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  • ई.1901 में जोधपुर राज्य में केवल 224 इसाई रहते थे

     02.06.2020
    ई.1901 में जोधपुर राज्य में केवल 224 इसाई रहते थे

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    ई.1901 में मारवाड़ राज्य अथवा जोधपुर राज्य का क्षेत्रफल 34,963 वर्गमील था। क्षेत्रफल के आधार पर राजपूताना में यह राज्य पहले स्थान पर था जबकि जनसंख्या के आधार पर यह दूसरे स्थान पर आता था। जोधपुर राज्य राजपूताना के सर्वाधिक महत्वपूर्ण 4 राज्यों में से एक था तथा भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण 18 राज्यों में से एक था। क्षेत्रफल के मामले में केवल कश्मीर एवं निजाम हैदराबाद ही ऐसी दो रियासतें थी जो मारवाड़ से बड़ी थीं। राजपूताना में बीकानेर को छोड़कर शेष सारे राज्य जोधपुर राज्य से आकार के मामले में आधे से भी कम थे। यूरोप के स्कॉटलैण्ड, आयरलैण्ड तथा पुर्तगाल आदि देश भी जोधपुर रियासत से काफी छोटे थे। भारतवर्ष के बीकानेर, किशनगढ़, ईडर, विजयनगर, झाबुआ, अमझेरा, रतलाम, सीतामऊ तथा सैलाना राज्यों के शासक वंश जोधपुर के शासक वंश में से ही निकले थे।

    जोधपुर राज्य की जनसंख्या वर्ष 1881 में 17 लाख 57 हजार 681, वर्ष 1891 में 25 लाख 28 हजार 178, वर्ष 1901 में 19 लाख 35 हजार 565, वर्ष 1931 में 21 लाख 26 हजार तथा वर्ष 1941 में 25 लाख 55 हजार 904 थी। कुल जनसंख्या में 83 प्रतिशत हिंदू, 7 प्रतिशत जैन, 8 प्रतिशत मुस्लिम तथा 2 प्रतिशत अन्य मतों एवं सम्प्रदायों को मानने वाले लोग रहते थे। 1901 में जोधपुर राज्य में ईसाई धर्म को मानने वाले मात्र 224 व्यक्ति थे। राज्य की जनसंख्या में प्रमुख जातियों का प्रतिशत इस प्रकार से था- जाट 11 प्रतिशत, ब्राह्मण 10 प्रतिशत, राजपूत 9 प्रतिशत, महाजन 9 प्रतिशत, भांभी 7 प्रतिशत, रेबारी 3.5 प्रतिशत, माली 3 प्रतिशत, रावणा राजपूत 3 प्रतिशत तथा कुम्हार 2.5 प्रतिशत। जोधपुर राज्य में कस्बों की संख्या 27 तथा गाँवों की संख्या 4,030 थी। राज्य का प्रशासन महकमा खास की सहायता से महाराजा द्वारा चलाया जाता था। महकमा खास में दो सदस्य होते थे। महाराजा की अनुपस्थिति एवं नाबालिगी में महकमा खास रेजीडंेट की देखरेख में कार्य करता था। राज्य को 23 जिलों में विभक्त किया गया था जिन्हें हुकूमत भी कहते थे। इन पर हाकिम बैठते थे। राज्य के अपने कानून एवं विधान थे। राज्य में 41 दरबार कोर्ट तथा 44 जागीरदारी कोर्ट थे। राज्य के औसत वार्षिक राजस्व वर्ष 1901 में 55 से 56 लाख रुपये, वर्ष 1936 में 146.0 लाख रुपये तथा वर्ष 1945-46 में 216.0 लाख रुपये थी।

    वर्ष 1901 में राज्य की प्रमुख मदों से आय इस प्रकार से थी, नमक से आय- 16 लाख रुपये, कस्टम- 10 से 11 लाख रुपये, भू राजस्व- 8 से 9 लाख रुपये, रेलवे- 8 लाख रुपये तथा जागीरदारों से करों की प्राप्तियां- 3.5 लाख रुपये थी। राज्य का कुल वार्षिक व्यय 36 लाख रुपये था जिसका मदवार विवरण इस प्रकार था- सेना एवं पुलिस पर व्यय- 7.75 लाख रुपये, सिविल एस्टाब्लिशमेंट- 4 लाख रुपये, सार्वजनिक कार्यों पर व्यय- 3 से 4 लाख रुपये, प्रिवीपर्स एवं महलों का व्यय- 3 लाख रुपये, केन्द्र सरकार को कर- 2.25 लाख रुपये। राज्य के 4,030 गाँवों में से 690 गाँव खालसा भूमि के अंतर्गत थे जो कि महाराजा के प्रत्यक्ष प्रबंधन में थे। खालसा भूमि में राज्य की 1/7 भूमि स्थित थी। शेष भूमि जागीरदारों भूमिया एवं इनामदारों में विभक्त थी। सामान्य जागीरदार वार्षिक सैन्य कर देते थे जो जागीर की कुल आय (रेख) का 8 प्रतिशत होता था। प्रति 1,000 की रेख पर एक घुड़सवार देना होता था। छोटे जागीरदारों को प्रति 500 रुपये एक पदाति सैनिक या प्रति 750 रुपये पर एक ऊंट सवार देना होता था। घुड़सवार के स्थान पर दरबार द्वारा निर्धारित राशि चुकानी होती थी। जागीरदार के उत्तराधिकारी को जागीरदार घोषित किये जाने पर जागीर को वार्षिक किराया मूल्य का 75 प्रतिशत हुक्मनामा अदा करना पड़ता था।

    1908 तक राज्य में राजपूताना मालवा रेलवे की 114 किलोमीटर रेलवे लाइन मौजूद थी जो राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग में थी। राज्य की अपनी रेलवे भी थी जो मारवाड़ जंक्शन से लूनी तक जाती थी। एक रेल लाइन हैदराबाद से सिंध तक तथा दूसरी रेल लाइन जोधपुर शहर से उत्तर की ओर मेड़ता रोड एवं कुचामन तक जाकर राजपूताना मालवा रेलवे में मिल जाती थी। मेड़ता रोड से एक लाइन बीकानेर एवं भटिण्डा तक जाती थी। जोधपुर राज्य में लगभग 455 मील रेल लाइन थी जिसका पूंजीगत व्यय 122 लाख रुपये का था। राज्य में 47 मील पक्की सड़कें तथा 108 मील कच्ची सड़कें थीं। इनका रखरखाव राज्य के द्वारा किया जाता था। वर्ष 1885-86 में इम्पीरियल पोस्टल सेवा आरंभ हुई तथा राज्य में 100 ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस एवं 5 तारघर खोले गये थे। राज्य के द्वारा 2 रेजीमेंटों का रख रखाव किया जाता था। एक रेजीमेंट में 605 सैनिक होते थे। स्थानीय सेना में 600 केवलरी (उँट सवारों सहित) 2400 इन्फैण्ट्री, 254 आर्टिलरी तथा 121 बंदूकें थीं। इनमें से 75 बंदूकें (45 फील्ड एवं 30 फोर्ट) काम में आने योग्य थीं।

    जागीरदारों द्वारा 1904-05 में दी गयी सेना इस प्रकार से थी- 1,785 माउण्टेड मैन तथा 234 इन्फैण्ट्री। राज्य में 1889-90 में इम्पीरियल सर्विस रेजीमेण्ट खड़ी की गयी थी जिसे सरदार रिसाला भी कहा जाता था। 1905 से इंसपैक्टर जनरल ऑफ पुलिस के नियंत्रण में पुलिस सेवा आरंभ की गयी जिसमें लगभग 1500 पुलिसकर्मी एवं अधिकारी थे। जोधपुर बीकानेर रेलवे के लिये एक छोटा पुलिस बल अलग से गठित किया गया। साक्षरता के मामले में राजपूताना के 20 राज्यों एवं ठिकाणों में जोधपुर का स्थान दूसरा था। 1901 में राज्य में 5.4 प्रतिशत साक्षरता थी। राज्य की पुरुष साक्षरता दर 10 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता दर मात्र 0.3 प्रतिशत थी। ई.1901 में राजपूताना के राज्यों में सर्वाधिक साक्षरता सिरोही राज्य में थी जहाँ कुल साक्षरता 6.8 प्रतिशत, पुरुष साक्षरता 12.4 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता 0.6 प्रतिशत थी।

    जोधपुर का 35वां राठौड़ शासक सरदारसिंह ई.1895 में 15 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा। उसकी नाबालिगी के कारण शासन व्यवस्था रीजेंसी कौंसिल के द्वारा की जाने लगी। महाराजा का चाचा सर प्रतापंसिंह रीजेंसी कौंसिल का अध्यक्ष बनाया गया। सरदारसिंह के गद्दी पर बैठने के 2 वर्ष बाद ही महारानी विक्टोरिया के शासन का हीरक जयंती उत्सव मनया गया। जोधपुर राज्य की ओर से सर प्रतापसिंह को इस उत्सव में भाग लेने के लिये लंदन भेजा गया। ई.1901 में सरदारसिंह ने लंदन जाकर ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम से भेंट की। राजपूताने के राजाओं में वह प्रथम था जो ब्रिटिश सम्राट से मिलने के लिये लंदन गया। ई.1908 में वायसराय मिंटो के जोधपुर आगमन पर उसका भव्य स्वागत किया गया। ई.1909 में जंगी लाट (लार्ड) किचनर जोधपुर आया। उसे दिखाने के लिये मारवाड़ की हस्तकला की वस्तुएं एकत्र की गईं तथा उन्हें एक स्थान पर प्रदर्शित करने के लिये इण्डस्ट्रीयल म्यूजियम की स्थापना की गई। यह संग्रहालय अब सरदार संग्रहालय कहलाता है। ई.1910 में सरदारसिंह ने गिरदीकोट में घण्टाघर तथा सरदार मार्केट बनवाया। अपने पिता महाराजा जसवन्तसिंह की स्मृति में उसने किले के नीचे जसवन्त थड़ा बनवाया। सरदारसिंह ने ई.1911 तक जोधपुर राज्य पर शासन किया। मात्र 31 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गयी।

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