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  • अंग्रेजों ने पिण्डारी अमीर खां को टोंक का नवाब बना दिया

     21.06.2017
    अंग्रेजों ने पिण्डारी अमीर खां को  टोंक का नवाब बना दिया

    भरतपुर के घेरे में अंग्रेजों से 32 हजार रुपये की रिश्वत खाकर जसवंतराव होलकर को अंग्रेजों को सौंप देने का वचन देने वाला अमीरखां अब भी होलकर की सेना में घुड़सवार सेना का प्रधान बना हुआ था। इतना ही नहीं उसने होलकर से सिरोंज की जागीर भी हथिया ली थी। ईस्वी 1810 में अमीर खां नागपुर के मोर्चे पर लड़ने गया किंतु उसे बीच में ही लौटना पड़ा क्योंकि अंग्रेजों ने उसकी जागीर सिरोंज पर आक्रमण कर दिया था। उन्हीं दिनों जसवंतराव होलकर के मस्तिष्क का संतुलन बिगड़ गया जिससे मालवा का सारा प्रबंध अमीर खां के हाथों में आ गया।

    इस प्रकार पिण्डारियों का नेता अमीर खां जसवंतराव होलकर का सहारा पाकर ऐसी शक्ति बन गया जिसकी उपेक्षा करना अंग्रेजों के वश में भी नहीं रहा। 1817 में अंग्रेजों ने बड़ी सेना लेकर मालवा को घेर लिया। इस युद्ध में अमीरखां परास्त हो गया तथा उसे अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी। इस समझौते के अनुसार अमीरखां ने अपनी अधिकांश सेना ईस्ट इण्डिया कम्पनी को समर्पित कर दी तथा अंग्रेजों ने अमीरखां को टोंक का नवाब मान लिया। इस प्रकार राजपूताने में पहली मुस्लिम रियासत अस्तित्व में आयी।

    सिरोंज, पिड़ावा, गोगला तथा निम्बाहेड़ा की जागीरों को भी अमीरखां की व्यक्तिगत जागीरें मान लिया गया। टोंक तथा रामपुरा के दुर्ग भी उसे दे दिये गये। अंग्रेजों ने अमीरखां की सामरिक शक्ति नष्ट करने के लिये उसकी समस्त तोपें तथा हथियार छीन लिये तथा उनके बदले में अमीर खां को रुपये पकड़ा दिये। अंग्रेजों ने अमीर खां को तीन लाख रुपये नगद दिये ताकि वह अपना राज्य स्थापित कर सके।

    उसके पुत्र को पलवल की जागीर दी गयी। इस जागीर से अमीर खां के पुत्र को प्रतिमाह बारह हजार पाँच सौ रुपये की आय होने लगी। अमीरखां के नवाब बनते ही उसके कई शत्रु स्वतः ही नष्ट हो गये। अब वह उठाई गिरा नहीं रहा था। एक शानदार रियासत का इज्जतदार शासक था। उसे मौलवियों ने घेर लिया तथा इस्लामी कानून के अनुसार राजकाज चलाने के लिये प्रेरित करने लगे। इस समय तक अमीरखां उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गया था जहाँ पहुंच कर वह और अधिक समय तक युद्ध के मैदान और घोड़े की पीठ पर नहीं टिक सकता था।

    जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने ई.1832 में अजमेर में दरबार किया तो अमीरखां ने भी बड़ी शानो शौकत से उस दरबार में भाग लिया। गवर्नर जनरल के दरबार में अमीरखां की भी एक कुर्सी लगी जिसमें जोधपुर, जयपुर, बीकानेर और कोटा जैसी बड़ी-बड़ी रियासतों के शासकों की कुर्सियां लगी हुई थीं। कोटा का फौजदार झाला जालिम सिंह कोटा राज्य को पिण्डारियों एवं मराठों से मुक्त करवाने के लिये किसी बड़े अवसर की तलाश में रहता था। जब उसने देखा कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी पिण्डारियों को घेर रही है तो वह भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी से मैत्री करने की जुगत में रहता था किंतु उसने ई.1804 में कर्नल मौन्सन के प्रति जो व्यवहार दर्शाया था, उसके कारण वह अंग्रजों से दोस्ती का हाथ बढ़ाने में हिचकिचाता था।

    दूसरी ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी अमीरखां के जहरीले दांत तोड़ देने के बाद पिण्डारियों और मराठों की बची-खुची ताकत से शीघ्र ही छुटकारा चाहती थी। इस समय तक कम्पनी झाला जालिमसिंह के मूल्य को अच्छी तरह समझ चुकी थी और यह जानती थी कि जब तक झाला जालिमसिंह की सहायता नहीं मिलेगी तब तक राजपूताने से पिण्डारियों तथा मराठों का सफाया करना संभव नहीं है। ई.1817 में कर्नल टॉड रावठे के मुकाम पर झाला जालिमसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ और निवेदन किया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देश में पिण्डारियों का दमन करके देश में शांति स्थापित करना चाहती है।

    इस समय तक झाला बहुत वृद्ध हो चुका था। उसकी दोनों आँखें बेकार हो गयी थीं तथा उसे कुछ भी दिखायी नहीं देता था। अतः वह कहने वाले के शब्दों पर ही विचार करके उसकी नीयत का पता लगाता था। कर्नल टॉड की बात सुनकर झाला एक मिनट तक चुप रहा और फिर मुस्कुराकर बोला- मैं जानता हूँ कि आज से दस वर्ष बाद सारे भारत में कम्पनी का राज्य होने वाला है। मैं पिण्डारियों को कुचलने में कम्पनी की सहायता अवश्य करूंगा। लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने दो लाख सिपाहियों को पिण्डारियों के विरुद्ध झौंक रखा था। जालिमसिंह ने उसी समय मराठों से अपने सम्बन्ध समाप्त कर लिये तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को कोटा राज्य की तरफ से एक हजार पाँच सौ पैदल सिपाही तथा चार तोपें प्रदान कीं।

    इसके अतिरिक्त विपुल धन राशि, रसद तथा अन्य संसाधन भी उपलब्ध करवाये। जब पिण्डारी नेता करीमखां अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आया तो अंग्रेजों ने फिर से झाला जालिमसिंह के दरबार में हाजरी बजायी। झाला ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति झौंककर करीम खां को पकड़ लिया। जब इस सेवा के बदले में अंग्रेजों ने झाला को चौमहला का परगना जागीर के रूप में देना चाहा तब झाला ने कहा कि मैं तो कोटा राज्य का सेवक हूँ इसलिये आप यह परगना महाराव उम्मेदसिंह को भेंट कर दें। सम्पूर्ण शक्तिसम्पन्न होते हुए भी झाला महाराव का बड़ा आदर करता था। एक बार झाला के पुत्र माधोसिंह ने राजकुमार किशोरसिंह के प्रति कुछ अशिष्टता कर दी। इससे कुपित होकर झाला ने अपने पुत्र को तीन वर्ष के लिये कैद में डाल दिया।

    इस आदर भाव के उपरांत भी जागीरदार लोग झाला के विरुद्ध महाराव के कान भरते रहते थे। एक बार झाला जालिमसिंह बृजनाथजी के मंदिर में दर्शनों के लिये गया। उसी समय वहाँ पर राजकुमार बिशनसिंह तथा पृथ्वीसिंह भी आये। मंदिर का फर्श कुछ गीला था। जब जालिमसिंह ने देखा कि राजकुमार बैठना चाहते हैं तो जालिमसिंह ने अपना दुशाला उतार कर फर्श पर बिछा दिया। राजकुमार उस पर बैठ गये। जब दोनों राजकुमार वहाँ से चले गये तो नौकर ने यह सोचकर दुशाला उठा लिया कि अब जालिमसिंह उस दुशाले को काम में नहीं लेगा। जालिमसिंह ने दुशाला नौकर के हाथ से छीन लिया और कहा कि देखता नहीं इस पर मेरे स्वामी के चरणचिह्न अंकित हो गये हैं। अब इसकी कीमत लाखों रुपये हो गयी है। जालिमसिंह की स्वामिभक्ति एवं स्वामिभक्ति प्रदर्शन के कई किस्से राज्य में प्रचलित थे। फिर भी कोटा राज्य के सरदार तथा कई अन्य लोग जालिमसिंह को जान से मार डालने का उद्यम करते रहते थे।

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