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  • लोहे के पिंजरे में सोता था झाला जालिमसिंह

     22.06.2017
    लोहे के पिंजरे में सोता था झाला जालिमसिंह

    झाला जालिम सिंह 21 वर्ष की आयु से कोटा राज्य की रक्षा और सेवा करता आ रहा था। ईस्वी 1764 में उसने कोटा को जयपुर के दांतों में पिस जाने से बचाया था। महाराव शत्रुशाल (द्वितीय) झाला जालिमसिंह पर जान छिड़कते थे। यही कारण था कि सामंत लोग ईष्यावश जालिमसिंह के विरुद्ध महाराव गुमानसिंह के कान भरा करते थे और महाराव ने झाला को देश निकाला दे दिया था किंतु जब गुमानसिंह ने कोटा को मराठों के मुँह में जाते हुए देखा तो फिर से जालिमसिंह को कोटा बुलाया।

    जालिमसिंह ने कोटा को न केवल मराठों की दाढ़ में जाने से रोका अपितु पिण्डारियों से भी कोटा राज्य की जनता को सुरक्षित किया तथा 1817 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कंधे से कंधा मिलाकर पिण्डारियों का सफाया करवाया। महाराव उम्मेदसिंह की उसने कई विपत्तियों से रक्षा की थी। जसवंतराव होलकर जैसे दुर्दांत मराठा सरदार से उसने केवल तीन लाख रुपयों के बदले में कोटा राज्य को बचा लिया था।

    जिस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी राजपूताने में पैर फैला रही थी उस समय झाला जालिमसिंह राजपूताने का सर्वाधिक समझदार और सामर्थ्यवान राजपुरुष था। वह राजा नहीं था किंतु अनेक राजा उससे मित्रता करने के लिये तरसते थे, यहाँ तक कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी उससे मित्रता करने को उत्सुक थी। यद्यपि जयपुर और मेवाड़ की आंख कोटा पर लगी रहती थी फिर भी जालिमसिंह राजपूताने से मराठों को निकलने के लिये इतना तत्पर रहता था कि जब कभी भी मराठे जयपुर या मेवाड़ पर आक्रमण करते थे, जालिमसिंह कोटा राज्य की सेना को जयपुर या मेवाड़ की सहायता के लिये भेजता।

    एक बार मराठों ने चारों ओर से मेवाड़ को घेर लिया। तब झाला जालिमसिंह स्वयं सेना लेकर मराठों से जा भिड़ा और उन्हें मार भगाया। जब पठानों ने उदयपुर के महाराणा पर नंगी तलवारें लेकर आक्रमण किया तो जालिमसिंह भी अपनी तलवार लेकर महाराणा तथा पठानों के बीच में आ गया। उसने पठानों को समझा बुझा कर शांत किया।

    पाठक भूले नहीं होंगे कि एक बार मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए जालिमसिंह झाला को मराठों ने कैद कर लिया था तब जालिमसिंह के मित्र एवं मराठा सरदार इंगले ने 60 हजार रुपये देकर जालिमसिंह को मराठों की कैद से मुक्त करवाया था। उस ऋण को उतारने के लिये जालिमसिंह मेवाड़ जैसे प्रबल राज्य से भी टकराने में नहीं हिचकिचाया। यह उसके उज्ज्वल चरित्र की पराकाष्ठा थी।

    कहा जाता है कि जब मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह ने इंगले के भाई भालेराव को कैद कर लिया। जालिमसिंह ने भालेराव को छुड़वाना अपना परम कर्तव्य समझा और वह मेवाड़ आया। जालिमसिंह ने महाराणा से प्रार्थना की कि भालेराव को मुक्त कर दिया जाये। महाराणा ने भालेराव को छोड़ने से मना कर दिया। इस पर जालिमसिंह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में मेवाड़ बुरी तरह परास्त हुआ।

    महाराणा को जालिमसिंह से संधि करनी पड़ी और भालेराव को मुक्त कर देना ना पड़ा। इस युद्ध में हुए व्यय को पूरा करने के लिये जालिमसिंह ने मेवाड़ राज्य से जहाजपुरा का दुर्ग तथा जहाजपुरा का परगना छीन लिये एवं युद्ध में हुई हानि की भरपाई के लिये महाराणा से ईंटोदा, सकरगढ़, कोटड़ी तथा हस्तड़ा परगनों के पट्टे प्राप्त किये। इस सब के बदले में झाला जालिमसिंह ने महाराणा को 71 लाख रुपये का कर्जा ब्याज पर दिया।

    ई.1814 में कर्नल टॉड ने ये परगने जालिमसिंह के अधीनस्थ अधिकारी बिशनसिंह से प्राप्त कर पुनः मेवाड़ में मिलाये। राज्य के बहुत सारे लोग जालिमसिंह के दबदबे से ईष्या रखते थे और उसके प्राणों के शत्रु बने हुए घूमते थे। उनका कहना था कि जालिमसिंह ने बलपूर्वक कोटा पर अधिकार कर रखा है।

    इन दुष्टों से बचने के लिये जालिमसिंह शिकार पर जाते समय, नहाते समय, भोजन करते समय तथा सोते समय विशेष ध्यान रखता था। फिर भी उस पर अनेक बार प्राण घातक हमले हुए और वह हर हमले में बच निकला। एक बार उसे मारने के लिये महाराव की दासियों ने षड़यंत्र रचा और उसे किसी बहाने से बुलाकर महल के जनाने हिस्से में ले गयीं। एक दासी ने जालिमसिंह को जनाना महल में देखा तो वह जोर से चिल्लाई- ''तू यहाँ कहाँ आ गया, मारा जायेगा। जान प्यारी है तो भाग जा।" जालिमसिंह तुरंत खतरे को भांप गया और बाहर भाग आया।

    जालिमसिंह लोहे के पिंजरे को भीतर से बंद करके सोया करता था ताकि कोई उसे शस्त्रहीन अवस्था में न मार डाले। फिर भी जान जाने का भय बना रहता था। जब ई.1817 में कोटा राज्य और अंग्रेजों के मध्य संधि हुई तो जालिमसिंह ने उस संधि में अपने लिये कुछ नहीं लिखवाया।

    उसकी स्वामिभक्ति को देखकर अंग्रेजों को बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने अपनी ओर से संधि पत्र में दो शर्तें बढ़ा दीं जिनके अनुसार महाराव उम्मेदसिंह और उसके वंशज कोटा राज्य के निर्विवाद राजा माने गये तथा झाला जालिमसिंह और उसके वंशज स्थायी रूप से कोटा राज्य के संपूर्ण अधिकार युक्त राजमंत्री माने गये। ये शर्तें गुप्त रखी गयीं।

    ई.1817 में जब कर्नल टॉड पहली बार झाला जालिमसिंह की सेवा में उपस्थित हुआ उस समय तक जालिमसिंह की आयु 75 वर्ष के लगभग हो चुकी थी। उसकी दोनों आँखें चली गयी थीं। 1819 में महाराव उम्मेदसिंह की मृत्यु हो गयी तथा किशोरसिंह महाराव हुआ। झाला जालिमसिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा राज्य का फौजदार बनाया गया।

    जालिमसिंह की एक मुस्लिम उपपत्नी थी जिससे गोरधनदास नाम का पुत्र था। वह बड़ा ही नमक हराम किस्म का व्यक्ति था। जब उसने देखा कि जालिमसिंह ने अपनी हिन्दू पत्नी से उत्पन्न पुत्र माधोसिंह को कोटा का फौजदार नियुक्त किया है तो उसने अपने बाप जालिमसिंह के विरुद्ध महाराव किशोरसिंह के कान भरे। गोरधनदास के भड़काने पर किशोरसिंह ने कम्पनी सरकार को लिखा कि वह जालिमसिंह को उसके पद से हटा रहा है। इस पर कम्पनी के पोलिटिकल एजेण्ट ने जवाब दिया कि महाराव तो कोटा का नाम मात्र का शासक है, वास्तविक शासक तो जालिमसिंह है।

    कोटा का महाराव किशोरसिंह अपने आप को सतारा के राजा तथा मुगल बादशाह से अधिक अच्छी स्थिति में न समझे। इस पर किशोरसिंह, पृथ्वीसिंह तथा गोरधन दास ने जालिमसिंह के विरुद्ध सैनिक अभियान करने का निर्णय किया। कहने को तो किशोरसिंह कोटा राज्य का महाराव था किंतु किंतु वास्तविकता यह थी कि विगत 50 वर्षों से कोटा राज्य झाला जालिमसिंह की छत्रछाया में ही पल रहा था। अतः महाराव किशोरसिंह तथा उसके साथियों की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिये पोलिटिकल एजेण्ट ने राजमहल पर पहरा बैठा दिया। इस पर किशोरसिंह, पृथ्वीसिंह तथा गोरधन दास राजमहल से भाग कर रंगबाड़ी चले गये तथा जालिमसिंह पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगे।

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