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  • संधि की शर्तों से बचने के लिए जोधपुर के राजा मानसिंह ने पागल होने का नाटक किया

     05.07.2017
    संधि की शर्तों से बचने के लिए जोधपुर के राजा मानसिंह ने पागल होने का नाटक किया

    क्षेत्रफल की दृष्टि से मारवाड़ रियासत राजपूताने की सबसे बड़ी रियासत थी तथा भारत वर्ष की देशी रियासतों में इसका तीसरा स्थान था। भारत भर में केवल हैदराबाद एवं जम्मू-कश्मीर ही इससे बड़ी रियासतें थीं। जब मारवाड़ में राठौड़ों की तीसवीं पीढ़ी के राजा विजयसिंह (1752-1793) की पासवान गुलाबराय का पुत्र तेजसिंह मर गया तो गुलाबराय ने राजकुमार मानसिंह जो कि विजयसिंह के पुत्र गुमानसिंह का पुत्र था, को अपने पास रख लिया। ई.1793 में विजयसिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसके पौत्र भीमसिंह, जो कि स्वर्गीय राजकुमार फतैसिंह का दत्तक पुत्र था, ने जोधपुर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

    राज्यासीन होते ही उसने अपने भाई-भतीजों को मरवाना आरंभ कर दिया। राजकुमार मानसिंह ने अपने प्राणों की रक्षा के लिये जालोर के दुर्ग में शरण ली। और स्वयं को मारवाड़ का शासक घोषित कर दिया। भीमसिंह की सेना ने 10 वर्ष तक जालोर दुर्ग को घेरे रखा किंतु मानसिंह पकड़ा नहीं जा सका। जब मानसिंह को जोधपुर की सेना से बचने का कोई उपाय न दिखा तो उसने 15 अक्टूबर 1803 को जालोर दुर्ग छोड़ने का विचार किया। जलन्धरनाथ पीठ के योगी आयस देवनाथ ने यह सुना तो उसने मानसिंह से केवल 4-5 दिन और जालोर का किला न छोड़ने का आग्रह किया और कहा कि यदि 21 अक्टूबर तक किला नहीं छोड़ोगे तो मारवाड़ का राज्य तुम्हें मिल जायेगा।

    आयसदेव नाथ की बात सही निकली, 20 अक्टूबर 1803 को जोधपुर नरेश भीमसिंह की मृत्यु हो गई। राजधानी जोधपुर से शिवचंद भण्डारी, ज्ञानमल मुहणोत तथा शंभुदान आदि ने इन्द्रसिंह को संदेश भिजवाया कि घेरा जारी रखा जाये तथा पोकरण ठाकुर सवाईसिंह के आदेश की प्रतीक्षा की जाये किंतु चतुर इन्द्रराज समझ चुका था कि भाग्य को संवारने का यही सबसे अधिक उचित समय है। यदि जोधपुर में प्रवास कर रहे राज्याधिकारी मारवाड़ के राजा का मनोनयन करेंगे तो राजा उनके प्रति समर्पित रहेगा। अतः बेहतर यही है कि मानसिंह को जोधपुर का राजा बना दिया जाये। उसने उसी समय मानसिंह को सब समाचार कह भिजवाये तथा तथा मानसिंह को आदर सहित जोधपुर लाकर मारवाड़ की गद्दी पर बैठा दिया। इसके बाद इन्द्रराज सिंघवी मारवाड़ राज्य का प्रमुख कर्ता धर्ता बन गया। आयस देवनाथ के प्रति श्रद्धानत होकर राजा मानसिंह ने उसे अपना गुरु बनाया और जोधपुर नगर से बहर मेड़ती दरवाजे से कुछ दूरी पर ईशान कोण में एक विशाल भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया जो अपने आकार और महत्ता के कारण महामन्दिर कहलाया।

    मन्दिर परिसर में दो सुन्दर महल भी बनाये गये जिनकी छत पर एक छतरी का निर्माण करवाया गया जहाँ खड़े होकर आयस देवनाथ राजा मानसिंह को प्रातः काल में दर्शन देते थे। राजा दुर्ग में स्थित महलों से ही गुरु के दर्शन करता और उसी के बाद अन्न-जल ग्रहण करता तथा प्रत्येक सोमवार को महामन्दिर में उपस्थित होकर गुरु को प्रणाम करता। महामन्दिर के पास ही मानसागर तालाब बनाया गया जिसमें राजा मानसिंह और आयस देवनाथ नौका विहार किया करते थे।

    राज्य को स्थायित्व देने के लिये महाराजा मानसिंह ने दिसम्बर 1803 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता किया किंतु वह अमल में नहीं लाया जा सका। जोधपुर राज्य में सामंतों का षड़यंत्र चलता रहता था। राजा मानसिंह के समय में भी कई सामंतों की हत्या हो गयी थी। 10 अक्टूबर 1815 को पिण्डारी अमीरखां ने जोधपुर के दुर्ग में घुसकर दिन दहाड़े महाराजा के गुरु आयस देवनाथ तथा राज्य के प्रधानमंत्री इंद्रराज सिंघवी को मार डाला।

    इस हत्याकाण्ड के समय महाराजा मोतीमहल में था, वह तुरंत ही तलवार लेकर दुष्टों का सिर काटने के लिये चल पड़ा किंतु सरदारों ने राजा को वहीं रोक लिया ताकि कोई अनहोनी नहीं हो जाये। इन्द्रराज सिंघवी की सेवाओं को देखते हुए राजा ने उसकी शवयात्रा दुर्ग के मुख्य मार्ग से ले जाने की आज्ञा दी। यह अधिकार केवल राजा, रानी एवं राजकुमारों को ही मिलता था।

    इन्द्रराज की मृत्यु के बाद मानसिंह राज्यकार्य से उदासीन हो गया। उसने इन्द्रराज के भाई गुलराज को दीवान बनाया किंतु 4 अप्रेल 1817 को उसकी भी हत्या हो गयी। इस पर 19 अप्रेल 1817 को भीमनाथ के कहने पर महाराजा मानसिंह ने राज्यकार्य अपने 17 वर्ष के राजकुमार छत्रसालसिंह को सौंप दिया किंतु राजकुमार से राज्य की रक्षा होना संभव न जानकर ई.1818 में महाराजा मानसिंह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से दूसरा समझौता किया जिसके अनुसार जोधपुर रियासत अंग्रेजी शासन के संरक्षण में चली गयी। इस संधि की शर्तें इस प्रकार से थीं-

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महाराजा मानसिंह तथा उसके वंशजों के बीच मैत्री, सहकारिता तथा स्वार्थ की एकता सदा पुश्त दर पुश्त कायम रहेगी और एक के मित्र तथा शत्रु दोनों के मित्र एवं शत्रु होंगे। अंग्रेज सरकार जोधपुर राज्य और मुल्क की रक्षा करने का जिम्मा लेती है। महाराजा मानसिंह तथा उसके उत्तराधिकारी अंग्रेज सरकार का बड़प्पन स्वीकार करते हुए उसके अधीन रहकर उसका साथ देंगे और दूसरे राजाओं अथवा रियासतों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे।

    अंग्रेजी सरकार को बताये बिना और उसकी स्वीकृति प्राप्त किये बिना महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी किसी अन्य राजा अथवा रियासत से कोई अहदनामा नहीं करेंगे परंतु अपने मित्रों एवं सम्बंधियों के साथ उनका मित्रतापूर्ण पत्रव्यवहार पूर्ववत् जारी रहेगा।

    महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी किसी पर ज्यादती नहीं करेंगे। यदि दैवयोग से किसी से कोई झगड़ा खड़ा हो जायेगा तो वह मध्यस्थता तथा निर्णय के लिये अंग्रेज सरकार के सम्मुख पेश किया जायेगा। जोधपुर राज्य की तरफ से सिंधिया को प्रतिवर्ष दिया जाने वाला 1 लाख 8 हजार रुपये खिराज अब सदा अंग्रेज सरकार को दिया जायेगा। अंग्रेजी सरकार इकरार करती है कि सिंधिया अथवा अन्य कोई खिराज का दावा करेगा तो अंग्रेज सरकार उसके दावे का जवाब देगी।

    जोधपुर राज्य को अंग्रेजी सरकार की सहायता के लिये 1500 सवार देने होंगे। जब भी आवश्यकता पड़ेगी राज्य के भीतरी प्रबंध के लिये सेना के कुछ भाग के अतिरिक्त शेष सब सेना महाराजा को अंग्रेजी सेना का साथ देने के लिये भेजनी होगी। महाराजा तथा उसके उत्तराधिकारी अपने राज्य के खुदमुख्तार रईस रहेंगे और उनके राज्य में अंग्रेजी हुकूमत का दखल न होगा।

    ये शर्तें व संधि दिल्ली में लिखी गयी और इस पर चार्ल्स मेटकाफ, व्यास बिशनराम और व्यास अभयराम ने हस्ताक्षर किये। संधि में प्रावधान किया गया कि जोधपुर के युवराज महाराजकुमार छत्रसिंह व महाराजा मानसिंह तथा गवर्नर जनरल की स्वीकृति के पश्चात् 6 माह के भीतर संधि लागू हो जायेगी। हालांकि महाराजा मानसिंह लगातार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पास विगत 13 वर्षों से संधि के लिये निवेदन करता रहा था किंतु वास्तविकता यह थी कि महाराजा को संधि से कुछ लेना देना नहीं था। वह तो उन दुष्ट ठाकुरों और पिण्डारियों से छुटकारा पाने के लिये कम्पनी की सहायता प्राप्त करना चाहता था जो उसे दुःख देते थे। बाद में सन्धि की शर्तों की पालना करने से बचने के लिये महाराजा ने पागल होने का नाटक कर लिया।

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