र शिवसिंह मुख्तार बनाया गया। ई.1838 में मेजर रॉस जयपुर राज्य का पोलिटिकल एजेण्ट बना। राजमाता चंद्रावती मेजर रॉस की नियुक्ति से अप्रसन्न थीं किंतु शिवसिंह ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये मेजर रॉस का विश्वास अर्जित किया। राजमाता चंद्रावती शिवसिंह को हटाने की जुगत भिड़ाने लगी।

    जयपुर राज्य के सेनापति मुन्नालाल ने रानी का पक्ष मजबूत करने के लिये रामगढ़ में स्थिति बटालियन को विद्रोह करने के लिये उकसाया। ये बटालियनें अपने चढ़े हुए वेतन की मांग करने लगीं। 2000 नागा सिपाही भी विद्रोहियों के साथ हो गये। इस पर ए.जी.जी. मेजर एवेल्स जयपुर आया तथा उसने मुन्नालाल को हटाकर चौमूं के ठाकुर लक्ष्मणसिंह को जयपुर सेना का कमाण्डर नियुक्त किया जिससे विद्रोह शांत हो गया।

    अवेल्स के बाद सरदलैण्ड राजपूताने का ए. जी. जी. होकर आया। उसका मानना था कि पर्दानशीन रानी के द्वारा राज्य का शासन चलाना संभव नहीं है। अतः उसने पोलिटिकल एजेण्ट की अध्यक्षता में पाँच सदस्यों वाली रीजेंसी कौंसिल का गठन करके शासन अधिकार रीजेंसी कौसिंल को सौंप दिये। अब तक चली आ रही रीजेंट राजमाता चंद्रावती का प्रशासन में कुछ भी हस्तक्षेप नहीं रह गया। शेखावाटी ब्रिगेड को रीजेंसी कौंसिल के सुपुर्द कर दिया गया। इसके बाद 11 साल तक रीजेंसी कौंसिल ने ही जयपुर रियासत का प्रशासन किया।

    निरंतर अकाल चलने के कारण तथा ब्रिटिश सरकार द्वारा सांभर झील तथा उससे संलग्न गाँवों पर अधिकार कर लिये जाने के कारण राज्य की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गयी और राज्य पर साहूकारों का 13 लाख रुपये का कर्ज हो गया। ई.1842 में एजीजी थोरसेबी ने ब्रिटिश सरकार से सिफारिश की कि राज्य का खिराज 8 लाख प्रतिवर्ष से घटाकर 4 लाख कर दिया जाये। यह सिफारिश मान ली गयी जिससे जयपुर को चैन की सांस आयी। अगले ही वर्ष शेखावाटी ब्रिगेड को ब्रिटिश फौज में मिला दिया गया जिससे जयपुर राज्य को ढाई लाख रुपये प्रतिवर्ष की बचत हुई। सांभर झील फिर से जयपुर राज्य को लौटा दी गयी।

    थोरसेबी के सुधारों से जयपुर राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरी तथा जयपुर रियासत एवं ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सम्बन्धों में सुधार आया जो कि ई.1818 की संधि के बाद से ही खराब चल रहे थे। 24 जनवरी 1824 को लुडलो रीजेंसी कौंसिल का अध्यक्ष बना। उसके शासन काल में झूथाराम के समय विभिन्न स्थानों पर जमा करवायी गयी धनराशि प्राप्त हो गयी जिससे जयपुर राज्य पर चढ़े ऋण का दो तिहाई हिस्सा चुका दिया गया।

    लुडलो का शासनकाल जयपुर राज्य में सामाजिक सुधारों तथा जनकल्याण के कार्यों के लिये जाना जाता है। उसके काल में सती प्रथा पर रोक लगी। गुलामों के क्रय विक्रय पर रोक लगी। कन्या वध पर रोक लगी। शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्नति हुई। राज्य में सड़कों व बांधों का निर्माण करवाया गया। लुडलो ने युवा महाराजा रामसिंह की शिक्षा का समुचित प्रबंध किया। महाराजा को अंग्रेजी, हिन्दी उर्दू, संस्कृत एवं फारसी भाषाओं का ज्ञान करवाया गया। इतिहास, दर्शन और विज्ञान विषयों की जानकारी करवायी गई। जब महाराजा वयस्क हो गया तो ई.1854 में उसे शासन के समस्त अधिकार सौंप दिये गये एवं रीजेंसी कौंसिल को भंग कर दिया गया। इस कार्य से जयपुर राज्य में ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। महाराजा को शासन के कार्य में सहयोग देने के लिये एक कौंसिल का गठन किया गया।

    उन्नीसवीं सदी के मध्य तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपने शत्रुओं से निबट चुकी थी तथा प्रशासन पर पकड़ बनाने के लिये देशी राज्यों में आधारभूत ढांचा खड़ा करने का प्रयास करने लगी। वह राज्यों को ब्रिटिश प्रशासित क्षेत्रों से रेल तथा सड़क यातायात से जोड़ने लगी। ई.1856 में ब्रिटिश फौज के आवागमन के लिये जयपुर से भरतपुर राज्य की सीमा तक सड़क बनायी गयी। उसी वर्ष जयपुर राज्य में हैजे का प्रकोप हो गया। इस संकट में ब्रिटिश सरकार की तरफ से लोगों को निशुल्क दवायें उपलब्ध करवायी गयीं। इतना सब होने पर भी देशी रियासतों में अंग्रेजों के विरुद्ध हवा खराब हो चली थी।

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