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  • प्यारेलाल ने महाराजा गंगासिंह को मुँहतोड़ जवाब दिया

     08.09.2017
    प्यारेलाल ने महाराजा गंगासिंह को मुँहतोड़ जवाब दिया

    बीकानेर गंगासिंह ने चैम्बर ऑफ प्रिंसेज में दिये गये भाषण में तीन प्रमुख बातें कही थीं- एक तो यह कि राजा लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद की उपज नहीं हैं अपितु ब्रिटिश भारत ब्रिटिश सम्राज्यवाद की उपज है। दूसरी यह कि अधिकांश रियासतें अपने राजाओं की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं इसलिये उन्हें मिटाया नहीं जा सकता। तीसरी यह कि राजा लोग कांग्रेस से नहीं लड़ रहे, कांग्रेस राजाओं से द्वेष भाव रखती है।

    इन बातों का जवाब देने के लिये गांधीजी के परम सहयोगी प्यारेलाल ने 20 अप्रेल 1940 के हरिजन में एक विस्तृत लेख लिखा जिसमें कहा गया कि दुर्भाग्य से इस प्रकार की बेतुकी बात हो गयी है किंतु यह बहुत विलम्ब से कही गयी है। परमोच्च सत्ता से राजाओं के सम्बन्धों की संवैधानिक स्थिति चाकर अथवा अधीनस्थ सहयोग की है, कोई भी कह सकता है कि यह कांग्रेस की शब्दावली नहीं है। इसकी नींव उस साम्राज्यवादी शासन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों ने रखी थी जिसके बारे में बीकानेर के महाराजा अनेक बार कह चुके हैं कि उन्हें इन सम्बन्धों पर गर्व है। महाराजा की इस बात पर उठायी गयी आपत्ति कि राजा लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रचना हैं, भारतीय राज्यों की यह परिभाषा भारत सरकार अधिनियम 1935 में देखी जा सकती है जो कि इस प्रकार से है- ''भारतीय राज्य का अर्थ है कोई भी ऐसा क्षेत्र जो ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं हो, जिसे सम्राट ने राज्य होने की मान्यता दे रखी हो, चाहे वह स्टेट, अथवा एस्टेट अथवा जागीर या अन्य कुछ कह कर सम्बोधित की गयी हो।"

    प्यारेलाल ने लिखा कि राजाओं की वैधानिक स्थिति विशुद्धतः सम्राट की मान्यता पर निर्भर करती है। रियासती भारत के साथ ब्रिटिश सम्बन्धों का इतिहास ऐसे उदाहरणों से छितराया हुआ है जिनमें साम्राज्यिक शक्ति की एक श्वांस के द्वारा आवश्यकतानुसार परिवर्तित होती हुई नीति से रियासतों को बनाया गया अथवा बिगाड़ा गया अथवा जमींदारियों को ठिकानों में (चीफशिप्स) में बदला गया अथवा इसका उल्टा किया गया।.........मध्य भारत में इस समय ऐसी 145 रियासतें हैं जो मराठों की प्रभुसत्ता समाप्त होने के समय अस्तित्व में नहीं थीं उन्हें ए.जी.जी. द्वारा मान्यता प्रदत्त है। कुल 212 नयी रियासतों का निर्माण किया गया है.......इन रियासतों को श्रेणी प्रदान करते समय जिस सिद्धांत की पालना की गयी है उसमें रियासत के मुखिया के अधीन गाँवों की संख्या, उसकी आय तथा उसकी अन्य स्थिति को ध्यान में रखा गया है। यहाँ तक कि वे भूस्वामी जो एक या दो गाँवों के स्वामी थे, उन्हें भी छठी या सातवीं श्रेणी में रख दिया गया। आगे चलकर, नयी बनी हुई 212 रियासतें उत्तराधिकारियों के बंटवारे के कारण छोटी होती हुई विलुप्त हो गयीं और मात्र कृषि भूमि रह गयीं। कई रियासतें अपनी शक्तियों का उपयोग करने में असमर्थ पायी गयीं और वे समस्त शक्तियों से वंचित कर दी गयीं।

    अब उलटा करके देखें, इम्पीरियल गजेटियर 1907 में रियासतों की कुल संख्या 693 दी गयी है किंतु वर्ष 1925 की सूची में रियासतों की संख्या केवल 562 ही दी गयी है। 1925 में रियासतों की कम संख्या का कारण मध्य भारत एजेंसी के तहत ठिकाणों की संख्या का 148 से घटकर मात्र 89, बर्मा ऐजेंसी के तहत 52 से घटकर शून्य तथा असम एजेंसी के तहत 52 से घटकर 1 रह जाना है। यहाँ तक कि जोधपुर एवं भरतपुर के शक्तिशाली राजाओं की स्थिति भी चौंकाने वाले स्तर तक बदलती रही है........मुगल शासन द्वारा जोधपुर एवं भरतपुर के शक्तिसम्पन्न राजाओं को जमींदार कहकर संबोधित किया गया है जो कि वर्तमान समय में किये जाने वाले सम्बोधन से काफी नीचे है और हम उन शासकों के शासन काल के बारे में जानते हैं। वे बादशाह के सिंहासनारोहण के समय उपस्थित रहने के लिये बाध्य थे।

    प्यारेलाल लिखते हैं कि बीकानेर महाराजा का यह बयान सच नहीं है कि राजा लोग साम्राज्यिक सत्ता की रचना नहीं हैं। ऐतिहासिकता और सच्चाई यह है कि 562 रियासतों में से अधिकांश रियासतों का निर्माण ब्रिटिश सत्ता ने ही किया है। सच्चाई तो इससे भी आगे है। आज भारतीय रियसातों में आंतरिक प्रशासन के लिये अपनायी गयी पद्धति में न तो राजतंत्र के लिये आवश्यक खूबियां मौजूद हैं, न लोकप्रिय सरकारों की संवैधानिक पद्धतियां मौजूद हैं, वह व्यक्तिपरक शासन है जो कि भारत में साम्राज्यिक पद्धति द्वारा प्रदत्त शासन का सह उत्पाद है।

    महाराजा साहब का यह कथन कि अनेक रियासतें अपने अस्तित्व के लिये अपने वर्तमान शासकों के पूर्वजों की बलिष्ठ भुजाओं की ऋणी हैं, मैं बीकानेर के इतिहास के गौरव को किंचित मात्र भी क्षति पहुँचाये बिना कहना चाहता हूँ कि बीकानेर और ब्रिटिश सरकार के मध्य प्रथम संधि 9 मार्च 1818 को हुई थी जिसमें कहा गया था कि महाराजा और उनके उत्तराधिकारी पर सहमत हैं कि ब्रिटिश सरकार राज्य की रक्षा करेगी तथा महाराजा और उसके उत्तराधिकारी ब्रिटिश सरकार के अधीनस्थ सहयोग के तहत काम करेंगे तथा उसकी सर्वोच्चता को स्वीकार करेंगे। महाराजा एवं उनके उत्तराधिकारी किसी के ऊपर आक्रमण नहीं करेंगे। ब्रिटिश सरकार को अधिकार होगा कि विद्रोही ठाकुरों और उनकी जनता को शक्तिविहीन कर दे। इस कार्य का पूरा व्यय बीकानेर राज्य को वहन करना होगा।

    प्यारेलाल आगे लिखते हैं- 1830 में ब्रिटिश रेजीडेंट ने विद्रोही सामंतों को कुचलने में महाराजा की सहायता के लिये बीकानेर राज्य में सेना भेजने का निर्णय लिया किंतु महाराजा को समझा दिया गया कि भविष्य में उसे अपनी असंतुष्ट जनता के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार से सैनिक सहायता मांगने का कोई अधिकार नहीं होगा। 1871 में असंतोष उत्पन्न हुआ, रियासत कर्ज में थी। महाराजा द्वारा राजस्व वृद्धि किये जाने के विरुद्ध प्रबल असंतोष भड़क गया। ठाकुर ने बीकानेर छोड़ कर ब्रिटिश सीमा में शरण ली। महाराजा और उसके सामंतों के बीच के विवाद को सुलझाने के लिये ब्रिटिश जाँच नियुक्त की गयी। ई.1883 में रियासत के मामले संदेह से देखे गये। बीकानेर में रेजीडेंट पॉलिटिकल एजेंट की नियुक्ति की गयी। क्या इन उदाहरणों के परिप्रेक्ष्य में भी महाराजा बीकानेर को अपने पूर्वजों की शक्तिशाली भुजाओं पर आधारित राज्य कहेंगे?

    प्यारेलाल ने बटलर समिति के हवाले से लिखा है- यह बात ऐतिहासिक तथ्यों से साम्य नहीं रखती कि ब्रिटिश सत्ता के संपर्क में आने से पूर्व भारतीय राज्य पूर्णतः स्वतंत्र थे। उनमें से कुछ का उद्धार किया गया, कुछ का निर्माण ब्रिटिश सत्ता द्वारा किया गया..... परमोच्चता और केवल परमोच्चता के माध्यम से ही ये सम्बन्ध मजबूत बनाये गये हैं।......... जिनके ऊपर भारतीय राजा अपनी सुरक्षा के लिये पीढ़ियों से विश्वास कर सकते आये हैं। यदि परमोच्चता को समाप्त कर दिया जाये तो रियासतों के नष्ट होने तथा उन्हें संलग्न कर लिये जाने का अत्यधिक खतरा है।

    भारत सरकार द्वारा अलिख भारतीय संघ की योजना स्थगित कर दिये जाने के बाद महाराजा गंगासिंह ने सम्राट के संरक्षण में एक एसे संघ की कल्पना की जिसमें भारतीय रियासतें समान जागीरदार के रूप में मानी जायें और राजाओं को वायसराय की देख-रेख में रखकर उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रखे जायें। इसे देखते हुए 1941 में वी. पी. मेनन ने नयी योजना बनायी जिसके अनुसार रजवाड़ों को ब्रिटिश हिंदुस्तान का हिस्सा बन जाना था। इन राज्यों का आंतरिक प्रशासन राजाओं के ही हाथों में रहना था और सुरक्षा, विदेश तथा यातायात केंद्रीय सरकार के हाथों में ले लिया जाना था। इस योजना से केंद्रीय हिंदुस्तान की नींव पड़ सकती थी किंतु लार्ड लिनलिथगो ने उस योजना को उस कूड़े में डाल दिया जिस पर किसी की नजर भी नहीं पड़ सकती थी।

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