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  • ब्रिटेन का राजा ईस्ट इण्डिया कम्पनी से उपहार लेता था!

     02.06.2020
    ब्रिटेन का राजा ईस्ट इण्डिया कम्पनी से उपहार लेता था!

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    ई.1818 से 1857 तक देशी रजवाड़ों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से जिन पोलिटिकल एजेण्टों व अधिकारियों की नियुक्ति हुई उनके बारे में भी कुछ जान लेना उचित रहेगा। इस काल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा नियुक्त पोलिटिकल एजेण्टों से लेकर अजमेर में पदस्थापित राजपूताना का ए. जी. जी. (एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल) तथा दिल्ली में पदस्थापित रेजीडेण्ट तक आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए थे। इनकी नियुक्ति ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सिविल सेवाओं के अधिकारियों तथा भारतीय सेना के अंग्रेज अधिकारियों में से होती थी।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अंग्रेज अधिकारियों में घूसखोरी, भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता, दलाली तथा निजी व्यापार का बोलबाला आरंभ से ही था। दूसरी ओर कम्पनी के भारतीय कर्मचारियों में उत्तरदायित्व की भावना तथा योग्यता का नितांत अभाव था।

    देशी रजवाड़ों में जो भारतीय अधिकारी एवं कर्मचारी नियुक्त थे उनमें से भी अधिकांश परले दर्जे के निकम्मे और भ्रष्ट थे। वे बात-बात पर षड़यंत्र रचते तथा एक दूसरे के प्राण लेने के लिये उद्धत रहते थे। यही कारण था कि जहाँ अंग्रेज जाति भारतीयों को नीच और गरिमाहीन कहकर पुकारती थी वहीं भारतीय लोग अंग्रेजों को पैसों के लुटेरे और वादा करके मुकरने वाले मानते थे। चार्ल्स ग्राण्ट ने भारतीयों के बारे में लिखा है- यह मनुष्यों की अत्यंत पतित और निकृष्ट नस्ल है जिसमें नैतिक जिम्मेदारी नाममात्र की भावना भर रह गयी है..... जो अपने दुर्गुणों के कारण विपन्नता में धंस गयी है।

    कम्पनी में नियुक्त होकर आये अंग्रेज अधिकारियों का उद्देश्य भारत से अधिकाधिक धन अर्जित कर अपने देश को लौट जाना था ताकि उनका शेष जीवन आराम से तथा बिना कोई काम किये कट जाये। इस क्रम में अक्सर थॉमस पिट (ई.1643-1726) का उदाहरण दिया जाता था जो सुप्रसिद्ध विलियम पिट का पितामह था। निर्धन थॉमस पिट ने भारत से इतना धन बटोरा था कि वह इंग्लैण्ड के उल्लेखनीय धनपतियों में गिना जाने लगा था।

    अधिकाधिक धन बटोरने की लालसा में अंग्रेज अधिकारियों ने कम्पनी के कारोबार के साथ-साथ अपने निजी कारोबार भी खड़े कर लिये थे एवं खुल्लमखुल्ला घूस, रिश्वत, कमीशन, भेंट, उपहार, ग्रेटीट्यूड तथा टिप लिया-दिया करते थे। कई बड़े अधिकारी स्वयं रिश्वत या उपहार स्वीकार न कर अपनी मेम के माध्यम से यह कार्य किया करते थे।

    ठेकेदारों तथा माल आपूर्तिकर्ताओं से अंग्रेजी साहब द्वारा ली जाने वाली रिश्वत की रकम मेमें तय किया करती थीं। अधिकांश रिश्वत गोरी मेमों के लिये हीरों के हार, अंगूठियां, सोने चांदी के बरतन तथा शेर-चीतों की खालों के रूप में ली जाती थी। हिन्दुस्तानी व्यापारियों की ओर से त्यौहारों पर मिठाई, फल, कपड़े, बच्चों के खिलौने तथा रेशम के थान बड़ी भारी मात्रा में अंग्रेज अधिकारियों को भेंट किये जाते थे।

    ध्यान देने वाली बात यह है कि चूंकि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ई.1600 से 1765 तक एक व्यापारिक कम्पनी थी इसलिये उसे ब्रिटेन में स्थित सरकारी अधिकारियों से अपने अनुकूल कानून बनवाने तथा उन्हें अपने पक्ष में लागू करवाने के लिये ब्रिटिश सरकारी अधिकारियों को महंगे उपहार तथा ब्याज रहित कर्ज देने पड़ते थे। इसलिये भारत में नियुक्त होकर आने वाले अंग्रेजों में वह परम्परा चलती आयी थी।

    ई.1693 में की गयी ब्रिटिश संसदीय जांच के अनुसार केवल उपहार के मद में कम्पनी द्वारा एक वर्ष में 90,000 पौण्ड खर्च किये गये थे जिनमें से ड्यूक ऑफ लीड्स को 5,000 पौण्ड तथा ब्रिटेन के सम्राट विलियम तृतीय को 10,000 पौण्ड की रिश्वत दी गयी थी।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में मुगल शहजादों से लेकर छोटे जागीरदारों, असंतुष्ट राजकुमारों, रजवाड़ों के सेनापतियों एवं दुर्गपतियों को खुल कर रिश्वत दी और अवसर आने पर खुल कर रिश्वत ली। युद्ध के मैदानों में भी उन्होंने तोप में बारूद डालने की बजाय हिन्दुस्तानी सैनिकों की जेबों में रिश्वत के सिक्के भरने पर अधिक जोर दिया।

    जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी रिश्वत या उपहार देते थे तो उस राशि को कम्पनी के खातों में खर्च दिखाया जाता था किंतु जब कम्पनी के अधिकारी रिश्वत या उपहार लेते थे तो उसे अपनी जेब में रख लेते थे।

    ईस्ट इण्डिया कम्पनी में बकायदा दलालों की नियुक्ति होती थी जो भारतीय राजाओं और नवाबों से सम्पर्क रखते तथा उन्हें महंगे उपहार, विदेशी शराब तथा गोरी वेश्याएं उपलब्ध करवाकर कम्पनी के लिये व्यापारिक एवं सामरिक संरक्षण प्राप्त करते थे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी में नियुक्त होने वाले अंग्रेज अधिकारियों एवं कर्मचारियों को कम्पनी से वेतन पाने के साथ-साथ अपना निजी व्यवसाय चलाने की भी अनुमति दी जाती थी। यहाँ तक कि वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के माल की बिक्री पर भी दलाली खाते थे।

    कई गवर्नर जनरलों ने कम्पनी के अधिकारियों एवं कामकाज में सुधार लाने के लिये प्रयास किये किंतु उन्हें आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई। चूंकि कम्पनी में बड़े पदों पर उच्च एवं अभिजात्य वर्ग के परिवारों से सम्बन्ध रखने वाले अंग्रेज युवक नियुक्त होते थे इसलिये उन पर अंगुली उठा पाना तथा उन पर शिकंजा कसना कम्पनी के अधिकारियों के वश में नहीं होता था।

    गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस (ई.1786-1797) की मान्यता थी कि कर्मचारियों का वेतन कम होने से वे घूस, उपहार तथा निजी व्यापार का मार्ग अपनाते हैं। इसलिये उसने रिश्वत, उपहार एवं निजी व्यापार को निषिद्ध घोषित कर दिया तथा जिले के कलक्टर का वेतन 1200 रुपये प्रतिमास से बढ़ाकर 1500 रुपये प्रतिमाह कर दिया। उसे 150 रुपये निवास गृह का किराया भी दिया जाने लगा। भूमिकर की वसूली पर उसे 10 लाख रुपये तक एक प्रतिशत तथा इससे अधिक वसूली होने पर आधा प्रतिशत कमीशन दिया जाने लगा। ऐसी वेतन वृद्धि अन्य कर्मचारियों के लिये भी की गयी।

    इस वेतन वृद्धि का परिणाम यह हुआ कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नागरिक सेवा विश्व में सर्वाधिक वेतन देने वाली हो गयी। कार्नवालिस के समय में न्यायाधीशों में रिश्वतखोरी की बड़ी बीमारी थी इसलिये कार्नवालिस ने न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्तों में भी अत्यधिक वृद्धि की। ईस्ट इण्डिया कम्पनी में जब कभी भी भ्रष्टाचार समाप्त करने की मुहिम चलाई जाती थी तो उच्च अंग्रेज अधिकारियों पर शिकंजा कसने के बजाय छोटे पदों पर नियुक्त भारतीय कर्मचारियों की धर पकड़ की जाती थी। लार्ड कार्नवालिस भारतीयों पर कतई विश्वास नहीं करता था। उसका मानना था कि भारत का हर निवासी भ्रष्ट है।

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