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  • झाला मदनसिंह को काले कपड़े पहनाकर कोटा राज्य से विदा किया गया

     15.07.2017
    झाला मदनसिंह को काले कपड़े पहनाकर  कोटा राज्य से विदा किया गया

    ई.1824 में कोटा राज्य के प्रतापी फौजदार झाला जालिमसिंह की मृत्यु हो गयी। उसका पुत्र झाला माधोसिंह पहले से ही कोटा राज्य का दीवान था। ई.1828 में महाराव किशोरसिंह की भी मृत्यु हो गयी तथा उसका भतीजा रामसिंह कोटा का राजा बना। जब ई.1831 में रामसिंह, भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के दरबार में भाग लेने के लिये अजमेर गया तो माधोसिंह भी उसके साथ गया। गवर्नर जनरल ने माधोसिंह को चंवर प्रदान किये। ई.1833 में झाला माधोसिंह मर गया तथा उसका पुत्र झाला मदनसिंह कोटा राज्य का दीवान बना।

    माधोसिंह ने शासन की समस्त शक्तियां अपने हाथ में रखते हुए भी अपने पिता जालिमसिंह के कहने पर सदैव महाराव का सम्मान किया तथा यह कभी अनुभव नहीं होने दिया कि महाराव स्वामी नहीं है या माधोसिंह सेवक नहीं है किंतु माधोसिंह के पुत्र मदनसिंह में अपने पितामह एवं पिता जैसी विनम्रता नहीं थी। उसने समस्त राजकीय चिह्न धारण कर लिये। जब वह नगर में प्रवेश करता अथवा बाहर निकलता तो राजा की तरह तोपों की सलामी लेता। उसका जन्मदिन पूरे राज्य में समारोह पूर्वक मनाया जाता। राजकीय आदेशों में उसका नाम राजाओं की तरह लिखा जाने लगा। धीरे-धीरे वह महाराव की आज्ञा का उल्लंघन करने लगा। इस पर ई.1834 में कोटा नरेश रामसिंह ने कम्पनी सरकार से दीवान मदनसिंह की शिकायत की।

    1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कोटा नरेश के साथ जो संधि की थी उसके अनुसार कोटा नरेश और उनके अधिकारी कोटा के महाराव बने रहने थे तथा इस संधि की गुप्त शर्तों के अनुसार झाला जालिमसिंह के वंशज कोटा राज्य के दीवान बने रहने थे। कोटा नरेश को यह अधिकार नहीं था कि वह अपनी मर्जी से किसी को कोटा राज्य का दीवान बना सके। संधि की गुप्त शर्त यह कहती थी कि कोटा नरेश तो राज्य के नाम मात्र के अथवा दिखावे के ही शासक हैं, राज्य के असली स्वामी झाला जालिमसिंह तथा उसके उत्तराधिकारी हैं।

    महाराव रामसिंह जैसे भी हो सके, अब झालों से पीछा छुड़ाना चाहता था। जब पोलिटिकल एजेण्ट तथा ए.जी.जी. ने उसकी बात नहीं सुनी तो वह मामले को गवर्नर जनरल की कौंसिल तक ले गया। अंग्रेजों ने इस शर्त पर मदनसिंह को कोटा राज्य के दीवान के पद से हटाना स्वीकार किया कि झाला जालिमसिंह के शासनाधिकार वाले क्षेत्रों को कोटा राज्य से काटकर एक नया राज्य बनाया जाये और मदनसिंह को उस राज्य का राजा बनाया जाये। रामसिंह ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

    अंग्रेजों ने मदनसिंह के लिये जो राज्य प्रस्तावित किया उसकी आय 5-6 लाख रुपये वार्षिक थी किंतु मदनसिंह इस राज्य से संतुष्ट नहीं हुआ। उसने एक जाली पत्र तैयार करके पोलिटिकल एजेण्ट लडलू को दिखाया। इस पत्र में महारावल उम्मेदसिंह द्वारा झाला जालिमसिंह के नाम से यह लिखा हुआ था कि गद्दी हमारे हाथ में रहेगी और शासन तुम्हारे हाथ में। यदि हमारे वंशज कभी अलग होना चाहेंगे तो तुमको राज्य का इतना बड़ा हिस्सा दिया जायेगा जिससे आय 12 लाख रुपये सालाना हो। यह जानते हुए कि पत्र नकली है, लडलू ने उसे स्वीकार कर लिया। रामसिंह भी मान गया। शासन के सारे सूत्र मदनसिंह के हाथ में थे ही, उसने कागजों में हेरा फेरी करके 15 लाख की आय वाले परगने अपने हिस्से में कर लिये।

    जब मदनसिंह अंतिम बार महाराव को प्रणाम करने आया तो क्रुद्ध रामसिंह ने उसे काला घोड़ा और काले कपड़े प्रदान किये। मदनसिंह ने बिना कोई उत्तेजना दिखाये उन काली वस्तुओं को स्वीकार कर लिया जो कि राज्य से निष्कासित किये जाने वाले राजपुरुषों को सजा के रूप में प्रदान की जाती थीं। उन काली वस्तुओं को धारण करके तथा तथा महाराव को अभिवादन करके मदनसिंह काले घोड़े पर सवार होकर सूरजपोल से बाहर निकला। कोटा नगर से एक मील दूर उसके सैनिक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वहाँ से वह नये वस्त्र धारण करके हाथी पर बैठा चंवर होने लगे। चौबदार नकीब बोलने लगे और वह नरेश की भांति छत्र तथा चंवर धारण करके अपने पाटन स्थित महलों में चला गया।

    इस प्रकार मदनसिंह के पितामह के समय से कोटा राज्य के साथ झालों का जो सम्बन्ध चला आ रहा था वह अपने अंत को प्राप्त हुआ। झालों का एक स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में आ गया जिसका नाम झालावाड रखा गया। झालरापाटन को इस नये राज्य की राजधानी बनाया गया। इस राज्य में 17 परगने थे। बहुत से जागीरदार जिनकी जागीरें झालावाड़ राज्य में चली गयीं वे कोटा राज्य की सेवा में चले आये तथा नयी जागीरें मांगने लगे। इस पर कोटा महाराव ने उन्हें तीन लाख रुपये की जागीरें प्रदान कीं।

    8 अप्रेल 1838 को झालावाड़ नरेश मदनसिंह तथा अंग्रेज सरकार के बीच एक संधि हुई जिसके अनुसार मदनसिंह की राजराणा की उपाधि स्वीकार कर ली गयी। उसका दर्जा राजपूताने के दूसरे राजाओं के समक्ष माना गया। उसके वंशजों को झालावाड़ राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी माना गया। इस सबके बदले में मदनसिंह ने अंग्रेज सरकार को अपने राज्य का संरक्षक स्वीकार कर लिया तथा उनसे पूछे बिना किसी अन्य राज्य से शत्रुता अथवा मित्रता न करने का वचन दिया।

    झालावाड़ राज्य द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 80 हजार रुपये वार्षिक खिराज दिया जाना निश्चित हुआ। आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता देने का भी वचन दिया गया। ई.1845 में मदनसिंह की मृत्यु हो गयी तथा उसका पुत्र झाला पृथ्वीसिंह झालावाड़ राज्य का राजराणा बना। ई.1818 से 1857 तक राजपूताना के राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के संरक्षण में रहे। इस काल में राजपूताना में दो नये राज्य अस्तित्व में आये- टोंक तथा झालावाड़। इनमें से टोंक राज्य के अस्तित्व में आने की कहानी पहले की कड़ियों में लिखी जा चुकी है।

    ई.1870 में गवर्नर जनरल लार्ड मेयो अजमेर आया। उसने राजपूताने के समस्त राजाओं को अजमेर दरबार में आमंत्रित किया। झालावाड का राजराणा झाला पृथ्वीसिंह को भी इस दरबार में आमंत्रित किया गया। राजपूताने का कोई भी राजा पृथ्वीसिंह को राजा मानने के लिये तैयार नहीं था। न ही उसे कोई अपने पास बैठाने को तैयार था। झाला पृथ्वीसिंह ने हाड़ौती के पोलिटिकल एजेण्ट से कहा कि आप महाराणा से मेरी भेंट करवा दें। मैं उन्हें प्रसन्न कर लूंगा। यदि उन्होंने मुझे राजा स्वीकार कर लिया तो फिर हिन्दुस्थान के किसी राजा की हिम्मत नहीं है जो मेरी उपेक्षा कर सके। जब हाड़ौती के पोलिटिकल एजेण्ट ने महाराणा शंभुसिंह के समक्ष यह प्रस्ताव रखा तो मेवाड़ के सरदारों ने इस बात पर आपत्ति व्यक्त की कि झाला पृथ्वीसिंह महाराणा से राजाओं की तरह मिलेगा। इस पर महाराणा ने पृथ्वीसिंह से भेंट करने से मना कर दिया।

    पृथ्वीसिंह अंग्रेजों के पीछे लगा रहा। अंत में सारे अंग्रेज अधिकारी महाराणा के समक्ष एकत्र हुए और विनती की कि आप झाला पृथ्वीसिंह से भेंट करके अंग्रेजों की इज्जत बचायें तथा हमारे बनाये हुए राजा को राज स्वीकार करें। महाराणा ने अजमेर से रवाना होने वाले दिन पृथ्वीसिंह को बुलवाया और उसे कोटा के राजा के समान आदर देते हुए अपनी बाईं तरफ की गद्दी पर बैठाया। महाराणा ने पृथ्वीसिंह को यह छूट भी दी कि वह मोरछल, चंवर तथ अन्य लवाजमे के साथ दरबार आये। महाराणा ने पृथ्वीसिंह को हाथी, घोड़े खिलअत तथा जेवर भी प्रदान किये। इसके बाद झालावाड़ के राजराणा को राजपूताने के समस्त शासकों ने राजा स्वीकार कर लिया।

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