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  • सालिमसिंह के अत्याचारों से तंग होकर पालीवाल ब्राह्मणों ने जैसलमेर छोड़ दिया

     23.11.2017
    सालिमसिंह के अत्याचारों से तंग होकर  पालीवाल ब्राह्मणों ने जैसलमेर छोड़ दिया

    सालिमसिंह के अत्याचारों से तंग होकर पालीवाल ब्राह्मणों ने जैसलमेर छोड़ दिया

    पल्लिका नगर के रहने वाले ब्राह्मण पालीवाल ब्राह्मण कहलाये। पल्लिका को अब पाली के नाम से जाना जाता है। पालीवाल ब्राह्मणों का बड़ा ही सम्पन्न समुदाय था। तेरहवीं शताब्दी के अंत में पश्चिम की ओर से होने वाले मुस्लिम आक्रमणों के कारण पालीवाल ब्राह्मणों का पाली नगर में रहना कठिन हो गया।

    उन दिनों कन्नौज के राजा जयचंद के वंशज मुहम्मद गौरी के हाथों परास्त होने तथा कन्नौज से खदेड़ दिये जाने के कारण काली नदी के किनारे दुर्ग बनाकर रहते थे किंतु वहाँ से भी खदेड़ दिये जाने के कारण जयचंद का वंशज सीहा अपने परिवार एवं साथियों को लेकर द्वारिका की यात्रा पर निकल गया।

    सीहा गौ, ब्राह्मण, एवं स्त्रियों का रक्षक, शरणागत वत्सल एवं धर्मनिष्ठ व्यक्ति था। द्वारिका से लौटते हुए वह पाली में रुका। जब पालीवाल ब्राह्मणों को सीहा के आगमन की जानकारी हुई तो वे सीहा के समक्ष उपस्थित हुए। उन्होंने सीहा से अनुरोध किया कि वह पश्चिम से आने वाले मुसलमानों से हमारी रक्षा करे।

    सीहा भी मुसलमानों से तंग आया हुआ था और उनसे दो-दो हाथ करके मन की निकालना चाहता था। कहीं न कहीं तो पैर टिकाने के लिये स्थान की आवश्यकता थी ही इसलिये उसने पालीवाल ब्राह्मणों का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

    इस बार जब मुस्लिम आक्रांताओं ने बहुत बड़ी फौज के साथ पाली पर आक्रमण किया तब सीहा और उसके पुत्र आसथान ने उनका मार्ग रोका। सीहा के आदमियों के साथ-साथ पालीवाल ब्राह्मण भी तलवार लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़े। पाली नगर में बड़ा भयानक युद्ध हुआ। सीहा तथा पालीवाल ब्राह्मणों दोनों के लिये ही यह जीवन-मरण का प्रश्न था। इसलिये उन्होंने अंत तक मोर्चा नहीं छोड़ा। इस युद्ध में एक लाख स्त्री एवं पुरुष या तो मारे गये या फिर उनके अंग-भंग हो गये। इस कारण इस युद्ध को मारवाड़ के इतिहास में लाख झंवर कहा जाता है। मृत ब्राह्मणों के जनेऊ तथा विधवा ब्राह्मणियों के चूड़ों से एक पाली नगर में एक चबूतरा बनाया गया जिसे धौला चौंतरा कहते थे।

    सीहा पूरे 30 वर्ष तक सीहा मुस्लिम आक्रांताओं से लोहा लेता रहा। उसकी मृत्यु भी मुसलमानों से लड़ते हुए हुई। ब्राह्मणों का आाशीर्वाद सीहा का फला और उसके वंशजों ने मारवाड़ में प्रबल राठौड़ साम्राज्य की स्थापना की।

    पालीवाल ब्राह्मणों के 84 गाँव जैसलमेर जिले में भी थे। इनमें से मंडाई, धनवा, कुलधरा, खाभा, मुबार, ब्रज, लोणेला, काठोड़ी, मोढ़ा, सीतसर आदि अधिक प्रसिद्ध थे। जैसलमेर राज्य के पालीवाल भी बड़े समृद्ध और साधन सम्पन्न लोग थे। इन्होंने वर्षा से खड्डों में भर जाने वाले क्षेत्रों में कृषि करने में महारत प्राप्त की। ये क्षेत्र पालीवालों के खड़ीन कहे जाते थे। जैसलमेर के पालीवालों ने अपने गाँवों में तालाब, सरोवर, बावड़ियां, कुएँ, मंदिर, छतरियां, चौकियां, देवलियां, धर्मशालाएं, यज्ञस्तंभ तथा बाग-बगीचे बनवाये। इनकी सम्पन्नता की कहानियां दूर-दूर तक प्रसिद्ध थीं।

    ई.1815 में एक पालीवाल ब्राह्मण एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहा था। उसे मार्ग में भाटी सामंतों ने लूट लिया। ब्राह्मण के साथ चल रही वृद्धा के पैरों में से जब चांदी के कड़े नहीं निकले तो भाटियों ने उसके पैर काटकर कड़े निकाल लिये।

    ब्राह्मणों ने इस लूट की शिकायत जैसलमेर के राजा मूलराज द्वितीय से की। उन दिनों जैसलमेर में शासन की वास्तविक शक्ति सालिमसिंह के पास थी। इसलिये ब्राह्मणों की कोई सुनवाई नहीं हुई। उल्टे उसने ब्राह्मणों पर कई तरह के कर लगा दिये तथा उन पर अत्याचार किये। इससे तंग आकर ई.1815 की एक रात को पालीवालों ने चुपचाप जैसलमेर राज्य छोड़ दिया।

    कहते हैं कि सालिमसिंह के अत्याचारों से तंग आकर जैसलमेर राज्य की आधी जनसंख्या राज्य से पलायन कर गयी। सालिमसिंह ने अपार धन एकत्र किया तथा अपने लिये जैसलमेर, जोधपुर तथा बीकानेर में कई हवेलियां बनवाईं। इनमे से जैसलमेर की हवेली मोतीमहल के नाम से जानी जाती थी। यक एक सात खण्डा विचित्र और ऊँचा भवन था। इस हवेली का शिल्प सौंदर्य बेजोड़ था। इसके कंगूरों एवं झरोखों पर नाचते मयूर व कमल देखते ही बनते थे।

    मूलसिंह के बाद गजसिंह जैसलमेर का महारावल हुआ। दीवान सालिमसिंह ने महारावल गजसिंह के लिये उदयपुर के महाराणा भीमसिंह से उसकी राजकुमारी रूपकुंवरि का हाथ मांगा। महाराणा भीमसिंह ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। महाराणा ने अपनी एक पुत्री का विवाह बीकानेर के शासक से तथा दूसरी पुत्री का विवाह किशनगढ़ के महाराजा से करना निश्चित किया।

    जब तीनों बारातें उदयपुर पहुँची तो जैसलमेर से आयी बारात को देखकर लोगों में तरह-तरह की चर्चा हुई। बीकानेर एवं किशनगढ़ से राठौड़ शासकों की जो बारातें आयीं थीं वे तो बड़े लाव लश्कर एवं शान-शौकत के साथ आयी थीं किंतु जैसलमेर का राजा एक साण्ड (मादा ऊंट) पर बैठकर आया था। उसके साथ केवल सात आदमी आये थे वे भी साण्डों पर सवार होकर आये थे।

    पूरे उदयपुर में यह बात फैल गयी कि भाटी राजा देखने में तो बड़ा सुंदर और बहादुर है किंतु निर्धन जान पड़ता है। जिस समय महारावल गजसिंह बारात लेकर उदयपुर के लिये रवाना हुआ उस समय सालिमसिंह उसके साथ नहीं था। जब सालिमसिंह को ज्ञात हुआ कि महारावल केवल सात आदमियों को लेकर उदयपुर चला गया है तो सालिमसिंह भी आनन-फानन में साण्ड पर सवार होकर उदयपुर पहुँचा। उदयपुर जाकर जब सालिमसिंह ने उदयपुर के रनिवास में हो रही चर्चा को सुना तो सालिमसिंह ने महारावल की प्रतिष्ठा बचाने के लिये अपने प्रभाव का उपयोग किया और तत्काल ही अपनी थैली का मुँह खोल दिया। जब चंवरी बधाई, त्याग तथा विदाई की रस्में हुईं तो सालिमसिंह ने दोनों हाथों से सोने की मुहरें लुटाईं। जिन्हें देखकर बीकानेर और किशनगढ़ ही नहीं उदयपुर वालों की भी आँखें खुली की खुली रह गयीं। जब विदाई के अवसर पर सालिमसिंह ने सोने की मुहरें लुटाईं तो बीकानेर तथा किशनगढ़ वालों ने तलवारें खींच लीं। इस पर महाराणा ने बीच बचाव करके सालिमसिंह का पक्ष लिया।

    महारावल गजसिंह अपने पिता की तरह सालिमसिंह का अनुशासन स्वीकार करने को तैयार नहीं था। अतः उसने सालिमसिंह से छुटकारा पाने के लिये कई प्रयास किये। अपने बलबूते पर वह कुछ न कर सका। अंत में 1818 में उसने जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता कर लिया तो महारावल की स्थिति कुछ मजबूत हुई।

    ई.1824 में महारावल ने अनासिंह नामक राजपूत को सालिमसिंह की हत्या के लिये तैयार किया तथा उसे एक जहर बुझी तलवारी दी। अनासिंह ने छुपकर सालिमसिंह पर वार किया जिससे सालिमसिंह बुरी तरह घायल हो गया। कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। सालिमसिंह की मृत्यु के बाद महारावल गजसिंह ने उसकी हवेली के तीन हिस्से उतरवाकर धरती पर रखवा दिये। कहने वाले कहते हैं कि सालिमसिंह के घाव उपचार के कारण ठीक होने लगे थे किंतु उसके अत्याचारी स्वभाव से रुष्ट होकर उसकी पत्नी ने ही उसे जहर दे दिया जिससे उसकी मृत्यु हुई।


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