• तोपों की सलामियों के लिये लड़ते थे राजा

     02.06.2020
    तोपों की सलामियों के लिये लड़ते थे राजा

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    सन् 1858 की घोषणा में रानी विक्टोरिया ने एलान किया था कि भारतीय रियासतों के शासकों को व्यक्तिगत और राजनीतिक तौर पर तोप की सलामियां दी जायेंगी। राजपूताना में 19 राज्यों के शासकों को तोपों की सलामी लेने का अधिकार था। इनमें से उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ एवं शाहपुरा गुहिलोत शासकों के अधीन थीं। बूंदी, कोटा एवं सिरोही पर चौहानों का शासन था। जैसलमेर एवं करौली पर यादवों का शासन था। जयपुर एवं अलवर पर कच्छवाहा राजाओं का शासन था। जोधपुर, बीकानेर, एवं किशनगढ़ पर राठौड़ों का शासन था। भरतपुर एवं धौलपुर पर जाटों का शासन था। झालावाड़ झालों के अधीन था। टोंक राजपूताने की एकमात्र मुस्लिम रियासत थी। कुशलगढ़ तथा लावा को नॉन सैल्यूट स्टेट कहा जाता था। इनके अतिरिक्त केन्द्र शासित प्रदेश (अजमेर-मेरवाड़ा) भी राजपूताना के अंतर्गत आता था।

    राजाओं को उनकी हैसियत के अनुसार तोपों की सलामी की संख्या निश्चित की गयी थी जिनकी संख्या 9 से 21 तक थी। तोपें उस समय दागी जाती थीं जब कोई राजा-महाराजा वायसराय से भेंट करने आता था। रियासतों में शासक या युवराज के जन्मदिन अथवा रियासती दरबार के अवसर पर तोपों की सलामी का प्रचलन था। लगभग 200 भारतीय शासक ऐसे थे जिन्हें तोपों की सलामियां प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।

    राजपूताना की रियासतों में 19 तोपों की सलामी केवल उदयपुर के महाराणा को दी जाती थी। 17 तोपों की सलामी पाने वाले शासकों में बीकानेर के महाराजा, भरतपुर के महाराजा, बूंदी के महाराजा, जयपुर के महाराजा, जोधपुर के महाराजा, करौली के महाराजा, कोटा के महाराव तथा टोंक के नवाब सम्मिलित थे। अलवर के महाराजा, बांसवाड़ा के महारावल, धौलपुर के महाराज-राणा, डूंगरपुर के महारावल, जैसलमेर के महारावल, किशनगढ़ के महाराजा, प्रतापगढ़ के महारावल तथा सिरोही के महारावल को 15 तोपों की सलामी दी जाती थी। झालावाड़ के महाराज-राणा को 13 तोपों की सलामी मिलती थी।

    उदयपुर और जयपुर के महाराजा को अपनी रियासत से बाहर 19 तोपों की सलामी पाने का अधिकार था किंतु वे अपनी रियासत में 21 तोपों की सलामी ले सकते थे। अंग्रेज सरकार द्वारा विभिन्न राज्यों के राजाओं के लिये तोपों की सलामी की संख्या निर्धारित करते समय राजाओं की हैसियत राज्य के आकार, उसकी प्राचीनता, उसकी जनसंख्या अथवा वार्षिक राजस्व आदि तथ्यों से नहीं आंकी गयी थी। अपितु यह हैसियत अंग्रेज सरकार के साथ उस राज्य के सम्बन्धों की स्थिति पर निर्भर करती थी। इस कारण यह घटती बढ़ती भी रहती थी।

    तोपों की सलामी की संख्या राजाओं के बीच कई बार विवाद का विषय बनीं। जब नरेन्द्र मण्डल बना तो उसमें प्रवेश के अधिकार को लेकर भी तोपों द्वारा दी जाने वाली संख्या के आधार पर बखेड़ा खड़ा किया गया। इसी प्रकार संविधान सभा में प्रतिनिधित्व को लेकर भी तोपों की सलामी की संख्या की दुहाई दी गयी। जब नरेन्द्र मण्डल में प्रवेश के आधार को लेकर राजाओं ने बखेड़ा मचाया तो 20 जनवरी 1919 को वायसराय चैम्सफोर्ड ने देशी राज्यों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा- मेरी और मिस्टर मॉण्टेग्यू की राय में सलामियों का पूरा सवाल बड़ी सावधानी से समझने और जांचने की आवश्यकता है, क्योंकि उसमें विषमतायें हैं। हमने तय किया है कि सलामियों की सूची जैसी बनी हुई है उसकी बुनियाद पर अधिक प्रभावशाली रियासतों और शेष रियासतों में कोई मौलिक अंतर मानना बड़ी नासमझी होगी।

    3 नवम्बर 1919 को राज्यों के सम्मेलन में वायसराय चैम्सफोर्ड ने फिर कहा कि मैं और मिस्टर मॉण्टेग्यू दोनों अनुभव करते हैं कि कुछ विषमताओं के कारण सलामियों का विषय जांचने योग्य है। अगर वह सिद्धांत जिसका मैं पक्ष करता हूँ, रियासतों के वर्गीकरण के लिये अपना लिया जाये तो और भी वांछनीय हो जायेगा कि शीघ्र से शीघ्र सलामियों के प्रश्न की जांच की जाये जिससे उसकी वर्तमान विषमताओं का निराकरण हो सके। मेरी सरकार इस विषय पर पूरा ध्यान देने और विचार करने को तैयार है और इस सम्बन्ध मंर भारत सरकार ब्रिटिश सरकार के राज्य सचिव को आवश्यक संस्तुतियां भेजेगी जो यथा अवसर सम्राट को प्रस्तुत की जायेंगी।

    दीवान जरमनी दास ने वायसराय के इस भाषण पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- दुर्भाग्यवश कुछ भी नहीं हुआ। सलामियों का दस्तूर ज्यों का त्यों जारी रहा। उल्टे पिछले दशकों में तरक्कियां दी जाती रहीं। के. एन. हक्सर ने लिखा है- राजा लोग सम्मान तथा अलंकरण पाने के लिये एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने में तथा अपनी मौज शौक के कामों में इतना व्यस्त रहते थे कि उनके पास अपने राज्य के शासन को चलाने तथा अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिये समय नहीं बचता था।

    हेनरी कॉट्स ने अपनी पुस्तक ''इण्डिया इन ट्रांजिक्शन" में लिखा है- ''हमारे भारतीय जागीरदारों से बढ़कर किसी अधिक संवेदनशील समुदाय की कल्पना करना असंभव है। वे लोग आपस में श्रेष्ठता के प्रश्नों पर, सलामियों के बारे में, अपनी फौजी ताकत के बारे में, सामान्य ईष्या द्वेष में एक-दूसरे से जला करते हैं। एक राजा ने मिसाल पेश की तो फौरन दूसरों पर छूत की बीमारी की तरह उसका असर हुआ। मिसाल की नकल होने लगी। कोई पीछे क्यों रहे? वायसराय के आने पर उसकी खातिरदारी, स्वागत- सत्कार, राजभक्ति के प्रदर्शन की पाशविक प्रवृत्तियां, जो विदेशी सरकार से मान्यता प्राप्त करने के अचूक मंत्र थे, सभी बातों में राजा लोग एक दूसरे से मुकाबला करते रहते थे।

    दीवान जरमनी दास ने लिखा है कि राजा लोग बराबर आडम्बर और मूर्खता के वफादार साथी बने रहे। वे बराबर मानवता के तरीके अपनाने से कतराते रहे जिससे विवश होकर कैलाश हक्सर जैसे व्यक्ति को लिखना पड़ा- ''पिछली शताब्दी के बीच या अंत तक, संसार ने रियासतों के राजाओं के मानसिक पतन के दृश्य को देखा है, जो उपाधियां और पदक प्राप्त करने की दौड़ में पूरे उद्यम से एक दूसरे को हराना चाहते थे।"

    ब्रिटिश भारतीय नेतागण विशेषकर कांग्रेसी नेता, भारतीय राजाओं को किसी भी कीमत पर पसंद नहीं करते थे। 13 जून 1933 को जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बहन कृष्णा नेहरू को एक पत्र में अपने मन की कल्पना के बारे में लिखा- मैंने राजाओं, रानियों, उनके अनुगामियों तथा उनके आश्रितों का एक जुलूस देखा जो एक वास्तविक वीभत्स नृत्य में नाच रहे थे। वे भूख से व्यग्र लोगों और अकाल से त्रस्त मानवता के ऊपर नाच रहे थे, और उनका नृत्य एक खड़ी चट्टान के कगार पर जा पहुँचा जहाँ से वे नीचे गिर पड़े तथा दृश्य से गायब हो गये। वे निश्चय ही करुणाजनक चित्र थे, बीते युग के अवशेष, बहादुरी से आभास बनाये रखने का प्रयास कर रहे थे किंतु अपरिहार्य विनाश के दुःखद अंत को प्राप्त हो गये।

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