Blogs Home / Blogs / ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ / महाराणा को पिता का श्राद्ध करने के लिये अंग्रेजों की मदद चाहिये थी
  • महाराणा को पिता का श्राद्ध करने के लिये अंग्रेजों की मदद चाहिये थी

     13.07.2017
    महाराणा को पिता का श्राद्ध करने के लिये  अंग्रेजों की मदद चाहिये थी

    ई.1828 में महाराणा भीमसिंह के पौत्र का बहुत कम आयु में निधन हो गया। उसके सदमें से मात्र 14 दिन बाद महाराणा भी चल बसा। उसके 17 रानियां थीं जिनसे उसे कई पुत्र हुए थे किंतु महाराणा की मृत्यु के समय केवल अकेला जवानसिंह ही जीवित बचा था जिसकी आयु 28 वर्ष थी। वही मेवाड़ का 40वां महाराणा हुआ। वह कुंवर पदे में बड़ा मितव्ययी और वचन का पक्का था।

    उसके कहने पर सेठ साहूकार तथा अंग्रेज उसके पिता को रुपये उधार दिया करते थे किंतु गद्दी पर बैठने के बाद जवानसिंह शराब पीने लगा और अपव्ययी हो गया। वचन का भी पक्का न रहा। मुँह लगे नौकरों ने चिकनी चुपड़ी बातों से उसे अपने वश में कर लिया। इन नौकरों ने राज्य को जम कर लूटा जिससे विश्वस्त सेवक राज्य छोड़कर चले गये। महाराणा जवानसिंह के समय में उसके मुँह लगे नौकरों का अन्य राजकीय कर्मचारियों पर बड़ा आतंक रहा। यदि कोई व्यक्ति इन नौकरों की इच्छा के प्रतिकूल आचरण करता तो वह भयानक विपत्ति में फंस जाता था। ईमानदार लोगों को हर समय कैद हो जाने का भय रहता था। ये नौकर राज्य का पैसा हड़प गये जिससे राज्य पर अंग्रेजी खिराज की सात लाख रुपये की रकम चढ़ गयी।

    जवानसिंह की इच्छा थी कि वह अपने पिता महाराणा भीमसिंह का श्राद्ध करने के लिये गया जाये किंतु गयाजी तक जाने के लिये उसके पास साधन और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। ई.1831 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक अजमेर आया। उसने पोलिटिकल एजेण्ट से कहा कि महाराणा को मुझसे मिलने के लिये अजमेर भेजे। महाराणा ने एजेण्ट से कहा कि मुसलमान बादशाहों के समय में भी मुलाकात के लिये हमारा कोई पूर्वज अजमेर या दिल्ली नहीं गया तब मैं अजमेर कैसे जा सकता हूँ?

    इस पर एजेण्ट ने जवाब दिया कि मुगल बादशाह आपके दुश्मन थे, हम आपके मित्र हैं। मित्र से मिलने जाने में कोई बुराई नहीं। मुगल बादशाह अपने दरबार में हाजिर होने वाले राजा को अपना नौकर समझते थे तथा नौकरों जैसा बर्ताव करते थे किंतु गवर्नर जनरल आपसे दोस्ती का व्यवहार करेंगे।

    महाराणा ने अपने सरदारों से विचार विमर्श किया। कुछ सरदारों ने महाराणा के अजमेर जाने पर आपत्ति की किंतु अधिकतर सरदार महाराणा के जाने में कोई बुराई नहीं समझते थे। महाराणा ने सरदारों से कहा कि अंग्रेजो के कारण ही मेवाड़ की मराठों से रक्षा हुई है। शाहपुरे के फूलिया परगने पर जो अंग्रेजी पुलिस बैठी है, वह बैंटिक की दोस्ती के बिना उठाई नहीं जा सकती। मुझे अपने पिता का श्राद्ध करने के लिये गयाजी जाना है जिसके लिये मुझे अंग्रेजी राज्य से होकर गुजरना पड़ेगा। अतः अंग्रेजों की मित्रता की आवश्यकता है। इस पर सरदार संतुष्ट हो गया और महाराणा अजमेर के लिये रवाना हो गया।

    फरवरी 1832 में जवानसिंह अजमेर पहुँचा । वहाँ पहुँच कर उसे ज्ञात हुआ कि अगले दिन बूंदी का राव रामसिंह अजमेर आने वाला है और वह मेवाड़ की सेना के बीच से होकर गुजरेगा। राव रामसिंह के दादा ने महाराणा जवानसिंह के दादा की हत्या की थी इसलिये जवानसिंह की भंवें तन गयीं। उसके आदमियों ने महाराणा को सलाह दी कि बूंदी राव पर आक्रमण कर दें किंतु जवानसिंह ने गवर्नर जनरल को कह भिजवाया कि मेरे दादा का हत्यारा रामसिंह मेरी सेना के बीच से होकर न निकले। गवर्नर जनरल ने बूंदी के राव का मार्ग बदलवाया और झगड़ा होने से बच गया।

    बैंटिक ने महाराणा का भव्य स्वागत किया तथा स्वयं महाराणा के डेरे पर मिलने के लिये आया। इस भेंट में महाराणा ने जो कुछ भी प्रस्ताव बैंटिक के सामने रखा, बैंटिक ने उसे मान लिया। बैंटिक ने महाराणा की तीर्थयात्रा का प्रबंध अंग्रेजी सेना की सुरक्षा में कर दिया। बैंटिक ने महाराणा से प्रार्थना की कि वह बूंदी के राव के साथ मित्रता कर ले। इस पर जवानसिंह ने उत्तर दिया कि बूंदी के राव के दादा ने मेरे दादा की हत्या की थी अतः मैं उससे मित्रता नहीं कर सकता। उससे तो मेरी शत्रुता ही रहेगी।

    ई.1833 में महाराणा 10 हजार सैनिक लेकर अपने पिता का श्राद्ध करने के लिये गयाजी गया। वह वृंदावन, मथुरा, प्रयाग होता हुआ अयोध्या पहुंचा जहाँ लखनऊ के नवाब नासिरूद्दीन हैदर ने उसकी बड़ी खातिरदारी की। वहाँ से बनारस होता हुआ महाराणा गया पहुंचा और अपने तीर्थ गुरु को 10 हजार रुपये, सोना, चांदी आदि दान करके महाराणा भीमसिंह का श्राद्ध किया। इस यात्रा में अंग्रेज सरकार ने महाराणा की बड़ी खातिरदारी की। तीर्थयात्रा के बाद 18 जून 1834 को महाराणा फिर से उदयपुर लौट आया। ई.1837 में नेपाल के महाराजा राजेन्द्र विक्रम शाह ने अपने पूर्वजों की प्राचीन राजधानी के रीति रिवाज देखने के लिये अपने यहाँ से कुछ प्रतिष्ठित पुरुषों एवं स्त्रियों को भेजा। इसके बाद से मेवाड़ तथा नेपाल राज्यों का सम्बन्ध फिर से जुड़ गया।

    30 अगस्त 1838 को सिर दर्द से महाराणा जवानसिंह की मृत्यु हुई। उसके कोई संतान नहीं थी इसलिये बागोर के महाराज शिवदानसिंह के ज्येष्ठ पुत्र सरदारसिंह को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। इसके समय में ई.1839 में भोमट के भीलों ने विद्रोह किया। भीलों पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिये खेरवाड़ा में भील कोर स्थापित की गयी। सरदार सिंह महाराणा जवानसिंह का श्राद्ध करने के लिये गयाजी गया। सरदार सिंह के भी कोई संतान नहीं थी इस पर उसने अपने छोटे भाई सरूपसिंह को गोद लिया। ई.1842 में सरदारसिंह बीमार पड़ा और मृत्यु को प्राप्त हुआ।

    सरूपसिंह के काल में बहुत कम चांदी वाले चित्तौड़ी और उदयपुरी रुपये नकली बनकर बाहर से मेवाड़ में आने लगे। अतः उसने नया सिक्का जारी करने के लिये अंग्रजों से अनुमति मांगी। अंग्रेजी सरकार ने महाराणा को सूचित किया कि राज्य हित में कोई भी कार्य करना आपके अधिकार में है। आपके द्वारा नये सिक्के जारी करने से अंग्रेज सरकार को प्रसन्नता होगी। जब नये सिक्के बनकर तैयार हो जायें तब एक दो सिक्के हमारे देखने के लिये भी भेजें। महाराणा सरूपसिंह ने चांदी की बढ़िया मुद्रा ढलवाई जिस पर उसने नेपाल तथा बजरंगगढ़ (मालवे में राधोगढ़) के अनुकरण पर देवनागरी लिपि अंकित करवायी। इस सिक्के पर महाराणा ने अपना नाम नहीं लिखकर एक तरफ चित्रकूट-उदयपुर लिखवाया तथा दूसरी तरफ 'दोस्ति लंधन’ लिखवाया और नमूने के दो रुपये कर्नल रॉबिन्सन को भिजवाये। अंग्रेजों को यह सिक्का पसंद आया। अतः काफी बड़ी संख्या में ये सिक्के ढाले गये जो सरूपसाही रुपयों के नाम से प्रसिद्ध हैं। चित्रकूट उदयपुर के नीचे चित्तौड़ का दुर्ग बनया गया है तथा दोस्ति लंधन के नीचे छोटी-छोटी लहरें बनायी गयी हैं जो इंगलैण्ड के चारों ओर के समुद्र की लहरों की सूचक हैं। इस नये सिक्के पर महाराणा ने मुसलमान बादशाहों के नाम तथा फारसी लेख नहीं खुदवाये क्योंकि मुसलमानी भाषा वाले सिक्कों को दान पुण्य में देना उसे धर्म विरुद्ध लगता था।

    महाराणा सरूपसिंह का अपने सरदारों से बहुत झगड़ा रहता था। जिस झगड़े से बचने के लिये मेवाड़ ने अपनी स्वतंत्रता का त्याग किया था, वह झगड़ा कभी समाप्त नहीं हुआ। मेवाड़ वीर भूमि है। वहाँ के लोगों में स्वतंत्रता की भावना अधिक है इसलिये प्रत्येक सरदार को लगता था कि उसके ठिकाणे में महाराणा द्वारा किया जाने वाला हस्तक्षेप अनुचित है। इस असंतोष ने मेवाड़ में अंग्रेजों के विरुद्ध भी हवा खराब की। जब 1857 में गदर के बादल उमड़-घुमड़ कर मेवाड़ की भूमि पर से गुजरे तो इन सरदारों में से कइयों ने विद्रोही तेवर अपना लिये।

  • ई.1828 में महार"/> ई.1828 में महार"> ई.1828 में महार">
    Share On Social Media:
Categories
SIGN IN
Or sign in with
 
×
Forgot Password
×
SIGN UP
Already a user ?
×